युधिष्ठिर का कुत्ता’ (व्यंग्य संग्रह), ‘दर्शन, दृष्टि और पांव (यात्रा संस्मरण) संप्रति: समकालीन अभिव्यक्तिमें सह संपादक।

केतकी से मेरी मुलाकात पूरे बारह साल बाद हुई थी।बारह वर्ष यानी एक पूरा वनवास।हां, इसे एक पूरा वनवास मानना ही ठीक होगा।वनवास के लिए वन में रहना कोई जरूरी तो नहीं।मन का वनवास शरीर के वनवास से कहीं कमतर नहीं होता।न मैं उस दिन को भूल सकता था और न इस दिन को।इन बारह वर्षों में मुझे महसूस होता रहा कि मैं वनवास में हूँ।शायद वह भी रही होगी, या फिर हो सकता है कि उसका जीवन अच्छा ही रहा हो।हो सकता है कि वह खुश रही हो और स्वयं को पति की पसंद में ढाल लिया हो।पति तो आखिर उसी की पसंद का था।यह बात अलग है कि वह न मुझे पसंद था और न उसके परिवार को।खासकर उसके छोटे भाई को।और एक वही क्यों, मैंने तो अधिकांश औरतों को पति की पसंद में ढलते देखा है।व्यवस्थित शादियों में तो वे ढाल ही लेती हैं।प्रेमविवाह में भी शायद ढलना पड़ता हो।वहां तो और भी मजबूरी होती है।कहीं-कहीं पति भी ढलते हैं।शायद केतकी भी ढल गई होगी।लेकिन वह खुश होगी, इसमें मुझे संदेह था।मेरे अनुमान, आशंकाएं और अनुभव कभी गलत नहीं होते।हालांकि मैं कई बार चाहता हूँ कि मेरे अनुमान गलत साबित हो जाएं।

आज वह अचानक मेट्रो में मिल गई।न कोई उम्मीद, न कोई प्रयास।हां, उत्सुकता रही तो सिर्फ यह जानने की कि उसका हुआ क्या? उसके उस फैसले का क्या हुआ जो उसने डंके की चोट पर लिया थासबकी सलाह और विरोध को धता बताकर।मेरी भविष्यवाणी या अनुमान का क्या हुआ?

एक युवती जिसे अंतिम बार लगभग पचीस वर्ष की उम्र में देखा हो और बारह साल बाद मिल जाए तो पहचानना बहुत आसान तो नहीं होता, भले ही वह व्यक्ति कितना भी नजदीकी क्यों न रहा हो।अब वह चालीस की होने वाली होगी।बाल-बच्चे हो गए होंगे और शबाब उतर गया होगा।लेकिन हम एक दूसरे की आंखों में बहुत गहराई तक उतर हुए थे उस दौर में।शायद इसीलिए एक पल के झटके के बाद हम दोनों ने पहचान लिया था।मैं मेट्रो कोच में गेट के पास वाली सीट पर बैठा था और वह राजीव चौक पर सवार हुई थी।एक साधारण सा पर्स लटकाए तथा औसत सा सलवार-कुर्ता पहने।मेरे बगल की महिला सीट पर वह बैठने ही वाली थी कि हमारी आंखें टकराईं।जैसे एक ही साथ हमारा स्वर निकला- ‘तुम’?

‘आप’?

बगल की सीट पर वह धम्म से बैठ तो गई, लेकिन विश्वास उसे भी नहीं हो रहा था।जैसे सोच रही हो कि बैठना चाहिए था वहां या नहीं।बैठते ही वह अपेक्षाकृत ज्यादा सट गई।यह उसकी पुरानी आदत थी।उन दिनों भी वह काफी नजदीक होकर बैठती थी।ऐसा लगता था कि उसे अपने लड़की होने का एहसास नहीं था।एकाध बार मैंने उसे मजाकिया लहजे में टोका था तो उसने हँसकर कहा था कि दोस्त दोस्त होते हैं, अछूत नहीं।क्या हुआ यदि एक पुरुष है और दूसरी महिला?

हमने ‘तुम’ और ‘आप’ का कोई उत्तर नहीं दिया था।बस स्वयं को विश्वास दिलाए जा रहे थे एक दूसरे के होने और मिलने का।मौन ने ही बहुत से प्रश्न किए और मौन ने ही उत्तर दिए।नई दिल्ली स्टेशन आते-आते वह अचानक खड़ी हो गई और आदेशात्मक प्रस्ताव में बोली- ‘उतर लें’?

‘श्योर’, मैंने कहा।तब भी हमारी आधी बातें अंगरेजी में ही होती थीं।उसे अंगरेजी बोलने का शौक था।उच्चारण में भी अमेरिकन पुट लाने की कोशिश करती।निजी और गोपनीय बातें वह अंगरेजी में ही करती।दिल्ली की भीड़ को दूसरों से मतलब नहीं।दो लोग हमारी खाली की हुई सीट की ओर लपके, लेकिन हम तो बाहर।

‘अब’? उसने पूछा।

‘वापस हो लें? सीपी ठीक रहेगा?’

‘हूँ, आपको जल्दी तो नहीं?’

‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बोलो।मैंने तो हमेशा ही एडजस्ट किया था।’ उदास हो आई वह – ‘हां, वो तो है, सही कहा आपने!’

और हम चुपचाप राजीव चौक जाने वाली मेट्रो में वापस सवार हो लिए।बिना कुछ बोले- देखते रहे एक दूसरे की आंखों में और पढ़ते रहे चेहरे।

वह चहक नहीं रही थी और न तो नॉन स्टाप बोल ही रही थी।एक समय था कि मैं मजाक उड़ाता था उसका – तुम्हारे बीच में बोलना मतलब पत्थर की दीवाल में कील ठोंकना।लेकिन आज वह चुप थी।शायद उम्र का असर होगा।बारह साल का अंतर वैसे भी अंतराल पैदा कर देता है।रिश्ते अपरिचय में बदल जाते हैं।

सबवे से उस पार पहुंचे तो रीगल सिनेमा था।बंद हो गया अब, लेकिन यादें बंद नहीं होतीं।इसी टाकीज में पंद्रह साल पहले मैंने केतकी के साथ एक फिल्म देखी थी।उसे फिल्में देखने का बहुत शौक था।एक हिंदी फिल्म रिवोली में देखी थी।उन दिनों वह दुखी थी।उसे पता लगा था कि उसके प्रेमी का किसी और लड़की से संबंध है जिससे वह लगभग अलगाव की स्थिति में आ गई थी।शायद अलगाव का निर्णय सही था।मैंने भी उसका समर्थन किया था।लेकिन वह भी अधिकांश लड़कियों की तरह प्र्रेम में अंधी थी।रीगल को देखकर हमने एक दूसरे को फिर से देखा और लौट गए अतीत में।

कॉफी होम में बैठ गए।संयोग अच्छा था।कोने की मेज खाली थी।बात का सिरा पकड़ना था।लगता था कि वह समंदर दबाए बैठी है, न जाने कब ज्वार आ जाए।मुझे अंदाजा तो लग गया था कि मेरी आशंका सही साबित हुई है।एक बार मैं फिर जीत गया हूँ, लेकिन इस जीत में उसकी ही नहीं, मेरी भी हार थी।

‘और बताओ! कैसी हो?’ पुरुष होने का दायित्व मैंने निभाया।

‘बस, ठीक हूँ’ और बड़ी लंबी सांस ली उसने।उसकी सांस की हवा को मैंने महसूस किया।… ‘और आप सर?’

‘सर’ मुझे वह कभी-कभी ही कहती थी।ज्यादातर अनूप जी ही बुलाती थी।ऑफिस में होती तब या चिढ़ी होती तब ‘सर’ कहती।मैंने कुछ क्रोधित नजरों से उसे देखा, वह समझ गई कि उसके ‘सर’ कहने से मैं चिढ़ा हूँ।बस पहले की तरह मुस्कराकर चुप रह गई- जैसे तीर निशाने पर लगा हो।

‘केतकी, बोलो न! क्या हाल है तुम्हारा? तुम्हारे हसबैंड? बच्चे वगैरह?’ मैं जानता था कि वह नाम लेकर बुलाने पर जरूर बोलती थी।

नजरें मिलाकर उसने चेहरा नीचे कर लिया।आंखों में बूंदें तैरने लगीं – ‘काश अनूप जी, आप उस समय शादीशुदा न होते!’

‘क्यों, क्या हुआ? मेरी शादी का इस प्रसंग से…?’ मैं समझ तो गया था।

जब मैंने उसे नकुल से शादी के लिए कई बार मना किया था तो एक बार उसने कहा था, ‘आप शादीशुदा न होते तो मेरी प्रथम वरीयता होते।मुझे लगता है कि आप भी मुझसे जरूर शादी करते।लेकिन ..और आज इस समय मैं बहुत कुछ समझ गया था।कुछ न कुछ गड़बड़ तो जरूर है।माना कि इतने साल बाद मिले हैं, फिर भी अविकल बोलने वाली लड़की ऐसे तो तोलतोल के नहीं बोलती।

केतकी ने मेरी आंखों में आंखें डाल दीं और बोली – ‘कहां के हसबैंड और कहां के बच्चे? मेरा तो तलाक हो गया।’

मैं अवाक रह गया।न जाने कितने प्रश्न मेरी आंखों में तैर गए – कुछ केतकी से, कुछ वक्त से और कुछ खुद से।बहुत विश्वास था मुझे अपनी आशंका एवं अनुभव पर।शायद मैं प्रतीक्षा कर रहा था इस तरह की खबर की, लेकिन जब खबर आई तो जैसे काठ मार गया मुझे! माना मुझे चिढ़ थी केतकी की पसंद और उसके निर्णय से, लेकिन क्या मैंने वास्तव में उसका इतना बुरा चाहा था? यदि वह आज अपने पति तथा बच्चों के बारे में अच्छी खबर देती तो मैं भी खुश होता? होता भी तो एक झेंप तो जरूर होती अपने अनुमान की हार पर।

‘मतलब मैंने ही तलाक दे दिया।एक बार फिर आप जीत गए।’

‘केतकी, ताने मारना और व्यंग्य बोलना हर परिस्थिति में जरूरी है क्या? क्या मैं यही चाहता था कि तुम बर्बाद हो जाओ या तुम्हारा जीवन दुखमय रहे? मेरी पूरी दोस्ती में मेरे विषय में तुम्हारा यही आकलन है?’ मेरा गला रुंध-सा गया और आंखें गीली हो गईं।

‘व्यंग्य बोलना भी तो मुझे आपने ही सिखाया था।लेकिन अभी आपने सीरियसली ले लिया।मेरा मतलब कि आपकी बात ही सही हुई।आपका तजुर्बा जीत गया और मेरी जिद तथा मूर्खता हार गई।मैं तब दूसरों के बारे में कहती थी कि पढ़े-लिखे भी मूर्ख होते हैं, बाद में यह मुझ पर ही लागू हो गया और वह भी अक्षरश:।बातें धीरे-धीरे समझ में आती हैं।अब मुझे लगता है कि काश आपकी बात मान लेती।खैर, अपनी-अपनी किस्मत है।आप किस्मत पर भी तो बहुत जोर देते थे।’

अब आवाज देकर मैंने बैरे को बुला लिया।केतकी को सांस लेने का मौका देना चाहता था।खाने-पीने में वह तब बहुत नि:संकोची थी, जो भी मन होता, बिना तकल्लुफ के ही मंगा लेती और बिल भरने की जिद नहीं करती।बिल प्राय: मैं ही भरता, कभी-कभी कोई खुशी होती तो जिद करके भर देती।आज थोड़ा संकोच कर रही थी।आग्रह करने पर कॉफी के साथ एक वेज बर्गर और फ्रेंच फ्राईज का आर्डर दे दिया।

केतकी मुस्कराई, ‘आपको याद होगा कि हम दोनों में यही तय हुआ था कि पति को तलाक मैं ही दूंगी, वह मुझे नहीं दे पाएगा।और मैंने दे दिया।’

‘हम दोनों में तय हुआ था?’

‘हां, आपको याद नहीं होगा। भुलक्कड़ तो तब भी आप गज़ब थे, अब तो और हो गए होंगे! आपको याद है न जब आखिरी बार आप नकुल से शादी के खिलाफ अड़ गए थे।मतलब आपको वह बहुत नापसंद था और आपने खुल्ला कहा था कि यह शादी नहीं चलेगी।तुम्हें तलाक देना पड़ेगा और मैं आपसे लड़ गई थी।बुरी तरह लड़ी थी मैं।याद है मुझे और यह भी कि आप फिर चुप हो गए थे- जैसे हतप्रभ।और मैं दिल्ली हाट से पैर पटकते हुए बाहर चली गई थी।आप भूल भी जाएं, मैं कैसे भूल सकती हूँ वह मंजर!’

हां, बहुत दिनों तक मैं उस द़ृश्य और उसकी प्रतिक्रिया को भूल नहीं पाया था।उसका उग्र रूप तथा असभ्य-सा व्यवहार बहुत चुभा था मुझे।यही नहीं, मैंने एक हफ्ते की छुट्टी भी ले ली थी कि कैसे ऑफिस में उससे बात करूंगा? यदि नहीं करूंगा तो स्टाफ के लोग क्या सोचेंगे।मुझे बिगड़े संबंध दिखाना अच्छा नहीं लगता।जिस दिन मुझे ज्वाइन करना था, उसने छुट्टी ले ली थी।दोपहर में ऑफिस के नंबर पर फोन आया था कि शाम को मैं उससे कॉफी हाउस में मिल लूं, बहुत जरूरी काम है।

न चाहते हुए भी ऑफिस से आधा घंटा पहले छुट्टी लेकर मैं कॉफी हाउस पहुंच गया था।इस बार वह पहले से ही इंतजार कर रही थी।उसके दिमाग का कोई भरोसा नहीं।मैंने सोचा था कि सॉरी बोलेगी और फिर कोई मुसीबत बताएगी।मसलन कि उसका छोटा भाई उससे नकुल को लेकर फिर लड़ गया।पापा ने उसके तौलिए से हाथ पोंछ लिया या बेसिन में शेविंग करके गंदगी फैला दी।लेकिन कुछ नहीं कहा था उसने।कॉफी आ गई तो एक सिप लेकर बोली- ‘मैं मानती हूँ कि आप अपनी जगह पर सही हैं, लेकिन मैं क्या करूं? मेरा दिल उसके बिना नहीं मानता।आज तक मेरे जीवन में उससे अच्छा कोई दूसरा आया भी तो नहीं।आप ही बताएं कि एक पढ़ाई को छोड़कर उसमें कमी ही क्या है? जितने लोग पढ़े-लिखे हैं, वे ही कौन से अच्छे हैं?’

मैं सहमत नहीं था उससे, लेकिन इस मुद्दे पर बात करने का कोई फायदा तो नहीं।मैं मुस्कराकर रह गया था।

सच तो यह था कि जबसे वह दिल्ली हाट में लड़ी थी, तबसे मैं थोड़ा विरक्त हो गया था।क्या करना है मुझे इस लड़की का? कौन सी मेरी गर्लफ्रेंड है या मुझे इससे शादी रचानी है।दोस्त ही तो है।साथ में एक लड़की होने की अनुभूति देती है, बस।माना कि बहुत बोल्ड है और बिना लिंगभेद के बात कर लेती है, लेकिन इतना करने के बाद भी यदि इसका यही तरीका है तो जाने दो।

मुझे याद आ गया सब कुछ- ‘हां केतकी, मैंने कहा था कि तलाक तुम ही दोगी, वह नहीं।लेकिन मैं ऐसा चाहता नहीं था।मैं ऐसा कभी नहीं चाह सकता।यह बात अलग है कि मजाक में कही गई बात भी कभी-कभी सही साबित हो जाती है।तब मैंने तुम्हारा स्वभाव देखकर ही ऐसा कहा था।तुम भड़क भी तो एक ही क्षण में जाती थी।लेकिन एक बार रिश्ता बना लिया तो निभाओ।या तो रिश्ता बनाने से पहले ही सोच लो।हालांकि मैं विवाह का बड़ा पक्षधर नहीं हूँ, फिर भी यदि कर लिया तो निभाओ।’ गंभीर हो गई थी केतकी मेरी बात सुनकर।

अब तक हमारी कॉफी और स्नैक्स आ चुके थे।दो घूंट पी लेने के बाद मैंने कहा- ‘अच्छा केतकी जो भी हुआ, तफसील से बताओ।’

‘कोई जरूरी है पहली ही मुलाकात में सब कुछ बता देना? अब तो इस दूसरी पारी में हमारी पहली मुलाकात है।किसी दिन फुरसत में आओ, बता दूंगी।बता तो तब सब कुछ देती थी जब नौजवान थी, अविवाहित थी, अब क्या बचा है छिपाने को?’ जैसे वह जिज्ञासा बनाए रखना चाहती थी।

‘नहीं, मैंने ये नहीं कहा कि हमारी मुलाकात अब नहीं होगी।तुम चाहोगी तो मिलते रहेंगे।लेकिन संक्षेप में ही सही, कुछ तो बताओ।’

‘बस यूं समझ लो कि आपकी एक-एक बात सही निकली।मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ।एक दिन रात को पीकर बहुत देर से लौटा था।शायद अपने किसी दोस्त के साथ कालगर्ल के पास भी गया रहा हो।आने पर मैंने पूछा तो थप्पड़ मार दिया।मैंने भी दो चप्पल दिए और तलाक देकर चली आई।अगले दिन कोर्ट का नोटिस भिजवा दिया।’

‘लेकिन ऐसे कैसे तलाक हो जाता है?’

‘तलाक तो मैंने अपने दिल-दिमाग दोनों से बोला था।वे लोग और होंगे जो प्यार को स्वाभिमान से बड़ा मानते होंगे।मेरे लिए मेरी इज्जत सबसे पहले।किसी के भरोसे नहीं जी रही हूँ।’

मैं चुप रह गया, क्योंकि मुझे मालूम था कि ये सब कुछ बताएगी, लेकिन अपनी मर्जी से बताएगी।फ्रेंच फ्राईज सॉस में डुबाकर कुतर-कुतर कर खाती रही।मेरे सामने उसके अतीत के पन्ने पलटते रहे।

वह विभाग में चयनित होकर नई-नई आई थी।मेरे अधीन ही उसे काम करना था।पहली नियुक्ति थी।ऑफिस के कायदे-कानून समझ से बिलकुल बाहर।ऊपर से क्लर्क जैसा पद उसे पसंद नहीं था।कुछ और करना चाहती थी, लेकिन उसके पिता की जिद थी कि जो मिल गया, उसे पकड़ो।हाथ से जाने मत दो।सरकारी नौकरी इतनी आसानी से नहीं मिलती।आगे कोशिश करती रहना।पिता की जिद के आगे झुकना पड़ा था।मुश्किल से बाईस-तेईस की उम्र।न मोटी न पतली।अच्छा सा भरापूरा शरीर और नए जमाने की वेशभूषा।शरीर के कटाव, कसाव, चढ़ाव और उतार की चर्चा ऑफिस में होती ही थी।लेकिन मैंने नोटिस किया था कि उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ने वाला।

काम सीखने, झुंझलाने और गलतियां करने के क्रम में वह मुझसे नजदीक होती गई।आकर्षित तो मैं भी था।पुरुष हूँ आखिर, इसलिए इस पाखंड का कोई मतलब नहीं बनता कि मेरे ऊपर उसके सौंदर्य का कोई असर नहीं था।हां, इतना जरूर है कि मुझे इन मामलों में छिछोरापन पसंद नहीं।कोई जरूरी तो नहीं कि जो-जो मुझे पसंद आए, वह मेरी प्रेमिका बन जाए।दोस्त की श्रेणी में आ जाए तो भी कम नहीं है।मैं जानता था कि पढ़ाई में कोई कितना भी मेधावी क्यों न हो, सरकारी नौकरी के शुरुआती दौर में गलतियां होती हैं।सरकारी कायदे-कानून और दफ्तर चलाने के ढंग स्कूलों में नहीं पढ़ाए जाते।

ऑफिस में काम की समस्याएं लेकर वह प्राय: मेरे पास आने लगी थी।कारण यह था कि मैं उसे बहुत ढंग से, ठंडे दिमाग से समझाता था।इतना ही नहीं, कक्षा में पढ़ाए जाने वाले बच्चों की तरह उससे प्रतिप्रश्न भी करता था और करके सीखने की विधि पर जोर देता था।बिगड़े हुए काम में थोड़ा हेर-फेर करके सुधारने की कला में मैं माहिर था।इसका फायदा मिला।दूसरी बात यह थी कि अपने संकोची स्वभाव के चलते मैं न तो उसे अपना लंच ऑफर करता और न अधिक निकटता दिखाने की कोशिश करता।धीरे-धीरे वह मुझ पर विश्वास करने लगी।एक दिन वह पर्स बदलने के चक्कर में पैसे भूल आई थी।जाते समय उसने बड़े संकोच से किराए के लिए पैसे मांगे।मैंने उसे पांच सौ रुपये दिए, जबकि उसने दो सौ ही मांगे थे।जैसे-तैसे उसने ले लिया, यह कहने पर कि मान लिया रास्ते में और कोई जरूरत पड़ जाए तो? वहां तो कोई परिचित नहीं मिलेगा।अगले दिन उसने आते ही पैसे वापस किए और मैंने बिना किसी तकल्लुफ के ले लिया था।

तब मोबाइल फोन शुरू ही हुए थे।हर किसी की औकात में वे नहीं आते थे।ऑफिस में कभी-कभी उसके लिए किसी पुरुष का फोन आता।पहले मैंने समझा कि उसके भाई या पिता का होगा।फोन मेरे टेबल पर रखा होता था। ‘केतकी, तुम्हारा फोन है’… मैं आवाज देता तो वह सकुचाते हुए आती।शुरू में तो केवल हां-नहीं में जवाब होता, लेकिन बाद में बोलने लग गई थी कि आज नहीं आ पाऊंगी, पापा घर पर ही हैं, लेट हो जाएगा या फिर ठीक है, आ जाती हूँ।मैं भी तब तीस के आस-पास था।धीरे-धीरे मुझे पता लग गया था कि उसका कोई ब्वॉय फ्रेंड था।

केतकी ने बताया था कि उसका ब्वॉय फ्रेंड उसका सहपाठी था।उनके संबंध के एक साल से अधिक हो गया था और अभी दोनों में शारीरिक संबंध पूरी तरह से नहीं बन पाया था।केतकी चाहती भी थी और नहीं भी।वह स्थान और विश्वास की कशमकश में चल रही थी।उसकी दो खास सहेलियां अपने मित्रों से संबंध बना चुकी थीं और इसे उत्साहित करती थीं।केतकी को लड़के से कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन वो थोड़ा बोरिंग लगता था।हास्यबोध भी उसमें कम था।एक समस्या यह भी थी कि ग्रेजुएशन के बाद पढ़ाई करने का उसका मन नहीं था।कहने के लिए वह पिता के व्यवसाय में हाथ बंटा रहा था।

केतकी पर न तो विश्वास करने का कारण था और न अविश्वास करने का।क्या पता इसने संबंध बना लिया हो और भय तथा लज्जावश मुझे न बता रही हो।वैसे भी हमारे संबंध बहुत घनिष्ठ नहीं हो पाए थे।मैं विश्वसनीय था और वह विश्वास करती थी – एक हद तक।

एक दिन ऑफिस आई तो बहुत डिस्टर्ब लग रही थी।आंखें कुछ सूजी हुई थीं और चेहरा सफेद।शनिवार और रविवार के कारण दफ्तर दो दिन बंद था।बाकी लोगों ने पूछा तो टाल गई कि तबीयत खराब है।यह कि आंखों में कीड़ा पड़कर मर गया था।लेकिन मेरे सामने उसकी एक न चली।काम के बहाने उस दिन देर तक रुकी।तब तक सभी लोग चले गए थे।ऑफिस में चपरासी, बॉस और चौकीदार ही रह गए थे।मुझे लगा कि शायद आज घर नहीं जाना चाहती, कुछ तो गड़बड़ है।

उस दिन पहली बार वह मेरे साथ कॉफी हाउस आई थी।पहली बार उस दिन अकेले में मैंने उसका हाथ पकड़ा थाकेतकी, इस तरह झूठ बोलने से सच नहीं छिप जाएगा।तुम कुछ न कुछ जरूर छिपा रही हो।क्या एक दोस्त मानकर बता देना इतना बुरा हो जाएगा? तुम मुझ पर उतना ही विश्वास कर सकती हो, जितना खुद पर करती हो।

उसकी आंखों में आंसू आ गए।बहुत गहराई तक बेधती हुई बोली- ‘बताने के लिए ही तो रुकी हुई हूँ।मैंने आज ब्रेक-अप कर लिया उससे।’

‘किससे? रितेश से?’ मैं चौंक उठा- ‘क्यों?’

‘क्योंकि उसका किसी और लड़की से संबंध है।कल मैंने उसे अपनी आंखों से देख लिया।’

मैं क्या कहता।खैर, केतकी ने बताया कि रितेश से उसके शारीरिक संबंध बन चुके थे।आखिर उसकी भी जरूरतें थीं और कब तक इंतजार करती।रितेश के मां-बाप घर पर नहीं होते तो वह चली जाती थी।मां से उसने कह भी दिया था कि शादी करेगी तो रितेश से ही।उसे किसी अनजान के पल्ले नहीं बंधना।दोनों के संबंध छह महीने तक चले होंगे।संदेह उसे काफी दिनों से होने लगा था।कल वह अपनी सहेली रंजना और उसके भाई के साथ इंडिया गेट गई थी।शाम के धुंधलके में जब वे टहल रहे थे, तभी उसने रितेश को पेड़ की जड़ में किसी लड़की के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया था।

मैने उसे बहुत समझाया कि जो हुआ उसे भूल जाए।ऐेसे मौकों के लिए कुछ निश्चित वाक्य होते हैं।जो होता है, वह अच्छा ही होता है।शायद इसी में उसकी भलाई होगी।मान लिया शादी के बाद इस तरह की बात होती तो क्या करती? अभी तो खैर क्या नुकसान हुआ है? और यह कि अपना ध्यान पढ़ाई में लगाए।यदि इसी क्लर्की में ही रहना है, फिर तो कोई बात नहीं।

उस रात मैं बहुत कुछ सोचता रहा।कैसा है रितेश जो इतनी सुंदर, नौकरीपेशा और खुली लड़की पाकर भी इधर-उधर मुंह मारता है? जो लड़की मुझसे इतना खुल चुकी है, वह उसके साथ कितनी खुली होगी! हर तरह से बेहतर ही है रितेश से।रितेश की फोटो उसने दिखाया था एक बार।बहुत बुरा तो नहीं था, फिर भी केतकी के योग्य तो कतई नहीं था।क्या पुरुष अपने इस स्वभाव को कभी छोड़ नहीं पाएगा? केतकी ने रितेश को उस लड़की को आलिंगन में लेकर चुंबन लेते हुए देखा था।अब तो ऐसे संदेह की गुंजाइश नहीं थी कि वह लड़की किसी अन्य रिश्ते में होगी।आदमी सब कुछ पाने के चक्कर में बहुत कुछ खो देता है।

मुझे लगा था कि केतकी अब इन चक्करों से तोबा कर लेगी और अपना मन भविष्य संवारने में लगाएगी।हालांकि कभी-कभी मेरे मन में चोर जागता कि वह शरीर का सुख ले चुकी है, रितेश से संबंध पुन: बन जाएंगे।लेकिन मैं बहुत जल्दी ही गलत साबित हो गया।दो सप्ताह के बाद ही वह बताने लगी कि नकुल से उसकी लंबी बातें ही नहीं होतीं, वह उसके साथ अकेले घूमने भी जाने लगी है।नकुल रितेश का दोस्त था।वह नकुल से पहले भी मिल चुकी है।केतकी कई बार उसकी दुकान पर फोटो खिंचवाने जा चुकी थी और नकुल उसकी फोटो बहुत ही अच्छी बनाकर दिया करता था।

नकुल की फोटोग्राफी की दुकान थी।दरअसल दुकान उसके पिता की थी।नकुल का छोटा भाई पढ़ने में बहुत अच्छा था जबकि नकुल दिमाग का तेज होने के बावजूद पढ़ने में फिसड्डी था।उसका मन शैतानी में लगता था।वह कक्षा में अध्यापकों के लिए एक मुसीबत था।उसके दो ही काम थे, खेलना तथा छात्रों एवं अध्यापकों को तंग करना।आठवीं जैसे-तैसे पास करके उसने पढ़ाई छोड़ दी।फोटोग्राफी का काम अब तक सीख लिया था उसने।लेकिन दुकान पर टिकना उसके वश का नहीं था।दुकान से पैसे निकालकर फुर्र हो जाता।सिगरेट, गुटका वगैरह उसके जीवन का हिस्सा बनने लगे थे।संयोग से पिता की तबीयत इस बीच खराब रहने लगी और वह अस्थायी रूप से दुकान संभालने लगा था।अपनी मर्जी से दुकान पर ठहरता और अपनी मर्जी से बंद करके दोस्तों के साथ गायब।बातें बनाने में उस्ताद हो गया था।जब केतकी रितेश के रिश्ते में थी, तभी से वह केवल शराब का आदी ही नहीं हो गया था, कालगर्ल के पास भी जाने लगा था।

 

मुझे केतकी का नकुल के साथ घूमना पसंद नहीं था।ऐसा लड़का, जो न पढ़ालिखा है और न जिम्मेदार, उससे केतकी क्या पाएगी? निश्चित ही वह इसके शबाब पर मर रहा है और अपनी काम पिपासा शांत करके एक दिन छोड़ देगा।अगर नहीं भी छोड़ता है तो उससे शादी करके ये लड़की घाटे में रहेगी।पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही लड़की आठवीं पास लड़के से कैसे निभाएगी ?

शुरू में तो केतकी कहती रही कि वह और नकुल केवल दोस्त हैं और नकुल ने उस पर कोई गलत द़ृष्टि नहीं डाली थी।परंतु मेरा अनुभव नकुल पर विश्वास करने को तैयार नहीं था।धीरे-धीरे केतकी ने यह मान लिया था कि नकुल उसका ब्वॉयफ्रेंड हो चुका है और उससे शारीरिक संबंध बन चुके हैं।शराब तो आजकल सभी लोग पीते हैं, यह कि इसमें कोई बुराई नहीं है और यह कि अब नकुल ने काल गर्ल्स के पास जाना भी बंद कर दिया है।पढ़े-लिखे भी बेकार बैठे हैं और लोगों के पास कॉमन सेंस नहीं है।नकुल इन सबसे अच्छा है।

मैं समझ गया कि कहावत सही है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि:।मैं नकुल की आदतों पर कटाक्ष करता या समझाता तो केतकी नाराज हो जाती।जब मैं उसे समझाता या नकुल के प्रति नकारात्मक विचार प्रकट करता, उसके चेहरे का रंग उतर जाता।एक बार तो उसने झुंझलाकर कह दिया कि मैं भी उस पर गलत नजर रखता हूँ, इसलिए नकुल के खिलाफ हूँ।बातचीत के सिलसिले में उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा था कि वह मुझे पसंद करती है, मेरे विचारों का सम्मान करती है और भले मैं उससे लगभग दस साल बड़ा हूँ, वह मुझसे शादी करने को तैयार है।तो क्या मैं अपनी पत्नी को तलाक देकर उससे शादी कर लूंगा?

इस बीच हमारे संबंधों में घनिष्ठता बढ़ती जा रही थी।नकुल से कभी-कभी उसका विवाद हो जाता, तब उसे मेरी बातें सच लगतीं।इधर मेरे कहने से वह ओपन यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने लगी थी।मैं भी इसी विषय में एम. ए. था, इसलिए उसे मुझसे बहुत सहायता मिल जाती।दरअसल यह सुझाव भी मैंने ही दिया था।मेरे पास अपने नोट्स थे, किताबें थीं और अवधारणाएं स्पष्ट थीं, अत: उसकी मदद भी मैं काफी अच्छी कर देता था।प्रथम वर्ष में उसे लगगभ साठ प्रतिशत अंक मिले थे।इससे मुझ पर उसकी निर्भरता तथा विश्वास बढ़ गया था।

मुझे याद है कि एक दिन मैं केतकी को फिल्म दिखाने ले गया था और वहां से निकलकर सेंट्रल पार्क में बैठकर मैंने उसे बहुत समझाया था- ‘देखो केतकी, नकुल से संबंध रखना ठीक नहीं होगा तुम्हारे लिए।मैं तुम्हारा मित्र हूँ, मालिक नहीं।मेरा तुम पर कानूनी अधिकार नहीं है।मेरा तुम पर उतना ही अधिकार है, जितना तुम मुझे दो।मेरा कोई स्वार्थ नहीं है, माना कि तुम सुंदर और जवान हो।एक आकर्षण जरूर है तुम्हारे प्रति मुझमें, लेकिन मैं अपनी पत्नी को छोड़कर तुमसे शादी नहीं करने जा रहा।यह भी सच है कि वह तुम जैसी मेधावी, शोख और सुंदर नहीं है, फिर भी अच्छी है।मेरे प्रति समर्पित है, मेरे लिए सारे व्रत रखती है और मुझमें ही खुश है।सुंदरता में भी कोई बुरी नहीं है।अब तो हमारे पास एक बच्ची भी है।मुझे तुमसे केवल सान्निध्य का लाभ है।हमारी नौकरी तबादले वाली है और हमारा साथ कभी भी छूट सकता है।मैं नहीं चाहूंगा कि तुम्हारा जीवन बर्बाद हो।तुम दूर तक नहीं सोच पा रही हो।मैंने जिंदगी तुमसे ज्यादा देखी है।जहां भी एक शिक्षित लड़की किसी अशिक्षित या कम शिक्षित की पत्नी बनी है, उसे या तो अपनी प्रतिभा की हत्या करनी पड़ी है, या फिर तलाक तक की नौबत आई है।प्रेमी या प्रेमिका में केवल अच्छाइयां ही नजर आती हैं।असली रूप तो शादी के बाद सामने आता है।अभी तुम उसकी गर्लफ्रेंड हो, तुम पर उसका पूरा अधिकार नहीं है।कल शादी हो जाएगी तो वह अपना अधिकार जरूर दिखाएगा।ऊपर से वेश्यागामी और शराबी।यह पुरुषवादी समाज है और स्त्री कितना भी आगे बढ़ जाए, पति उसे अपने से नीचे ही देखना चाहता है।

‘और चलो, घूमने-फिरने या सेक्स तक की इजाजत मैं दे सकता हूँ।शादी की सलाह तो मैं कतई नहीं दूंगा।कारण यह कि शादी के बाद अलग होना इतना आसान नहीं होता।सामाजिक बदनामी की बात छोड़ भी दूं, एक तो कानूनी पचड़े।बच्चा हो गया तो और मुश्किल! मैं तलाक के पक्ष में कभी भी नहीं हो सकता।या तो शादी करो मत, करो तो निभाओ।प्रेमविवाह में तलाक किसी कीमत पर स्वीकार्य होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि आप दावा करते हैं कि आपने अपने साथी को समझ लिया है।परंपरागत शादियों में तो माना भी जा सकता है कि लड़के या लड़की के व्यवहार और चरित्र की जानकारी नहीं थी! अत: मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि तुम अविवाहित भले ही रह जाओ, नकुल से तुम्हारा विवाह न हो।’

केतकी मेरी बात से सहमत नहीं हुई थी, हां उसने मेरा सम्मान किया था और उग्र नहीं हुई थी।बोली- ‘मैं मानती हूँ कि आप एक अच्छे मित्र हैं।आप एक अच्छे इनसान भी हैं।ऑफिस में भी लोग आपके स्वभाव की प्रशंसा करते हैं।मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे आप जैसा मित्र मिला।कभी-कभी तो मुझे चिढ़ होती है, दुख भी होता है कि आपने इतनी जल्दी शादी क्यों कर ली? यदि आप अविवाहित होते, तो मैं नकुल को छोड़कर आपसे शादी कर लेती।लेकिन अब मैं भी नहीं चाहूंगी कि आप अपनी पत्नी को छोड़ें और मुझसे शादी कर लें।दरअसल, मैं तो यह सोचती भी नहीं।मैं क्यों किसी सुखी औरत की जिंदगी तबाह करूं? उनका अच्छा भाग्य था कि आप उन्हें पति के रूप में मिले।एक मित्र के रूप में मैं भी कभी आपको नहीं छोड़ना चाहूंगी।आप मित्र के अलावा मेरे गाइड, संरक्षक और प्रेरक भी हैं।लेकिन आप नकुल को उसकी पढ़ाई के स्तर से ही मत आंकें।वह काफी जिम्मेदार हो गया है।वह कोई बड़ा बिजनेस शुरू करने वाला है।वह आदती शराबी नहीं है, बस कभी-कभी पीता है।रही कालगर्ल्स के पास जाने की बात तो वह कब का छोड़ चुका है।कहता है कि जब तू नहीं थी तब जाता था।अब तू है तो क्यों जाऊँ? और यह बात सच भी लगती है।दूसरी बात, अभी जब तक एम.ए. पूरा नहीं हो जाता, मैं शादी करने ही कहां जा रही हूँ? ठीक है, जो होगा, देखा जाएगा।’

मुझे लगा कि मैं बेकार में ही अपना माथा फोड़ रहा हूँ।एक विरक्ति हो आई मन में।चार दिन की लड़की, अपने आप को कितना बड़ा ज्ञानी मान रही है! धीरे-धीरे इस मुद्दे पर बात करना मैंने कम कर दिया।उसकी पढ़ाई में मदद करता रहा।

मैं वर्तमान में वापस आया।कॉफी हाउस में बैठे हमें घंटा भर तो हो गया होगा, लेकिन बातें ज्यों की त्यों रह गई थीं।उसने पूरा नहीं बताया कि शादी कब हुई, कितने दिन चली और झगड़े का असली कारण क्या रहा? फ्रेंच फ्राईज खत्म हो चुकी थीं और कॉफी भी कप की पेंदी में पहुंच गई थी।मैंने विषय को किंचित बदलाऔर अलग होकर रह कहां रही हो?’

‘वृद्धाश्रम के स्टाफ क्वार्टर्स में।’

‘वृद्धाश्रम के स्टाफ क्वार्टर्स में, क्यों?’ मैं चौंक गया।

वह मुस्कराई- ‘क्यों, बुढ़िया नहीं हो गई मैं?’ फिर अचानक उठ गई थी- ‘आज के लिए इतना ही।आगे सुनना हो तो किसी और दिन आ जाइए।सुनाना मैं भी चाहती हूँ, क्योंकि आपको सुनाना बहुत जरूरी है।’

आदेश देने का वही पुराना अंदाज- ‘अगले शनिवार को फिर यहीं मिलेंगे।यह तो हमारी दोस्ती का तीर्थस्थल है।’ और वह भावुक हो गई थी- ‘मैं जानती हूँ कि आपको मैंने बहुत दुख दिया है।आज मैं समझ सकती हूँ कि तब आपको कितना दुख हुआ होगा, क्योंकि आज मैं भी दुखी हूँ।आप कितने भी नाराज हों, मुझे छोड़ नहीं सकते।हूँ, फिर मिलते हैं।’

मेरा मोबाइल नंबर लिया उसने और मेरे नंबर पर रिंग किया। ‘सेव कर लेना इसे।’ और फिर ठठाकर हँस पड़ी- ‘इस मोबाइल ने भी बहुत दुखी किया।काश! उस समय होता जब हम अलग हुए थे, इतना अलगाव तो नहीं झेलना पड़ता।’

मैं तब भी जानता तो था कि ये लड़की कुछ अजीब है, लेकिन इतना नहीं जानता था।उसने बताया था कि नकुल का घर छोड़कर आने के बाद वह बहुत उदास और नकारात्मक हो गई थी।क्या नहीं किया उसने नकुल के लिए? कितनों के बोल सहे उसने! उसे अपने माता-पिता का दिल तोड़ना पड़ा और नकुल के लिए ही उसने मेरे जैसा मित्र खोया।जिस शरीर को उसने मुझे चाहते हुए भी न छूने दिया, उसे उस वेश्यागामी पर लुटा दिया।यहां तक कि एड्स से भी नहीं डरी।

अगले शनिवार को कॉफी हाउस में हम फिर मिले और इस बार दूसरे कोने वाली मेज खाली मिल गई।इस बार मुझे ज्यादा कुरेदना नहीं पड़ा।एक-एक करके उसने सारा किस्सा बता दिया।अपनी तीन साल की बेटी को लेकर निकली थी आधी रात को नकुल के यहां से।सीधे अपनी बड़ी बहन के यहां गई थी।भाई को न तो नकुल पसंद था और न उसकी बेटी पसंद आती।उसने सारा निर्णय रास्ते में ही ले लिया था।कई बार समझौते किए हैं और लौटी है, अब नहीं लौटना है।सारा जीवन अकेले भले ही काटना हो।इतनी रात गए बहन के यहां पहुंची थी तो उसका चौंकना स्वाभाविक था।साफ-साफ बता दिया कि हमेशा के लिए नकुल को छोड़कर आई है, रहने दे तो रहे।बहन ने कुछ नहीं कहा था।

कुछ दिनों बाद संयत हुई।फिर भी लगता कि कमजोर हो रही है।एक पुरुष की जरूरत पड़ जाती थी।लेकिन इस बार उसने पक्का कर लिया था कि अपने इस फैसले का सम्मान करेगी।मन में विरक्ति भर गई थी, किंतु जिजीविषा कम नहीं हुई थी।

बीच में मैंने माहौल हल्का बनाने के लिए टोका – ‘तो क्या बाद के दिनों में तुम्हें सेक्स की जरूरत नहीं महसूस हुई?’

वह हँस पड़ी- ‘पड़ी क्यों नहीं, और मैं आपसे झूठ क्यों बोलूं? लेकिन मैंने सोचा कि मेरा यह कोटा खत्म हो चुका है।मैंने महसूस किया कि मैं और नकुल एक-दूसरे को प्यार नहीं करते थे।हमारे बीच केवल सेक्स ही था।आपसे अलग होने के बाद नकुल ने शादी करने में भी नखरे दिखाए थे, लेकिन वह मेरी जिद और साहस जानता था।शायद इसीलिए उसने शादी कर ली।’

‘तो तुमने उस विवाद के बाद कभी मुझसे मिलने का प्रयास नहीं किया?’

‘किया था न! लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।शुरू में मुझे भी लगा कि आपसे लड़कर और अलग होकर ठीक किया।नकुल भी आपसे चिढ़ता था, क्योंकि आप उसकी चालाकियों की व्याख्या कर देते थे और मैं कभी-कभी उससे आपके तर्क के आधार पर भिड़ जाती थी।तुरंत तो उसने कुछ नहीं कहा, बल्कि दुख भी प्रकट किया, लेकिन बाद में मुझे लगा कि उसे बहुत खुशी हुई थी।दरअसल उसे कदाचित संदेह था कि मेरे आपके बीच कुछ है।आपसे लड़ाई के बाद उसने मुझे काफी समय और सहारा दिया था।पांच-छह महीने बाद मेरा ईगो कम हुआ तो आपसे मिलने का मन हुआ।ट्रांसफर तो आपने लड़ाई के बाद ही करा लिया था।बाद में मैं आपके दूसरे ऑफिस में गई तो आप वहां से भी जा चुके थे!’

मुझे ठीक से याद था कि मई-जून में केतकी की एम.ए. फाइनल की परीक्षाएं थीं।ऑफिस से स्टडी लीव लेकर वह पढ़ाई में लगी हुई थी।उसी बीच नकुल को तलब लगी।पहले तो मिलने के नाम पर, बाद में खुले तौर पर उसे बुलाया।उसने समय की कमी का हवाला देकर मना कर दिया।एक शाम को पीकर वह केतकी के घर पर तिकोनिया पार्क में आ गया।उसे पता था कि केतकी शाम को दो चक्कर लगाने जरूर जाती है।वहीं पर उसने केतकी को रंडी और रंडी की औलाद तक कह डाला।केतकी ने गालियां देकर ब्रेक-अप कर लिया था।मैं खुश हुआ था कि चलो, किसी प्रकार बेचारी की जान छूटी।उसने शिद्दत से महसूस किया कि नकुल के साथ संबंध बनाकर बहुत गलत किया और एक बार फिर भाग्य ने साथ दिया कि नकुल का असली रूप सामने आया और वह बच गई।

लेकिन तीन महीने बाद केतकी नकुल के पास वापस।अब मैं उसके मामले में दखल कम देने लगा था।एक दिन उसने इसी कॉफी हाउस में डरते-डरते बताया।मुझे काटो तो खून नहीं।अब कुछ कहने के लिए बचा ही नहीं था।उस दिन न चाहते हुए भी बात बढ़ गई थी।

मेरी बातें कड़वी लगीं तो उसने साफ कहा कि आपको नकुल से इसलिए परेशानी है कि उसके रहते आप मुझे पा नहीं सकते।यह कि आप भी उन्हीं लोगों में हैं जो पढ़ेलिखे होकर भी अनपढ़ से कम नहीं होते।लगभग चीखने लगी थी।इससे पहले कि लोग जुटें, मैंने माफी मांग ली और घर आ गया।अगले दिन छुट्टी लेकर मुख्यालय गया और एक सुदूर अंचल में अपना तबादला करवा लिया था।बड़ी मुश्किल से उसकी यादों से उबर पाया था मैं।

उसके माता-पिता और भाई ने भी नकुल से शादी की इजाजत नहीं दी।नकुल के घरवालों को कोई आपत्ति नहीं थी।अब केतकी ने कोर्ट मैरिज करने की बात सोची और उसे मेरी याद आई।मैं होता तो साक्षी बनने के अलावा अन्य प्रकार की मदद कर सकता था।मित्र ही सही, कोई तो होता कन्यापक्ष से।मेरी कमी उसे खलने लगी थी और उसने मेरी तलाश में मेरे ऑफिस तक चक्कर लगाया, लेकिन तब तक मेरा तबादला वहां से भी हो चुका था।

फिर शादी हो गई।हनीमून भी हो आए।नया तो कुछ था नहीं।साल के भीतर एक बेटी भी पैदा हो गई।एम.ए. पास तो हो गई, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ।मैं चला गया था, नकुल अब उसका पति हो गया था, जिसे उसका एम.ए. होना खलने लगा था।एकांत क्षणों में उसके पढ़े-लिखे होने का मजाक बनाता था।फोटोग्राफी में डिजिटल युग आ गया था और आमदनी गिर गई थी।सास-ससुर के भी आरोप कि पढ़ाई लिखाई का घमंड हो गया है, किसी को कुछ समझती नहीं।न जाने कितनी तरह की बातें।मेरी बातें उसे रोज याद आने लगीं और उसने चीख-चीखकर कहा कि वह बहरी हो गई थी कि मेरी सलाह नहीं मानी।

और फिर उस रात छोड़ ही आई।

‘और बच्ची को?’ मैंने पूछा।

बच्ची को साथ में ही रखती है अब।पहले कुछ दिनों तक क्रेच और हॉस्टल में रखा था।एक दिन जब वापस जा रही थी तो एक अकेले बच्चे को रोते हुए देखा।उसे दया आई, पुचकारा और चुप कराया।वह बिलकुल अकेला था।शायद बिछड़ गया था अपने मां-बाप से या फिर किसी कारण बाल-तस्करी से बच गया था।कुछ खास बता पाने में समर्थ नहीं हो रहा था।पुलिस थाने से होती हुई वह एक अनाथालय पहुंच गई।वहीं से उसका जीवन बदल गया।बहुत तरस आया उसे अनाथ बच्चों के जीवन पर।मालूम करके वह अनाथालय चलाने वाले स्वयंसेवी संगठन से मिली।तब से वह उन्हीं से जुड़ी है।वहीं रहती है।बहुत कुछ बदला है उसने वहां।बच्चों के साथ जुड़कर उसे बहुत अच्छा लगने लगा।एक तो निश्छल प्यार और दूसरे एक सार्थक जीवन।

आखिर में बहुत गंभीर हो गई- ‘जीवन में एक ग्लानि थी- आपसे दुर्व्यवहार करने और बिछड़ने की।मैं जानती थी कि आप मुझे बहुत प्यार करते थे और भूले नहीं होंगे।दुनिया में एक ही तो मेरा अपना था जिसे मैंने खो दिया था।लेकिन मेरी खुशकिस्मती देखो कि देर से ही सही, मिल तो गए।’

मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूं।केतकी ने एक लंबी सांस ली- ‘मैं भी कितनी बड़ी मूर्ख थी न!’

‘आप सोच रहे होंगे कि मैं कमजोर थी।मैं अपने फैसले बदल देती थी।अब मैं फैसले नहीं बदलती।जब देख लिया कि उस ओर कुछ नहीं है तो अब इस ओर ही सही।’ मेरी ओर हसरत भरी नजर से देखने लगी थी।

‘क्या हुआ? कुछ और कहना चाहती हो?’ मैंने पूछा था।

‘कहकर क्या होगा? अब आप मेरे जैसे कड़े फैसले ले नहीं पाएंगे।काश! इस ओर आप भी चलते मेरे साथ।लेकिन मैं जानती हूँ, बसी गृहस्थी छोड़कर मेरे रास्ते पर चलना आसान नहीं है।फिर भी मिलते तो रहेंगे न?’

उसने बैरे को बुलाकर बिल का भुगतान किया और मेरा हाथ पकड़कर खड़ी हो गई।बाहर निकलते समय सोचता ही रहा कि जिंदगी भी अपने रास्ते कैसे-कैसे बदलती है।मुख्यमार्ग को छोड़कर कौन कब पगडंडियों पर मुड़ जाएगा, कौन जानता है? मैं भी केतकी के रास्ते पर क्यों न चल दूं? कुछ सामाजिक दायित्व तो मेरे भी बनते ही हैं।और साथ देने का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता है!

हाथ मिलाकर चलते समय कुछ गरम सा लगा मुझे- ‘तुम मिल गई न! हमेशा साथ दिया था, एक बार फिर कोशिश करूंगा।’

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