चर्चित कवयित्री और कथाकार।दो कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित।कविताओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

यह अभिनंदन युग है

वे लोग तानाशाह का करते हैं अभिनंदन
वे कहते हैं कि तानाशाह ने ही बचाया है लोकतंत्र
अपने तानाशाही रवैये से
वे कहते हैं कि न होता तानाशाह
तो नहीं समझ आ पाते हमें मायने लोकतंत्र के
वे कहते हैं और एक साथ चारों ओर से
गूंजने लगती हैं समर्थन की आवाजें
वे करते हैं तानाशाह का स्वागत
और खाते हैं कसमें
कि निरंकुशता को बनाए और बचाए रखने में
वे झोंक देंगे अपनी पूरी ताकत
वे तानाशाह को पहनाते हैं हार, भरी सभा में
वे माइक पर खड़े होते हैं
गुणगान करने तानाशाह के निर्णयों का
ऐसा करते हुए उन्हें धोखा नहीं देती उनकी आवाज
नहीं लड़खड़ाती उनकी जबान
वे हर गलत को साबित करते जाते हैं सही
इसी उत्साह में हाथ उठाकर
लेने लगते हैं शपथ कि
वे इस पूरी व्यवस्था को यथावत बनाए रखने में
जुटा देंगे अपनी पूरी ऊर्जा
तानाशाह को बीच सभा में पहनाई जाती हैं मालाएं
वह सिर झुका जनता के इस अभिनंदन को
स्वीकार कर लेता है सादर
और प्रण लेता है कि
जब तक रहेगी उसकी सांस में सांस
वह डिगने नहीं देगा उसे रत्तीभर
तानाशाह अपने अभिनंदन के प्रति नतमस्तक हो
उठाता है एक और ईंट
इस लोकतंत्र की इमारत के लिए
और वे हाजिर कर देते हैं अनगिनत सिर
नींव में दफन करने के लिए
इस तरह मजबूत होती जाती है
लोकतंत्र की इमारत
जिसकी कब्र में न जाने कितनी सिसकियां दफन हैं।

स्वप्न पुरुष

एक अदद मुकम्मल स्त्री
तलाशती रही है अपने स्वप्न पुरुष को सदियों से
वह तलाश रही है अपने लिए एक ऐसा साथी
जो समुद्र के पानी-सा असीम हो
एक ऐसा पुरुष
जो नदी के जल-सा ठहरा हो
अपने ही तटबंधों में
जिसमें हो तारों भरे आसमान के बावजूद
झुककर सबकुछ लुटाने की सलाहियत
एक ऐसा पुरुष जो अपने पुरुष होने के एहसास को
छोड़ आए दरवाजे से बाहर
और फिर प्रवेश करे एक स्त्री में
तुम जो मेरे जन्मों की तलाश हो, मिले मुझे आज
कुछेक पलों के लिए मेरे स्वप्न में ही
और मैं नींद को सीने से लगाए सोती रही
मेरे उस स्वप्न में तुम थे, मुझे बांहों में थामे
और अपने होंठों को मेरे कानों से सटाए
और हम दोनों शायद किसी समाधि में थे
एक-दूसरे के होने के एहसास को जीते हुए
तुम बुदबुदा रहे थे क़ुरान की आयतें
या कोई गीत नया
तुम गुनगुना रहे थे कोई धुन
या कोई नज्म मुलायम, नहीं जानती मैं
लेकिन उस पल तुम मुझे वैसे ही लगे
जैसा होना चाहिए एक पुरुष को
संपूर्णत्व से परिपूर्ण और लदी शाख-सा झुका
तुम कोई सूफी लगे मुझे उस पल
जिसकी बांहों में कोई स्त्री नहीं
बल्कि उसका खुदा हो
जिसकी इबादत में झुका हो उसका सिर
तुममें पुरुषों की तय परिभाषाओं का
कुछ भी नहीं था
कुछ भी नहीं
तुम उस वक्त सचमुच एक ऐसे पुरुष थे
जिसका ख्वाब देखती है एक संपूर्ण स्त्री
और जिससे मिलती है
वह केवल अपने स्वप्न में ही।

वह अपने मर चुके सपनों का मर्सिया पढ़ रही है

वह एक लड़की थी सपनों से भरी आंखें लिए
उसने देखे थे ढेरों सपने
अपने बेरंग घर की दीवारों से सटकर
वह अकसर ख्वाब देखती थी कि
उसकी बांहों के दोनों ओर
उग आए हैं रंग-बिरंगे पंख
और वह उड़ सकती है ऊंची उड़ान
उसने अपनी इन उड़ानों में दोस्ती भी कर ली थी
न जाने कितने पंछियों से
उसने हाथ फैलाकर उड़ने की कोशिश भी की
इस धोखे से कई बार चोट भी खाई
पर वह रोई नहीं
अपने घावों और जख्मों को
सपनीली आंखों की मुस्कराहट से चूम लिया उसने
उसे बताया गया कि एक दिन आएगा
इन्हीं सपनों की गलियों से गुजरकर
सपनों का एक राजकुमार
सफेद घोड़े पर सवार
उसकी आंखों में होंगे कई रंग
और उठा ले जाएगा वह उसे
उसी सफेद घोड़े पर बैठाकर
उस पल वह सचमुच उड़ने लगेगी
खुले आसमान में
वह लड़की अब हर पल करने लगी
उस सपनीले राजकुमार के आने का इंतजार
वह जान गई थी कि वही है वह राजकुमार
जिसके पास हैं उसके पंख
वह अब सपने देखने की जगह
ब्याहे जाने का करने लगी इंतजार
सचमुच आया था राजकुमार उसके दरवाजे
सफेद घोड़े पर होकर सवार
उसने च्यूंटी काटकर देखा था खुद को
सपना नहीं था यह
सचमुच का राजकुमार था सफेद घोड़े पर सवार
जिस दिन से ब्याह कर आई वह
अपने राजकुमार के साथ
ठीक उसी दिन से इंतजार करती रही वह
अपनी बांहों में पंखों के उगने का
वह आसमान में उड़ रहे पंछियों के संग
छूना चाहती थी क्षितिज को
उसने प्रश्नाकुल आंखों से देखा कई बार
अपने राजकुमार को
पर दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं आया
ब्याह के इतने बरसों के बाद
धीरे-धीरे उसने छोड़ दिया सपने देखना
और यह भी कि उड़ सकेगी वह कभी
नीले खुले आसमान में उन्मुक्त
अब उसकी जिंदगी रोज
एक स्वप्न को दफनाने का सिलसिला बन गई है
वह अपनी उदास आंखों में
कहीं खोई सी
अपने मर चुके सपनों का मर्सिया पढ़ रही है।

उसके अधूरे सवाल लटके हैं ब्रह्मांड में

वह शुरू से जिज्ञासु प्रवृत्ति की थी
वह परियों की कहानी सुनते वक्त
उनका पता पूछती थी
वह कहानियों में आने वाले भूत-पिशाच के
भूत बन जाने का कारण पूछती
वह पूछती कि क्यों नहीं आती
चांद में रहने वाली बूढ़ी नानी उनके घर
पूछती वह कि कहां जाता है वह सूत
जो बूढ़ी नानी बुन रही है सदियों से
वह पूछती कि डायन के घूर लेने से ही
कैसे राख बन जाती है थाली में रखी खीर-पूड़ी
वह थोड़ी बड़ी हुई तो पूछने लगी कि
भाई क्यों नहीं उठाता जूठे बर्तन खाना खाने के बाद
क्यों नहीं घिसता वह भी बर्तन चौरे पर बैठकर
उसने पूछा बाबा से कि
क्यों नहीं पहन सकती वह फ्रॉक
वह जानना चाहती थी कि क्या अंतर है
भैया की और उसकी टांगों में
वह अपनी देह में हो रहे परिवर्तनों के लिए
उत्सुक रही बहुत
उघाड़ कर देखती वह अपना दुपट्टा
अपने सीने के उभार को
वह भी उन्मुक्त हो साइकिल चला
हवा से बातें करना चाहती थी
जिसमें लहराता रहे उसका दुपट्टा हवा में
लेकिन रोक दिया उसे उसके ही छोटे भाई ने
उसे दसवीं के बाद
शहर जाकर स्कूल पढ़ने की इजाजत न थी
उसने पूछा मां से कि
क्यों हर व्रत और कथा में
स्त्रियों को ही मिलता रहा दंड
पूछा उसने मां से कि
क्यों रखती है वह जितिया
केवल भाइयों के लिए
क्या नहीं हुई थी उसे खुशी उसके जन्म की
क्या नहीं चाहती कि वह भी जिए लंबी उम्र
पूछा उसने
मां की तरह पिता क्यों नहीं रहते निर्जला
मां की लंबी उम्र के लिए
पूछा उसने
पुरुषों के बालों में क्यों नहीं होती लंबी मांग
जिसका रास्ता स्वर्ग के द्वार से जुड़ता हो
वह पूछती रही सवाल बरसों से
लेकिन नहीं आया कोई जवाब ऐसा
जो संतुष्ट कर पाता उसे
और एक दिन ब्याह दिया गया उसे
उसकी इच्छा के बिना
उसने फिर सवाल पूछा
लेकिन मां के पास नहीं था जवाब
विदा हो गई वह उस घर, उस द्वार से
सदा के लिए
जिसे लीपती आ रही थी
न जाने कितने बरसों से
वह बंध गई गृहस्थी की चक्की से
और खींचने लगी कोल्हू
अपने कंधों पर
अब उसके जे़हन में सवाल नहीं आते
अब तो वह घूम रही है गोल-गोल ऐसे जैसे
चलते-चलते लांघ जाएगी पृथ्वी को
लेकिन वह इस सबसे बेखबर नहीं जानती कि
उसके अधूरे सवाल टंगे हैं ब्रह्मांड में आज भी
अपने जवाबों के इंतजार में।

हदे निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है
(शहरयार से साभार)

फरवरी का बीतता महीना
खिड़की के परदों को चीरकर
सर्दियों की गुनगुनी धूप
मेरे चेहरे पर आकर थम जा रही है
शायद बाहर पंछी धूप में अपने डैने पसारे
रात घिरने से पहले
जुटा रहे होंगे जिंदा रहने के लिए जरूरी सांसें
और मैं बैठी हूँ
अपने कमरे में छत को ताकती एकटक
उठाकर देखती हूँ दफ्तर के कामों की फेहरिस्त
अपनी ही पीठ थपथपाने का मन करता है
कि निपटा दिए न जाने कितने काम
अपनी जरूरत और क्षमता से कहीं अधिक
जेहन में टटोलने लगती हूँ
मनपसंद फिल्मों की फेहरिस्त
अपने बच्चों की नजर में कैसी मां हूँ
यह महसूस कर भी गुरूर होता है खुद पर कि
उन्होंने कम या अधूरा नहीं पाया मुझे
जब भी चाहा
अपने जीवनसाथी के साथ भी थी मैं
पूरी शिद्दत से
फिर भी
भीतर ही भीतर कुछ बेहद अधूरा-सा लगता है
कुछ है जो कचोटता रहता है दिनभर
हर वक्त कहीं से मुझे ताकता हुआ और मुझपर ज्यों हँसता हुआ
मैं पूछती हूँ क्या है वह, कौन है वह
जो पुकारता है मुझे कहीं गहरे अंधेरे से
हर दिन उसकी आवाज
और नुकीली-सी हो जाती है
जो टीसती रहती है हर पल मेरी रूह को
शायद वे अनजाने-अनदेखे रास्ते पुकारते हैं मुझे
जिनकी कोई मंजिल नहीं होती
या पुकारता है सायं-सायं
गूंजते सन्नाटे से बाहर बजता शोर
जो मुझे खींच निकालना चाहता है लगातार
सम पर बजते, बजते चले जाते नीरस संगीत से
मेरी रूह खिंचती है उसकी ओर
और देह है कि जैसे जम-सी गई है
जैसे हौसला ही न रहा हो मुझमें
अपने भीतर उठ रहे तूफान से आंख मिलाने का
मैं भाग जाना चाहती हूँ हर पल, हर वक्त
एक ही दिशा में उठते कदमों से सने रास्तों से
मैं भाग जाना चाहती हूँ
एक ही धुन में हिलती गर्दनों की गहरी सड़ांध से
मैं चिल्लाना चाहती हूँ
अपने भीतर उठ रहे शोर के साथ सुर मिलाकर
मैं दुनिया भर की नियमावलियों को
झकझोर देना चाहती हूँ एकबारगी
और सबकुछ गड्डमड्ड कर
ठहाका लगाना चाहती हूँ जोर से
मैं जी भर चिल्लाना चाहती हूँ
मैं जोर से हँसना चाहती हूँ इस पल
और हँसते-हँसते रो देना चाहती हूँ मन भर
मैं अपनी पूरी ताकत से
कहना चाहती हूँ गलत को गलत
और सही के पक्ष में
खड़ी होना चाहती हूं बेखौफ
मैं अपने हिस्से के कामों को
रख देना चाहती हूँ कुछ दिन के लिए
बादलों की चादर पर
और लपेटकर फेंक देना चाहती हूँ
किसी और दिशा में
मैं इन कामों से जरूरी
और कई काम करना चाहती हूँ
जो गवाह हों
मेरे हांड़-मांस और धड़कते दिल के
मुझे चिल्लाना है जोर-जोर से
और खूबसूरत रंगों से सजे-धजे चित्रों को
बिगाड़ देना है
अपने दोनों हाथों से जी भर
कि नहीं मानना वह सब जो कह दिया गया
कि नहीं समझना वही सब
जो समझाया जा रहा है हमें लगातार
मुझे चुप्पियों के खिलाफ
आवाजों के पक्ष में खड़े होकर
दर्ज करनी है अपनी उपस्थिति
मुझे बचना है उस अपराधबोध से
जो इस सुरक्षित चुप्पी के एवज में
लदता जा रहा है मेरी पीठ पर
शिमला के मालरोड पर
बोझा ढोते मजदूरों की पीठ की तरह
घायल है मेरी पीठ और मेरी आत्मा भी
और चेहरा है कि लगातार मुस्करा रहा है
मेरे चेहरे की मुस्कान ने
विद्रोह छेड़ रखा है मेरी आंखों से
कि जब मुस्कराता है चेहरा
तो उदास रहती हैं आंखें
और जब बोलती हैं आंखें
तो होंठ गहरी चुप्पी साध लेते हैं
यह कैसी उदासीनता है जिसने
काले कंबल की तरह ढंक लिया है
मेरे पूरे अस्तित्व को
यह कैसी बेबसी है कि
गर्दन हिलती ही नहीं
किसी अन्य दिशा में चाहकर भी
मैं अपने भीतर के मनुष्य को
मशीन में
तब्दील हो जाने की प्रक्रिया के पूरे हो जाने से
ठीक पहले रोक लेना चाहती हूँ।

संपर्क :अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यापीठ, इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली110068, मो.9871819666