संस्कृत की प्रमुख कवयित्री और लेखिका।संस्कृत में महाकाव्य सहित दो काव्य, हिंदी में तीन काव्य सहित संस्कृत हिंदी में पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित।संस्कृत वाङ्मय में शिल्पकलाएं’, ‘वैदिक संस्कृति की संरचना में स्त्रियों का योगदानआदि चर्चित पुस्तकें।

 

सात बरस की बाना लिखती है
ओलप्पो नगर से
भूखी हूँ, घर नहीं
सोई नहीं कब से
हैं लाखों बच्चे मुझ जैसे
सीरिया देश के

अपराध क्या हमारा
क्या छीना किसी का खिलौना
क्या किया किसी से झगड़ा
गृहयुद्ध में फिर
क्यों जलता है देश यह मेरा?

न जाने कितने तो दिन बीते
शाला की सीढ़ी देखे
बस्ता लिए बालक जाते पाठशाला
छूटते ही
दौड़ते थे घरों को

खंडहर है अब शहर
बाग बने मरघट-कब्रिस्तान
नहीं हैं फूलों में रंग
रंग बस गर्म लहू का
सुर्ख लाल या सूखा हुआ स्याह

बरसते हैं आसमां से रात-दिन
गोला-बारूद-बम
जैसे उल्कापिंड
पत्थर के बंकर में
जीता है
मरता है बचपन

बजते नहीं अब बाजे
हैं केवल बधिर बनाते विस्फोट
भयभीत क्रंदन
भागती भीड़ का
लांघते-रौंदते से वे लाशों को

सुना मैंने, बहुत लोग
नावों से पार करते सागर
तूफानी लहरों से डूबे हिम-सलिल में
वह बालक एलन कुर्दी भी

‘हे प्रभु! गया कहां वह… नहीं नहीं…’
रोते कलपते से
विकल माता-पिता के देखते ही देखते
समा गया दरिया की गोद में

जलधि के वितत तट पर
कुछ दिन बाद
चिरनिद्रा में लीन
दुनिया को रुलाता
मानो मुंह चिढ़ाता
देखा गया वह नन्हा फरिश्ता

संभवतः यह मेरा लेख अंतिम
बीतेगी क्या यह रात?
मौत है बहुत पास
जान कर भी यथार्थ
मैं चाहती जीना, मरना नहीं।

अनुवाद -स्वयं कवयित्री द्वारा

संपर्क : २१, आदित्य कॉलोनी, नर्मदा रोड़, जबलपुर-४८२००१, म.प्र. मो. ९८९३७९८७७२