हरेकृष्ण दास
उड़िया से हिंदी में कई प्रमुख रचनाओं के अनुवाद। अंग्रेज़ी भाषा-साहित्य के अध्यापक।

 
ईप्सिता षड़ंगी
ओड़िशा सरकार से राज्य युवा पुरस्कार से सम्मानित। समकालीन ओड़िआ काव्य जगत की एक प्रमुख कवयित्री। छह कविता पुस्तकें। अद्यतन कविता संग्रह ‘दृश्य दर्पण’।

यशोधरा

1.
हमारे रिश्ते की
हर एक अस्थिरता को
सौंप दिया था तुमने
पीपल के उन पत्तों को सिद्धार्थ!
मुझे मालूम है
मिट्टी का घड़ा शब्दों से गूंज रहा था
लेकिन वह खाली घड़ा था मुझे पता है
कोई भी उम्मीद करना मूढ़ता होगी

दिव्य शांति की आभा
तुम्हारे पूरे अस्तित्व से भासित हो रही थी
संसार को रौशन करने के लिए निकले तुम सिद्धार्थ
लेकिन क्या पारदर्शिता की कमी के कारण
मेरा तन-मन उस आनंद को भर न सका?

2.
मैंने त्याग दिए थे गहने सारे
उतार दिए थे राजकीय वस्त्र भी
दुनियादारी को कर दरकिनार
शून्यता के अंगवस्त्रों में खुद को समेट लिया था
विद्रोह और अभिमान के साथ
मन को भी कर लिया था शांत
हर रंग उड़ गए थे मेरे जीवन से
निर्मल श्वेत हंस की तरह

मेरी तनहाई को
मुझपर हुए अन्याय को
पिछले जन्म में मेरी मांगी हुई
अभिलाषा का नाम दे दिया शास्त्रकारों ने।

3.
स्त्रियों पर किए गए अत्याचार पर
हमेशा डाल दी जाती है
कहानियों की कई झिलमिलाती चादरें

उनके जिए हुए नरक को
बना दिया जाता है स्वर्ग का भरम कभी-कभी
जलते अंगार-सी यातना को
बना दिया जाता है महानता की मिसाल

मैं यशोधरा हूँ सिद्धार्थ
दुखों से मेरे प्रज्वलित हैं महल के दीप तुम्हारे
प्रकाशमान हो तुम
मेरी जीवन यंत्रणा की होमाग्नि से

आग से मेरा जीवन बना है
यह आग की दहन
आवश्यक है जीवन के लिए
मुझे बताओ न सिद्धार्थ।

नारी जन्म

क्षितिज के दोनों विपरीत बिंदुओं की ओर
फैलाना पड़ता है अपना अस्तित्व
तन मन और लफ्जों से
निगाहें फेर लिए
लपकाना होता है हँसी को
हमेशा के लिए होंठों पर

समझाना पड़ता है खुद को
भूल जा अपनी जो भी है ख्वाहिशें
अभिमान सारे अपने छुपाके रख ले कहीं
कोटर में किसी पेड़ के
फिर जी लेने की तमन्ना

कभी-कभी आसमान से भी
सूना लगता है अपना अस्तित्व
फसल के बाल से भी सतेज सारे सपने
हर किसी की अनदेखी
और नज़रअंदाज़ी की गरमाहट में
मुरझाए रहते हैं हर पल

उड़ जाती है तितली एक
रंगीन सपनों की तरह
हँस कर सारी मुश्किलों पर
मेरी हर एक हार भुला कर
जीत जाने की सीख देती है पल-पल

रूपांतर होता है मेरा समय में
चलती रहती हूँ मैं निरंतर
रुकना ही नहीं
बस चलते जाना ही है मेरा नसीब

फूल के परागों के बीच बैठकर
झुलने के आलम खोए
उनके अंदर कैद रहकर
सांस के लिए तड़पते रहना-
अब यही हमारा जीवन है।

इप्सिता षाड़ंगी, 303, पांडा रेजीडेंसी, बीजेईएम स्कूल2 के पास, सत्यभामापुर, भुवनेश्वर, ओडिशा 752100 मो. 9938370289

हरेकृष्ण दास, सहायक प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, नियाली कॉलेज, नियाली, कटक, ओडिशा 754004 मो. 9861345658