
कविता लेखन के साथ साथ स्टोन आर्टिस्ट और बोनसाई आर्टिस्ट के रूप में पहचान।
धुएं की इबारतें
उस घर की रसोई की दीवारों पर
धुएं की कुछ इबारतें थीं
पुरुष अक्सर बैठक से चीखता
कमबख्त कितनी भी सूखी लकड़ियां लाओ
धुआं उठता है
फुंकनी भर का भी दम नहीं रहा क्या
और स्त्री अपने संपूर्ण प्राण
फुंकनी में भर देती
धुआं दीवारों पर फिर कुछ शब्द उकेरता
और समा जाता छत के आंचल में
चूल्हा बोल सकता तो यही बयान देता कि
नमकीन है इस घर की लकड़ियों की सीलन
चूल्हे की आग नीले सागर-सी नीली है
और दीवारों पर लिखी गईं धुएं की इबारतें
नमक की खड़िया से लिखी गई हैं
पहले पहल लगा
नमकीन झील-सी हैं स्त्री की आंखें
धुआं बर्दाश्त नहीं कर पातीं और
बहने लगती हैं
बहुत बाद में पता चला
उस घर की स्त्री सब कुछ बर्दाश्त कर लेती है
युगों बाद किसी खुदाई में जब
रसोई की दीवारों पर लिखी
धुएं की इबारतों को चीन्हा जाएगा
तब पुरातत्वविद बताएंगे
कि उस स्त्री ने क्या-क्या बर्दाश्त किया था।
संपर्क :1/235, विजयंत खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010


Bohot achi kavita