शंभुनाथ

दि कोई देश अपने साहित्यकारों को भूलता जाता है तो वह निश्चय ही आत्मघात के पथ पर है।प्रेमचंद को लेकर हिंदी के आम शिक्षित नागरिकों, यहां तक कि लेखकों के अंदर भी अब कोई उत्सुकता नहीं है।विभिन्न विमर्शों ने उन्हें पहले से साहित्यिक पिछवाड़े में डाल रखा है।उनसे ‘धर्मात्मा’ दूर रहते हैं और आधुनिक सज्जन उन्हें पसंद नहीं करते।आखिरकार वैश्वीकरण के जमाने में उनका क्या काम! उनकी सार्ध-शताब्दी 2030 में है, अतः उत्सव-प्रेमी अभी से क्यों चिंतित हों।३१ जुलाई को भले कहीं-कहीं रस्म अदायगी हो जाए, पर यह दुर्भाग्यजनक है कि प्रेमचंद आमतौर पर आजकल विस्मृति के मुहाने पर हैं।

प्रेमचंद अपनी आंखों के सामने भारतीय राष्ट्र को बनते देख रहे थे।वे इस महान घटना के साक्षी थे।इसके अलावा, उनका संपूर्ण साहित्य ही राष्ट्र और हाशिया (किसान, स्त्री, दलित) के बीच एक असमाप्त संवाद है।उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि एक स्वतंत्र माहौल में होनेवाले राष्ट्र निर्माण की तुलना में औपनिवेशिक माहौल में राष्ट्र निर्माण कितनी बाधाओं से भरा और पेचीदा मामला है।यह कितना ट्रेजडी-भरा है, इसके कुछ चित्र उनके ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’, ‘गोदान’ उपन्यास और उनकी कई कहानियों में हैं।आज पूरी दुनिया युद्ध और हिंसा की घटनाओं से घिरी है।हम देख सकते हैं कि अपने समय के ऐसे मामलों में भी वे कम बेचैन नहीं थे।वे सिर्फ भारत नहीं, पूरे विश्व की संहारक घटनाओं पर चिंतित थे और शांति के एक बड़े प्रवक्ता थे।

चर्चिल ने जब कहा, ‘भारत की जनता कोई परिवर्तन नहीं चाहती’, प्रेमचंद ने लिखा, ‘चर्चिल शायद भूल जाते हैं कि यह बीसवीं सदी है और संसार जिस तरफ जा रहा है, उधर ही भारत का जाना स्वाभाविक है।’(विविध प्रसंग)।उस जमाने में उपनिवेशवाद के अलावा फासिज्म और डिक्टेटरशिप के कई रूप थे।दुनिया भर में शांतिप्रिय लोग इनके खिलाफ थे।हर तरफ स्वाधीनता की आवाजें गूंज रही थीं।प्रेमचंद चर्चिल का प्रतिवाद करते हुए इसी तरफ इशारा कर रहे थे।यह देखकर विस्मय हो सकता है कि वे किस तरह दुनिया में बढ़ते फासिज्म को पहचान रहे थे और एक देशप्रेमी होते हुए भी किस तरह विश्वमानवता की एक प्रमुख आवाज थे।

संकुचित राष्ट्रीयता और युद्ध

तानाशाही भिन्न मत की चीजें बर्दाश्त नहीं करती।हिटलर के शासन में महान कवि गेटे के साहित्य का अपमान हो रहा था।यह देखकर प्रेमचंद ने चिंता व्यक्त की, ‘गेटे जर्मनी का ही अमर कवि नहीं, संसार के युग-प्रवर्तक कवियों में है।अभी तक जर्मनी ने उसे जन्म देने का गर्व किया है, पर अब नात्सी नीति में गेटे इसलिए सम्मान के योग्य नहीं रहा कि उसके विचार अंतरराष्ट्रीय थे और अब जर्मनी की संकुचित जातीयता में ऐसे महान स्रष्टाओं के लिए भी स्थान नहीं।जो जर्मनी अपनी संस्कृति और अपने ऊँचे दार्शनिक आदर्शों के लिए विख्यात था, उसका आज यह पतन।’ (नवंबर 1935, विविध प्रसंग)।संकुचित राष्ट्रीयता देश की उच्च साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत और महापुरुषों का तिरस्कार करती है।यह उन्हें हिजैक नहीं कर पाती, तो उसकी कोशिश ऐसी सारी चीजों को लोक स्मृति से मिटा देने की होती है जो उसकी विचारधारा के अनुकूल नहीं होतीं।क्योंकि इसके बिना संकुचित राष्ट्रीयता न विद्वेष का प्रचार कर पाएगी और न एकछत्रता संभव है।

प्रेमचंद बार-बार इस तरह की बातें कहते हैं, ‘संसार का कल्याण तभी हो सकता है जब संकुचित राष्ट्रीयता का भाव छोड़कर व्यापक अंतरराष्ट्रीय भाव से विचार हो।’ (भावी महासमर, 1933, वही)।लेकिन विश्व के शासक आधुनिक भौतिक प्रगति के बावजूद संसार के कल्याण की जगह सामान्यतः अपने अंध प्रभुत्व के लिए चिंतित रहे हैं।प्रेमचंद कहते हैं, ‘हरेक राज्य…अपनी रक्षा कर दूसरे का संहार करना चाहता है।पराये का व्यापार चौपट किए बिना अपना व्यापार कैसे पनपेगा?…

इसलिए अस्त्रों-शस्त्रों का संचय हो रहा है।महायुद्ध कहां से शुरू होगा, यह कोई नहीं कह सकता।इसका कारण प्रत्येक देश का अपने पड़ोसी के प्रति इतना घोर अविश्वास है कि किसी के अविश्वास अथवा विरोध की तुलना नहीं की जा सकती।… किसका विरोध किस समय कितना तीव्र हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता, पर यह निर्विवाद है कि योरोप या एशिया जहां कहीं  भी समर की आग फूटेगी, वह इतनी भयंकर होगी कि अपनी लपटों में सबको समेट लेगी।’ (वही)।प्रेमचंद यह सब द्वितीय युद्ध (1939-45) के 6 साल पहले लिख रहे थे।

प्रेमचंद युद्ध-विरोधी लेखक थे।वे चिंतित थे, ‘प्रत्येक राष्ट्र की प्रजा घोर दारिद्र्य तथा हाहाकार की लहरों में, भविष्य की बिना कल्पना किए और लक्ष्य का बिना विचार किए, बहती चली जा रही है।… लड़ाई की भीषण तैयारी हो रही है।’ (वही)।प्रेमचंद भारत के स्वाधीनता संग्राम से प्रतिबद्ध थे, पर उनके मन में एक बड़ी चिंता विश्वशांति और मानव-भविष्य को लेकर थी।

व्यापारिक प्रभुत्व के लिए युद्ध

कुछ समय से यूक्रेन-रूस युद्ध चल रहा है।इस पर कई बुद्धिजीवी कुछ बोलना नहीं चाहते, क्योंकि स्थिति जटिल है- वे नाटो और रूस में किसका पक्ष लें? फिर भी, इसमें संदेह नहीं है कि इस युद्ध का असर इन दो देशों तक सीमित न होकर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।इसका व्यापार, विश्व शांति और आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन पर व्यापक असर है।देखा गया है कि कुत्सित व्यापारिक होड़ अंततः युद्ध के दरवाजे पर खड़ा कर देती है।प्रेमचंद कहते हैं, ‘व्यवसाय और व्यापार के युग में राष्ट्रों में लड़ाइयों का मुख्य कारण आर्थिक हुआ करता है।हरेक राष्ट्र चाहता है कि वह अधिक से अधिक नफे में रहे।इसलिए वह तरह-तरह से अन्य देशों के माल को अपने देश में आने से रोकता है।इसका नतीजा यह होता है कि आपस में वैमनस्य बढ़ता है और एक दिन बारूद में आग लग जाती है।’ (1933, वही)।

वैश्वीकरण के जमाने में शक्तिशाली देशों की मुख्य चिंता है कि उनके माल की खपत कैसे बढ़े, क्योंकि इसपर उनकी वैश्विक प्रभाव-वृद्धि और देश के लोगों का असीमित सुख निर्भर करता है।प्रेमचंद ने लिखा है, ‘उन्हें तो धन चाहिए, धन के लिए- माल की खपत के लिए निर्बल देशों का होना लाजिम है।’ दरअसल वैश्वीकरण कई वजहों से एक सच्चा मुक्त बाजार बनाने में असफल रहा है, जैसा कि उसका दावा था।सरहदों पर तनाव या युद्ध मुक्त बाजार व्यवस्था की एक भारी विफलता है।निश्चय ही यह एक विडंबना है कि उदारीकरण के जमाने में सामाजिक उदारता में व्यापक ह्रास आया है और अंध-राष्ट्रवाद बढ़ा है।

21वीं सदी में, आर्थिक मंदी के इस खास दौर में हथियारों की होड़ में कमी नहीं है।पिछली सदी में युद्ध की दौड़ को शांति की दौड़ में बदलने तथा निःशस्त्रीकरण पर चर्चा होती थी।अब चर्चा भी नहीं होती।प्रेमचंद ने निःशस्त्रीकरण के लिए बैठकों को ‘ड्रामा’ कहते हुए एक मार्के की बात कही थी, ‘शस्त्र व्यापारी लड़ाइयों को उत्तेजित करते हैं।कितनी ही लड़ाइयां तो इन्हीं शस्त्र-व्यापारियों द्वारा खड़ी की जाती हैं।’ (1933, वही)।

कोविड-19 के समय हथियारों के व्यापार में कमी नहीं आई।सिप्री की एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में अविश्वसनीय 531 बिलियन डालर (करीब 42 करोड़ लाख रुपये) का विश्व व्यापार हुआ।इसमें आधी से ज्यादा, 54% बिक्री अमेरिकी कंपनियों द्वारा हुई।अमेरिका की अर्थव्यवस्था गेहूँ नहीं युद्ध उपकरणों के व्यापार पर निर्भर है।स्पष्ट है कि इन चीजों का व्यापार तभी चलेगा, जब सरहदों पर तनाव हो।

प्रेमचंद अपने समय में देख सके थे, ‘तेल ही इस समय दुनिया में हुकूमत कर रहा है।… यदि आज महासमर हो जाए तो जो राष्ट्र तेल के स्रोतों पर अधिकार रख सकेगा, वही विजयी होगा।’ (ईरान का तेल, 1932, वही)।रूस के पास तेल और गैस का बड़ा भंडार है।इसे वह हथियारों की तरह ही एक ताकत के रूप में देखता है।लक्षित किया जा सकता है कि पश्चिम एशिया तेल की वजह से लंबे समय तक युद्धक्षेत्र रहा है।प्रेमचंद की सोच उनके दौर के कई दूसरे बड़े लेखकों की तुलना में गहरी थी।

प्रेमचंद हिटलर को पहचान गए थे

दुनिया में हिटलर के प्रशंसक आज तक हैं।कई लोग नंगे रूप से उसकी सराहना नहीं करते, पर उसके गुणों को अपना चुके होते हैं।प्रेमचंद ने नाजी सत्ता का परिचय पहले ही स्पष्ट कर दिया था, जब हिटलर के सोवियत रूस से अच्छे संबंध थे और विश्व युद्ध के  दो सालों 1939-41 के दौरान तो ये दोनों गठबंधन में थे।प्रेमचंद लिखते हैं, ‘जर्मनी में नाजी दल की विजय (1933) के बाद यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में जर्मनी फासिस्ट हो जाएगा…? यदि एकबार नाजी शासन को जमकर काम करने का मौका मिला तो वह जर्मनी के प्रजातंत्रीय जीवन को, उसकी प्रजातंत्रीय कामनाओं को अपनी सेना और शक्ति के बल पर इस तरह चूस लेगा कि फिर 25 वर्षों तक जर्मनी में नाजी दल का कोई विरोधी न रह जाएगा।… यह कहां का न्याय था कि विरोधियों को पिटवा कर, मुसोलिनी की तरह विरोधी पक्षों को बंद कराकर चुनाव कराया जाए और अपनी विजय को राष्ट्र मत की विजय कहा जावे।हिटलर मुसोलिनी की नकल कर रहा है।’ मुसोलिनी हिटलर से 10 साल पहले (1922) सत्ता में आ चुका था।

प्रेमचंद बार-बार यह बात कहते हैं- ‘यह डिक्टेटरों का युग है’।चिंताजनक यह है कि बड़ी संख्या में भारत के आमलोग आज भी मानते हैं कि भारत पर डिक्टेटर ही अच्छा शासन कर सकते हैं!

दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर पराजित हुआ था।उसने अपनी जान ले ली थी, लेकिन वह मरा नहीं था।उसने दुनिया में रक्तबीज की तरह बार-बार नया जन्म लिया और वह जन्म लेता रहेगा।वह हमारे देश पर पश्चिम के प्रभाव का एक हिस्सा बन गया है।

प्रेमचंद ने भारत पर पश्चिम के अच्छे पहलुओं की तुलना में बुरी चीजों के ज्यादा पड़े प्रभाव पर टिप्पणी की है, ‘योरोप से यदि हमने अगर कुछ सीखा तो वही सीखा जो उसकी संस्कृति का सबसे निकृष्ट पहलू था।… (इस समय) संघर्ष अपना नंगा नृत्य कर रहा है।शक्तिवान और शक्तिवान, धनवान और धनवान होना चाहता है और वह निर्बलों को कुचलता हुआ आगे बढ़ेगा।वह पड़ोसी के बराबर नहीं रह सकता, उससे आगे बढ़कर रहेगा, उसे उखाड़ फेंकेगा।उसे अधिकार चाहिए… अधिकार के आगे ही सिर झुकाना जानता है, सच्चाई का बल उसके सामने कोई महत्व नहीं रखता।इसे वह दुर्बलता समझता है।उसके सामने केवल पशुबल का महत्व है…।’ पशु बल उपभोक्ता संस्कृति के वर्तमान दौर में ‘भोगपशु’ का बल हो गया है, जो स्पर्धा के दौर में भयंकर रूप से हिंसक बनाता है।

आज आदमी-आदमी के बीच विश्वास का संकट है।हर तरफ विद्वेष का ज्वार है।प्रेमचंद जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों पर हुए अत्याचार का चित्र खींचते हुए भारतीय संदर्भ में जो कहते हैं वह महत्वपूर्ण है, ‘यहूदियों की दुकानें लूटी जा रही हैं… यहूदी विद्वानों और पदाधिकारियों का अपमान किया जा रहा है।…प्रोफेसर आइंस्टीन जैसे विद्वानों को केवल यहूदी होने के कारण देश से बहिष्कृत कर दिया गया और उनकी संपत्ति छीन ली गई।… इसके मुकाबले भारत को देखिए।यहां हिंदू, मुसलमान, ईसाई, पारसी सब सदियों से रहते चले आते हैं।इधर कुछ दिनों से हिंदू-मुसलमान के एक दल में वैमनस्य हो गया है, पर इसके लिए भी वही लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने पश्चिम से प्रकाश पाया है।परोक्ष रूप से यहां भी पश्चिमी सभ्यता अपना करिश्मा दिखा रही है।… यहां बलवान होने का अर्थ है निर्बलों को, आरक्षितों को पीसकर पी जाना, इस समय समाज में निर्बल पर सबल के अत्याचार खुलकर बढ़े हुए हैं।

देखा जाए तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद, शीतयुद्ध के समानांतर दुनिया के सभी युद्ध कोई न कोई तर्क बनाकर एकतरफा रहे हैं।सबल ने निर्बल को दबाया है।इसी तरह धार्मिक मामलों में भी हृदय की विशालता या उदारवाद में कमी आती गई है।

हमें प्रेम से अधिक क्या चाहिए!

प्रेमचंद की यह चिंता सार्वकालिक है, ‘जो अपनी उन्नति चाहता है, वह दूसरे के संहार के बल पर।जो बढ़ना चाहता है, वह दूसरे को गिरा कर।’ (अशांति, 1933, वही)।विश्व में अशांति के नजारे युद्ध तक सीमित नहीं हैं, ‘विश्व में इस समय चारों ओर घोर अशांति का वातावरण फैला हुआ है।जिधर देखिए, जिसे देखिए, वह उद्विग्न है, पीड़ित है, दुखी है।वैभव और सुख के मद में डूबता-इतराता धनी भी जब अपने सुख से अघा जाता है तो … एक अजीब हवा उसके भीतर पैठकर उसे जला डालती है और वह कराहता है- न जाने उसे क्या चाहिए!…उसकी सबकुछ पाने की इच्छा ‘अहंकार’ और ‘अभिमान’ का रूप धारण कर लेती है।उसमें ‘मेरा’ और ‘मैं’ का गर्व पैदा हो जाता है।’ लगता है, प्रेमचंद यह सब आज के बारे में लिख रहे हैं।

उन्होंने गांधी के रूप में एक समाधान की ओर इशारा किया था, ‘एक कन्फ्यूसियस पैदा हो गया है और वह यरवदा जेल के भीतर बैठा हुआ है।वह कह रहा है- आपस में प्रेम करो, बस प्रेम करो।सबसे।… और कुछ कर भी तो नहीं सकते, प्रेम करने में क्या हानि है?’ प्रेम करना युद्ध के विरुद्ध युद्ध है!

प्रेमचंद पश्चिम में दो पश्चिम देखते थे- उत्कृष्ट और निकृष्ट।इसके साथ, उन्होंने कहा था-‘मैं इंग्लैंड का शत्रु नहीं हूँ।… भारत को इंग्लैंड से कोई दुश्मनी नहीं है।वह तो केवल इतना ही चाहता है कि भारत की ऐसी अवस्था न रहे कि जो भारत संतान हैं…, जो पसीना बहाकर और अपना रक्त जलाकर धन कमाते हैं, वे दाने और वस्त्र के मुहताज हों और पशुओं की भांति जिएं।’ प्रेमचंद को भारत के लोगों से गहरा प्रेम था, यही उनका देशप्रेम था।

हम प्रेमचंद के उपन्यासों में स्थानीय स्तर पर वस्तुतः एक विश्वछवि ही देखते हैं। ‘रंगभूमि’ में उद्योग के लिए जबरदस्ती जमीन लेने की समस्या औपन्यासिक केंद्र में है।गांव वाले सूरदास से सवाल करते हैं, ‘क्यों सूरे कोई विपत आने वाली है क्या?’ उस जमाने में यह साधारण सवाल न था।पश्चिम का अंध-राष्ट्रवाद भारत जैसे औपनिवेशिक देशों में उदार राष्ट्रीय भावना को प्रभावित करने लगा था।इसी का नतीजा है कि एक-दूसरे को शंका और अविश्वास से देखा जाना शुरू हो गया था।आपस में स्पर्धा और लड़ाइयां बढ़ने लगी थीं।पश्चिम की इस आक्रामक सभ्यता के जवाब में ही प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ में सूरदास को सत्य और प्रेम का प्रतीक बनाया था।उन्होंने इस चरित्र के जरिए ‘राष्ट्र’ की समावेशी और अहिंसात्मक भारतीय धारणा उपस्थित की थी।

‘रंगभूमि’ के सूरदास के पास आंखों की दृष्टि न हो, पर दूरदृष्टि थी।उसने जिस आने वाली विपदा की चर्चा की थी, वह जान सेवक के सिगरेट कारखाने तक सीमित न थी, ‘ऐसे बुरे दिन आ रहे हैं जब तुम्हें सेवा और टहल करके पेट पालना पड़ेगा।जब तुम अपने नौकर नहीं पराये नौकर हो जाओगे, तब तुममें नीति-धरम का निशान भी न रहेगा।’ क्या नहीं लगता कि आज का नव-उदारीकरण आम लोगों के लिए ऐसी ही गुलामी और मूल्यहीनता का परिदृश्य लेकर आया है? बहुराष्ट्रीय कंपनियों की श्रम संस्कृति में हर आदमी एक खाता-पीता गुलाम है!

प्रेमचंद ने एक लेख लिखा था- ‘राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता’।वे अंध-राष्ट्रीयता के विरोधी थे, राष्ट्रीयता के नहीं।राष्ट्रीयता दो तरह की होती है-बहिष्कारपरक और समावेशी।पश्चिमी देश बहिष्कारपरक राष्ट्रीयता का प्रचार कर रहे थे, जबकि प्रेमचंद ‘धार्मिक पाखंड, वर्ण-व्यवस्था और ऊंच-नीच के भेद’ से मुक्त समावेशी राष्ट्रीयता की आवाज बुलंद कर रहे थे।

सिर्फ छायावादी कवि ही विश्वमानवतावादी न थे, प्रेमचंद भी थे।इन्होंने राष्ट्रीय जागरण की जरूरत बताते हुए यह भी लिखा है, ‘इसमें संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीयता मानव संस्कृति और जीवन का बहुत ऊंचा आदर्श है और आदि से संसार के विचारकों ने इसी आदर्श का प्रतिपादन किया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ इसी आदर्श का परिचायक है।वेदांत ने एकात्मवाद का प्रचार ही तो किया।’ प्रेमचंद जिस अंतरराष्ट्रीयता की बात करते थे, वह आज के वैश्वीकरण से भिन्न थी।उनके युग की अंतरराष्ट्रीयता के केंद्र में ‘विश्वप्रेम’ था, जबकि आज के वैश्वीकरण के केंद्र में ‘मुनाफा’ है।प्रेमचंद को लगता था कि पश्चिमी शिक्षा खुदगर्जी के जो पाठ पढ़ा रही है, उनमें एक रूप अंध-राष्ट्रीयता का है।

सभी दल अपनीअपनी रक्षा करेंगे
राष्ट्र की रक्षा कौन करेगा?

प्रेमचंद को 20वीं सदी के चौथे दशक में मनुष्य और मनुष्य के बीच बढ़ती जा रही भिन्नता परेशान कर रही थी।वे आम नागरिकों के भीतर जन्म ले रही पशु बल की आकांक्षा भी लक्षित कर रहे थे।वे इससे विचलित हुए थे।यह आकांक्षा धर्म, जाति और प्रांतीयता के आधार पर उसी तर्ज पर पैदा की जा रही थी, जिस तरह इटली में मुसोलिनी और जर्मनी में हिटलर पैदा कर रहे थे।प्रेमचंद की आंखों के सामने ही हिंदुस्तान के लोगों के बीच उन दोनों का वायरस फैल रहा था।

यही वजह है कि राष्ट्रीयता के दृष्टिकोण में प्रदूषण फैलने लगा था।19वीं सदी से बड़े होते जा रहे भारतीय चित्त का फिर सिकुड़ना शुरू हो गया था।यह एक बड़ी चुनौती थी।पश्चिम के रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान की नकल 19वीं सदी से चल रही थी।कई राष्ट्रीय नेता इन चीजों के असर में थे।प्रेमचंद ने ‘अपने से नीचे दरजे के आदमियों से पृथक रहने की आदत’ का जिक्र किया है।लेकिन धार्मिक और जातीय बहुलता वाले देश भारत में राष्ट्रीयता के संकुचित दृष्टिकोण का प्रचार एक दूरगामी घटना थी।राष्ट्रीयता का संकुचित दृष्टिकोण वस्तुतः एक पश्चिमी अवधारणा है और खासकर मुसोलिनी-हिटलर की विचारधारा की देन है।

हिंदी संयुक्त प्रांत के गवर्नर मालकम हेली ने 1933 में एक भाषण दिया था, जिसका शीर्षक था-‘भारत 1983 में’! उन्होंने 50 साल बाद के भारत की कल्पना करते हुए कहा था, ‘जहां तक भारत की वर्तमान मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह (1983 में)  अपने लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा जो स्पष्ट रूप से बहुमत के प्रति जवाबदेह हो।’ प्रेमचंद ने उपर्युक्त भाषण का शीर्षक देकर हेली का उपर्युक्त कथन उद्धृत करते हुए टिप्पणी की, ‘सर मालकम हेली के विचार में भारत की परंपरा और उसकी संस्कृति प्रतिनिधि शासन के अनुकूल नहीं है।यह कथन हमें चिंता में डाल देता है।… उनका सारा जीवन भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुजरा है।’ मालकम हेली ही नहीं, चर्चिल ने भी भारत के बारे में 1946 में कहा था, ‘भारत काठ के अलग-अलग टुकड़ों का बंडल है।’ उन्होंने भारतीय राजनेताओं को बदमाश और लुटेरा कहा था।

क्या 21वीं सदी की घटनाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि अंग्रेज राजनेताओं की भविष्यवाणियां सही थीं?

कई बार लगता है कि भारत में प्रातिनिधिक जनतंत्र की विफलता ही धर्म, जाति और स्थानीयता पर आधारित सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा की जनक है।सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व निर्धारित करने के लिए सजातीयता और सदृश्यता को राजनीतिक आधार बनाया जाता है।धर्म, जाति और स्थानीयता मुख्य कसौटी बन जाते हैं।इन्हीं आधारों पर ‘फूट डालो और राज करो’ की धारणा बनती है।समुदाय-आधारित सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व हमेशा ‘हम-वे’ के वैमनस्य और तानाशाही से जुड़ा होता है।भारत के राजनेताओं में आज भी निरंकुशता की आकांक्षा बची हुई है।कई आज भी मानते हैं कि भारत में थोड़ी-बहुत तानाशाही जरूरी है।

कहना न होगा कि अंग्रेजी उपनिवेशवाद प्रातिनिधिक जनतंत्र की संभावनाओं को मिटाने के लिए पहले ही काफी जहर बो चुका था।उसका भारी असर अब स्पष्ट दिख रहा है।इसलिए भारतीय पुनर्निर्माण आज एक बड़ी चुनौती है।प्रेमचंद चिंतित होकर सवाल करते हैं, ‘सभी दल अपनी-अपनी रक्षा करेंगे, राष्ट्र की रक्षा कौन करेगा?’ उनका ‘सभी दल’ से आशय, विभिन्न धार्मिक दलों और जाति-आधारित दलों से था- नीचे पड़ रही दरारों से था।

प्रेमचंद के जमाने में एक व्यापक राष्ट्रीय प्रतिरोध खड़ा होना शुरू हो चुका था- वह नवजाग्रत ‘राष्ट्र’ की मानवता से जन्मा था।साम्राज्यवाद-विरोधी महान चेतना के उस दौर में संकुचित राष्ट्रवादियों का आंदोलन आंधी में पतंग उड़ाने के समान था।

प्रांतीयता के मुद्दे पर

प्रेमचंद ने प्रांतीयता के मुद्दे पर टिप्पणी की है, ‘इधर कुछ दिनों से फिर प्रांतीयता का भाव जोर पकड़ने लगा है।… प्रांतीयता की मनोवृत्ति राष्ट्रीय मनोवृत्ति की विरोधिनी है।वह हमारे मन में संकीर्णता का भाव उत्पन्न करती है और हमें किसी प्रश्न पर सामूहिक दृष्टि डालने के अयोग्य बना देती है।इतिहास कह रहा है कि इसी संकीर्ण मनोवृत्ति ने भारत को पराधीन बनाया।’ (नए-नए सूबों की सनक, 1932, वही) भारत में इन दिनों अंध-प्रादेशिकता में भी उभार आया है।दूसरे प्रदेश के लोगों को ‘बाहरी’ समझा जा रहा है। ‘दूसरे’ की भावना का विस्तार न जाने कहां-कहां तक है।यह सब भारत-भाव में आई बड़ी गिरावट का नतीजा है।हम अब एक ऐसे देश में हैं, जब लोग पशु-पक्षियों की तरह अपने-अपने झुंड में रहना चाहते हैं!

प्रेमचंद जिस भारतीय राष्ट्र को बनते हुए देख रहे थे, वह आज भी पूरा बना नहीं है।उनकी आंखों में ऐसे ‘राष्ट्र’ का स्वप्न था जिसमें ‘पहचानें होंगी, पर भेदभाव और पृथकतावाद नहीं होगा।अंतरराष्ट्रीयता, वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण होगा, पर लोकतंत्र भी होगा।धर्म होंगे, धार्मिक पाखंड न होंगे।प्रेमचंद को लगता था कि दुनिया के सभी राष्ट्रों और जातीयताओं में ऐसे विचारवान लोग हैं, ‘जिन्हें वर्तमान संस्कृति से तबाही के चिह्न दिख रहे हैं।वे एक स्वर से परिष्कार की और जरूरत पड़े तो शांतिमय क्रांति की जरूरत समझ रहे है।’ (विविध प्रसंग)।आज के युग में भी ऐसे विचारवान लोग हैं जिन्होंने लोकतंत्र, न्याय और स्वतंत्रता के मूल्यों को नहीं छोड़ा है।आज भी इन मूल्यों की जरूरत महसूस होना प्रेमचंद का बचा होना है।