ग़ज़ल संग्रह ‘आशियाने की बातें’ और ‘उड़ना बेआवाज परिंदे’ प्रकाशित।स्पेनिन सम्मान और रज़ा पुरस्कार से सम्मानित।गायन का शौक।

 1.
घर कहीं, दफ्तर कहीं, बस्ती कहीं, सहरा कहीं
हम कहीं पर हैं, हमारा कारवां बिखरा कहीं

यूं भी हर इंसान में, रहता है इक खानाबदोश
एक बादल की तरह, छाया कहीं, बरसा कहीं

किसने खुशफहमी में चिड़ियों के सकोरे भर दिए
क्या कोई मन का परिंदा, प्यास में झुलसा कहीं

तुमने बांटीं, गर्म वादों की मुलायम रोटियां
अब न होगी बस्तियों में, भूख की चर्चा कहीं

जल रहे थे खेत जब, थी राजधानी जश्न में
बेखबर को क्या खबर, कब क्यूं कहर बरपा कहीं

चांदनी की बज्म में, शामिल था सारा आसमां
कांपता मौसम, बदन की आग में दहका कहीं

घिर गई क्या शाम, चूल्हे झोपड़ों में जल उठे
भूख के आंचल में, थककर सो गया रस्ता कहीं

उम्र अनजाने ही, सौ टुकड़ों में बंट कर रह गई
जैसे बेआवाज, कोई आइना दरका कहीं

रात का लश्कर चला, टूटा सितारों का भरम
रह गया पलकों में, तेरे ख्वाब का कतरा कहीं।

2.
पहने हुए है, खून से भीगा लिबास रात
क्या हादसे के वक्त रही, आस-पास रात

हर वाकए की चश्मदीद है भी, नहीं भी
बेबात लगाती नहीं, यूं भी कयास रात

मुझमें है स्याह रात, कि खुद रात में हूँ मैं
है क्यूं मेरे वजूद के फिर, आस-पास रात

महलों की दावतों को, बताती नहीं कभी
करती है तंग बस्तयों में, क्यूं उपास रात

सच्चाई है कोई, कि ये मन का फितूर है
जितने उदास हम नहीं, उतनी उदास रात

दिन में कोई भी जश्न हो, फीका लगे है क्यूं
क्यूं महफिलों में, रंग जमाती है खास रात।

 

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