रविशंकर सिंह, रानीगंज : ‘वागर्थ’ का अप्रैल 2025 अंक। कथाकार महावीर राजी ने ‘स्त्रियां कभी बीमार नहीं पड़तीं’ कहानी में अमानवीय पुरुषवादी मानसिकता को दर्शाया है। हालांकि ऐसी पुरुष मानसिकता वाले लोग समाज में विरले हैं , लेकिन उनके होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

कुलदीप सिंह भाटी की कविताएं अच्छी लगीं।  एक विश्व प्रसिद्ध वास्तविक घटना पर गोविंद भारद्वाज की लघुकथा ‘आत्मग्लानि’ पढ़ी जिसमें उन्होंने गिद्ध की जगह बाज का उल्लेख किया है। यह एक सच्ची घटना की प्रस्तुति  है।

1994 में केविन को ‘गिद्ध और लड़की’ शीर्षक फोटो के लिए विश्व विख्यात पुलित्जर पुरस्कार मिला था। इस फोटो ने दुनिया को हिलाकर रख दिया था और अफ्रीका में भुखमरी का खुलासा कर दिया था, हालांकि इस फोटो की खूब आलोचना भी हुई थी। लोगों ने फोटो ग्राफर को दूसरा गिद्ध कहा था।

कुलदीप सिंह भाटी, जोधपुर : ‘वागर्थ’ के अप्रैल अंक में अनुरोध शर्मा की कहानी ‘राजा ननकू, रानी गनी और आदमखोर’ उम्दा कहानी है। शिल्प, कहने का तरीका विशेष व अलग है, बिल्कुल सरल व भाषाई बोझिलता से रहित। प्रकृति के प्रति प्रेम, छल/कपट, ओछी राजनीति, स्वार्थ लोलुपता, ग्रामीण किसानों की सरलता व भोलापन और इन सबके साथ ननकू और गनी के प्रेमिल पलों का बाकमाल कहन। बहुत रंग है कहानी में।

इसकी रुमानियत में जितनी सिहरन है उतनी ही जंगल के उजड़ने में भी। सिक्के के दोनों पहलुओं पर ग़ज़ब की पकड़। बहुत बेहतरीन कहानी जो देर तक आपके भीतर गूंजती रहती है, बिलकुल ननकू की बांसुरी की तरह।

शीशपाल सिंह : बरसों बाद ‘वागर्थ’ के अप्रैल 2025 अंक में अनुरोध शर्मा की कहानी ‘राजा ननकू, रानी गनी और आदमखोर’ पढ़ी। वैसे तो मैं फेसबुक पर कई पोस्ट पढ़ चुका हूँ लेकिन कहानियों में, जबसे स्मार्टफोन हाथ में आया, रुचि खत्म हो गई है। रुचि खत्म होने का मुख्य कारण मानसिक स्थिति में आया परिवर्तन है जो बढ़ती उमर और स्मार्ट फोन की दुनिया से आया है। आज सोच में गहराई कम, बेचैनी ज्यादा हो गई है। दशकों बाद आज एक कहानी को लगातार पढ़ता गया। कहानी बहुत अलग नहीं थी, लेकिन कहानी का बयान और संदेश बहुत प्यारा था। कहानी का अंत बिलकुल वास्तविक जिंदगी की सचाइयों के अनुरूप रहा। कहानी के मुख्य पात्र भले ही आज के परिवेश के अनुसार नहीं थे, मगर कहानी का मूल सार आज की परिस्थितियों और व्यवस्था के गंदे रूप से रूबरू कराता है।

भगत सिंह सोनी : ‘वागर्थ’ के अप्रैल अंक में प्रदीप जिलवाने ने अपने आलेख में समकालीन कविता पर सार्थक चर्चा की है, और बहुतेरे प्रश्नों का सटीक उत्तर भी दिया है।

अमृता गिरीश : वागर्थ के मई 2025 अंक में शोभनाथ शुक्ल की कहानी पढ़ी। धार्मिक आडंबर पर प्रहार करती हुई, मीडिया की सच्चाई बताती हुई मारक कहानी है। धर्म कोई भी हो, वह स्त्री को उपभोग की वस्तु मानकर अपने हिसाब से चलाना चाहता है।