विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। कुछ वर्षों तक पत्रकारिता के बाद पूर्णकालिक लेखन।

ट्रेंच ट्रेंच ट्रेंच… ट्रेंच ट्रेंच ट्रेंच

जानी-पहचानी-सी ध्वनि ने मेरी नींद में दखल दिया तो चौंककर मैं चारों ओर देखने लगी। किसी अनाम-सी जगह पर ट्रेन रुकी हुई थी। बंद खिड़की के भीतर आवाज भला कैसे आ रही है? मैं खिड़की से बाहर देखने लगी। कुछ दूर पर नाला बह रहा था। यानी, शहर अब दूर नहीं।

ट्रेंच… ट्रेंच… ट्रेंच… फिर वही आवाज… अब मुझसे रहा नहीं गया। मैं अपनी सीट से उठकर कंपार्टमेंट के गेट पर आ गई। किसी ने भीतर गेट का दरवाजा खुला रख दिया था। बाहरी गेट पर एक लड़का बैठकर चिड़ियों को बिस्कुट के टुकड़े खिला रहा था। कौए, मैंना के साथ-साथ दो टिटहरी भी बिस्कुट के टुकड़े लपकने आ गई थी। कौवे उन्हें मौका ही नहीं दे रहे थे। परेशान होकर वे चीखने लगे  ट्रेंच… ट्रेंच… ट्रेंच…

यह ध्वनि सालों बाद मेरे कानों में पड़ी थी।  मुझे ऐसा लगा जैसे वही टिटहरी सामने आ गई हो।

एक टीस-सी मन में उठी। मैं अपनी सीट पर वापस आ गई। किसी शहर से चले जाने के बाद भी वह शहर, हमारे भीतर से कभी नहीं जाता। कुछ दृश्य कुछ ध्वनियां हमेशा के लिए किसी कोने में ठहर जाया करती हैं।

उस दिन भी टिटहरियों का झुंड ट्रेंच… ट्रेंच… करता हुआ मेरे कमरे के ऊपर से गुजरा, तो मेरी नींद खुल गई थी। बालकनी में निकलकर मैं चारों ओर देखने लगी थी। उड़ती चिड़िया, मेरे लिए तो रुक नहीं सकती थी जाने किधर से आई और किधर चली गई?  ‘कौन सी चिड़िया है ये? अपने रांची में तो कभी ये आवाज नहीं सुनी!’ जिज्ञासा जाग उठी।

मेरा मन हमेशा नए की तलाश में रहता है। नई चीजें नए फल-फूल नए जीव-जंतु आकर्षित करते हैं मुझे। अब इस नई ध्वनि ने बेचैन कर दिया था मुझे।

शहर नया था मेरे लिए। बिटिया के सुनहरे सपनों ने इस शहर तक खींच लाया था मुझे। डॉक्टर बनने के लिए बेहतर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने की जरूरत थी। और दाखिले के लिए होने वाली भर्ती परीक्षा के लिए गहन तैयारी की जरूरत थी। अपने घर के आस-पास बेहतर शिक्षक नहीं मिले तो, मैं उस औद्योगिक शहर में आ गई थी। साथ थी मेरी बेटी और उसके सपनों की गठरी।

ऐसे शहर में जहां, सपने खरीदे जाते थे। वहां सपनों की दुकानें थीं। किशोर बच्चे, किसी मृगतृष्णा में न खो जाएं, इसके लिए जरूरी है, उसे मजबूत हाथों से थामे रखना। ये मजबूत हाथ मां के सिवाय किसका हो सकते हैं? मेरे अतिरिक्त कई मांएं वहां अपने बच्चों की सपनों की गठरी लिए मौजूद थीं। बच्चों को अपने-अपने क्लास रूम में भेजने के बाद, मांए चिंताओं की पोटली खोल कर बैठ जाती किसी मंदिर या पार्क की बेंच पर। और मैं ढूंढने निकल पड़ती नए की तलाश में।

उस चिड़िया को तलाशना ही था, जिसने पहली ही सुबह मेरी नींद में दस्तक दी थी वह ध्वनि… वह ध्वनि मुझे खींच लाई थी। एक पुल पर मैं हुलस उठी अहा! शहर में नदी! मैं दौड़ पड़ी उस ओर उफ्फ! बदबू का झोंका मेरे नथुनों में भर आया। पुल के नीचे से बह रहा था। काला बदबूदार पानी। उसके ऊपर तैर रहा था फेनिल झाग। देर तक खड़ा रहना मुश्किल था फिर भी मेरी दृष्टि अटक गई थी नाले के किनारों पर बैठ कीट केंचुए चुगते झुंड के झुंड चिड़ियों पर। वही ट्रेंच… ट्रेंच… की गुहार पहचानने की कोशिश में स्मृतिकोश खंगाला तो बचपन की पुस्तकों के चित्र सजीव हो उठे टिटहरी! हां! ये तो टिटहरी है!

बगुले-सी पतली लंबी टांगों पर बैठी मैना  पहली बार देख रही थी मैं! मंत्रमुग्ध-सी टकटकी लगाए देखती रही थी। बदबू के झोंके ने वर्तमान में खींचा तो बेमन से लौट आई थी उस रोज।

टिटहरियों का आकर्षण हर दिन मुझे एक बार नाले के पुल पर खींच लाता। दूर-दूर तक देखती रहती नाले के किनारे क्यारियों में उगाए जा रहे गाजर, मूली, पालक, गोभी की फसल।

शाम को सब्जी मंडी जाती तो, एकदम पुष्ट, ताजे गाजर मूली देखते ही काले बदबूदार झाग वाले पानी का दृश्य आंखों में कौंध जाता। लेने के लिए उठे हुए हाथ वापस अपनी ओर खिंच जाते।

टिटहरियों का आकर्षण मंद पड़ने लगा था। मन में फिर से किसी नए तलाश की आकांक्षा उठने लगी। एक दिन पुल पर खड़े-खड़े दृष्टि दूर बबूल की झाड़ियों के पीछे पीपल की फुनगी पर गई। पीपल के सान्निध्य में जाने की तत्परता में मेरे कदम उस ओर बढ़ गए। कुछ ही क्षण में मैं, एक विशाल पीपल की छांव में खड़ी थी। पंचतंत्र की कहानियों-सा पीपल। पीपल के पास ही खड़ा था एक युवा बरगद और एक छोटा-सा मंदिर। प्रेमी युगलों के हस्ताक्षरों से पटी दीवारों वाला मंदिर। वैसे लोग कहा करते थे, मंदिर के पास पीपल और बरगद खड़ा है। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे, पीपल के पास मंदिर आकर खड़ा हो गया हो।

मुझे एक नया ठिकाना मिल गया था। मैं हर रोज आने लगी। मंदिर एक विशाल कॉलोनी परिसर के भीतर था। बहुत ही शांत और सुंदर वातावरण। मेंहदी की झाड़ियों से घिरे, एक ही आकार के पंक्तिबद्ध आवास। लकड़ी के छोटे-छोटे जालीदार गेट से झांकती फूलों की क्यारियां। नींबू, अमरूद, बादाम और नीम के पेड़। पेड़ पर बैठकर बतकही करती चिड़ियां और पंख फैलाकर नाचते मोर। सुबह-शाम जब भी मैं वहां जाती, मुझे ऐसा लगता जैसे, प्राचीन काल के समय में आ गई हूँ। अपना घर अपना शहर छूटने का दुख भूल गई थी मैं। यह शहर अपना लगने लगा था।

एक सुबह उस कॉलोनी में टहलते हुए मुझे, दो टिटहरी दिखी। मैं रुककर देखने लगी। मेंहदी की झाड़ियों के आस-पास अपने नुकीले चोंच से नम मिट्टी के नीचे केंचुए ढूंढते हुए वे अब हर रोज दिखाई देने लगे थे। ऐसा लग रहा था जैसे, दंपत्ति टिटहरी उस कॉलोनी में रहने आई हो। हर रोज कॉलोनी गेट के अंदर कदम रखते ही मेरी नजर उन्हें ढूंढने लगती। जिस दिन दिखाई नहीं देती तो मैं बेचैन होकर पूरे कॉलोनी में ढूंढती रहती।

एक दिन देखा कि, अकेली टिटहरी, एक कुत्ते के सिर के ऊपर ट्रेंच… ट्रेंच… चीखती हुई ड्रोन की तरह गोल-गोल मंडरा रही है।

‘अरे! रे! क्या हो गया टिटकी? (अनायास मेरे मन में यही नाम सूझा)। इतने गुस्से में क्यों?’ कुत्ता चुपचाप आंखें मींचे टिटहरी की डांट सुन रहा था। बिलकुल मासूम-सा चेहरा लिए। मानो कह रहा हो, ‘जितना डांटना है डांट ले पगली! मैंने तो कुछ किया ही नहीं!’ इस दृश्य को देख मुझे हँसी आ गई। साथ ही, मुझे फिक्र होने लगी कि ‘कहीं इसके युगल को कुत्तों ने तो नहीं! नहीं!’

लपककर मैं मेंहदी की उन झाड़ियों के पीछे झांकने लगी, जिसके आस-पास अक्सर वे दिखाई देती थीं। झाड़ियों के कोने में नीम की सूखी पत्तियों के ऊपर, दूसरा युगल बैठा था। टिटहरी दंपत्ति ने अंडे दे दिए थे। मेरी ताक-झांक देखकर उस क्वार्टर से एक बूढ़ा व्यक्ति बाहर निकल आया था।

‘क्या चाहिए?’ जोर से चिल्लाकर उन्होंने पूछा।

‘नहीं! कुछ नहीं चाहिए अंकल!’ मैं सहमकर बहुत धीरे से बोली।

‘कुछ नहीं चाहिए तो ये ताक-झांक काय को कर रई?’ उन्होंने डपटते हुए पूछा था।

‘वो बस टिटकी को ढूंढ रही थी।’

‘टिटकी! कौन टिटकी?’

मैंने टिटहरी की सारी बातें बता दी। उनका संदेह मैं दूर कर देना चाहती थी। ताकि उन्हें ऐसा न लगे कि, मैं कुछ चुराने की कोशिश कर रही थी।

‘अच्छा! वो वैज्ञानिक!’

उन्होंने कोने में इशारा करते हुए कहा तो मैं चौंक गई।

‘वैज्ञानिक?’

मेरे चेहरे पर प्रश्नचिह्न देखकर वे बोले, ‘इस साल बहुत सूखा पड़ेगा! हां! देखना तुम! इसे देख रही हो? हर वर्ष ये टिटहरी अंडे देने यहां आते हैं। सामान्य तौर पर ये मिट्टी के ऊपर अंडे देते हैं। लेकिन इस बार मिट्टी के नीचे गड्ढा बनाया उसके ऊपर पत्तों से घोंसला बनाया फिर अंडे दिए। इन्हें मालूम है, पंद्रह-बीस दिन बाद ही धरती ऐसे तपने लगेगी कि इसके बच्चे झुलस जाएंगे। इसीलिए पहले से ही सुरक्षा के इंतजाम कर लिए हैं। कुछ साल पहले तो इन्होंने उस छप्पर के ऊपर घोंसला बनाया था। उस साल इतनी बारिश हुई थी कि, पूरे शहर में बाढ़ जैसी स्थिति हो गई थी। केदारनाथ की पहाड़ियां ढह गई थीं। बड़े-बड़े होटल ताश के महलों की तरह नदी में समा गए थे। देखा था न टीवी पर? ये साधारण पक्षी नहीं है! मौसम वैज्ञानिक हैं! इन्हें सबकुछ पहले से ही अनुमान हो जाता है पिछले बत्तीस वर्षों से तो यही देख रहा हूँ, लेकिन…!’

मैं अवाक होकर उन्हें देख रही थी। वे बहुत उदास हो गए थे।

‘लेकिन क्या अंकल?’ मैंने कुरेदा।

‘कुछ नहीं!’

एक गहरी उदासी उनके छेहरे पर आ गई। बिना कुछ बोले ही वे भीतर चले गए। मैं सोचती रह गई, अंकल आखिर कहना क्या चाह रहे थे!  

अब हर सुबह मेरी नजर टिटकी के साथ-साथ अंकल को भी ढूंढती रहती। टिटकी तो कभी कुत्ते के सिर के ऊपर मंडराती दिख जाती या कभी अपने आहार की तलाश में भटकती हुई। हर बार अकेली।

कुछ ही दिन बीते थे कि, कॉलोनी में सन्नाटा फैलने लगा। गर्मी बढ़ने लगी थी। मेंहदी की झाड़ियां मुरझाने लगीं। आवासों के गेट पर ताला दिखाई देने लगा। अमरूद और नींबू के पेड़ों की रौनक कम हो गई थी। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि, इस कॉलोनी में रहने वाले लोग, कहां चले जा रहे हैं? बेचैन होकर एक दिन, टहलते हुए कॉलोनी के दफ्तर तक चली गई। दफ्तर बंद था। सिर्फ एक गार्ड वहां रहने वाले मोरों के झुंड को मकई के दाने डाल रहा था।

व्याकुल होकर मैं पूछ बैठी ‘भैया! ये कॉलोनी क्यों सूखने लगी है? यहां रहने वाले लोग कहां चले गए?’

गार्ड ने बताया कि ‘ये कंपनी बंद हो चुकी है। कंपनी के कर्मचारियों के लिए यह कॉलोनी बनाई गई थी। इसके लिए सरकार ने भील जनजातियों से यह जमीन खाली करवाकर कंपनी को लीज पर दिया था। जब कंपनी बंद हो गई तो, किसी रियल स्टेट कंपनी ने मल्टीप्लेक्स सोसायटी बनाने के लिए ले लिया है। यहां रहने वाले लोग आवास खाली नहीं कर रहे थे, तो एक हफ्ते पहले बिजली-पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। मजबूर होकर उन्हें आवास खाली करना पड़ा। अब तो निर्माण कार्य शुरू होने वाला है। लोग यहां रहते थे, तब इनके खाने-पीने की चिंता हमें नहीं करनी पड़ती थी। जब तक इन्हें चिड़ियाखाना भेजने का इंतजाम नहीं हो जाता है, तब तक मुझे ही दाना-पानी डालने की जिम्मेदारी दी गई है। यहां रहते-रहते ये लोग मुझे पहचानने लगे हैं। इनके जाने के बाद कितना सूना हो जाएगा! है न?’

डूबती हुई आवाज में उसने पूछा तो मेरा दिल बैठ गया। एक नजर से मैंने अपने चारों ओर देखा। विशाल भुजाएं फैलाए, सेमल, आम, शिरीष और पीपल के पेड़ों पर असंख्य पंछी अपने बसेरों के इर्द-गिर्द सुस्ता रहे थे।

‘उफ्फ! इन बेचारों को मालूम ही नहीं है कि यहां क्या होने जा रहा है! पूरे ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने वाले मनुष्य की प्रवृत्ति को समझ ही नहीं पाए!’ मेरा हृदय हाहाकार कर उठा!

एक सुबह मैंने देखा कि टिटहरी का जोड़ा, अपने दो नन्हें चूजों को मिट्टी के नीचे छिपे कीट-केंचुओं का शिकार करना सिखा रही थी। एक-दो कुत्ते, कुछ दूर से चूजों पर नजर टिकाए, मौके की तलाश में थे। जैसे ही, वे टिटहरियों के करीब आने की कोशिश करते, टिटकी अपनी नुकीली चोंच से कुत्तों की आंखों पर हमला करने के लिए तत्पर हो जाती। कुत्ता, आंखें मींचकर चुपचाप खड़ा हो जाता। टिटकी उसके सिर के ऊपर मंडराती हुई, खूब डांटती। यह मनोरम दृश्य देखकर मैं मुग्ध हो रही थी, तभी सांय-सांय करती कुछ गाड़ियां कॉलोनी के अंदर आई। उनमें दो जेसीबी मशीनें भी थीं। बड़े ही भारी मन से मैं, अपने कमरे में वापस आ गई। मन ऐसा अनमना रहा कि खाने में नमक की जगह शक्कर और हल्दी की जगह मिर्च डाल दिया। जेसीबी के दैत्याकार पंजे रात भर मेरी नींद खुरचते रहे।

दूसरे दिन सुबह जब मैं कॉलोनी के अंदर पहुंची, तो वहां की दशा बदली हुई थी। कई आवासों को ध्वस्त कर दिया गया था। मेंहदी की सूखी झाड़ियां जमींदोज हो चुकी थी। जगह-जगह फाउंडेशन के गड्ढे खोदे गए थे। और-तो-और विशाल भुजाओं वाला सेमल का पेड़ औंधा पड़ा था। टूटी डालियों और पत्तों के ढेर में पंक्षियों के घोंसले बिखर गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी भयानक भूकंप ने एक बहुमंजिली इमारत को मलबे के ढेर में बदल दिया है। मेरा मन चीत्कार कर उठा। दुख और क्रोध की लहरें मेरे सीने को छलनी करने लगीं। व्याकुल होकर मैं चारों ओर टिटहरी परिवार को तलाशने लगी। वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। मेरा मन रुआंसा हो उठा। आस-पास कोई नहीं था। ऐसा लग रहा था कि किसी परिचित के मिलते ही मैं फूट-फूट कर रो पड़ूंगी। मेरे लिए वहां रुककर उस विध्वंस को देखना बहुत मुश्किल हो रहा था। वापस आने के लिए मैं मुड़ी ही थी कि एक कौंध ने मेरे पांव रोक लिए। नीचे गिरी पत्तियां हिल रहीं थीं। एक जीवन, नन्हें डैनों के सहारे मृत्यु के मुंह से बाहर निकलने के संघर्ष में जुटा था।

पत्तों को हटाकर मैंने बड़ी कोमलता से उसे उठाया और अपने दुपट्टे में छुपा लिया था।

एक कर्कश ध्वनि के साथ ट्रेन हिल उठी। इधर-उधर बिखरे हुए यात्री सतर्क होकर अपनी-अपनी सीट पर वापस आ गए। एक दीर्घश्वास के साथ मैं भी वर्तमान में लौट आई। पूरे रफ्तार के साथ ट्रेन भाग रही थी। ऊंची-ऊंची चिमनियों से निकलने वाला धुआं और गगनचुंबी मोबाइल टावरों की झलक बता रही थी कि शहर करीब आ रहा है।

संपर्क :अंशमात्र, विकास नगर रोड नं. 2, हेसाग, पोस्ट-  हटिया, जिला – रांची, 834003 मो. 9472780555