पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव।कहानी संग्रहटुकड़ेटुकड़े धूपऔर फुगाटी का जूताप्रकाशित।

पूरे गांव के लोग परेशान थे।उनकी आंखों की कोरों में खौफ टिका रहता।चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ नजर आतीं।डर उनके आसपास हरदम पसरा रहता।उनके दिमाग में आशंकाएं हमेशा खदबदाती रहतीं।सुबह-शाम खबरें मिलती रहतीं।उनके कान ऐसी खबरों के लिए चौकन्ने रहते।हर बुरी खबर के साथ उनकी हिम्मत थोड़ी और पस्त हो जाती।इस तरह वे धीरे-धीरे पस्त होते जा रहे थे।खबरें उन्हें भयभीत करतीं।एक तो विपदा की घड़ी और दूसरे खबरों की तफसील।सुनाने वाले कुछ इस अंदाज में सुनाते कि दिल बैठने लगता।सांसें थमने लगतीं।

बूढ़ों और कमजोर दिल वालों ने तो बाहर निकलना ही लगभग बंद कर दिया था।वे अपने घर की चौहद्दी में जिंदगी गुजारने को मजबूर थे।जो कुछ हिम्मती लोग इन सबके बावजूद गलियों में चहल-कदमी कर लिया करते थे, वे भी पूरी तरह चाक-चौबंद रहा करते।उनकी निगाहें दूर गली के मुहाने तक बनी रहती।किसी भी आपात स्थिति के लिए वे अपने पास तमाम विकल्प मौजूद रखते।

यह कोई नई बात नहीं थी।गांव में इससे पहले भी ऐसी कई विपदाएं आ चुकी थीं।आती ही रहती थीं, पर वे लोग अपनी सामूहिकता के बल पर इनका सामना करते रहे थे।सदियों से कई बार उन्होंने जंगली जानवरों, अकाल-सूखे, बाढ़-बारिश, ओले-भूकंप, देवता के प्रकोप, सरकारी यातनाओं और भूत-प्रेतों के डर के बावजूद अपने जीवन को सहेज रखा था।वे भूखे पेट रहकर भी नाचते-गाते और हँसते-खिलखिलाते थे।प्रकृति के साथ वे हमेशा खुश बने रहते।

ऐसा भी नहीं कि इसका निदान उनके हाथ में नहीं था, चाहते तो इसका हल भी वे खुद कुछ ही घंटों में निकाल सकते थे।लेकिन उनके चाहने भर से क्या होता।और इसमें सबसे बड़ा पेंच तो यह था कि बीच में सरकार थी।सरकार का दखल बीच में न होता तो हालात यूं खराब न हुए होते।वे सबकुछ झेल सकते थे, मौसम और प्रकृति का कोप सहन कर लेते थे, जंगली जानवरों से मुठभेड़ कर सकते थे, जहरीले  सांप-बिच्छुओं से बच सकते थे, विषम से विषम परिस्थितियों में रह सकते थे, लेकिन सरकार से बहुत डरते थे।यह डर उनके पुरखों से होता हुआ उनके भीतर तासीर में शामिल हो गया था।

उनका बस चलता तो वे अपनी बात सरकार के सामने भी रखते पर इसमें दिक्कत यह थी कि वे सरकार को जानते ही नहीं थे।उन्होंने सरकार को कभी देखा नहीं था।वे सोचते, सरकार भी अजीब है।न कहीं दिखती है, न सुनाई देती है।हवा की तरह बस सिर्फ महसूस होती है।वे पशोपेश में थे कि अपनी पीड़ा कहना भी चाहें तो किससे कहें।कौन सुनेगा उनकी बात।कितना अच्छा होता कि आदमी की तरह सरकार के भी दो कान होते और दो आंखें भी।कान लोगों की बातें सुनते और आंखें उनके दुख-दर्द देख पातीं।खैर।अब सरकार तो सरकार है।और सबसे बड़ी बात कि हम सब उसे ही सरकार मानते हैं तो फिर यह मलाल भी मन में लाना ठीक नहीं।

सरकार चाहे न देख सके और न ही सुन सके पर यह सांड तो सब कुछ देख सकता है, सुन सकता है।इसके कान हैं और बड़ी-बड़ी आंखें भी।सांड तो गांवों में हजारों सालों से रहते आए हैं।जब से इस धरती पर मनुष्य ने रहना सीखा होगा, सांड तब से उसके साथ रहता आया था।जब से उसने खेती करना सीखा, गाय, बैल और सांड उसके साथ रहे।सिंधु घाटी सभ्यता में तो मुद्राओं पर भी छोटे सींगों और कूबड़ वाले सांड मिलते हैं।कृषितंत्र के सबसे मजबूत आधार के रूप में तब इन्हें पूजनीय माना जाता था।सांडों की लड़ाई भी उन्होंने बहुत देखी थी।कुछ देशों में तो सरकार खुद ही सांडों को लड़ाती थी।अखाड़े में सांड लड़ाके सैनिकों को लहू-लुहान करते तो राजे-महाराजे असीम आनंद से भर जाते।वे जोर-जोर से अट्टहास करने लगते।उन्हें खुश देखकर दर्शक भी उत्साहित हो जाते।वे राजाओं का प्रशस्ति-गान दोहराते और जयकारा लगाते।

गांव वालों ने अपने बचपन से देखा था कि श्यामलाल पंडित पोथी बांचते हुए कहते-सांड बनाने के लिए बछड़ा देना पुण्य कार्य है।जब भी सांड मस्ती में आकर अपने खुरों से मिट्टी झाड़ता है तो वह मिट्टी भोजन के रूप में तथा जो जल पीता है, वह पितरों के पास पहुंचता है।न सांड को बैलगाड़ी में जोतते हैं और न ही खेती में उससे कोई काम लिया जाता है।वह सिर्फ खाता-पीता और आराम करता है।श्रम से उसे छुटकारा दिया गया है।वह जितना आनंदित रहेगा, बछड़ा देने वाले परिवार के पितर भी उसी तरह आनंदित रहेंगे।कोई बछड़ा देने में सक्षम-समर्थ नहीं है तो उसे प्रतीक रूप में आटे या मिट्टी का सांड बनाकर दान देना चाहिए।लोग श्रद्धा से सिर झुकाए उनकी बात सुनते रहते।

कार्तिक महीने की पूर्णिमा पर बड़े मंदिर के दालान में सुबह से ही किसान अपने बछड़ों को सांड घोषित कराने के लिए इकट्ठे होने लगते।मंदिर की पूजा के बाद अच्छे मुहूर्त में पंडित जी मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान से पूजा कराते।

किसान वृषभ के सामने हाथ जोड़े उनके साथ दोहराते जाते- हे सोम राजन! हमें संतति का अभाव न हो।खेती-बाड़ी में, धन-धान्य में, राज-रोजगार में, मान-सम्मान में खूब-खूब मिले।परिवार फले-फूले।फिर वृषभ के सामने गाय को करवाते और गाय को हाथ जोड़कर दोहराते- मैं तुम्हें इस वृषभ को पति रूप में देता हूँ।इसके साथ आप प्रेमपूर्वक विहार करो।

इसके बाद लोहार गर्म लोहे से वृषभ के बाएं पुट्ठे पर चक्र और दाएं पर त्रिशूल का निशान दाग देता।गर्म लोहे के दागने से बछड़ा कंपकंपाता।सिहर उठता।बिलबिलाता, उधर ढोल पर ताल पड़ती।ढम-ढमा-ढम की आवाज में उसका दर्द कहीं बिला जाता।गले में रंग-बिरंगे फूलों की माला और पैरों में गजरे पहनाए जाते।गुलाल और फूल उड़ाए जाते।नारियल बदारे जाते।लुहार को सवा सेर और ब्राह्मण को ग्यारह सेर अनाज दिया जाता।भिश्ती को कपड़े और अनाज का दान दिया जाता।फिर उस बछड़े को गांव में छुट्टा छोड़ देते।चौपाल पर उसके लिए चारा पड़ा रहता।नदी-नालों से पानी मिल जाता।नहीं मिलता तो मवेशियों की ठेल में पी लेता।वह खेती के काम का नहीं था, उसका काम तो गायों को गर्भवती बनाना था।जबकि खेती में काम करने वाले बैल बनाने के लिए बछड़े को बधिया कर दिया जाता है।

लेकिन यह बात तो बहुत पुरानी हो गई।नए चलन के साथ इधर कुछ सालों में देखते ही देखते गांवों से देशी सांड लगभग खत्म हो गए।गांव-गांव विदेशी सांड पहुंचने लगे थे।दूर देशों से आने वाले इन सांडों ने देशी सांड को अपने ही गांव-जवार से हकाल दिया।चारे-पानी की कमी से वे अशक्त होकर मुफलिसी में बसर करने लगे और धीरे-धीरे मिट्टी हो गए।उन्हें जिन पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए छोड़ा गया था, पता नहीं उनका क्या हुआ!

अब सांड पुण्य का पशु नहीं, अच्छे गौवंश देने वाले प्रोडक्ट में बदल चुका था।इसलिए बाजार में उसके ऊंचे दाम थे और बड़ी साख थी।संकर नस्ल के जर्सी और ऊंची प्रजातियों के विदेशी सांड का अपना ब्रांड था, अपना ठप्पा और अपना ठाठ-रुतबा था।उनकी चाल में एक अजीब किस्म की ठसक और रवानी थी।

दुनिया में देश और विदेशों की सीमाएं टूट गई थीं।पहले जो किसान पंजाब के साहीवाल, हरियाणा के हरियाणवी, गुजरात के गिर, राजस्थान के हाठी-नागौरी, मालवा के मालवी और महाराष्ट्र के देवनी या खिल्लारी सांडों को ही बढ़िया मानते रहे थे, वे ब्राजील और इजराइल के एच एफ, जर्सी और उन्नत संकर किस्म के सांडों को सबसे अच्छा बता रहे थे।

अब वह किसी अकेले गांव का नहीं, समूचे विश्व का सांड हुआ करता।सांड पूरी दुनिया का हो चुका था।ग्लोबल सांड।उसकी धाक हर तरफ थी।कभी लगता कि धरती का गोला उसने अपने ही सींगों पर उठा रखा है तो कभी लगता कि वह अपनी मस्ती में बेलौस होकर पूरी दुनिया को अपने पैरों तले रौंद रहा है।वह जब तेज दौड़ता या खुमारी में अपना सिर हिलाता तो लगता दुनिया अब गिरी कि तब गिरी…!

उस गांव के लोगों के संकट की वजह भी यही थी।इन दिनों उनके सबसे बड़े संकट का कारण था वह सांड, जिसने पूरे गांव को हलकान कर दिया था।यह सांड कोई ऐसा-वैसा नहीं था।सरकारी सांड था।पूरा सरकारी।लिहाजा गांव में उसे कोई सांड नहीं कहता था।सब उसे सरकार कहकर ही पुकारते थे।यह सुनकर सांड मगन हो जाता।उसके चेहरे पर खुशी दमकने लगती।वह दर्प में आकर अपने खुरों से मिट्टी झाड़ने लगता।अपने आसपास चारे को फैला देता और डकार लेते हुए एक जोरदार हुंकार भरता।फिर विजयी भाव से चौपाल की तरफ देखता, जहां लोग श्रद्धावनत खड़े दिखते।

हुआ यूं था कि सरकार ने दूध की पैदावार बढ़ाने के लिए बाहर से सांड गांव-गांव में भिजवाए थे।इन्हें दूर देशों से लाखों की कीमत से खरीदा गया और गांव तक पहुंचाने के लिए भी लाखों का बजट था।बाद में घोटालों के कागजों से पता चला कि सरकारी अफसरों ने कई सांडों को लारियों की जगह स्कूटर पर ही लादकर गांव तक पहुंचा दिया था।ऐसा कमाल अफसर ही कर सकते हैं।खैर, इस तरह कई सरकारी सांड गांवों तक पहुंच गए।उनकी आव-भगत की जिम्मेदारी गांव के लोगों की थी।वह उनके यहां का मेहमान था तो वे उसकी खातिरदारी कैसे नहीं करते।

पहले-पहल जब सरकारी गाड़ियों में लादकर उसे यहां भेजा गया था तब उसका जरा भी मन नहीं लगता था।कई बार इच्छा होती कि कहीं भाग जाए पर कहां जाएगा, उसके देश से तो वह बहुत दूर आ चुका था और कितना भी भाग ले, वहां तक पहुंचना अब उसके बस में नहीं।फिर कुछ दिनों में धीरे-धीरे गांव वालों का प्रेम-भाव, आव-भगत और मान-सम्मान उसे रास आने लगा।उसने कहीं भाग जाने का अपना विचार त्याग दिया।उसका मन वहीं रमने लगा।लोग उसे सरकार कहते तो वह फूलकर कुप्पा हो जाता।समूची देह में फुरफुरी-सी दौड़ जाती।उसकी आंखें गर्वोन्मत्त हो उठतीं।

धीरे-धीरे समय का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि वह खुद को इस गांव का राजा ही समझने लगा था।बेलौस घूमता, जमकर ऊधम मचाता, मस्ती में चूर होकर किसी को उठाकर पटक देता, किसी को गेंद की तरह उछाल देता, किसी को रौंद डालता।वह एक-एक कर कई लोगों को जख्मी कर चुका था तो कुछ की हड्डियां चटका दी थीं।शांत खड़े रहते हुए वह कब किस तरफ दौड़ लगा दे, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाता।उत्पात मचाते हुए वह किसी की टपरिया ढहा देता, कभी गलियों-खेतों में बेतहाशा दौड़ता तो कभी खड़ी फसल को नेस्तोनाबूद कर देता।पहले वह किसी खास मौसम में सामने लाई गई गाय से ही सहवास करता था लेकिन अब व्यभिचारी होने लगा था।उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं था।वह अपनी मर्जी का मालिक था।पूरे दिन चौपाल पर बैठे हुए पगुराता या गलियों-खेतों में डोलता फिरता।

लोग उसकी इन हरकतों से आजीज आ चुके थे, न खेती-बाड़ी होती थी न धंधा-पानी चलता था।बच्चों का स्कूल जाना छूटता जा रहा था।औरतें पनघट पर जातीं तो बहुत संभल कर।उनकी निगाहें हर वक्त चारों तरफ लगी रहतीं।पता नहीं किस गली से मुसीबत आ जाए।रात-बेरात लोग खेतों पर आते-जाते तो पूरी देखभाल कर निकलते।हर कहीं उसका आतंक तारी था।लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई थी।

कहावत है कि चोर, जार और राजा कितने भी बलवान हो, उनके भीतर एक डर हमेशा समाया रहता है।चोर और जार को पकड़ाए जाने का डर रहता है तो राजा  को अपना राज-पाट छीन जाने का डर हर हमेशा सताता रहता है।यही वजह थी कि इस सांड को, जिसे गांव के लोग सरकार कहते थे, उसे भी अपने मान-सम्मान के बावजूद भीतर ही भीतर भय सताता रहता कि कहीं किसी दिन गांव के लोग उसकी शक्ति और सत्ता को नहीं मानने लगे तो उसका क्या होगा।ऊपर से वह अपने को जितना बलशाली दिखाने की कोशिश करता, अंदर से उतना ही डरपोक था।

हालांकि इस बात की संभावना बहुत कम थी कि जो लोग सदियों से सांड को पूजनीय मानते आए थे, उसकी बात नहीं मानते।इसलिए वह धर्म की आड़ में बहुत खुश था।खुश और निश्चिंत।फिर भी वह हर वक्त भयभीत बना रहता।वह यह भी जानता था कि पढ़े-लिखे और समझदार लोग ही उसके खिलाफ माहौल बना सकते हैं, इसलिए वह उन्हें सामने देखते ही ऐसे भड़क जाता जैसे लाल रंग देख लिया हो।उसकी आंखों से चिनगारियां निकलने लगतीं और नथुने फूलने लगते।वह उन पर पिल पड़ता।

उधर कुछ ही सालों में किसानों का भ्रम भी टूटने लगा।धीरे-धीरे उन्हें यह बात  समझ आने लगी कि विदेशी के मुकाबले देशी सांडों से पैदा होने वाली बछिया (गाय) दूध कम देती है, लेकिन देशी गायों का दूध ही ज्यादा पौष्टिक होता है और उसकी बाजार में कीमत भी बनिस्बत ज्यादा है। ‘लौटकर बुद्धू घर को आए’ की तरह अब मवेशी पालक विदेशी छोड़ देशी की तरफ फिर से भाग रहे हैं।देशी सांडों की पूछ-परख बढ़ी है।लेकिन इस काम में भी सरकार ने अमेरिका की मदद ली।लोग मजाक में कहते, सरकार का काम अमेरिका की मदद के बिना चल ही नहीं सकता।सरकार ने एक अमेरिकन कंपनी की मदद से अरबों रुपये से देशी सांडों के वीर्य उत्पादन केंद्र बनाए।

देश में सरकार और किसानों ने भले ही घर लौट आने की इस बात को मान लिया हो, लेकिन इस गांव के लोग अब तक घर नहीं लौट पा रहे थे।लौट आना उनके हाथ में नहीं था, सरकार के हाथ में था और सरकार के हाथ उन्हें दिखाई नहीं दे रहे थे।

गांव के लोग सरकार के नाम से भी बहुत दूर रहते थे।सरकारी कागजों से सबसे ज्यादा डरते थे।उनके पुरखों ने उन्हें इनसे डरना सिखाया था, अंग्रेजी राज भले ही चला गया था, लेकिन सरकारी कागज का डर लोगों के मन में उसी तरह समाया हुआ था।यही वजह थी कि वे सरकारी सांड का आतंक झेलकर भी चुप्पी साधे हाथ पर हाथ धरे बैठे थे।

कोई देशी सांड होता तो वे लोग ही उसका दिमाग ठीक कर देते।सारी अकड़ निकाल देते।उसकी हेंकड़ी धरी की धरी रह जाती।देशी सांड आंखों की बोली समझते थे।लेकिन वह तो सरकारी सांड था।वह गांव की भाषा नहीं जानता था।

सांड की तानाशाही से परेशान लोग ज्यादातर चुप रहने लगे थे।चुप्पी उनकी जीवनचर्या में शामिल होने लगी थी।उनकी चुप्पी तभी टूटती थी, जब उन्हें किसी से उस बारे में कोई खबर जानने की बेचैनी बढ़ जाती या किसी को उससे जुड़ा कोई राज साझा करना होता।वे भूखे पेट रह लेते, प्यासे रह लेते, बिना बिजली के रह लेते, बीमार रह लेते, पर कोई किसी से बात नहीं करता था।उनके बीच का संवाद खत्म होने लगा था।

कभी-कभार जब वे बोलने को होते तो उनका मुंह खुल ही नहीं पाता।कई-कई दिनों तक मुंह बंद रहने से उन्हें मुंह खोलने में बड़ी परेशानी आती।जैसे-तैसे मुंह खुल जाता तो शब्द नहीं फूटते।कई बार तो केवल गों…गों… की घुटी हुई आवाज निकलती।गांव की खालिस खामोशी में सिर्फ सांड की गुर्राहट की ध्वनि बची रह गई थी।डरा देने वाली यह गर्जना पहाड़ से टकराकर बढ़ते-बढ़ते देश-दुनिया में चारों तरफ़ गूंजने लगती।

उस अंधेरी रात में मौसम बहुत ही खुशगवार था।शाम की हलकी फुहारों वाली बारिश के बाद मद्धिम बयारों से खेत-खलिहान का पत्ता-पत्ता झूम रहा था।सरकार दिन भर खाने-पीने और मौज-मस्ती के बाद एक हरे-भरे खेत में अघाया हुआ अधलेटा अपने ही सपनों में खोया पड़ा था।उसके नथुनों में कच्ची फसल की ताजी गंध भर रही थी।उसकी आंखें अंधेरे में भी चमक बिखेर रही थी।उसकी निगाहें आसमान की तरफ़ थी।नींद की खुमारी उसकी पलकों पर थी कि उसने एक भयावह दृश्य देखा।

गांव की तरफ वाली पगडंडी से कई लोग हाथों में लाठी-डंडे लिए उसकी ओर बढ़े आ रहे थे।कुछ के हाथों में लप-लप करती मशालें थीं।वह उनमें से किसी को भी पहचान नहीं पा रहा था।सबने अपने चेहरों पर कपड़ा बांध रखा था।चारों तरफ गाढ़े अंधेरे के बावजूद मशाल की रोशनी में उसने उनके लाल चेहरे और आंखों में गुस्से के भावों को पढ़ लिया था।

उसकी नींद उड़ गई थी।उसने क्षणभर सोचा और तुरंत मोर्चा लेते हुए जोर-जोर से हांफ-हूंफ करने लगा।खुरों से मिट्टी खोदते हुए अपने गुस्से का इजहार किया, लेकिन कोई नहीं रुका।लोग उसकी तरफ़ बढ़ते ही जा रहे थे।वह संभलता इससे पहले किसी ने उसकी पीठ पर लाठी का एक भरपूर वार कर दिया।वह भीतर तक बिलबिला उठा।दर्द से वह तिलमिला गया।तभी कुछ और लोग भी लाठी का निशाना साधे आगे बढ़े।उसे कुछ नहीं सूझा।वह भागने लगा, लेकिन लोग कहां रुकने वाले थे।वे उत्साह में भरे हांका लगाते उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे।सांड आगे-आगे, लोग पीछे-पीछे।वे दूर तक उसका पीछा करते रहे।पूरी रात सरकारी सांड चौकड़ी भरता रहा।वह बुरी तरह थक चुका था।उसके पैर जवाब देने लगे थे।आंखों में अंधियारी छा रही थी।वह वहीं गिर पड़ा।उसके गिरने से सूखे पत्तों का ढेर एक पल चरमराया और जंगल फिर से मौन हो गया।पेड़ों की झुरमुट से सुबह की धूप छन-छन कर आ रही थी।

शाम को पटवारी अपनी फटफटी से चौपाल पर पहुंचा।उसने गांव की आंखों में आंखें डालकर धमकाने के अंदाज में पूछा- ‘तुमने हांका लगाकर उसे भगा दिया आख़िर…?’ उसके आसपास बैठा सारा गांव एक सुर में हाथ जोड़कर बोला- ‘नहीं अन्नदाता नहीं… वे हमारे मेहमान थे।हम सबने मन लगाकर उनकी बहुत सेवा की।हम सबने सरकार को गांव में ही रोकने की कितनी बार मनुहार की, लेकिन उनके सिर पर तो जैसे कोई धुन सवार थी।उन्होंने हमारी बात ही नहीं सुनी।कुछ लोगों ने तो उनके रास्ते में पड़कर उन्हें रोका, देखिये साहब…!! इस कशमकश में इनके कपड़े कैसे फट गए और कैसी चोट लगी है।गिर गए, खून निकल आया साहब पर कोई नहीं रुका।हम तो आगे भी नहीं रुकते साहब, पर क्या करते…! जंगल की सीमा शुरू हो गई थी।जंगल में हमारा जाना ठीक नहीं हुजूर।जंगल वाले साहब हमारी कब सुनते।कभी भी कोई केस बन सकता था।इसीलिए माई-बाप, अन्नदाता हम निराश होकर लौट आए।’

दीवान जी ने अपनी आंखों से ऐनक उतारी।शाम के धुंधलके में सबके सपाट चेहरों की ओर देखा।अपने कुर्ते के कोरों से ऐनक के शीशे साफ किए और कागज पर इबारत लिखने लगे। ‘चौकीदार और गांव वालों के पंचनामे बयान के अनुसार सरकारी सांड गांव की सीमा लांघता हुआ जंगल की सीमा में प्रवेश कर गया है।वन विभाग को इसकी सूचना देकर तफ्तीश की जाए।’ हलफनामे के कागज पर सबके अंगूठे लगवाए।फिर कागज को मोड़कर फाइल में लगाकर वे निश्चिंत भाव से भर गए।दावत के लिए लोग दौड़-दौड़ तैयारियां करने लगे।गांव की हवा में खरगोश के ताजे भूने हुए मांस की गंध है और कच्ची दारू का सुरूर पटवारी के चेहरे पर दमक रहा है।

11-, मुखर्जी नगर, पायोनियर स्कूल चौराहा, देवास (मप्रपिन-455001 मो.9826013806