युवा कवि। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। शिक्षा निदेशालय दिल्ली के अधीन टीजीटी हिंदी।

सभ्यताओं का स्वर्णकाल

सभ्यताओं के स्वर्णकाल में
हथियारों की खेती हुई और हवस की पूजा
इतनी कि परियों को छुपाना पड़ा कोहे काफ में
खून के रंग वाली धरती और
धुएं के आकाश से बने क्षितिज पर
एक कृत्रिम इंद्रधनुष बनाने के लिए
अनगिनत तितलियों को चढ़ानी पड़ी अपनी बलि

जमीन के सीने पर दरार उभर आई थी
दो महाध्रुवों की ओर दुनिया खिंच रही थी
इतनी कि जैसे रस्सियों बंधे पैरों वाला मनुष्य
दो अलग अलग दिशाओं की भीड़ के खींचने पर
बीच से चिरता जाता है

यह खींचतान जमीन से लेकर आसमान तक फैली थी
प्रकृति के दो स्थाई रंग सदियों से जंग में थे
काले और सफेद के शीतयुद्ध में
संतुलन साधक थे बचे हुए रंग
कि एकाएक खबर उड़ी
सूरज नई दिशा में करवट ले रहा है
निजाम बदल रहा है ब्रह्मांड का
धूर्त कलमचियों ने काले रंग को लिखा पाप
जरखरीद संगताराशों ने काले रंग के बनाए दस सर
रंगबाजों ने अपनी सुविधानुसार
सांवले रंग का आविष्कार किया
काले कारनामे गोरे रंग में छिपकर आए
काली त्वचा बेदखल हुई
सभ्यताओं की दास्तान से

जिन बिल्लियों को मिला काला रंग
प्रकृति के समस्त अपशकुन उनके अनुगामी हुए
उनकी सरपरस्ती में हुए दुनिया के तमाम हादसे
उनकी काया की छाया में शरणार्थी हुए अंधेरे

जिन पंछियों को मिला काला रंग
उन पर चालाकी का टैग चस्पा कर दिया गया
उनकी कर्कश और कोमल ध्वनियों को छोड़कर
साहित्य उनकी फितरत को काले अक्षरों से रंगकर
मतलबपरस्ती के मुहावरे गढ़ता रहा

जिन इंसानी नस्लों को मिला काला रंग
उन्हें सभ्यता का दुश्मन मानकर
सभ्य दुनिया की गाड़ी में जोत दिया गया
उनको मारना पाप की जगह पुण्य कहलाया
इतना कि इनके हत्यारे देवता की पदवी से विभूषित हुए

सभ्यताओं के इतिहास रंगों की कलम से लिखे गए
जहां काला रंग
अपमान का पर्यायवाची लिखा गया
और उन्हें जन्मजात दास समझने वाली बर्बरता
गोरे रंग में छिपकर सभ्यता कहलाई

राष्ट्रवाद उसी सभ्यता का आधुनिक अवतार है
जो राजतंत्र में रंगों के श्रेष्ठता बोध में छिपा था
और लोकतंत्र में धर्मांधता की भीड़ के
दरअसल राष्ट्रवाद
देश की किताब में वह पवित्र शब्द है
जिसका मौन वाचन देश की जनता करती है
और सस्वर पाठ हिंसक गतिविधियों में लिप्त ठेकेदार।

मायके गई बीवी के लिए

तुम्हारे होने पर कभी ध्यान ही नहीं गया
उस संगीत पर
जो किचेन में गैस पर रखी पतीली में खदबदाता था
मैंने छत के गमलों में लगे फूलों की महक तक
समेटे रखा अपनी सूंघ का दायरा
और नाकद्री की उस खुशबू की
जो खाना बनते वक्त पतीली से निकलती है
स्कूल से लेट होने पर आए तुम्हारे फोन पर
झल्लाते हुए तुम्हारी फिक्र को अनदेखा किया
रात में चाय की चुस्कियों के साथ लिखते हुए
तुमसे कभी नहीं कहा
इन कविताओं के निर्माण में
तुम्हारी नींद भी शामिल है

ओह मैंने तुमसे बहुत कुछ नहीं कहा
शायद प्यार जताने का हुनर मुझे आया ही नहीं
मुझे कवियों की तरह
आपबीती को जगबीती बनाने का
हुनर भी नही आया
मेरी भाषा कही और अनकही के बीच
बिन मांझी नाव बनी हिचकोले खाती रही
तुम्हें वेलेंटाइन पर कभी गुलाब नहीं दिया
एनिवर्सरी पर पहाड़ ले गया
मगर मुंह से मुबारकबाद नहीं बोला गया
रोज सवेरे तुम्हें स्कूल छोड़ने की ड्यूटी
मोटर साइकिल के साथ पूरी शिद्दत से निभाता रहा
पर कहा नहीं गया मुझे तुम्हारी फिक्र है
शायद तुम समझ सको कि असल में
अड़ियल और नाशुक्रे आदमी का प्यार
ऐसा ही होता है
मैं प्रेम को जबान पर लाने का कायल नहीं रहा
इसीलिए मेरा प्रेम तुम्हारी अनुपस्थिति में
हमेशा आंखों से पिघलता रहा
और तुम्हारे सामने कभी कभी होंठों से
जैसे उस दिन तुम्हारे माथे पर अंकित हुआ
जब पहली बेटी होने के वक्त स्ट्रेचर पर लेटे हुए
ऑपरेशन थियेटर के लिए तुम्हें विदा कर रहा था
और नमाज बाद दुआ के लिए उठे हाथों में
टप टप गिरते आंसुओं की शक्ल में फूट पड़ा

कहते हैं प्रेम कलाओं से व्यक्त होता है
आज इस प्रेम दिवस पर पूरी ईमानदारी से कहता हूँ
मुझसे अपने प्रेम की न मूर्ति बनाई जाएगी न तस्वीर
मैं प्रेम को शब्दों का जामा नही पहना सकूंगा
मैं काम याचना को प्रणय निवेदन
लिखने वाले कवियों से पूछता हूँ
क्या प्रेम की कोई व्यक्त भाषा भी होती है।

फैमिली मैन

मैं उस धूमकेतु का वंशज हूँ
जो खुद के पैरों में उजालों को बांधकर
भीड़ की रहनुमाई की तख्ती को थामकर
अपनी आंखों के लिए
रोशनी के दो कतरे जुटा नहीं पाता
और जाका गुरु भी
आंधला की व्यंग्योक्ति कान में धरकर
अनजाने अंधेरे में गिरता जाता

बच्चे मुझे सुपरमैन समझते हैं
लेकिन असल में
मैं एक संशयग्रस्त फैमिली मैन हॅूं

मैं ही वह दलित हूँ
जो हजार सालों से दूध से हाथ जलाते जलाते
अब छाछ से भी डरने लगा है

मैं ही वह ब्राह्मण नौजवान हूँ
जो तमाम रोशनख्याली के बावजूद
ब्राह्मणवाद के ताने झेलने को मजबूर है
शोषक का ठीकरा ढोता बेगारी मजदूर है

मेरे अंदर एक धार्मिक अल्पसंख्यक का खौफ है
जो दंगों की अफवाह उड़ते ही
घर के दरवाजे पर मोटे ताले जड़ देता है
घर की महिलाओं को थमाता है जहर की शीशी
सहमी हुई आंखों और कंपकंपाते हाथों से
सब्जी काटने वाली छुरी को थामकर
दरवाजे पर कान लगाए रहता है
और हर आहट के साथ अपने अंदर मरता जाता है

बहन बेटियों वाले परिवार का अकेला आदमी हूँ
जो स्त्रियों को पढ़ाना तो चाहता है
मगर अकेले स्कूल भेजने से डरता है
खानदानी रईसी खोया जमीदारों का वंशज हूँ
जो चौपाल पर बैठने से बचता है
और दरवाजे पर
फकीर की सदा आते ही सहम जाता है

उस मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया हूँ
जो अश्लील विज्ञापन के डर से
टी वी का रिमोट हाथ में पकड़े रहता है
जो पूरे परिवार को बंद मुट्ठी रखना चाहता है
मगर किसी पर भरोसा नहीं कर पाता
जो सब कुछ बच्चों के नाम लिखना तो चाहता है
मगर बुढ़ापे की फिक्र में रुका रहता है
जिंदगी के कहकहों को अनसुना करके
आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा में कुम्हलाया रहता है।

संपर्क : हाउस नंबर 380, थर्ड फ्लोर, पॉकेट 9, सेक्टर 21,रोहिणी , दिल्ली-110086 मो.9136397400