शंभुनाथ

एक लोक वह रहा है जिसमें संदेह करने, प्रश्न करने, सृष्टि से प्रेम करने और मिल-जुलकर रहने के महान गुण थे।मेगस्थनीज (300 ईसा पूर्व) ने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि उनके समय का लोक कैसा था।राजा जिस समय कहीं युद्ध लड़ रहे होते थे, पास में कृषक अपनी जमीन पर शांतिपूर्वक खेती करते रहते थे।उनके जीवन में हस्तक्षेप न था।अब मनुष्य का हर पहलू- जीवन, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, कला-साहित्य-संस्कृति, यहां तक कि निजी जीवन भी राजनीतिक नियंत्रण में है।

लोक आज जितना असहाय और कृपा-निर्भर पहले कभी न था।यह भी एक विडंबना है कि लोग अब प्रचारित चीजों के बाहर सोच नहीं पा रहे हैं, साथ ही सस्ते मनोरंजन से घिरे हैं।इन सबका नतीजा है कि बौद्धिक सतहीपन  एक सार्वभौम सत्य बन गया है।ऊंची शिक्षाओं का कोई असर नहीं दिखता।ऐसी दशा में महान खलनायक हो जाता है और खलनायक महान।कहा जाता है कि बौने की परछाई जब लंबी हो जाती है, समझना चाहिए कि सूर्यास्त हो रहा है।

देखा जा सकता है कि आज का लोक अपने महान गुणों को भूलकर बौद्धिक स्तर पर ‘प्रिमिटिविज्म’ की गिरफ्त में है।उसके प्रति एक रोमांटिक आकर्षण पैदा कर दिया गया है।उसमें ग्लैमर भर दिया गया है, फलस्वरूप लोक को अतीत अब अधिक मोहक लगता है।वह प्रायोजित ‘प्रिमिटिविज्म’ में खो जाता है।उसके इस तरफ झुकाव का मतलब है उसका अंधविश्वासों, हिंसक अंतर्शत्रुताओें और संकीर्ण मानसिकता का शिकार होना।मन में ‘दूसरे’ के प्रति घृणा की आग सुलगते रहना।उसका आपस में बिखरे और लड़ते रहना।ऐसी स्थिति में कहीं शांति नहीं होती और देश का विकास प्रभावित होता है।

यह चिंताजनक है कि आज काफी लोग बौद्धिक जमीन पर परित्यक्त अतीत की ओर लौटते हुए, भौतिक जमीन पर अमेरिकीकरण के रास्ते पर चल रहे हैं! जिसे देखो वह धार्मिक साज-सज्जा में है, पर धर्महीन है! जिसे देखो उसने आधुनिक जीवन शैली, फास्ट फूड-ड्रेस अपना रखे हैं, पर उसकी दृष्टि में आधुनिकता नहीं है! जहां देखो, ‘राष्ट्र’ की पश्चिमी दृष्टि हावी है।

इन घटनाओं की गहरी वजहों में उतरने की जरूरत है, पर कोई माथा खटाना नहीं चाहता।कोई इतिहास से सीखना और अपने को सुधारना नहीं चाहता।पश्चिम के औपनिवेशिक विचारों की उधारी पर चलतेचलते बहुतों की अपने दिमाग से सोचने की क्षमता सुन्न हो गई है!

दरअसल लोक का सांस्कृतिक अंतर्मन एक ऐसी जगह है, जहां महान और निम्न दोनों तरह की प्रवृत्तियां हैं।उसमें राम और रावण दोनों हैं।यह एक ऐसी जगह है जहां उसकी पीड़ा है, आत्मज्ञान है, बुद्धिपरक चीजें हैं और उसकी शक्तियां हैं तो विकृत कर दी गई परंपराएं, निर्बुद्धिपरकताएं और कमजोरियां भी हैं।लोक के जीवन में उच्च परंपरा के पहिए हैं तो रोड़े भी हैं, ब्रेक है तो स्टार्टर भी है।लोकमन में कई तहें हैं।

लोक के विश्वासों में धार्मिक रूढ़ियां स्वाभाविक हैं, जिनकी आत्मीय आलोचना होनी चाहिए।लेकिन आत्मीय आलोचना और मखौल उड़ाना एक नहीं है।एलीट बुद्धिवादियों को इधर लोक बेवकूफ और बदमिजाज दिखने लगा है।वे जानना नहीं चाहते कि इन लोगों में पागलपन क्यों बढ़ रहा है।

कहना होगा, लोगों का क्षोभ दिग्भ्रमित हो सकता है।लेकिन वे गंवार, बेवकूफ और बदमिजाज नहीं हैं।वे आधुनिकता, लोकतंत्र, क्रांति, धर्मनिरपेक्षता और विमर्श की जिन छतों के नीचे थे, जब ये छतें चूने लगी हों और वे बदहाल हों तो उनका दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है।लोक जब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में विकास के पिछवाड़े फेंक दिया जाता है, लोकतंत्र की क्षयावस्था में वह चुनाव का गणित भर रह जाता है।वह जब क्रांतिकारी विचारधारा में भटकाव देखता है, धर्मनिरपेक्षता में मूल्यहीनता देखता है, विमर्शों को कुछ व्यक्तियों की ऊपर उठने की सीढ़ी बन जाते देखता है और खुद को अपने स्वप्नों की एक विध्वस्त दुनिया में पाता है तो वह निराश होता है।अंध-राष्ट्रवाद की लोकप्रियता और अतीत के जगे तमाम प्रेत इसी निराशा की देन हैं।

ऊंची शिक्षा का फिलहाल कोई असर नहीं है

प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ ग्रंथ का मूल शीर्षक है ‘पोलितेंगया’, जिसका अर्थ है राजनीतिक न्याय।आगे चलकर अनुवाद में वह सिर्फ ‘रिपब्लिक’ के रूप में जाना गया और इसी रूप में लोकप्रिय हुआ।बहुत संभव है कि राजनीतिक न्याय, रिपब्लिक, सार्वजनिक वस्तु, नागरिकों द्वारा परिचालित राज्य व्यवस्था, गणसंघ आदि 600-500 ईसा पूर्व की सार्वभौम धारणाएं हों।ग्रीक के साथ बौद्ध दर्शन का उदय उसी समय हुआ था।माना गया है, भारत में बौद्धों के गणसंघों का अस्तित्व था।गौर करने की जरूरत है कि प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ या राजनीतिक न्याय का क्षेत्र धनिकों/नागरिकों तक सीमित था।गैर-नागरिक और गुलाम राजनीतिक न्याय (रिपब्लिक) के दायरे में नहीं आते थे।स्त्रियां भी नागरिक नहीं थीं।कवि ‘रिपब्लिक’ के बाहर थे।प्लेटो ने यह जरूर कहा था, ‘अशिक्षित नागरिकों के कारण रिपब्लिक का नाश होता है’।बौद्धों के गणसंघ में भी दासों और स्त्रियों के अधिकार न थे।फिर भी कहा जा सकता है कि प्राचीन दुनिया की सीमा में ‘राजनीतिक न्याय’ की धारणा आ गई थी, ‘गणतंत्र’ की कल्पना की जाने लगी थी।

जिस तरह धर्म के संस्कार होते हैं, उसी तरह गणतंत्र के भी संस्कार होते हैं।देश में गणतंत्र की स्थापना वे ही कर सकते हैं जो खुद अपने संस्कार और आचरण में लोकतांत्रिक हैं।समस्या यह है कि यहां हर खाते-पीते आदमी के दिमाग में छोटा-मोटा फासिज्म भरा हुआ है।वह बराबरी के आचरण के बारे में सोच नहीं पाता।इसके उदाहरण दफ्तरों में मिलते हैं, संगठनों में हैं, परिवारों में हैं।

बहुतों में आज भी राजवंशों के प्रति खास आकर्षण है।उन्हें विलासितापूर्ण जीवन आकर्षित करता है।जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव और वर्चस्व के संस्कार इन 75 सालों में भी मिटे नहीं हैं।प्रांतीयता और स्थानीयता के आधार पर भेदभाव बढ़ा है।

इसके अलावा, अक्सर समृद्ध व्यक्ति साधारण वर्ग के लोगों को तुच्छ समझते हैं।व्यक्तिगत तौर पर पसंदनापसंद की भावना अलग से है।इस देश में इतनी खाइयां हैं कि परका बोध पनप नहीं पाता।७५ सालों में शिक्षा की यह एक बड़ी विफलता है कि वह देश से अपर का बोध, भिन्नता का बोध मिटा नहीं पाई।

आज ऊंची शिक्षा न्याय की चेतना पैदा नहीं कर पाती।देखा जाता है कि शिक्षित व्यक्ति भेदभाव तथा वर्चस्व को तरह-तरह से तार्किक बना लेता है।लोकतंत्र और शिक्षा का संबंध लगातार मजबूत होना चाहिए, लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय या उच्च तकनीकी संस्थान में ऊँची शिक्षा नौजवानों को ‘दूसरे’ के बोध, कुछ को ‘निम्न’ या ‘भिन्न’ समझने की मनोरुग्णता से मुक्त नहीं कर पाती।इसके अलावा, शिक्षा स्वार्थपरता की प्रवृत्ति को सींचती है।

देश के विश्वविद्यालयों के मानविकी विभाग, साहित्य के विभाग भी सामान्यतः अमानवीय जगहें हैं।आमतौर पर मानविकी विभागों में सबसे खराब और पुराने ढंग से पढ़ाई होती है, जबकि समाजविज्ञान, इतिहास, भाषा-साहित्य-दर्शन जैसे विषयों अर्थात- ‘दूसरे’ का बोध मिटाकर अच्छा मनुष्य बनाने वाले विषयों और विभागों की मानव सभ्यता के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका है।वस्तुतः इन विषयों और विभागों को, उनके विशिष्ट झुकाव/पहचान को बचाकर,  अधिकाधिक ‘इंटरैक्टिव और कंपोजिट’ रूप देने की जरूरत है।हालांकि आजकल कहा जाता है कि ऐसे विषयों के विद्यार्थियों का कोई भविष्य नहीं है।तो क्या अब मानवता का ही कोई भविष्य नहीं है?

विमर्श और महाविमर्श

यह तय करना मुश्किल है कि नवजागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को नकारने के मामले में सबाल्टर्नवादी विमर्शकारों तथा धार्मिक कट्टरवादियों में कौन आगे है।दोनों शिविर के चिंतक इस देश के विविधतापूर्ण नवजागरण तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों के समान रूप से विरोधी रहे हैं।वे राममोहन राय, विद्यासागर, रवींद्रनाथ, गांधी ही नहीं भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद-निराला-महादेवी आदि को नकारते रहे हैं।वे रोमांटिसिज्म  (छायावाद) और प्रगतिशील आंदोलन के भी विरोधी रहे हैं।

कहा जा सकता है कि सबाल्टर्नवादियों ने ‘राष्ट्र’ से संवाद और अपने अधिकारों के लिए नीचे से मिलजुलकर संघर्ष करने की जगह ‘राष्ट्र’ को खलनायक बना दिया।उन्होंने बेनडिक्ट एंडरसन के ‘राष्ट्र एक कल्पित समुदाय है’ का विकास ‘राष्ट्र’ को टुकड़ों  में देखने की धारणा में किया।कट्टरवादियों के लिए ‘राष्ट्र’ एक असीम शक्ति है तो सबाल्टर्नवादियों के लिए ‘राष्ट्र’ एक खलनायक है।दोनों के लिए  बुद्धिपरकता, कल्पनाशीलता और तर्क काम की चीजें नहीं हैं।दोनों विमर्शवादी हैं, अर्थात वे सुनते नहीं हैं, संवाद नहीं करते हैं, सिर्फ बोलते हैं।दोनों ‘मनुष्य’, ‘वर्ग’, ‘नागरिक’ या ‘लोक’ की श्रेणियां पसंद नहीं करते।ये उन सबको पसंद नहीं करते जो आधुनिकता, लोकतंत्र और समावेशी राष्ट्रीय भावना लेकर चलते हैं, मानवीय सौहार्द लेकर चलते हैं।

सबाल्टर्नवाद ने जिस दौर में वामपंथियों के सर्वहारा की जगह समुदायों की आवाजों  को रखा था, उस दौर में वर्ग का ही नहीं, ‘मनुष्य’, ‘नागरिक’ और ‘अ-पर’ का बोध भी तेजी से विघटित हो रहा था। यह भी उल्लेखनीय है कि सबाल्टर्न इतिहास कृषक को लेकर लिखा जाना शुरू हुआ, लेकिन इस मामले में वह आगे नहीं बढ़ सका।उसमें जाति का मामला ज्यादा मुखर हुआ, दलित और पिछड़ा सबसे बड़े मुद्दे हुए।सबाल्टर्नवाद को थोड़ी सफलता जेंडर और एलजीबीटी के मार्चे पर मिली।इस विडंबना पर गौर किया जा सकता है कि एक विमर्श को दूसरे विमर्श से मतलब नहीं रहा है।

सबाल्टर्नवादियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बाजारवाद की आलोचना कभी नहीं की।विमर्शों में बाजारवाद मुद्दा नहीं बना, महंगाई मुद्दा नहीं बनी।सबाल्टर्न अध्ययन में स्त्री-दलित उत्पीड़न और आक्रोश के कई दबे रूप जरूर सामने आए, लेकिन व्यवस्था में प्रतीक-निर्माण से अधिक समाधान नहीं निकल सका।कहीं दो-चार दलित ऊपर बैठ गए।कहीं दो-चार स्त्रियां ऊँची जगह पा गईं।उत्पीड़न पहले-सा चलता रहा।इधर अतिरंजनापूर्ण विमर्श सीढ़ियां बनते रहे, राष्ट्र ‘अदर्स’ से सुलगता रहा तथा साधारण लोग खंड-खंड विभाजित होते गए।उधर वैश्वीकरण का शिकंजा कसता जा रहा था-नीचे फूट और ऊपर लूट!

इसी समय लगभग सौ सालों से दबे, लेकिन सधे कदमों से यात्रा करके धार्मिक कट्टरवाद एक प्रभावशाली मामला बना।हर जगह धर्म ही धर्म दिखने लगा, जबकि कहीं धर्म नहीं था।यह नागरिक समाज के खोखला हो चुके उदारवाद के जवाब में वीरगाथात्मक राष्ट्रवाद है।यह सबाल्टर्न विमर्शों के जवाब में राष्ट्रवादी महाविमर्श है।इसका काम भी सिर्फ बोलना है, सुनना नहीं।इसका लक्ष्य भी समावेशीकरण की जगह धु्रवीकरण है, समाज को झुंडों में बदलना है।

इस पर सोचने की जरूरत है कि हमने अपनी व्यापक सांस्कृतिक विरासत की कितनी चिंता की और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को कितना निभाया? हमने संगठित सेवा, रचनात्मक कामों और बुद्धिपरक शिक्षण का कितना विस्तार किया- ग्रामों, शहरों और आदिवासियों के बीच कितना काम किया? हम आम लोक में कितना पैठे, उनके दुखों के साथ खड़ा होकर एक युग के स्वाधीनता सेनानियों की तरह कितने रचनात्मक कार्य किए।हमसे बार-बार गलतियां हुईं और फिसले।क्या एक बार भी आत्ममुग्धता की जगह आत्मनिरीक्षण को गंभीरता से चुना? हाँ, जब देखो आत्मग्लानि में मरे जा रहे हैं! आत्मग्लानि पर्याप्त नहीं है, हालांकि अब यह भी कम बची है!!

इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए कि ‘सर्वहारा’ क्यों फेल कर गया, ‘मनुष्य’ क्यों विघटित हो गया, ‘विमर्श’ क्यों निगल लिए गए, दो सौ सालों से विकसित हो रहा आधुनिक उदारवाद क्यों खोखला साबित हुआ और लोकतंत्र की मीठी हत्या क्यों होती गई, क्योंकि इन सब पर सोचे बिना मानवता की नई राह नहीं निकलेगी।

यह एक सभ्यतागत क्षति है

दरअसल वैश्वीकरण के साथ ही दुनिया के देशों में एक दूसरे छोर से अंध-राष्ट्रवादी पुनर्उन्मेष की लहरें तैयार होने लगी थीं।अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, तुर्की आदि में भी ये ही दृश्य हैं।ये लहरें 21वीं सदी के दूसरे दशक में सुनामी बन चुकी थीं 20वीं सदी के दूसरे दशक के अंध-राष्ट्रवाद से प्रेरित प्रथम विश्वयुद्ध की तरह! ठीक सौ सालों बाद।प्रथम विश्वयुद्ध में बाहर से आक्रमण होते थे।अब देश के भीतर कृत्रिम सामाजिक सरहदों पर लड़ाइयां हैं।जो इतिहास की सुरंगों में रेंग रहे थे, वे टिड्डियों की तरह वर्तमान पर छा गए हैं।दुनिया के देशों में तीन-तीन सौ, दो-दो सौ साल के त्याग और बलिदान की उपलब्धियां रेत होने लगी हैं।यह विपर्यय समाज की गहराई में प्रवेश कर गया है।विडंबना यह है कि यह सब क्यों घटित हुआ, इसे लेकर कोई विस्तृत आत्मनिरीक्षण नहीं है।

सबाल्टर्नवाद के सभी रूपों को निगलते हुए, सभी विमर्शों को रौंदते हुए और एलीटवर्गीय उदारवादी बुद्धिजीवियों को उनकी बौद्धिक गुमटियों में सीमाबद्ध करते हुए राष्ट्रवाद का महाविमर्श उभरा है।उसने तर्क की जगह भावोन्माद को प्रधान बना दिया है।यह महाविमर्श विदेशी पूंजी, तकनीकी क्रांति, मीडिया की ताकतों और लोकप्रिय नारों से सुसज्जित है।बहुरूपिया है, मायावी है।सबसे विलक्षण बात यह है कि इसके पीछे शब्द और आचरण के बीच भीषण दूरी रखने वाले नेताओं से क्षुब्ध बड़ी संख्या में लोक खड़ा है, बहुत-सी जगहों पर हुड़दंग के साथ खड़ा है।

एलीट मानसिकता से प्रभावित बुद्धिजीवी अपने ऊटपटांग बयानों के कारण किस तरह लोक से विच्छिन्न होते गए, इसका एक उदाहरण अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय हैं।गांधी को नस्लवादी कहने से लेकर कश्मीर को भारत के बाहर घोषित कर देने तक जो उच्छेदवादी बयान उन्होंने दिए, इसकी वजह से उन्होंने अपना अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव जितना बढ़ाया हो, देश के लोकतांत्रिक उद्देश्यों की क्षति की है।बूकर प्राइज से होकर नोबेल तक पहुंचने का यह रास्ता वी. एस. नायपाल दिखा चुके थे।वे भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने के लिए ज्यादातर ऐसी ही बेसिर-पैर की बातें बोलते थे।

महंगी चीजों के बीच जीते हुए स्माल थिंग्सके बारे में लिखा जा सकता है, पर वंचितों के पक्ष में खड़े होने के लिए देश को भी थोड़ाबहुत समझना होता है।देश ने गांधी को देखा है कि वे किस तरह जीते थे और अन्याय का कैसे विरोध करते थे।

बुद्धिजीवियों के भटकाव का एक उदाहरण कोलकाता की सड़क पर एक पूर्व-मेयर का दो बांग्ला लेखकों के साथ बीफ खाने का प्रदर्शन (2015) करना है, जिसका कभी अच्छा नतीजा नहीं हो सकता था।

एक तरफ उदारवाद का वैचारिक खोखलापन बढ़ता गया, दूसरी तरफ कई लेखकों और बुद्धिजीवियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सीमित कर लिया, वे उच्छेदवाद के रास्ते पर थे।वे परजीवी बौद्धिकता के शिकंजे में थे।कई ने धार्मिक दिखावे के जवाब में धार्मिक दिखावा अपनाया, पर यह अतीत के अपराधों को ढक नहीं पाया।धर्मनिरपेक्षता और भ्रष्टाचार के बीच संबंध की वजह से मूल्यों का व्यापक क्षय हुआ, आम लोगों की आर्थिक दशा बिगड़ी।उदारवाद का नेतृत्व सुखवादी एलीट वर्गों के हाथ में आ जाने की वजह से ही वस्तुतः एक बड़ी सभ्यतागत क्षति हुई।

याद करना चाहिए, पुरु की सेना को उसके अपने हाथियों ने ही रौंदा था।इस बार सफेद हाथी थे!

लोकोपकार निरंकुश सत्ता को मानवीय चेहरा देता है

अब लगता है, ‘लोकोपकार’ ही सबकुछ है।किसी जमाने में निरंकुश राजा-बादशाह सिंचाई का प्रबंध कर देते थे, पर्व-त्योहार में अन्न-वस्त्र दान करते थे और हिंसक होते हुए भी दानी कहलाते थे।हर्षवर्द्धन बौद्ध होते हुए भी युद्ध प्रेमी था।वह गौड़ों का नामोनिशान मिटाने का इरादा रखने वाला एक निरंकुश राजा था और दानी भी था।उसके पास बड़ी सैन्यशक्ति थी।ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि हर्षवर्द्धन राजकोष का एक-चौथाई दान में बांट देता था।उसने प्रयागराज में  कुंभ मेले की शुरुआत की, जिसमें वह खुलकर दान करता था।

निरंकुश राजतंत्र का एक चिह्न है अपनी लोकोपकारी छवि निर्मित करने के लिए दान करना।इसी तरह निरंकुश कारपोरेट अर्थतंत्र भी अपने ‘मानवीय चेहरा’ के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रदर्शन करता है।वह सरकार के कोषों में दान करता है।आजकल सरकारें शक्तिशाली कारपोरेट कंपनियों से बड़ी आशा रखती हैं।कारपोरेट महारथी दान और समाज सेवा करते हुए अपने ब्रांड का प्रचार करते हैं।वे इस रास्ते से अपनी सुरक्षा पंक्ति बनाते हैं और पर्यावरण-विनाश की अपनी योजना पर पर्दा डालते रहते हैं।

बिल गेट्स ने 2010 में बिहार के खगरिया जिला के गुलेरिया गांव को गोद लिया था।वे महादलितों के इस अभावग्रस्त इलाके में अमेरिका से चलकर आए थे।इस तरह के लोकोपकार प्रतीकात्मक और प्रचारप्रधान होते हैं।ये सत्ता, विदेशी पूंजी और आभिजात्य को मानवीय चेहरा देते हैं।

निर्मम इतिहास ने एक जमाने के ‘अधिकार’ को अब ‘खैरात’ में बदल दिया है।लोक की महान आकांक्षाओं को इन दिनों दो रुपए किलो चावल, सौ दिनों की रोजगार गारंटी, मिड-डे मील, कभी साइकिल, कभी टैब, कहीं-कहीं लैपटॉप, भूख से मरने से बचाने के लिए शहर में लंगर, कभी किताबें-कंबल-चश्मा, कभी कुछ सौ-हजार मासिक की राहत में सीमित कर दिया गया है।हजारों साल के इतिहास में लोक कभी इतनी कम इच्छाओं के साथ नहीं जी रहा था, इतना बिखरा तथा विवश न था।

देश में विषमता तेज गति से बढ़ी है, इसके साथ अशांति भी।आजकल लाखों करोड़ का वित्तीय पूंजी-निवेश दिखाया जाता है और बड़े उद्योगपतियों के ‘बिजनेस मीट’ होते हैं।लेकिन सिर्फ दो चीजें बढ़ती हैं-मुनाफाखोरी और बेरोजगारी।तेजी से हो रही तकनीकी प्रगति रोजगार देती कम है, छीनती ज्यादा है।इसकी क्षतिपूर्ति खैरात में कुछ बांटकर लोकोपकार से होती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों और व्यापारियों की नजर में दुनिया में बढ़ती जा रही अशांति, नस्लीय और सांप्रदायिक हिंसा या रूढ़िवादी संरक्षणशीलता नुकसानदेह मामले हैं।ये आर्थिक विकास में अवरोधक हैं।ये प्रेम, भाईचारा और उदात्त सांस्कृतिक परिदृश्य को ही नहीं उजाड़ते, व्यापारिक मुनाफे के भी स्पीड ब्रेकर हैं।हिंसक माहौल में बहुराष्ट्रीय निेवेश आखिरकार कितना होगा? कहना न होगा कि आर्थिक मंदी में एक बड़ा योगदान राजनीतिक अशांति का है।फिर भी बड़े व्यापारी विद्वेष और हिंसा के माहौल पर आमतौर पर चुप दर्शक होते हैं।

सबसे बड़ी चुनौती प्रचारितका सामना करने की है

एक सचाई यह है कि इस समय कोई मामला बाजार से बाहर नहीं है, कुछ भी प्रबंधन  के बाहर नहीं है और यह कितनी भयानक बात है! निश्चय ही जो ‘है’, सिर्फ उसके अधीन रहना दासता है।इसलिए हर जमाने में स्वप्नों की जरूरत होती है, हर युग में कल्पनाशीलता  की रक्षा की जानी चाहिए।आदमी बाजार के प्रलोभन में आता है, यह बाजार की ताकत है।लेकिन यह मनुष्य की ताकत है कि वह बाजार में ‘प्रलुब्धकारी’ और ‘जरूरी’ में कितना विवेकपूर्ण भेद कर पाता है, छद्म को कितना पहचानता है और अपनी निजी कल्पनाशीलता को कितना बचाकर रखता है।

देखा जा सकता है कि ज्ञान अब प्रबंधन का विषय है।अब मूर्खतापूर्ण विचारों को भी ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है।यह काम टीवी, सोशल मीडिया, आईटी सेल और पेशेवर विशेषज्ञ बड़े पैमाने पर कर रहे हैं।इन्हें ‘विद्वेष उद्योग’ से भारी कमाई हो रही है।आजकल टीवी के एंकर या विशेषज्ञ आईपीएल के खिलाड़ियों की तरह बिकते हैं।ये ही आजकल लोकतंत्र के निर्माता हैं।इनमें ताड़ को तिल और तिल को ताड़ बनाने की क्षमता है।अब जल्दी ही बड़े पैमाने पर कृत्रिम मेधा और रोबोट भी बाजार में आ जाएंगे।तथ्यों में झूठ की मिलावट तेज हो जाएगी और सत्य जानना कठिनतर होगा।आज हर तरफ एक ही मांग है, छवि प्रबंधक बनो या हट जाओ!

ऐसे माहौल में आखिरकार किसी भी व्यक्ति में मानवीय विवेक कितना बचा रह सकता है, कोई दिमाग कैसे लोकतांत्रिक हो पाएगा? लोग अक्सर निर्मित सूचनाओं, उत्तेजक नारों और विद्वेष के प्रचार से घिरे रहकर सिर्फ अपने सामुदायिक अधिकार के लिए लड़ते हैं।वे ‘दूसरों’ के अधिकार के बारे में चुप रहते हैं।वस्तुतः आज ‘प्रचारित’ वैसे ही बड़ी चुनौती है, जिस तरह सौ-दो सौ साल पहले ‘प्रचलित’ बड़ी चुनौती थी।

आजकल कृत्रिम प्रचार की वजह से आम लोग टापूमानसिकता में जी रहे हैं! एक तरफ लोकोपकार और दूसरी तरफ विद्वता के वेश में अज्ञानता का भारी प्रचार, जनचेतना को दबाने के ये दो बड़े औजार हैं।

मिथ्या प्रचार अपनी ताकत से लोगों की तर्कशक्ति, संवेदना और कल्पनाशीलता पर ताला जड़ देते हैं।उनकी ‘भेद में अभेद’ की  दृष्टि मंद पड़ जाती है।यह करना कल्पना-शून्यता और विकल्पहीनता के दौर में आसान है।ऐसी स्थितियों में मानवता की बात करते हुए अमानवीय बने रहने, लोकतंत्र की बात करते हुए लोकतंत्र के संस्कारों से दूर होते जाने और देशप्रेम की बात करते हुए सिर्फ अपनी क्षमता से प्रेम करने के ही दृश्य होते हैं।

आजकल अखबार के पूरे-पूरे पृष्ठ पर या टीवी के पर्दे पर कैंसर फैलाने वाले पान मसाले के विज्ञापन आते हैं।इनकी ताकत देखिए, फिर सोचिए कि खबर के इन व्यापारियों को लोकहित और मुनाफे में किसकी ज्यादा चिंता है।

देखा जा सकता है कि हर तरफ ज्ञान विस्थापित हुआ है, इसकी जगह चालाकी ने ले ली है, चालाकीपूर्ण प्रचार ने ले ली है।इसका नतीजा है कि संवेदना की जगह हिंसा है।समाज की चिंता की जगह व्यक्तिगत चाटुकारिता है।पता नहीं प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ से ग्रीक कवि होमर कितना बाहर था, पर आज के गणतंत्र से कवि और हर कल्पनाशील मनुष्य बाहर होता जा रहा है।

मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखा था, ‘कभी-कभी ऐसा भी होता है, मन अपने को भून कर खाता है।’ ज्ञानार्जन अपनी आत्मा को भूनने जैसा ही मामला है।यह ज्ञान है, जो कल्पना के बंद द्वार खोलता है और ‘अ-पर’ के लिए स्पेस बनाता है।लेकिन आजकल ज्ञान  ‘इंस्टैंट मैगी’ जैसा मामला है।मनुष्य की कल्पनाशीलता वस्तुतः ‘प्रचारित’ के समुद्र में डूब रही है।

लोक की जगह समुदाय और उपभोक्ता नहीं ले सकता

हमारा देश, हमारी सभ्यता एक दुखद मोड़ पर है।वह आत्महारा है, उसकी आत्मा को  सदियों से विकृत किया जा रहा है।इसी का नतीजा है कि हर आदमी ही ‘हम’ के बाहर एक न एक ‘वे’ में खड़ा कर दिया गया है।ऐसी स्थितियों में ‘हम’ को बड़ा बनाना, इसका विवेकशील भारतीय पुनर्गठन जरूरी है।

दरअसल हर शब्द का एक अर्थ गौरव है।खासकर लोक, नागरिक समाज, बुद्धिजीवी, धर्म, इतिहास, साहित्य, संस्कृति, लोकतंत्र, न्याय जैसे हर शब्द का एक मतलब है।ऐसे हर शब्द का एक इतिहास है।हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे शब्दों के अर्थ गौरव की वापसी कैसे हो।शब्द ही हैं हमारे जीवन की मिट्टी, हमारे पैर खड़ा करने की धरती, हमारी आंखों की ज्योति।वर्तमान ध्वंसों पर खड़ा होकर भी शब्दों की पुनर्रचना करनी होगी।यह शक्ति लोक में है और यह छिपी हुई है।

लोक, मनुष्य और नागरिक की धारणाओं का अंत करना संभव नहीं है।लोग देर-सबेर संदेह करते हैं, गरजते हैं।वे ‘भेद में अभेद’ लाते हुए अपनी उदात्त सांस्कृतिक विरासत को विनम्रतापूर्वक बचाना चाहते हैं।वस्तुतः लोक धर्म, मनुष्य धर्म और नागरिक धर्म बड़े महत्वपूर्ण हैं।ये एक दूसरे से जुड़े हैं।इन पर चलते हुए ‘अ-पर’ बनता है और अखंड देश बनता है।अंतिम रूप से लोगों का आत्मसंकुचन या सामाजिक संकुचन  संभव नहीं है, जब तक कलाएं हैं, साहित्य है और भारत की उत्थानशील सांस्कृतिक जड़ें हैं।लोक, मनुष्य और नागरिक धर्म की बातें- सामान्यीकरण की बातें धार्मिक कट्टरवाद, सबाल्टर्न सिद्धांत और विमर्शों के बावजूद निरर्थक नहीं हुई हैं।

ये प्रेम, स्वतंत्रता और शांति के लिए आम लोगों के दीर्घ संघर्षों से जन्मी चीजें हैं।वर्तमान जहरीले परिवेश में भी उनका अंत संभव नहीं है, अगर अतीत में इनका कभी अंत नहीं किया जा सका।

लोक, मनुष्य या नागरिक की जगह अंततः न समुदाय ले सकता है और न हमेशा बाजार की चीजों के पीछे दौड़ने वाला उपभोक्ता ले सकता है।लोक संदेह करने, सपने देखने और बोलने की अपनी प्राकृतिक शक्ति के कारण हमेशा बचा रहेगा।संकीर्णताओं से ऊपर उठे हुए लोक, मनुष्य या नागरिक में ही गणतंत्र लाने की शक्ति है।कहना न होगा कि आज भी लोक के भीतर घुमड़ते बादलों-सा पानी है और बिजलियां हैं।पहाड़-सी ऊंचाई और नदी-सा प्रवाह है। ‘कोई दूसरा नहीं है’, यह भारतीयता का प्राणाधार है।इस धारणा को कोई मिटा नहीं पाएगा।लोक, मनुष्य या नागरिक मरजीवा है, फीनिक्स चिड़िया की तरह है-अपनी राख से फिर जन्म ले लेने वाला और इंद्रधनुष की तरह है!