स्नातकोत्तर का छात्र।

 

समय तुम्हें गिन रहा है

लेकिन तुम-
अपने-आप में डूबे हुए
इतिहास की किसी फुटनोट-सी चुप्पी में
खड़े हो
किताब में छपे पेड़ की तरह
जिसकी पत्तियां कभी झरती नहीं
जिसे आंधी नहीं छूती
जिस पर धूप भी केवल उदाहरण बनकर आती है

तुम्हें नहीं मालूम
कि बाहर मौसम
कितना बेरहम हो चुका है-
सर्दियां अब मजदूरों की हड्डियों में
पहले पहुंचती हैं
बारिश शहर के नक्शे बदल देती है
और गर्मी
सबसे पहले झोपड़ियों को जलाती है

तुम चुप हो
जैसे चुप्पी कोई सुरक्षित आश्रय हो
जैसे समय से बाहर खड़े रहना
किसी उत्तर से बच जाना हो

और मैं-
हर रोज
अपने छोटे-छोटे दिनों को
हथेली पर रखकर
तुम्हारी ओर बढ़ता हूँ
ताकि तुम्हें
वक्त में वापस खींच सकूं
उस वक्त में
जहां चीजें घटती हैं
लोग थकते हैं
गलतियां होती हैं

और फिर भी
जिंदा रहने की कोई वजह
बनती है

मैं जानता हूँ
किताब से बाहर आते ही
पेड़ को काटा भी जा सकता है
लेकिन यही जोखिम
उसे सचमुच का पेड़ बनाता है

इसलिए कहता हूँ-
आओ
पन्नों की उस सफेद सुरक्षा से बाहर निकलो
मौसम तुम्हें पुकार रहा है
समय तुम्हें गिन रहा है
और मैं
तुम्हें वक्त में
वापस खींच लाने की कोशिश में
अब भी
लगा हूँ।

नेपथ्य

नेपथ्य में बहुत कुछ होता रहता है
जो मंच पर आते-आते
थक जाते हैं

जैसे पिता का शांत चेहरा-
जिसके पीछे
अधूरी किश्तों का डर धुआं बनकर भरा है
या मां की हल्की मुस्कुराहट-
जिसके भीतर
गिरवी पड़े गहनों की खनक बची है

नेपथ्य में एक छोटा-सा कमरा भी है
जहां सपने अपने जूते उतारकर
अंधेरे में रख देते हैं
और उजाला पहनकर बाहर निकलने की
साजिशें रचते हैं

बच्चों की हंसी का भी एक नेपथ्य होता है-
जिसमें दबे होते हैं
उनके पूछ न सकने वाले सवाल
किताबों के कोने में पड़े
मुड़े हुए भविष्य की तरह

नेपथ्य हमेशा चुप रहता है
पर उसकी चुप्पी में
नाटक से ज्यादा नाटक
शोर से ज्यादा शोर
और सच से ज्यादा सच
छिपा होता है

मंच पर कुछ भी हो रहा हो-
तालियां या हूटिंग
विजय या पराजय-
नेपथ्य अपना काम करता रहता है
जैसे देश चलता है
भाषणों से नहीं
किसी अनदेखे, थके हुए
पर लगातार चलते हाथों से

जो कुछ भी चमकता है
वह नेपथ्य से होकर आता है
और वही लौट जाता है
जब रोशनी बुझ जाती है-
अपने पुराने अंधेरे में
जो सबसे ज्यादा सच्चा होता है।

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