युवा लेखिका। हाल में डॉक्टरेट की उपाधि। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा, लेख प्रकाशित

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उदय हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह केवल तकनीकी प्रगति का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना, उसकी रचनात्मकता और सामूहिक सांस्कृतिक अनुभवों को नई दिशाओं में मोड़ने वाली नई शक्ति है। जिन सभ्यताओं ने भाषा के माध्यम से खुद को समझा और शब्दों को स्मृति का घर बनाया उनके सामने अब एक ऐसी व्यवस्था खड़ी है जो मनुष्य की तरह बोलती है, लिखती है, कलाएं निर्मित करती है और सीखती भी है। इस कारण एआई को समझना केवल तकनीक को समझना नहीं है। यह अपने समय की सांस्कृतिक हलचलों, साहित्यिक दिशाओं, सामाजिक आशंकाओं और भविष्य की संभावनाओं को जानना भी है।

मनुष्य के इतिहास में भाषा सबसे आत्मीय आविष्कार रही है। वह भावना और विचार दोनों की वाहक है। एआई ने इसी भाषा को अपनी शक्ति का आधार बनाया है। वह लिख भी रहा है, रच भी रहा है और संवाद भी कर लेता है। इससे कलाओं और साहित्य के सामने एक जटिल स्थिति जन्म लेती है। क्या मशीन मनुष्य की भांति सृजन कर रही है या वह केवल मनुष्य के अनुभवों का गणितीय प्रतिरूप बना रही है? इस प्रश्न का एक उत्तर यह है कि एआई साहित्य को चुनौती नहीं दे रहा बल्कि वह मनुष्य की भावनात्मक गहराई को और अधिक स्पष्ट कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि मशीन के पास भाषा है, पर यह भाषा अनुभवहीन है। उसके शब्दों में प्रवाह है, पर शब्द जीवन के ताप से रहित हैं। इसलिए एआई लेखकों को एक गहरा सांस्कृतिक संकेत दे रहा है कि आने वाला समय उस साहित्य को और अधिक मूल्य देगा जिसमें मनुष्य के अनुभवों की अनोखी छाप हो, जिसमें स्मृतियों, संघर्षों और जीवन की कड़ियों से निकले हुए विशिष्ट मानव स्वर हों।

अब भाषा भूगोल या अतीत की परंपरा से नहीं बन रही है, बल्कि डिजिटल एल्गोरिद्म द्वारा निर्मित हो रही है। किसे क्या दिखेगा, किस विचार से कौन जुड़ा रहेगा, किस सांस्कृतिक प्रतीक को केंद्र में लाया जाएगा, ये सब अब मानव समाज की पारंपरिक संरचनाओं के साथ-साथ तकनीकी प्रणालियों पर भी निर्भर हैं। यह सब मानव समाज के समक्ष एक गहरी नैतिक चुनौती भी है। क्या हमारी अस्मिताएं अब स्वतंत्र या डिजिटल संरचनाओं द्वारा निर्देशित होंगी, एसे प्रश्नों पर विचार करना जरूरी हो गया है।

कक्षा-शिक्षण में एआई प्रवेश कर चुका है। वह बच्चों को उनके स्तर के अनुसार सीखने की सुविधा देता है, भाषा और गणित की जटिलताओं को सरल बना देता है और शिक्षा को निजी अनुभव में बदल देता है। इससे यह भ्रम पैदा होता है कि शायद शिक्षक का स्थान मशीन ले ले। इसलिए इसपर सोचना होगा कि शिक्षा केवल विषय-ज्ञान का स्थानांतरण है यह यह एक आत्मिक प्रक्रिया है। मशीनें ज्ञान दे सकती हैं, पर जिज्ञासा जगाने, चरित्र बनाने और विचारों को दिशा देने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। इसलिए यह मानना कि एआई ‘नया गुरु’ होगा, शिक्षा की मानवीय जटिलताओं पर प्रश्नचिह्न लगाना कहा जा सकता है।

स्कूल-कॉलेज भविष्य में डिजिटल अवतार ले सकते हैं, पर वे समाप्त नहीं होंगे। वे केवल भवन नहीं, समूह-जीवन के केंद्र, संस्कार निर्माण के क्षेत्र और सामाजिक आदान-प्रदान की आधारभूमि बने रहेंगे।

एआई की सबसे जटिल परीक्षा तब होती है जब वह गैर-पश्चिमी समाजों को समझाने की कोशिश करता है, जबकि उसके मॉडल, भाषिक ढांचे और ज्ञान-स्रोत पश्चिमी संदर्भों से अधिक निर्मित बने होते हैं। परिणामस्वरूप भारतीय, अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी, आदिवासी और द्रविड़ सभ्यताओं के मिथकों, बोलियों, स्मृतियों और विश्वदृष्टियों को वह विस्तार से नहीं समझा पाता। यह स्थिति एक प्रश्न उठाती है। क्या तकनीक उतनी वस्तुपरक है जितना हम मानते हैं?

सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए तकनीक को केवल भाषा नहीं बल्कि इतिहास, सांस्कृतिक प्रतीक, मौखिक परंपराओं, हाव-भाव और सामुदायिक अनुभवों को भी पढ़ना सीखना होगा। जब तक एआई के विकास में स्थानीय भाषाओं, लोक-कथाओं, आदिवासी ज्ञान-तंत्रों और भारतीय दर्शन की भागीदारी नहीं होगी तब तक वह हमारी दुनिया को, हमारी संवेदना को समझने में असफल ही माना जाएगा।

इसलिए यहां जिम्मेदारी केवल वैज्ञानिकों की ही नहीं बल्कि लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक शोधकर्ताओं और शिक्षकों की भी एक जिम्मेदारी होती है कि वे एआई के समय में अपने विचारों और अनुभवों से दुनिया में मानवीय मूल्यों को बचाने की कोशिश करें।

आज फिल्म, मीडिया के अन्य रूपों और कला के क्षेत्र में एआई के कारण व्यापक परिवर्तन हुआ है। लेखन, निर्देशन, संपादन, गायन, संगीत-सृजन, वीडियो-निर्माण, चित्र निर्माण एनीमेशन,  डिजाइन आदि अब एआई की सहायता से क्षणों में तैयार हो सकते हैं। यह बदलाव तभी मानव-मित्र होगा जब हम प्रशिक्षण और नैतिक नियमों पर जोर देंगे।

अंतत: एआई को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न मनुष्य के विकास से जुड़ा है। तकनीक अपनी गति से बढ़ रही है, पर मनुष्य हमेशा अपनी गति से बदलता है- भावनाओं, स्मृतियों, संस्कृतियों और रिश्तों के माध्यम से। मशीनें जितनी उन्नत हो जाएं, वे मनुष्य के विचारों और निर्माणों की जगह नहीं ले सकतीं। मानव की कथा त्रासदी और जीवन की जटिल अनुभवों से जन्म लेती है, स्वप्नों से आकार पाती है और संस्कारों से अर्थ पाती है। मशीन उसे दोहरा सकती है, पर जी नहीं सकती।

आज हम एक ऐसे समय में हैं जहां तकनीक और मनुष्य के बीच संवाद की नई भाषा बन रही है। ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कला-साहित्य’ विषय पर केंद्रित इस परिचर्चा का उद्देश्य भविष्य में साहित्य की मौलिकता और प्रासंगिकता बनाए रखने के उपायों के बारे में सोचना है। साथ ही एआई के बढ़ते सामाजिक प्रभाव और उसके कारण हर क्षेत्र में हो रहे व्यापक परिवर्तन के ऐसे मुख्य बिंदुओं को भी जानना है जो मानव विकास को भविष्य में सबसे अधिक प्रभावित करने वाला है।

सवाल
(1) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास समाज और साहित्य के संबंध पर किस तरह के प्रभाव डाल सकता है और यह अप्रत्यक्षत: लेखकों को क्या सांस्कृतिक संदेश दे रहा है?
(2) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अंतत: कक्षा-शिक्षण को किस हद तक प्रभावित कर सकता है? क्या मेधारोबो बनेंगे नए गुरु और स्कूल-कॉलेज के बड़े-बड़े परिसर अप्रासंगिक हो जाएंगे?
(3) एआई समाज में अस्मिता निर्माण और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को किस हद तक प्रभावित करेगा?
(4) एआई व्यवस्थाएं गैर-पश्चिमी समाजों के विश्वासों, परंपराओं और विश्वदृष्टियों को समझने में कितनी समर्थ हैं?
(5) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिल्म, मीडिया के अन्य संसारों तथा कलाओं के विभिन्न क्षेत्र में रोजगार पर क्या प्रभाव डालेंगे? उसका सदुपयोग कैसे संभव है?

 

बालेंदु शर्मा दाधीच
एआई विशेषज्ञ और तकनीकविद्। माइक्रोसॉफ्ट के पूर्व निदेशक, पूर्व संपादक और वर्तमान में आईसीएएनएन के एंबेसडर,  दुबई में निवास।

 एआई ऐसी साहित्यिक विधाएं जन्मेगी जिन्हें हमने अब तक नहीं देखा

(1) साहित्य रचने वालों के साथ-साथ उसका रसास्वादन करने वालों की सोच, वरीयताओं और कार्यप्रणालियों में व्यापक परिवर्तन आने वाला है। साहित्य की विभिन्न धाराएं सामने आएंगी। मानव-रचित साहित्य के पास स्पेस तो हमेशा मौजूद रहेगा; उसकी विशिष्टताएं मूल्यवान बनी रहेंगी किंतु एक छोटा परिनिष्ठित पाठक-दर्शक-श्रोता वर्ग होगा जो मानव रचित साहित्य का पारखी होगा और उसमें संतुष्टि एवं तृप्ति महसूस करेगा। साहित्य का उपभोग करने वाला बहुत बड़ा वर्ग ऐसा होगा जिसे इस बात से कोई सरोकार नहीं होगा कि अमुक रचना का सृजन किसने किया- मानव ने या एआई ने। उसे परिणाम से ही सरोकार होगा। यदि यह परिणाम उसकी तथाकथित रचनात्मक तृष्णा को शांत कर पाता है तो वह इस बात की परवाह नहीं करेगा कि उसकी यह पसंद कितनी नैतिक, उचित या तार्किक है।

सोशल मीडिया ने हमें ‘फटाफट साहित्य’ और ‘रचनाकर्म के कमोडिटाइजेशन’ की दिशा में धकेला है, एआई इस प्रक्रिया तथा उसकी तीव्रता को ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ाएगी। कोई भी व्यक्ति इस नए तकनीकी सहायक की सहायता से साहित्य रच सकेगा और वह भी जब चाहे, ऑन डिमांड, अपनी सुविधानुसार किसी भी विषय पर तथा किसी भी प्रारूप में। इससे साहित्य की गुणवत्ता, मानवीयता, उत्कृष्टता, भावनात्मकता आदि प्रभावित होंगे। किंतु पाठक, जो कि अब सोशल मीडिया पर घंटों खर्च कर देने के बावजूद न जाने किस तरह की जल्दबाजी में रहने लगा है और उसके साथ-साथ एआई के प्रभाव से अपनी स्मृति, चिंतन, मंथन, मनन, तर्कक्षमता आदि को खो रहा है; साहित्य के महीन तत्वों का सुख लेने की स्थिति में नहीं होगा; उस आनंद को महसूस करने, परखने और सराहने की उसकी प्रवृत्तियां कमजोर पड़ रही होंगी। अधिकांश पाठकों को इस बात की परवाह भी नहीं होगी कि वे वास्तविक और उच्च कोटि के साहित्य तक नहीं पहुंच रहे बल्कि ऐसे कृत्रिम व सतही साहित्य के मजे ले रहे हैं जो उनके मस्तिष्क और जीवन को कुछ प्रदान नहीं करता, उनकी बौद्धिकता में वृद्धि नहीं करता, कोई ज्ञान-पिपासा शांत नहीं करता और न ही किसी किस्म का आत्मिक सुख देता है।

यह मानकर चलिए कि मानव-रचित साहित्य के साथ-साथ एआई-रचित साहित्य एक वास्तविकता बन चुका होगा। वास्तव में वह बन ही चुका है क्योंकि अमेजॉन जैसे ई-कॉमर्स पोर्टलों पर ऐसा साहित्य आ चुका है। तीसरी श्रेणी का साहित्य वह होगा, जो पूरी तरह से एआई-रचित नहीं होगा किंतु उसमें एआई की सहायता ली गई होगी। यह सहायता रचना का प्रारूप तैयार करने, बीच-बीच में आवश्यकता पड़ने पर नए विचारों की खोज करने, सहायक सामग्री जुटाने, कहानी को आगे क्या मोड़ दिया जाए इस पर मंथन करने, कुछ पैराग्राफ एआई की मदद से लिखवा लेने, भाषा की शुद्धता को जांच लेने, उस साहित्य में लोकप्रियता के तत्वों का आकलन करने, विविध भाषाओं में अनुवाद करने जैसा हो सकता है। लेखक एआई की मदद से यह भी जान सकेगा कि इस उपन्यास का अंत सुखांत किया जाए या दुखांत या फिर सपाट अंत कर दिया जाए। ऐसी सभी परिस्थितियों में पाठकों का कैसा प्रतिसाद (रेस्पॉन्स) रह सकता है, इसकी भविष्यवाणी एआई कर सकती है। इस श्रेणी का साहित्य धीरे-धीरे स्वीकार्य हो जाएगा- साहित्य की दुनिया में भी। वजह यह कि यहां पर एआई खुद साहित्य रचना नहीं कर रही है बल्कि वह सृजनकर्ता के लिए एक उपयोगी सहायक या उपकरण की भूमिका निभा रही है। वैसे ही जैसे आज कंप्यूटर, इंटरनेट या मशीन अनुवाद उसी तरह के सहायक उपकरण निभा रहे हैं और पहले पुस्तकालय, कलम और शोध सामग्री निभाया करते थे।

इन सबके अतिरिक्त स्वचालित ढंग से निर्मित साहित्य भी होगा जिसे रचनाकर्मी नहीं अपितु कारोबारी लोग तैयार कर रहे होंगे- विभिन्न प्रकार के ऐप्स, साहित्य पोर्टलों, सोशल मीडिया और समुदायों में प्रयोग करने के लिए। यह एक फैक्ट्री जैसा माहौल होगा जहां रचनात्मकता एक उत्पाद की तरह होगी और ऐसे उत्पाद एक ही समय पर एक या एक से अधिक रूपों में निर्मित होकर आ रहे होंगे- टेक्स्ट, ध्वनि, वीडियो, चित्रों, एनिमेशन, वृत्तचित्रों और यहां तक कि फिल्मों के रूप में भी। मैं जानता हूँ कि यह सब पढ़ना बहुत अवास्तविक महसूस होता है और ऐसा सोचकर झटका-सा लगता है। किंतु एआई की वास्तविक दुनिया इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। जिनका उल्लेख मैंने किया, उनमें से अधिकांश को किसी न किसी छोटे-बड़े रूप में आज भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐसी साहित्यिक विधाओं, शैलियों आदि को शुरू करने में भी सक्षम होगी जिन्हें अब तक हमने नहीं देखा। वह वैश्विक स्तर पर विभिन्न युगों, भाषाओं, विधाओं और शैलियों के ज्ञान भंडार पर बैठी होगी। इनके बीच से तत्वों को जोड़-घटाकर, यहां-वहां से प्रेरणा लेकर, सीखकर कुछ नया बना देना, कुछ संकर किस्म की विधाओं को जन्म देना उसके लिए अस्वाभाविक नहीं होगा। इन विधाओं का सामने आना साहित्य के लिए नकारात्मक ही हो, यह आवश्यक नहीं है। वह उसमें वास्तविक विविधता, नयापन और विस्तार लाने वाला भी हो सकता है जिसे साहित्य की दुनिया में पसंद कर लिया जाए और स्वीकार भी कर लिया जाए। कहने का अर्थ यह कि साहित्य और उसके सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से एआई भी एक पक्ष और हितधारक बनने जा रहा है- जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही तरह। भले ही यह आपको और हमें कितना भी अनुचित, असामान्य या कृत्रिम प्रतीत हो किंतु लार्ज लैंग्वेज मॉडलों और जनरेटिव एआई के दौर में यह असंभव बिलकुल भी नहीं है।

(2) कक्षा-शिक्षण पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रभाव धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा है जहां सीखना किसी एक निश्चित स्थान, समय या शिक्षक की उपस्थिति पर निर्भर नहीं रहेगा। ज्ञान की उपलब्धता अब एक निरंतर बहने वाले स्रोत की तरह हो चली है और छात्र उस स्रोत तक अपनी सुविधा, अपनी गति और अपनी जिज्ञासा के अनुरूप पहुंच सकेंगे। इस बदलाव से यह आशंका जरूर पैदा होती है कि कहीं कक्षाएं, शिक्षक और विशाल शैक्षणिक परिसर- समय के साथ अनावश्यक व अप्रासंगिक न हो जाएं, किंतु वास्तविक परिवर्तन इससे कहीं अधिक सूक्ष्म और बहुमुखी है।

एआई उन कामों को अत्यंत सहजता से संभाल लेती है जिनमें दोहराव, गणना, मूल्यांकन या त्वरित प्रतिक्रिया की जरूरत होती है। वह छात्र की कमजोरियों, उसकी प्रगति उसके सीखने की गति और स्वभाव को पहचानकर उसे इस तरह (निजी स्तर पर) पढ़ा सकती है जैसा एक शिक्षक सैकड़ों विद्यार्थियों की भीड़ में नहीं कर सकता। एआई युग में किसी रोबोट या डिजिटल सहायक के रूप में नए गुरु अवश्य उभर सकते हैं। ऐसे गुरु जो न थकते हैं, न बोरियत के शिकार होते हैं और न विद्यार्थियों से तंग आते हैं। लेकिन संभवतः ये ‘सहायक गुरु’ ही होंगे, ‘वास्तविक गुरु’ की भूमिका में मानव ही रहेंगे। हां, उनकी संख्या भले ही घट सकती है। एआई के प्रधान भूमिका में न आने की वजह स्पष्ट है। शिक्षा कोई मशीनी प्रक्रिया नहीं है। जहां मानवीय परिवेश और अनुभवों की जटिलता शुरू होती है वहां एआई की क्षमताएं छोटी पड़ जाती है। प्रेरणा, संवेदना, संघर्षों की समझ, सामाजिक जुड़ाव, नैतिक दृष्टि जैसे तत्व किसी भी शिक्षा का मूल होते हैं और मानवीय संवाद के माध्यम से ही अपने अर्थ पाते हैं।

विद्यालयों और महाविद्यालयों के बड़े परिसर मात्र इस आधार पर अप्रासंगिक नहीं हो जाने वाले हैं कि ज्ञान डिजिटल हो चुका है। किंतु उनके तौर-तरीकों, कार्य-संचालन, शिक्षण प्रदान करने की प्रक्रिया आदि का रूपांतरण होगा। वे अब सिर्फ पाठ्यपुस्तकों और व्याख्यानों के स्थान नहीं रहेंगे बल्कि शिक्षा को और अधिक निजी, प्रयोग व अनुभव-आधारित, इंटरएक्टिव, जीवंत और दिलचस्प बनाने वाले संस्थानों के रूप में विकसित होंगे। विद्यार्थी सिर्फ सैद्धांतिक शिक्षा भर प्राप्त नहीं करेंगे बल्कि आभासी दुनिया में खुद उन दृश्यों और कल्पनाओं को जी सकेंगे जिनके बारे में वे फिलहाल रट्टा मारते हैं। वे सिर्फ बाहरी स्तर पर ही नहीं सीखेंगे बल्कि जितना चाहें गहराई तक जा सकेंगे क्योंकि विश्व का अथाह ज्ञान उनकी पहुंच में होगा। बहरहाल, शिक्षण का केंद्र पूरी तरह मशीनों की ओर नहीं झुकेगा बल्कि शिक्षा की एक मिश्रित दुनिया बनेगी। यहां एआई छात्रों के ज्ञान तथा अनुभवों को विस्तार देगी जबकि मानवीय शिक्षण उन्हें संवेदना, दिशा और अर्थ देगा।

(4) एआई गैर-पश्चिमी समाजों को समझने की कोशिश तो करती है, लेकिन उसकी पकड़ अभी सतही है। वजह यह नहीं कि मशीनें अयोग्य हैं, बल्कि यह कि जिस डेटा से वे दुनिया को पहचानती हैं, वह खुद दुनिया का संतुलित प्रतिबिंब नहीं है। आज के एआई मॉडलों के पास तीसरी दुनिया की संस्कृतियों, समाजों, भाषाओं आदि के बारे में डेटा सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। दूसरी ओर विकसित देशों के बारे में उसे प्राप्त डेटा अथाह तथा विविधतापूर्ण है। फिर इसका विकास भी प्रधानतः पश्चिम में हुआ है (चीन को छोड़कर, जिसके मॉडल भी काफी हद तक पश्चिमी मॉडलों से लाभान्वित हुए हैं) इसलिए पश्चिमी नैरेटिव में उसकी दक्षता (और कुछ हद तक पूर्वग्रह भी) अधिक है। पश्चिमी भाषाएं, पश्चिमी ग्रंथ, पश्चिमी तर्क आदि उसके प्रशिक्षण का मूल तत्व बन जाते हैं। ऐसे में वह भारतीय, अफ्रीकी, अरबी या अन्य गैर-पश्चिमी  संस्कृतियों की जटिल अनुभूतियों को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाती।

किसी परंपरा की निहित संवेदना, किसी समाज का आत्मविश्वास, उसकी स्मृतियां, उसके घाव आदि केवल शब्दों और चित्रों में बंधकर नहीं रहते। उन्हें जीने वाले लोगों के बीच रहकर ही समझा जा सकता है। एआई के पास यह अनुभव-धारा नहीं होती; वह डेटा के आंकड़ों को समझती है, जीवन के स्पंदनों को नहीं। इसलिए कई बार वह प्रतीकों को पहचान लेती है पर उनके अर्थों को चूक जाती है- जैसे त्योहार का नाम जानती होगी पर उसके भाव, उसकी स्मृति, उसके आत्मिक महत्व को नहीं। फिर भी, एआई की यात्रा जारी है। जैसे-जैसे गैर-पश्चिमी समाज अपने भाषाई और सांस्कृतिक डेटा को सामने लाएंगे, अपने इतिहास, मिथकों, दर्शन और लोकविश्व को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराएंगे, एआई की समझ भी विस्तृत होगी। उसकी व्याख्याएं संतुलित होंगी, उसके निर्णय अधिक न्यायसंगत बनेंगे।

(5) पहले जिन कामों में वर्षों की सीख, साधना, लंबे अभ्यास और टीमों के सहयोग की जरूरत होती थी, उन्हें आज एआई कुछ क्लिकों में कर पाने की क्षमता लेकर आई हैं। यह सामर्थ्य उन सीमाओं को छू रही है, जिन्हें हम कभी पूरी तरह मानव का क्षेत्र मानते थे।

रोजगार पर इसका असर दो दिशाओं में फैलेगा। एक दिशा चिंता की है, जहां पारंपरिक भूमिकाएं सिमटती या बदलती दिखाई देती हैं। दूसरी दिशा वह भी है जहां रचनात्मकता का दायरा पहले से कहीं अधिक विस्तृत हो जाता है। निर्देशक अब अपनी कल्पनाओं को पहले से कहीं अधिक सटीकता से विजुअलाइज कर सकते हैं। लेखक विचारों के साथ तेज गति से प्रयोग कर सकते हैं। छोटे रचनाकार, जो पहले बजट या संसाधनों के बोझ के सामने दब जाते थे, अब उच्च गुणवत्ता वाली फिल्में, एनीमेशन और संगीत तैयार कर सकते हैं। रचनात्मकता अब केवल बड़े स्टूडियो की संपत्ति नहीं रहेगी। यह हमें कुछ हद तक नागरिक पत्रकारिता और प्रयोक्ता जनित कंटेंट (यूजर जनरेटेड कंटेंट) जैसे सफल प्रयोगों की तरफ इशारा करती है जिन्होंने पत्रकारिता और रचनाकर्म को बड़े खिलाड़ियों के आधिपत्य या एकाधिकार से मुक्त करने में योगदान दिया है।

इस परिवर्तन को सकारात्मक बनाने के फिल्म, मीडिया, कलाओं तथा अन्य संबंधित उद्योगों को भी नई सोच तथा नए प्रारूप की जरूरत होगी। नए प्रशिक्षण कार्यक्रम और ऐसे नैतिक ढांचे जो सुनिश्चित करें कि तकनीक मानवीय प्रतिभा को दबाए नहीं, बल्कि उसे ऊंचा उठाए। जब रचनाकार और तकनीक एक-दूसरे की सीमाओं को समझते हुए साथ चलेंगे, तब फिल्म, मीडिया, शिक्षा, कला और साहित्य का भविष्य किसी संकट की तरह नहीं, बल्कि एक विशाल संभावना की तरह हमारे सामने खड़ा होगा।

ई-मेल : balendu@gmail.com

 

जितेंद्र भाटिया
वरिष्ठ कथाकार, अनुवादक और विचारक। प्रमुख कृतियां : ‘सदी के प्रश्न’, ‘इक्कीसवीं सदी की लड़ाइयां’, ‘कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर’  (आत्मकथात्मक संस्मरण)।

 एआई से मानवीय मौलिकता और सूझबूझ के नष्ट होने का खतरा ही सबसे बड़ा है

साहित्य और कला के महकमों में इन दिनों एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) या कंप्यूटर जनित कृत्रिम मेधा की चर्चा बार-बार की जाने लगी है। साहित्यकारों को चिंता है कि उनकी मौलिकता का वर्चस्व कहीं उनसे छीन तो नहीं जाएगा, और कलाकर्मी दुविधा में है कि आने वाले दिनों में उसकी मौलिक प्रतिभा कहीं एआई द्वारा आसानी से आनन फानन तैयार होने वाली मशीनी कृतियों से मात तो नहीं खा जाएंगी। बड़ा सवाल यह है कि एआई जनित यह मेधा, आने वाले दिनों में मानवीय सूझ-बूझ और बुद्धिमत्ता के सबसे उर्वर पारंपरिक शक्ति स्रोत को हमसे छीनकर कहीं कंप्यूटर के हवाले तो नहीं कर देगी? क्या इसके प्रचलित हो चुकने के बाद हमारे सोचने की बची-खुची क्षमता भी जाती रहेगी और हमारी जगह कंप्यूटर क्या हमें वह सब कर दिखाएगा, जिसकी हमने अब तक कल्पना तक नहीं की थी?

एआई का जिक्र छिड़ते ही मेरे जेहन में हर बार अंग्रेजी के विख्यात विज्ञान कथाकार रे ब्रैडबरी की उस भयावह कथा का स्मरण हो आता है- ‘देयर विल कम सॉफ्ट रेन्स’ जिसमें विश्व का अंत हो चुका है, लेकिन पूरी तरह रोबो और सुपर कंप्यूटरों द्वारा स्व-संचालित एक आखिरी मकान में दीवारघड़ी बार-बार तारीख की घोषणा कर रही है, रसोईघर में स्वचालित मशीनों में बनता लजीज नाश्ता सलीके से प्लेटों में सज रहा है और फिर खाने वालों की गैरहाजिरी में खुद-ब-खुद गटर में फेंका जा रहा है, डिशवॉशर प्लेटें साफ कर उन्हें विधिवत चमका रहा है, बगीचे में पानी का छिड़काव हो रहा है, गैराज का स्वचालित दरवाजा बार-बार खुल-खुलकर बंद हो रहा है और इंसान की अनुपस्थिति में एक स्वचालित दुनिया किसी नीमपागल की तरह बार-बार अपने आपको दोहराए चली जा रही है, लेकिन उन मशीनों को बंद करने या उस घर को यांत्रिकता से मुक्त कर मानवता की ओर वापस लौटाने वाला कोई व्यक्ति इस दुनिया में बाकी नहीं बचा है।

सोचकर डर लगता है कि दुनिया की लाखों वर्ष पुरानी सभ्यता के साथ हम सब तथाकथित विकास की इस निरंतरता में कहीं जानबूझकर अपने आपको ब्रैडबरी के उस दु:स्वप्न की ओर तो नहीं धकेल रहे?

दुनिया के कई पर्यावरण विशेषज्ञों का दृढ़ मानना है कि हमारी सभ्यता अपने समूचे तकनीकी विकास और प्रकृति के प्रति सारी जागरूकता के बावजूद, धीरे-धीरे अपने अंतिम विनाश की ओर बढ़ रही है और पर्यावरण के रख-रखाव को लेकर उठाए जाने वाले तमाम वैश्विक कदम इस अवश्यंभावी अंत को ज्यादा-से-ज्यादा कुछ और दिनों के लिए टाल सकते हैं, पर इसकी अंतिम परिणति को रोक नहीं सकते। एक लेखक कहते हैं कि यह कायनात अपने आपको पूरी तरह नष्ट कर, उसे दुबारा नए सिरे से गढ़ने के लिए मचल रही है!

तो क्या ब्रैडबरी का वह दु:स्वप्न हमारे आने वाले दिनों की सबसे डरावनी हकीकत है? एआई की शक्ल में विकास की वह आखिरी सुनहरी सीढ़ी क्या सचमुच हमें सुख की परम पराकाष्ठा तक पहुंचाएगी, या कि कामू के ‘मिथ ऑफ सिसीफस’ की तरह पहाड़ की ऊंची चोटी से दुबारा हमें नीचे धकेल देगी, जहां जीवन की छोटी-छोटी खुशियों, सूर्यास्त के रोशनी या समुद्र की लहरों के अनवरत शोर को अपने भीतर जज्ब कर अपने आपको खुशकिस्मत समझने की कोई काबिलियत या आकांक्षा हममें बाकी नहीं बचेगी? उस शिखर तक पहुंच चुकने के बाद क्या हम सचमुच कह सकेंगे कि पहले के मुकाबले हम अब अधिक सुखी हैं? और अपने समूचे तकनीकी विकास (या मलबे) का यह निरंतर ऊंचा होता ढेर क्या सचमुच हमें जिंदा रहने का कोई सार्थक विकल्प दिला सकेगा, या कि इसके विषाक्त मलबे में अंतत: हम स्वयं भी फना हो जाएंगे? ये सारे सवाल बहुत जटिल और काफी हद तक डरा देने वाले हैं!

हमारे समूचे वैज्ञानिक और टेक्नोलॉजिकल विकास में कंप्यूटर का एक विशिष्ट स्थान है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जब एनालॉग कम्पूटरों का आविष्कार हुआ तो इनकी उपयोगिता मुख्यत: गणित और भौतिक शास्त्र के मुश्किल सवालों को हल करने और उन्हें तरतीबवार समझने तक सीमित थी। दूसरे विश्व युद्ध की भयावहता के बीच दुनिया के पहले सेमी कंडक्टरों और इनसे बने डिजिटल कंप्यूटर ईजाद हुए और इससे आगे जब साठ-सत्तर में माइक्रो-प्रोसेसर क्रांति आई तो इनके विभिन्न उपयोगों ने इन्हें घर-घर पहुंचा दिया। औद्योगिक जगत में कंप्यूटर द्वारा चालित रोबो विविध स्वचालित मशीनों में इस्तेमाल किए जाने लगे।

कंप्यूटर द्वारा चालित इन रोबो में इंसानों के मुकाबले कई अभिनव गुण थे। एक तो वे गजब के आज्ञाकारी थे। न वे थकते थे और न ही उसके काम में कभी ढिलाई आती थी। सैंकड़ों बार की आवृत्ति के बाद भी उसकी दक्षता न कम, न ज्यादा-हमेशा सौ फीसदी बनी रहती थी। हां, उनकी अगर कोई सीमा थी, तो अपने रचित प्रोग्राम से बाहर सोच पाने की असमर्थता! वे सिर्फ वही कर सकते थे, जिनके लिए उन्हें ‘प्रोग्राम’ किया गया था और अपनी इस यांत्रिकता को वे अक्सर अपने चालक मालिक के साथ भी बांटते थे। देखा जाए तो ‘एआई’ का प्रादुर्भाव उस पुराने रोबो की उन पारंपरिक सीमाओं को तोड़ने का अभिनव प्रयास है, जिसमें यह मशीन या रोबो वह सब भी कर सकेगा जिसे अब तक मनुष्य अपनी मेधा के सहारे करता आया है।

‘आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस’ या ‘कृत्रिम बुद्धि’ का प्रादुर्भाव कंप्यूटर की दुनिया का वह क्रांतिकारी विकास है जिसमें ये कंप्यूटर वे जिम्मेदारियां भी उठा सकते हैं, जिनका संबंध इससे पहले मनुष्य की ‘सोच’ और उससे जुड़ी निर्णयात्मकता से था। इसे कर पाने के लिए एआई इंटरनेट और कंप्यूटर पर अर्जित मनुष्य के सारे ज्ञान को किसी कच्चे माल की तरह इस्तेमाल कर उसमें से आवश्यकतानुसार ज्ञान को चुन एक तरतीबवार, तार्किक रूप में पेश करता है।

शब्दों और साहित्य की दुनिया में एआई की संभावनाएं अभी से दिखाई देने लगी हैं। जैसे यदि जापान में किसी स्कूल के विद्यार्थी को अपने घर पर निबंध लिखना हो तो एआई उसकी उपयुक्त भाषा में, उस प्रदेश में बनने वाले मकानों की सामग्री निकाल उसे आदर्श निबंध तैयार कर देगा। यही लेख यदि किसी भूकंप प्रतिरोध घरों को बनाने वाली संस्था को चाहिए तो एआई इसमें इस्तेमाल होने वाले सामान के आधार पर भूकंप ग्रस्त इलाके में बनने वाले मकान की प्रामाणिक जानकारी उसमें शामिल कर देगा। और यही निबंध यदि किसी कोऑपरेटिव घर बनाने वाली कंपनी को चाहिए तो एआई इसके लिए उपयुक्त मसौदा भी आपको तैयार कर देगा। यही नहीं, किसी लंबे लेख को यदि किसी भी आवश्यक तथ्य को छोड़े बगैर छोटा करना हो तो एआई यह काम बहुत मुस्तैदी से आनन-फानन में पूरा कर देगा।

जापान के नोबेल पुरस्कार लेखक यासुनारी कवाबाता का सबसे महत्वपूर्ण और कालजयी उपन्यास है ‘स्नो कंट्री’, जो दरअसल उनकी नौ प्रकाशित कृतियों का समन्वय है! अपनी मृत्यु से कुछ पहले कवाबाता ने कई महीनों की मेहनत से इस उपन्यास का कुछ पन्नों में एक अति संक्षिप्त रूप प्रकाशित किया था- ‘ग्लीनिंग्स फ्रॉम स्नो कंट्री’ नाम से, यह कहते हुए कि इस उपन्यास में वे जो कुछ कहना चाहते थे, वह सब इन चंद पृष्ठों के संक्षिप्त प्रारूप में आ गया है। कवाबाता के रहते दुनिया में एआई का कोई वजूद नहीं था, वरना जो काम कवाबाता ने कई महीनों की मेहनत से किया, उसे एआई चंद मिनटों में पूरा कर देता। लेकिन इसके बाद भी यह जानना अति दिलचस्प होता कि कवाबाता का स्वयं किया संक्षिप्तीकरण किन मायनों में एआई के यांत्रिक संक्षिप्तीकरण से कमतर या उससे आगे था!

इसमें कोई शक नहीं कि एआई के इस्तेमाल से बहुत-सी साहित्यिक और दूसरी विधाओं की प्रकाशित सामग्री को परिमार्जित करना और कई बार सिर्फ कृत्रिम मेधा से गढ़ना बेहद आसान हो जाएगा, पर इसी के साथ बड़ा खतरा यह है कि इससे मनुष्य की सृजनात्मकता का बड़ा हिस्सा भी शायद सदा के लिए नष्ट हो जाएगा।

हमारे आधुनिक जीवन में ‘एआई’ के इस्तेमाल की असंख्य संभावनाएं हैं! ‘एआई’ का वास्तविक विकास इक्कीसवीं सदी के आरंभ से शुरू होकर पिछले पांच वर्षों में आश्चर्यजनक गति से बढ़ा है और समझा जा रहा है कि अगले दस-पंद्रह वर्षों में इसके प्रभाव वाणिज्य, व्यापार, कला, साहित्य से लेकर सामरिक, उपचार और यातायात क्षेत्रों में हर तरफ दिखाई देने लगेंगे! यातायात साधनों के क्षेत्र में ‘वेमो’ नाम का प्लेटफॉर्म स्वचालित वाहन बनाने के नए आयाम तय कर रहा है। डॉक्टरों को ‘एआई’ के प्लेटफार्मों की मदद से असाध्य रोगों की खोजबीन में आश्चर्यजनक मदद मिलेगी। यूनिवर्सिटी के शोध छात्रों के लिए ‘एआई’ द्वारा दुनिया भर से तथ्यों को उजागर करने की प्रक्रिया बेहद सुलभ हो जाएगी! ये सब सकारात्मक उदाहरण हैं।

हमारे जैसे गरीब देश में ‘एआई’ का विस्तार निश्चय ही असंख्य नौकरियों को हड़प जाएगा, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है और हम देख रहे हैं कि इसके प्रयोग से हमारी बड़ी ‘आई टी’ कंपनियों ने अभी से अपने कर्मचारियों में कटौती आरंभ कर दी है।

सिनेमा का पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास अत्यंत चमत्कारी रहा है। माना जा रहा है कि ‘एआई’ के आगमन से फिल्मों में ऐसे विलक्षण दृश्य देखे जा सकेंगे, जिनकी इससे पहले कल्पना करना भी मुश्किल था। यही नहीं, इसके जरिए अब इतिहास को मनचाहे ढंग से तोड़-मरोड़कर एक झूठा संसार भी रचा जा सकता है। दृष्टव्य है कि अभिनेत्री ऐश्वर्या राय और उनके पति अभिषेक बच्चन ने हाल ही में अदालत में विधिवत दरख्वास्त की है कि कोर्ट ‘एआई’ के इस्तेमाल से उनके बारे में तैयार की जाने वाली सारी फर्जी अभद्र सामग्री/तस्वीरों के इंटरनेट प्रसारण पर रोक लगाए और उसपर कानूनी कार्रवाई करे।

लेकिन मेरी नजर में ‘एआई’ से जुड़ा सबसे बड़ा संकट मानवीय मौलिकता और इसकी सूझ-बूझ को विनष्ट कर देने का है। हमने देखा है कि पिछले एक-दो दशकों में ‘फेसबुक’, ‘ट्विटर’ और ‘इंस्टाग्राम’ जैसे माध्यमों ने किस तरह साहित्यिक रचनात्मकता में सेंध लगाकर हजारों-लाखों लोगों को एक जैसी ‘शॉर्ट कट’ भाषा का व्याकरण का इस्तेमाल करने और उसके ‘आइकन’ आधारित चित्रों में संवाद करने पर मजबूर किया है। इससे मौलिकता का ह्रास तो हुआ ही है, गो कि इन प्रतिक्रियाओं और पोस्टों की लोकप्रियता को ही हम साहित्य की अंतिम कसौटी समझने लगे हैं। आज हम रचनात्मकता और परिश्रम का सहारा लिए बगैर, इन माध्यमों पर सवार हो रातों-रात लोकप्रिय हो जाना चाहते हैं। लोगों ने गंभीर साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है और उनकी रुचि सूचनाओं के सतही संसार को पढ़ने-गढ़ने और उसे अधिकाधिक लोगों के बीच प्रचारित करने तक सीमित रह गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘एआई’ का उदय इस संकट को कई गुना बढ़ा देगा और गंभीर रचनात्मक साहित्य में लोगों की रुचि कुछ और कम हो जाएगी।

अंग्रेजी में एक उक्ति है कि भाषा और शब्दों का ज्ञान ही अगर साहित्य होता तो एक चतुर बंदर भी शेक्सपियर लिख लेता। देखा जाए तो ‘एआई’ का यह युग शेक्सपियर को असंगत साबित करने वाले, इसी तरह के सर्वज्ञाता चतुर बंदरों की फौज बनाने में जुटा हुआ है।

योरोप के चेक विचारक इवान क्लीमा कहते हैं- ‘जानकारी और सूचना का जो अपरिमित अंबार हमारे इर्दगिर्द गूंजने लगा है, उसके साथ ही यह खतरा भी जन्म ले रहा है कि अंतत: हम इसी के खालीपन में डूबकर रह जाएंगे। खालीपन जो हमें अपनी जड़ों से विलग कर हमें समय और अस्तित्वहीनता के संवेदनविहीन शून्य में धकेल देगा!’

‘एआई’ का युग आरंभ हो चुका है, पर हममें से अधिकांश के पास इससे जुड़े सवालों पर सोचने का समय नहीं होगा, और होगा भी तो इसका कोई आशाजनक उत्तर दे पाना मुश्किल होगा। आज के यांत्रिक टेक्नोलॉजिकल जीवन की यह दुरभिसंधि सचमुच भयभीत करने वाली है।

इतिहास बताता है कि हमारा बहुत कम तकनीकी विकास अंतत: पर्यावरण और प्रकृति हितैषी साबित हुआ है। ‘एआई’ का पर्यावरण से क्या रिश्ता है, यह तय करने में अभी काफी समय लगेगा, लेकिन यह तो निश्चय ही कहा जा सकता है कि एक ओर जहां इसमें जीवन को आमूल बदल डालने की असीम संभावनाएं हैं, वहीं दूसरी ओर इसका आगमन इंसान को रोबो में बदल डालने की दिशा में एक और निर्णायक कदम होगा!

602 गेटवे प्लाजा, हीरानंदानी गार्डंस, पवई, मुंबई-400076 मो. 8169449650

 

 

वीरेंद्र यादव
वरिष्ठ प्रगतिशील आलोचक। ‘उपन्यास और देस’, ‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’, ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ चर्चित पुस्तकें।

 एआई साहित्य और शिक्षा के समक्ष एक चुनौती है

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उन्नत तकनीकी उत्पाद है, जो वास्तविक न होकर कृत्रिम है। इसे एक प्रविधि के रूप में ही लिया जाना चाहिए। यह कुछ तथ्य, आंकड़े और पृष्ठभूमि सामग्री उपलब्द्ध कराने में सहायक हो सकता है। उन्नत तकनीक होने के कारण यह उपलब्द्ध सामग्री को एक कलेवर दे सकता है। यह आकार लेख, कविता, कहानी या उपन्यास का भी हो सकता है। लेकिन यह सबकुछ उपलब्द्ध सामग्री का तकनीकजनित निवेशन है। यह द्वितीयक उत्पाद है, न कि जीवित मस्तिष्क की सृजनात्मक कृति।

एआई द्वारा प्रदत्त सामग्री पुनर्प्रस्तुति से अधिक कुछ नहीं हो सकता। थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ यह उसी तरह किसी अन्य तकनीकी उत्पाद के मानिंद होता है जैसी अन्य उपभोक्ता सामग्री। इसके द्वारा प्रस्तुत सामग्री कला और साहित्य का स्थानापन्न नहीं हो सकती। इसकी कृत्रिम मेधा प्रेमचंद के नाम से ‘गांव की सांझ’ शीर्षक से कविता तो लिख देगी, लेकिन यह नहीं बताएगी कि प्रेमचंद और कविता बेमेल हैं, इसलिए इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती। यहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सीमा और मानवीय विवेक के सामर्थ्य को समझा जा सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हुसैन की पेंटिंग की नकल तो प्रस्तुत कर सकता है लेकिन हुसैन की मौलिकता उसके सामर्थ्य की बात नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस औसत लेखन के थोक उत्पाद को उपलब्द्ध करने में सक्षम है। जहां यह कमतर प्रतिभाओं के लिए एक सहज सुलभ उपादान की भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम है, वहीं यह उच्चतर प्रतिभाओं के लिए बेहतर सृजन की चुनौती भी पेश करता है। सृजनशील मौलिकता के लिए अधिक मशक्कत की दरकार होगी। सरलीकृत यथार्थ की मानकीकृत भाषा में प्रस्तुति की प्रतिद्वंदिता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होगी। इसलिए किसी भी विधा में वही रचना टिकेगी जो यथार्थ या सामाजिक स्थितियों से गहरे मानवीय सरोकारों से संपृक्त होने के साथ साथ कलात्मकता का भी निर्वहन करेगी।

‘मैला आंचल’ सरीखी कालजयी कृति को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा उत्पादित किया जाना संभव नहीं है जबकि सतही यथार्थ को चालू भाषा में प्रस्तुत करना इसके लिए चंद सेकेंड का खेल है। स्वीकार करना होगा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जहां औसत बाजारू लेखन के लिए मददगार होगा, वहीं स्तरीय संश्लिष्ट के सम्मुख यह बौना सिद्ध होगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत जैसे कम उन्नत देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए अधिक उपयोगी नहीं है। ग्रामीण व कस्बाई इलाकों में यह कारगर इसलिए नहीं होगा कि वहां न अपेक्षित तकनीकी सुविधाएं हैं और न वातावरण। उच्च-शिक्षा में इसकी सहायक भूमिका हो सकती है, लेकिन यह जीते-जागते शिक्षक का  स्थानापन्न नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा होने पर यह शिक्षा का रोबोटीकरण करेगी जिसके प्रतिकूल प्रभाव होंगे।

प्राथमिक छात्रों के लिए तो एआई अनुत्पादक ही होगी क्योंकि देशकाल की परिस्थितियों के अनुकूल छात्र व शिक्षक के संवाद को बाधित करेगी।

मानवीय मूल्यों और बेहतर समाज की समझदारी भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा समुचित रूप से संभव नहीं है। भारतीय समाज के लिए मेधागुरु अभी दूर की कौड़ी है, इसलिए कक्षा तथा शिक्षक की जरूरत बनी रहेगी। तकनीकी रूप से उन्नत पश्चिमी शिक्षा के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल की न यहां जरूरत है और न ही उपयोगिता।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अस्मिता निर्माण तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में भारतीय समाज के वर्तमान स्तर पर फिलहाल कोई सकारात्मक व कारगर भूमिका लक्षित नहीं की जा सकती। संस्कृति और अस्मिता जीते-जागते समाज में बहुलतावादी निर्मिति है, तकनीक द्वारा इसका मानकीकरण इसके मूल अस्तित्व को ही नकारना है।

भारतीय समाज में दलित, स्त्री तथा आदिवासी विमर्श अभी अपनी आरंभिक स्थिति में हैं। इन्हें वर्चस्ववादी मूल्यों और सरणियों के विरुद्ध व समानांतर अपनी सार्थकता को सिद्ध करनी है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा किया जाना संभव नहीं है। अस्मिता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को संस्थाबद्ध व मानकीकृत किया जाना इसके मूल उत्स को नकारना है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जनित व्यवस्थाएं या पद्धति गैर-पश्चिमी देशों व समाजों के विश्वासों तथा परंपराओं को समझने में इसलिए अक्षम सिद्ध होंगी, क्योंकि समूचे विश्व के लिए कोई एक या कुछ मॉडल पर्याप्त नहीं होंगे। भारत जैसे देश में जहां विश्वासों और परंपराओं की इतनी विशालता है कि उन्हें एक समूचे भारतीय मॉडल में समाहित किए जाने की परिकल्पना नहीं की जा सकती और न की जानी चाहिए। महाद्वीपीय विस्तार लिए भारत जैसे देश में इतने समाज हैं और हर समाज की अपनी इतनी विपुल धाराएं और विविधता है कि इसे समाजशास्त्रियों के लिए भी परिभाषित करना और एकसूत्र में बांधना न तो संभव है और न ही वांछित।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिल्म, मीडिया और अन्य कला क्षेत्रों में उस सीमा तक जरूर सहायक है जहां तकनीक की प्रभावी उपस्थिति है। एनिमेशन फिल्मों और कार्टून आदि में यह प्राविधि पहले से ही इस्तेमाल की जा रही है।  मीडिया में इसकी भूमिका दिनोंदिन बढ़ रही है और अब तो एआई न्यूजरीडर भी परदे पर नजर आने लगे हैं। निश्चित रूप से इससे रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं और हो रहे हैं, जो भारत जैसे विकासशील देशों के तात्कालिक हितों के विरुद्ध है।

लेकिन हर तकनीक अपने साथ नई संभावनाओं के द्वार भी खोलती है, उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत जैसे देश में बदलते समय के साथ तकनीक और सामाजिक विकास एक साथ कदमताल कर सकेंगे।

सी 855, इंदिरा नगर,  लखनऊ-226016, मो.9415371872

 

 

सुनील कुमार शर्मा
कवि, लेखक और विशिष्ट तकनीकविद।

 एआई में विविध भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक डेटा को समान महत्व से शामिल किया जाए

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं है। यह समाज और साहित्य के संबंधों को भी गहराई से बदल रहा है। जैसे-जैसे हमारे अनुभव, रिश्ते और दैनिक व्यवहार डिजिटल होते जा रहे हैं, साहित्य की दुनिया भी नए विषयों और नई संवेदनाओं से भर रही है।

एआई के चलते आज हम एल्गोरिद्म के सुझावों, स्क्रीन पर बनते रिश्तों, और डेटा-आधारित फैसलों के बीच जी रहे हैं। यह बदला हुआ अनुभव स्वाभाविक रूप से साहित्य में प्रवेश करता है। आज की नई कहानियां अब डिजिटल अकेलेपन, आभासी घनिष्ठता, रोजगार के बदलते स्वरूप और मनुष्य-मशीन के टकराव को पकड़ने लगी हैं। एआई इसी दौरान लेखकों के सामने एक नया दार्शनिक प्रश्न भी खड़ा करता है- रचना का अर्थ क्या है? मशीनें अब कविता, कहानी, समीक्षा सब लिखने लगी हैं जिससे मौलिकता और रचनात्मकता की परिभाषा पर बहसें खड़ी हो रही हैं। यह स्थिति लेखकों को अप्रत्यक्ष रूप से याद दिलाती है कि भाषा की नकल मशीन कर सकती है, पर अनुभव, पीड़ा, स्मृति और करुणा मनुष्य का अपना क्षेत्र है। एआई के युग में भावनात्मक गहराई ही लेखक की सबसे बड़ी पहचान बन जाती है।

एआई हमारी संस्कृति को भी एक नया आईना दिखा रहा है। यह बताता है कि आज का समाज कैसे ‘क्लिक’, ‘लाइक’, ‘फॉलो’ और रैंकिंग के आधार पर चलता है। यह इसका संकेत देता है कि साहित्य को अब मनुष्य की असलियत, उसकी कमजोरियों और उसकी जटिलताओं को अधिक संवेदनशीलता से दर्ज करना होगा, ताकि इंसान ‘डेटा’ में बदलते समाज के बीच अपनी मानवता खो न दे।

साथ ही, एआई लेखन को लोकतांत्रिक भी बना रहा है- अनुवाद आसान हुए हैं, संपादन सरल हुआ है। वे आवाजें भी साहित्य में आ रही हैं जो पहले तकनीकी या भाषाई सीमाओं के कारण दब जाती थीं।

यह सही है कि एआई तेजी से लिख सकता है, पर जीवन को पढ़ना अभी भी मनुष्य का ही काम है। यही वह जगह है जहां साहित्य उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सबसे बड़ा अवसर दोनों बनकर सामने आता है। इन सबके बीच एआई लेखकों को यह सांस्कृतिक संदेश देता है- अनुभव की प्रामाणिकता ही तुम्हारी वास्तविक पूंजी है, संवेदनशीलता ही तुम्हारी पहचान है और नैतिक दृष्टि तथा सत्य के प्रति निष्ठा ही वह मानवीय तत्व हैं जिसकी बराबरी कोई मशीन नहीं कर सकती। इसलिए एआई का नैतिक विकास अंतत: मनुष्यों की ही जिम्मेदारी है। हम ही यह तय करते हैं कि तकनीक किस दिशा में आगे बढ़ेगी और वह किस हद तक मानवता के काम आएगी।

वर्तमान में हो रहे शोध यह संकेत देते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कक्षा-शिक्षण की संरचना को महत्वपूर्ण रूप से परिवर्तित करेगा, परंतु शिक्षकों या शैक्षणिक परिसरों का पूर्ण प्रतिस्थापन संभव नहीं है। ओईसीडी की ‘फ्यूचर ऑफ एजूकेशन एंड स्कील्स’ से 2030 रिपोर्ट  और यूनेस्को की एआई एंड एजूकेशन गाइडेंस फॉर पॉलिसी मेकर्स (2021) के अनुसार एआई व्यक्तिगत अधिगम, त्वरित आकलन, और डेटा-आधारित निर्देशात्मक सहायता में उल्लेखनीय दक्षता प्रदान करता है। हालांकि एआई की उभरती क्षमताओं और हालिया तकनीकी अनुभवों से ‘मेधारोबो’ या एआई-आधारित रोबो-टीचर्स जैसी अवधारणाएं स्वाभाविक रूप से आकार लेने लगती हैं।

दरअसल शिक्षा सिर्फ ज्ञान या जानकारी देना नहीं है! इसमें बच्चों का सामाजिक व्यवहार, भावनाएं, प्रेरणा, सहानुभूति और नैतिक समझ भी शामिल होती है, हालांकि इन क्षेत्रों में एआई अभी बहुत सीमित है।

स्टैंनफोर्ड हाई (2023) भी यह दिखाता है कि स्कूल का वातावरण बच्चों के आपसी जुड़ाव, सहयोग और उनकी पहचान बनने के लिए आज भी बेहद जरूरी है। अत: भौतिक विद्यालय अथवा महाविद्यालय परिसर भी अपने नए स्वरूप में परिवर्तित हो सकते हैं, पर उनकी उपयोगिता समाप्त नहीं होगी। सामाजिक सहयोग, समूह-अध्ययन, सह-पाठ्य गतिविधियां और नैतिक-भावनात्मक विकास अब भी मानवीय वातावरण पर निर्भर हैं जिनका डिजिटल रूपांतरण सीमित है।

निष्कर्षत: एआई शिक्षण प्रक्रियाओं को अधिक अनुकूलनशील और सटीक अवश्य बनाएगा, पर यह न तो शिक्षकीय भूमिका को अप्रासंगिक करता है और न ही भौतिक परिसरों को। भविष्य का शिक्षण परिदृश्य, ‘मानव-मशीन सहयोग’ पर आधारित होगा। इस काम में एआई का नैतिक, सुरक्षित और उत्तरदायी विकास तथा उपयोग करने का दायित्व अंतत: मनुष्यों पर ही होगा।

एआई हमारे समाज में अस्मिता-निर्माण की प्रक्रिया और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को तेजी से पुनर्संरचित कर रहा है। इसके चलते अब हमारी पहचान अब केवल सामाजिक अनुभवों से नहीं, बल्कि डिजिटल अनुभवों और एल्गोरिद्मिक फिल्टरों से भी प्रभावित/निर्मित हो रही है। एआई आधारित प्लेटफॉर्म यह तय करने लगे हैं कि हम कौन-सी भाषा, किस तरह के विचार, किस प्रकार की कलाएं, और किन सांस्कृतिक प्रतीकों से सबसे अधिक जुड़ते हैं। इससे व्यक्ति की पहचान धीरे-धीरे ‘डिजिटल क्यूरेशन’ से आकार लेने लगती है- यानी एल्गोरिद्म हमारी रुचियों, विकल्पों और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को छिपे रूप में दिशा दे सकते हैं।

दूसरी ओर, एआई पहचान को नए अवसर भी देता है। स्थानीय भाषाओं का त्वरित अनुवाद, सांस्कृतिक धरोहरों का डिजिटल संरक्षण और हाशिए पर मौजूद समुदायों की अभिव्यक्तियों का वैश्विक प्रसार अब पहले की तुलना में कहीं सरल हुआ है। इसी कारण एआई अस्मिता को सीमित भी कर सकता है और विस्तार भी दे सकता है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज इसका उपयोग कितनी नैतिकता, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विवेक के साथ करता है।

निष्कर्षत: एआई केवल तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि अस्मिता और संस्कृति दोनों को नई दिशा देने वाला एक सक्रिय सामाजिक कारक है। इसलिए इसके नैतिक और सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी विकास की जिम्मेदारी भी अंतत: मनुष्य पर ही है।

एआई व्यवस्थाएं अभी गैर-पश्चिमी समाजों की मान्यताओं, परंपराओं और सोच को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर एआई मॉडल उस डेटा पर बने हैं जो पश्चिमी भाषाओं और संस्कृतियों पर आधारित हैं। इसलिए कई बार एआई स्थानीय प्रतीकों, मुहावरों, आध्यात्मिक धारणाओं, मौखिक परंपराओं और सांस्कृतिक भावों को ठीक से पकड़ नहीं पाता।

यूनेस्को (2021) और स्टैंफोर्ड हाई (2023) भी यही दिखाते हैं कि डेटा में यह असमानता एआई की समझ को सीमित कर देती है। हालांकि नए मॉडल अब अधिक भाषाओं और अलग-अलग समाजों के उदाहरणों पर प्रशिक्षित किए जा रहे हैं जिससे स्थिति बेहतर हो रही है। फिर भी सांस्कृतिक बारीकियां, भावनात्मक गहराई और सामाजिक संदर्भ जैसी चीजें एआई के लिए अब भी चुनौती बनी हुई हैं और इसमें मानव समझ का कोई विकल्प नहीं है।

संक्षेप में, एआई गैर-पश्चिमी समाजों को पूर्ण रूप से नहीं समझ सकता है। इन जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थव्यवस्थाओं को पूरी तरह समझने की उनकी क्षमता तभी विकसित होगी जब उनके विकास में विविध भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक डेटा को समान महत्व से शामिल किया जाए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिल्म, मीडिया और कला के क्षेत्रों को तेजी से बदल रहा है। एडिटिंग, स्क्रिप्टिंग, ग्राफिक्स, संगीत और वीएफएक्स जैसे कई कार्य अब एआई की मदद से मिनटों में किए जा सकते हैं। हाल के सर्वे- जैसे यूनेस्को (2023) और डेलॉयट मीडिया ट्रेंड (2024) यह संकेत देते हैं कि मीडिया उद्योग में लगभग 20-30 प्रतिशत ‘रूटीन क्रिएटिव वर्क’ आने वाले वर्षों में स्वचालित हो सकता है। इससे पारंपरिक भूमिकाओं पर कुछ दबाव बढ़ेगा, लेकिन इसके समानांतर नए प्रकार की नौकरियां भी उभर रही हैं।

पिक्सर एआई का उपयोग करने से एनीमेशन समय घटा रहा है। नेटफ्लिक्स दर्शकों की पसंद समझने और कंटेंट योजना बनाने में एआई का सहारा ले रहा है। बॉलीवुड में वीएफएक्स डी-एजिंग और वर्चुअल शूटिंग एआई के कारण अधिक प्रभावी हुई है। इससे स्पष्ट है कि एआई उत्पादन प्रक्रियाओं को तेज, किफायती और अधिक प्रयोगधर्मी बना रहा है।

एआई का सही लाभ तभी उठाया जा सकता है, जब हम उसे मनुष्य की जगह लेने वाली ताकत न मानकर अपना सहायक समझें। यानी रचनात्मक काम में एआई तकनीक हमारी मदद कर सकती है- लेकिन अंतिम निर्णय, कल्पना और भावनाएं मनुष्य को ही देनी होंगी। इसके लिए जरूरी है कि कलाकार, लेखक, पत्रकार और तकनीकी कर्मचारी एआई टूल्स का इस्तेमाल करना सीखें, ताकि वे इन तकनीकों का अपने काम को बेहतर और आसान बनाने के लिए उपयोग कर सकें।

साथ ही, डीपफेक, नकली वीडियो और बिना अनुमति किसी की आवाज या चेहरा इस्तेमाल करने जैसी समस्याओं से सावधान रहना होगा। मीडिया और कला जगत में ऐसे मामलों के लिए साफ नियम और नैतिक सीमाएं बनाना जरूरी है, ताकि तकनीक का दुरुपयोग न हो और लोगों का भरोसा बना रहे।

आखिर में यही बात सबसे महत्वपूर्ण है कि एआई नए प्रयोग, नए विचार और तकनीकी सुविधा दे सकता है- पर कला को ‘हृदय’ और ‘अर्थवत्ता’ अभी भी मनुष्य को ही देना है। यही कारण है कि भविष्य में सबसे सफल वही लोग होंगे जो एआई के साथ मिलकर काम करेंगे, लेकिन अपनी मानवीय दृष्टि और कल्पना को केंद्र में रखेंगे।

फ्लैट नंबर-3, ब्लॉक नंबर-21, दक्षिण पूर्व रेलवे ऑफिसर्स कॉलोनी,  11, गार्डेनरीच रोड, कोलकाता-700043 मो.8902060051

 

 

विनोद शाही
वरिष्ठ आलोचक, नाटककार और कथाकार। अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘भाषा दर्शन और हिंदी’।

 एआई हाशिए की आवाजों के लिए एक वरदान हो सकता है मगर…

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मूलत: एक डाटा-आधारित भाषावस्तु है। यह भाषा के इस नए रूप के साथ, समाज और साहित्य के रिश्तों की पुर्नव्याख्या का सवाल खड़ा करती है।

इस संदर्भ में केट क्रॉफर्ड द्वारा उठाया गया यह सवाल गौरतलब है कि ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता न कृत्रिम है, न बुद्धिमत्ता।’ तो वह क्या है? इसका संसाधन वह भाषा है, जो डेटा में बदल गई है। इसकी देह एल्गोरिद्म है और कार्यक्षेत्र है- लोकचित्त का निकट-पाठ, ताकि उसे अनुमेय सोच-समझ और व्यवहार में ढाला जा सके। ये तमाम चीजें, जब उसके डाटा संसार में बदलती हैं, बकौल वाल्टर बेंजामिन ‘उनका प्रभा-मंडल खो जाता हैं।’ इस तरह एआई का पूरा ज्ञान तंत्र गहरे में डाटा-भाषा पर आधारित संचारतंत्र है। ऐसे में हम एआई के लिए हिंदी में एक नए पारिभाषिक का प्रयोग कर सकते हैं ‘संचार मेधा’।

तो यह जो ‘संचार मेधा’ है, यह कृत्रिम नहीं है, क्योंकि इसका अपना एक अलग यथार्थ है। इसका संबंध एक खास तरह की ‘उत्पादित समझ’ से है। इसके असर का क्षेत्र वहां तक दिखाई दे सकता है जहां तक संचारतंत्र की सत्ता दिखाई देती है।

संचार मेधा की सत्ता का स्वरूप क्या है- इसे भी समझना जरूरी है। शोशाना जूबॉफ, इसे ‘इंस्ट्रूमेंटेरियन’ या ‘माध्यमधर्मी सत्ता’ कहती हैं। यह ज्ञान की सत्ता का एक नया यांत्रिक रूप है। समाज जिस अनुपात में इसके असर में दिखाई देता है, उसी अनुपात में उसकी परछाई साहित्य में भी दिखाई देने लगती है। वह ‘पूर्वानुमेय रचनात्मकता’ की तरह साहित्य में दाखिल होती है। संचार मेधा इसे अपनी एक एल्गोरिद्म’ के रूप में उत्पादित करती हैं। वास्तविक रचनाशीलता, वह है जो यंत्र के लिए पूर्वानुमेय ना हो। ऐसा होने पर ही अभिव्यक्ति को एकरूप, मानकीकृत और डाटा-निर्भर होने से बचाया जा सकता है।

साहित्य के सामने संचार मेधा एक अन्य तरह का संकट भी खड़ा कर रही है। संचार तंत्र बहुत दूर तक राजसत्ता द्वारा नियंत्रित और संचालित होता है। अर्थतंत्र और राजतंत्र के असर से डाटा-केंद्रों और डेटाबेस पर कई तरह के अंकुश लगाए जा सकते हैं। उनका राज्य के पक्ष और विपक्ष में प्रचार और दुष्प्रचार के लिए इस्तेमाल भी संभव है।

समाज और साहित्य दोनों पर इसका प्रभाव करीब-करीब वैसा ही है, जैसा इससे पहले के दौर में राजसत्ता और साम्राज्यवाद द्वारा नियंत्रित विचारधारा और पक्षधरता के मामलों में दिखाई देता रहा है। अब हम इसके अगले दौर में पहुंच गए हैं। इसे निक कोल्डरी और उलिसेस मेहियास जैसे कुछ लोग ‘डाटा उपनिवेश’ का दौर भी कह रहे हैं।

लेकिन संचार मेधा की रचनात्मकता के लिए सबसे गंभीर चुनौती यह है कि उसके असर से साहित्य का अपनी परंपरागत चीजों, जातीय स्मृतियों, वास्तविक अनुभवों और विकल्प की खोज से जुड़ी चेतना से विच्छेद होने लगता है।

तथापि मेरा मानना यह है कि साहित्य हर प्रकार की यांत्रिकता से उबरने का रास्ता खोज लेता है। रचनात्मकता के यांत्रिक रूप एकरूप होने की वजह से अधिक देर तक पाठक वर्ग और बाजार को धोखा नहीं दे सकते। कुछ समय के पश्चात वे दोहराव का शिकार होकर उबाऊ होने लगते हैं।

दूसरी बात यह है कि संचार तंत्र द्वारा जिस अनुभव-संसार को खड़ा किया जाता है, उसका अर्थ वास्तविक अनुभव-संसार की बुनियाद पर टिका है। आप प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों के संबंध में कितनी भी दृश्य-श्रव्य छवियों का निर्माण क्यों न कर लें, वे वास्तविक अनुभव का विकल्प नहीं हो सकतीं। साहित्य उनकी अभिव्यक्ति के लिए निरंतर मौलिक होने के खतरे उठाता रहेगा।

यह अलग बात है कि संचार मेधा बहुत जल्द उसे भी अपनी एल्गोरिद्म में बदल लेगी। परंतु इससे केवल इतना ही साबित होता है कि रचनाशीलता के सम्मुख जो संकट है, वह पहले से कहीं अधिक गंभीर है। उसे पहले से कहीं अधिक सजग होना पड़ेगा और लगातार अपनी मौलिकता की रक्षा के लिए काम करना होगा।

जहां तक कक्षा-शिक्षण का संबंध है, उसका स्वरूप संचार मेधा के हस्तक्षेप के कारण अभी से थोड़ा-बहुत बदलने लगा है। मेधा-रोबो के गुरु का विकल्प होने की संभावना उतनी नहीं है। मेधा-रोबो की भूमिका एक सहायक से अधिक कारगर नहीं हो सकेगी। इसकी वजह यह है कि भविष्य में संचार मेधा के असर से सीखने के रूपों में एक बड़ी तब्दीली हो जाएगी। छात्रों की स्मृति पर अतिरिक्त दबाव कम हो जाएगा। जो काम संचार मेधा के द्वारा किए जा सकते हैं, उन्हें याद करने की बहुत जरूरत नहीं रह जाएगी। यह कुछ इस तरह होगा जैसे मोबाइल पर ‘कैलकुलेटर’ के आ जाने के बाद, पहाड़ों को कंठस्थ करने की परंपरा का तकरीबन अंत हो गया है। किसी भी विषय से संबंधित कुशलता का एक अर्थ संचार मेधा के बेहतर संचालन से जुड़ जाएगा।

जहां तक शिक्षण संस्थानों के बड़े-बड़े परिसरों का संबंध है उनका प्रयोग, ‘लेक्चर’ के बजाय व्यावहारिक कार्यों के लिए अधिक होने लगेगा। औद्योगिक क्षेत्र की जरूरतें पाठ्यक्रमों के नए किस्म के निर्धारण के लिए अधिक भूमिका निभाने लगेंगी। भाषागत अभिव्यक्ति और साहित्य संबंधी शिक्षण के मामले में मौलिकता की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जाने लगेगी। इतिहास और समाज-विज्ञान के क्षेत्र में हाशिए की अस्मिताओं के लिए अधिक जगह बननी आरंभ हो जाएगी। गौण संस्कृतियों का क्षेत्र पहले जितना अनछुआ अनपढ़ा नहीं रहेगा। ‘सबाल्टर्न’, प्रवासी, दलित, स्त्री आदि से संबंधित विषय, अपने लिए अधिक जगह खोजने लगेंगे।

इन सबके अलावा गहराई में उतरने वाली चेतना को उपलब्ध करने के तरीके भी गुरुओं के हाथ में ही न रहकर शिक्षण संस्थानों में भी अपनी जगह तलाशने लगेंगे। शिक्षण संस्थान विविधता, बहुलता और समावेशी अध्ययनों की ओर रुख करेंगे। हालांकि यह भी होगा कि संचार मेधा बड़ी जल्दी उन्हें अपने डेटाबेस में बदलकर समानुकूलित करती जाएगी। जिन क्षेत्रों को अध्ययन का विषय बनाया जा सकेगा, उनसे बाहर के क्षेत्र विषय, चुनौती फेंकते रहेंगे। इस वजह से शिक्षा और शिक्षण संस्थान पहले से कहीं अधिक डायनेमिक रूप लेकर हमारे सामने आएंगे। जो ऐसा नहीं कर सकेंगे, वे अप्रासंगिक होकर समाज द्वारा धीरे-धीरे अस्वीकृत कर दिए जाएंगे।

कक्षा शिक्षण को बचाए रखने की एक अन्य वजह आचरण और व्यवहार के समानुकूलन की समस्या है। मनोवैज्ञानिक रोगों से लेकर आतंकवादी प्रवृत्तियों तक के विस्तार की वजह से छात्रों के समय रहते समानुकूलन के काम को शिक्षण संस्थानों द्वारा सक्रिय रूप में अपने हाथ में लेने के लिए दबाव बढ़ेगा। फिलहाल इस तरह के काम कई अच्छे शिक्षण संस्थान अपने ‘समर कैंप्स’ जैसे अतिरिक्त कार्यक्रमों के द्वारा करते हैं।

एक अन्य समस्या प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक के अधिकाधिक महंगे होते जाने तथा आम जनता के बजट से बाहर होते जाने की है। संचार मेधा का व्यक्तिगत रूप में उपलब्ध होना एक शुभ संकेत भी है, जो इस तरह के पूंजीमूलक लालच और प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्र में सेंध लगा सकता है। गहरी जिज्ञासा और सीखने की रुचि वाले प्रतिभा-संपन्न छात्र संचार मेधा के इस्तेमाल से महंगे शिक्षण संस्थाओं के विकल्प खोज सकते हैं। अभी से अनेक बड़े औद्योगिक संस्थानों ने डिग्री की अनिवार्यता के बजाय कार्य-कुशलता को महत्व देना आरंभ कर दिया है।

संचार मेधा की एक और बड़ी समस्या है। वह ‘सबाल्टर्न’ पहचानों को ‘शामिल’ करते हुए भी उन्हें डेटा श्रेणियों में समेट लेती है। लेबल लग जाने से पहचानों की विविधता-बहुलता का सरलीकरण हो जाता है। उनके वास्तविक अनुभव-संसार की पीड़ा भी तब संवेदित नहीं करती, बस एक तरह की सौंदर्य वस्तु की तरह प्रभावित हो जाता है।

उत्तर-आधुनिक दौर के सांस्कृतिक संकट को सामने रखते हुए गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने एक किताब लिखी थी- ‘कैन द सबाल्टर्न स्पीक?’ संचार मेधा के आ जाने के बाद अब वह समस्या उतनी विकराल नहीं है। उसके तहत हम दलित और उनकी आवाजों को बोलता हुआ सुन तो पाते हैं, परंतु वे आवाजें अब वास्तविक जीवनानुभवों की दृश्य-श्रव्य छवियों की एल्गोरिद्म जैसी अधिक हो गई हैं। इससे यह मिथ्या आभास भी पैदा होता है कि संचार मेधा उन आवाजों की हकीकत को हमसे ज्यादा जानती है। इसे मैं एक बड़ा सांस्कृतिक संकट मानता हूँ।

यूवाल नोवा हरारी कहता है कि संचार मेधा पर हम वास्तविक लोगों की तुलना में अधिक ‘भरोसा’ करने लगे हैं। भरोसे जैसी चीज के यांत्रिक हो जाने के नतीजे अच्छे नहीं हो सकते।

आज हाशिए के लोगों के इतिहास को जानना चाहें, तो बहुत आसानी हो गई है। संचार मेधा  हर तरह के इतिहास को खपत के लायक बनाकर बाजार के पैकेज की तरह हमें उपलब्ध करा देती है। सबाल्टर्न पहचानों से जुड़े लोग अपने आप को खोजने और स्थापित करने के लिए अभी तक सत्ता के प्रतिरोध की मदद लेते रहे हैं। वे समाज के वैकल्पिक नवसृजन की संभावनाओं को अपना भविष्य मानते रहे हैं। अब संचार मेधा के युग में हालात बदल गए हैं। ये सभी चीजें अब संचार मेधा के द्वारा उपलब्ध कराई जा सकने वाली टूल-किट्स में बदलती जाती हैं।

सवाल यह है कि हम संचार मेधा के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे इस तरह के विकल्पों का उपयोग नैतिक, सहभागी और आलोचनात्मक दृष्टि से कर सकते हैं, या नहीं? हम संचार मेधा को नियामक की भूमिका की बजाय एक भरोसेमंद सहायक में बदल सकते हैं, या नहीं?

बेशक एक सहायक के रूप में संचार मेधा हमारी अब भी दूर तक मदद कर सकती है, पर केवल एक सहायक के रूप में ही। जैसे कि वह उपेक्षित भाषाओं व अभिलेखों के संरक्षण में मदद कर सकती है। गौण इतिहासों और संस्कृतियों की वैकल्पिक कथाओं को उभारने और केंद्रीय बनाने में हमारे काम आ सकती है। रचनाशीलता के नए रूपों की खोज में मददगार हो सकती है। सरकारी और बड़े प्रकाशन संस्थानों के वर्चस्व में सेंध लगा सकती है। वह सामान्य जन के लिए अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन और वितरण की एक नई लोकतांत्रिक ‘साइट’ प्रदान कर सकती है।

एआई व्यवस्थाएं गैर-पश्चिमी समाजों के विश्वासों, परंपराओं और विश्वदृष्टियों को समझने में कितनी समर्थ हैं? यह एक गंभीर सवाल है। इसपर भारत के नुक्ते-निगाह से गौर करेंगे तो शायद कुछ नतीजे तक पहुंच सकें।

पश्चिम की भारत के ज्ञान-विज्ञान और परंपराओं में गंभीर रुचि अंग्रेजों के यहां आने के बाद तब दिखाई देती है, जब 19वीं सदी के आरंभ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के अंतर्गत प्राच्यवादी अध्ययन आरंभ होते हैं। पश्चिम के अनेक विश्वविद्यालयों में ‘ओरिएंटल स्टडी सेंटर्स’ की बाकायदा स्थापना हो जाती है। तब पहली दफा यह होता है कि हमारे बहुत से ग्रंथों के अनुवाद और भाष्य हमारे लिए भी सहज सुलभ हो जाते हैं। इससे भारतीय परंपरा के वैज्ञानिक किस्म के अध्ययन की एक अलग तरह की पद्धति विकसित होती है।

हम यह भी पाते हैं कि हमारी ज्ञान परंपराएं हमारे अपने वास्तविक अनुभव-संसार का विषय हैं जबकि पश्चिम के लिए उनकी अहमियत व्याख्या-वस्तु के रूप में अधिक है। हम उन्हें विविध मतों-संप्रदायों की साधना पद्धतियों के रूप में निरंतर विकसित करते रहे हैं। इसलिए वे हमारे लिए व्याख्या या भाष्य के रूप में ही नहीं, जीवन-पद्धति के रूप में भी अर्थ रखती हैं।

विद्या तथा तत्वज्ञान हमारे लिए दो अलग चीजें हैं। हमारे यहां जब योग को कर्म में कुशलता कहा गया तो इसका मतलब तत्वज्ञान या भक्ति-आधारित कर्म से अधिक है। पश्चिम की दिलचस्पी हमारी उन्हीं बातों में ज्यादा रही है जिनका संबंध अनेक प्रकार की कुशलताओं से है। इस वजह से, हमारे यहां जब पश्चिमी शिक्षा-पद्धति लागू हुई तो दार्शनिक तत्वदर्शन की परंपराओं का विघटन हो गया। हम भी खुद को अकादमिक रूप में पश्चिम की ओरिएंटल स्टडीज की तरह देखने-समझने की दिशा में ही आगे बढ़े। इस स्थिति का विरोधाभास यह है कि पश्चिम जब भारत की विशिष्ट ज्ञान-परंपरा की बात करता है तो उसका ध्यान हमारे विवेकानंद, अरविंद, जे कृष्णमूर्ति या ओशो जैसे तत्वदर्शियों की ओर ही अधिक जाता है।

अब हम संचार मेधा के एल्गोरिद्म में ‘ओरिएंटल स्टडीज’ को एक नए रूप में प्रस्तुत किए जाने की स्थिति तक आ सकते हैं। संचार मेधा हमारे तत्वदर्शियों द्वारा किए गए कामों को भी अपने डेटाबेस में शामिल कर रही है। योग साधना और तत्वज्ञान तक को खपत की वस्तु में बदला जा रहा है। इससे यह भ्रम पैदा हो सकता है कि हमें उन सब बातों का पता है। परंतु उससे जीवन का रूपांतर नहीं होता।

इस बारे में जे कृष्णमूर्ति की इस बात की ओर ध्यान दिया जा सकता है कि यह जो असल ज्ञान है वहां तक पहुंचने के लिए, ‘वह सब जो सीखा जा सकता है, उसे अनसीखा करना पड़ता है’। संचार मेधा का चीजों को ‘अनसीखा करने’, ‘मौन में उतरने’ या ‘चेतना के स्वरूप में स्थित होने’ जैसी बातों से कुछ खास लेना-देना नहीं है।

पूर्व और पश्चिम के बीच की इस बुनियादी दृष्टि-भिन्नता के संबंध में संचार मेधा बेहद अपर्याप्त है। साइबरनेटिक्स के क्षेत्र में होने वाले नए शोध से यह हो सकता है कि संचार मेधा का कोई विकसित रूप हमारे सामने आ सके। उसके बाद ही पूर्व और पश्चिम के बीच के फासले के कम होने की उम्मीद की जा सकती है।

संचार मेधा के आ जाने पर यह तय करना मुश्किल हो गया है कि फिल्म, वीडियो, पेंटिंग, कविता, कहानी या मीडिया-क्लिप किस हद तक लोगों की परंपरागत रचनाशीलता की अभिव्यक्ति का आधार है और किस हद तक ‘डिजिटल क्रिएटिविटी’ का उत्पादन।

संचार मेधा की मदद से नौसिखिए लोग भी बहुत उत्कृष्ट और व्यावसायिक किस्म के उत्पादों का निर्माण कर सकते हैं। संगीत की ऐसी-ऐसी धुनें और ट्रैक्स बनाई जा सकती हैं, जो क्लासिक माने जाने वाले संगीतकारों को टक्कर दे सकें।

रचनात्मकता के परंपरागत रूपों की शुद्धता को जो लोग बचाना चाहते हैं, उन्हें यह परिदृश्य बहुत अराजक लग सकता है। एक अन्य दृष्टि से देखने पर हम यह भी कह सकते हैं कि संचार मेधा ने पहली दफा मानव जाति को उस जगह पहुंचा दिया है जहां रचनात्मकता का सार्वजनिक रूप में महाविस्फोट हो सकता है। इस प्रकार रचनाशीलता अब गिने-चुने प्रतिभा-संपन्न विशिष्ट वर्गों के एकाधिकार से बाहर आकर, पहली दफा लोकतांत्रिक विस्तार पाने जा रही है। यह मामला एकदम अराजक भी नहीं है।

जिस रचनाशीलता को हम सार्वजनिक रूप में अभिव्यक्त होता देखते हैं, वह संचार मेधा की एल्गोरिद्म का उत्पादन होने के कारण एकरूपता और दोहराव की बड़ी जल्दी शिकार हो सकती है। कुछ देर के लिए वह समाज को अपनी चमक से हतप्रभ कर सकती है। परंतु बड़ी जल्दी इस तरह की चीजों में समाज अपनी रुचि खो देगा। रचनाशीलता के मामले में यांत्रिकता मनुष्य को बहुत समय तक बांधे रख सकेगी, इसमें संदेह है।

असल में जो लोग सच में प्रतिभा संपन्न होंगे, वे इस तरह के कार्य करेंगे जिन्हें संचार मेधा की ‘एल्गोरिद्म’ की मदद से करना संभव नहीं होगा। बेशक इससे रचनाशीलता के सामने चुनौतियां बढ़ जाएंगी। परंतु यह मनुष्य की एक ऐसी परीक्षा होगी जो मानव-जाति के अब तक के इतिहास में अभूतपूर्व मानी जाएगी।

ए 563 पालम विहार, गुरुग्राम-122017  मो.9814658098

संपर्क प्रस्तुतिकर्ता :मो. 9340791806