वरिष्ठ कथाकार।आठ कथा संग्रह, पांच उपन्यास, एक कविता संग्रह प्रकाशित।हिंदी के अतिरिक्त डोगरी में भी लेखन।

रतिराम शाह की आवाज सुनकर चौंक गया हरिया अहीर।सुबह-सुबह दरवाजे पर उल्लू बोल गया।जाने क्या होगा।हड़बड़ाया हुआ हरिया हाथ बांध कर बाहर निकल आया और खुशामदी अंदाज में आंखें मिचमिचा कर बोला, ‘किसी से कहकर बुलवा लिया होता मालिक।खुद क्यों तकलीफ की?’

‘इधर से गुजर रहा था तो देखा कि तेरा तो छप्पर ही उधड़ गया है।बरसात कैसे झेलेगा?’

रतिराम शाह ने हाथ में पकड़ी हुई छड़ी छप्पर की उधेड़ में घुसा दी।हरिया अहीर की रूह कांप गई।कंबख्त ने अगर छड़ी को दाएं-बाएं या ऊपर-नीचे घुमा दिया तो छप्पर पूरा ही उधड़ जाएगा।सुराख हुआ तो हवा-पानी रोके नहीं रुकने वाले।

‘कोई बात नहीं हुजूर, जुगाड़ बिठा कर ठीक करा लूंगा।’ हरिया अहीर ने लिजलिजी आवाज में कहा।

‘जुगाड़ कै दिन चलेगा भला।नया छप्पर डलवा ले।’ रतिराम शाह ने कहा तो हरिया झींक गया।साला सलाह देने चला आया।पैसे कौन देगा, तेरा बाप।पर हाथ बांधे-बांधे ही बोला, ‘जेब में धेला नहीं मालिक! छप्पर कहां से डलवाऊं।’

‘पैसा भी हो जाएगा।हवेली आएगा तो ले लेना।’ कहने के साथ ही रतिराम शाह चल पड़ा तो हरिया अहीर भौंचक्का सा खड़ा हुआ देखता ही रह गया।पूछना तो चाहता था कि यह दरियादिली किसलिए, पर मुंह से बोल ही नहीं फूटे।

रतिराम जैसा कमीना साहूकार जो रुपये पर आठ आने ब्याज वसूले और वह भी चमड़ी उतार कर, वही रतिराम हरिया जैसे खानदानी कंगाल को पैसे देने की बात कहे, यह पहेली बूझ नहीं पाया हरिया।

हरिया अहीर रतिराम शाह की हवेली में पानी भरने का काम करता था।गांव में नल थे पर उनमें पानी नहीं था।नल आए तो कुएं उपेक्षित हुए।फिर न नल रहे न कुएं।अब डेढ़ किलोमीटर की ढाल ढल कर पानी लाना पड़ता और यही हरिया अहीर की रोजी भी थी।

हरिया अहीर के छप्पर की मरम्मत हुई तो हरिया को रतिराम शाह छलछलाया हुआ कुआं दिखलाई देने लगा।वाह रे कुदरत, सूखे कुएं में पानी उतर आया है।जिस कुएं को सूखा समझ कर कभी रस्सी नहीं डाली उसी कुएं के पानी की छलछलाहट ने हरिया को भिगो दिया।हरिया अब चिरौरी पर उतर आया।जब भी खाली होता, रामभक्त हनुमान की तरह रतिराम शाह के चरणों में जा बैठता।रतिराम आवाज किसी और को लगाता और दौड़ा हुआ हरिया अहीर पहुंच जाता।

‘तू जानता है हरिया कि जीवन में सबसे मूल्यवान क्या होता है?’ एक दिन जब हरिया रतिराम के तलुए सहला रहा था- रतिराम ने पूछा।

‘मैं निपट गंवार मालिक, मैं क्या जानूं।’ हरिया जितना मूर्ख दिख सकता था- बन गया।

‘सबसे मूल्यवान होता है आदमी का ईमान।ईमान चला गया तो समझो आदमी केंचुआ हो गया।फिर क्या जिया क्या मरा।’ रतिराम शाह ने किसी औघड़ ज्ञानी की तरह आंखें मूंद कर कहा और आराम कुर्सी से पीठ टिका दी।

‘वाजिब बात हुजूर।’ हरिया ने समर्थन में गरदन को कई झटके दिए।

‘कल झब्बालाल की दुकान से कुर्ते पायजामें का कपड़ा उठा लेना।मैं कह दूंगा।इस्लाम को भी कह दूंगा- सिल देगा।’ आंखें मूंदे-मूंदे ही रतिराम शाह ने कहा।

‘किसके लिए मालिक!’ हरिया असमंजस में बोला।

‘तेरे लिए मूरख और किसके लिए।जरा अपने कपड़ों की हालत तो देख और कै दिन टाकियां लगा कर चलाएगा।’

रतिराम शाह ने झिड़का तो हरिया अहीर जैसे चाशनी में डूब गया।कुएं में उतरी हुईं बाल्टी में मीठा पानी भर रहा था।हरिया की उम्मीदें परवान चढ़ने लगीं।पर कभी-कभी सोचता कि क्या यही सच है जो दिखलाई दे रहा है, या फिर दिन-दो दिन का छलावा।पर जो भी था, था तो मनभावन।

रतिराम शाह पुश्तैनी सूदखोर था।पर इधर बदले दौर में आसामियों में कमी आई थी।आसामियों की एक बड़ी तादाद बैंकों के दलालों ने तोड़ ली थी।फिर भी बचे हुए आसामी, ठीक-ठाक गुजर बसर के लिए काफी थे।कब्जाई हुई जमीनें भी थीं, मकान भी और दुकानें भी जिनसे फसल भी आती और किराया भी।इन सबके बावजूद रतिराम शाह की गिनती इलाके के नामी कमीनों में होती थी।भिखारी को भीख और भूखे को रोटी देना तो बहुत दूर की बात है, कहा जाता कि रतिराम शाह तो मरते के मुंह में पानी भी मुफ्त नहीं डालता।उसी रतिराम शाह की नियामतें हरिया अहीर पर बरस रही थीं।जो सुनता यकीन नहीं करता।

हरिया, तुझसे ज्यादा सीधा और सच्चा आदमी गांव में दूसरा नहीं होगा।एक दिन जब हरिया अहीर रतिराम शाह की टांगें धीरे-धीरे दबा रहा था- शाह ने अचानक से बात शुरू कर दी।

‘ये तो आपका बड़प्पन है मालिक।’ हरिया खुशी से झेंप गया।कैसी पारखी नजर पाई है।पूरे गांव की चाकरी की पर पहचाना सिर्फ शाह ने।सोकर मन ही मन हुलस गया हरिया।

‘सच बात कहने में कैसा बड़प्पन।इंसान का सबसे बड़ा गुण है- सचाई और ईमानदारी।तू सच्चा भी है और ईमानदार भी।’ रतिराम शाह ने जोर देकर कहा

‘जी मालिक’, हरिया को सूझा ही नहीं कि क्या जवाब दे।

‘आदमी जिस थाली में खाए, उसे धो-पोंछ कर सुखाए यही कायदा है।न कि कील लेकर उसमें छेद करने बैठ जाए।’

‘जी मालिक।’ हरिया अब भी कुछ नहीं समझा पर समर्थन करना ही था।

‘तू जानता है, ईसाई धर्म में क्या होता है?’

‘क्या होता है मालिक?’ अब ये ईसाई धर्म कहां से आ गया।कुछ हैरान होते हुए हरिया ने पूछा।

‘उनके यहां एक तरीका है कि अगर किसी से कोई गुनाह हो जाता है तो पादरी से सचाई बता कर अपना पाप भी धो लेता है और मन भी हल्का कर लेता है।’ रतिराम शाह ने कहा।

‘बड़ा अच्छा तरीका है मालिक।’ हरिया ने गर्दन को जुंबिश दी।

‘हां! सचमुच अच्छा तरीका है।अरे! मैंने तेरे पैरों की तरफ तो देखा ही नहीं।फटे हुए जूते पहन कर इतनी मेहनत करता है तू।अंगूठा, उंगलियां सब बाहर झांक रही हैं।’ रतिराम शाह हरिया अहीर के पैरों की तरफ देख कर जैसे चौंक गया।

‘टांका लगवा लूंगा मालिक।ठीक हो जाएगा।’ इस बार हरिया अहीर अपनी विपन्नता पर झेंप गया।

‘कै दिन चलेगा टांका।टांका टिकने के लिए भी तो जूते में जान होनी चाहिए।कल बाजार से ठीक-ठाक जूते खरीद लेना।पैसे मैं दे दूंगा।इतने दिनों से मैंने यह सब देखा ही नहीं।’ रतिराम शाह जैसे आत्मग्लानि से बुदबुदाया।

‘ठीक है मालिक, गुजर तो हो ही रही है।’ भीतर से खुश होते हुए भी हरिया ने ऊपरी तौर पर जैसे बात को टालने की कोशिश की।

‘कुछ ठीक नहीं है, जो कहता हूँ कर।’ हरिराम शाह ने घुड़का तो उपकृत हरिया ने उसके पांव छूकर हाथ माथे से लगा लिया।

हरिया के दिन बदल रहे थे।छप्पर नया तो नहीं बिठाया गया था, पर मरम्मत खूब कायदे से और मंहगी हुई थी।शरीर पर नए कपड़े थे और पैरों में साबूत जूते।रोटी भी हो, कपड़ा भी और मकान भी तो फिर हरिया अहीर को और क्या चाहिए।रतिराम शाह भी जैसे उसे जानवर से आदमी बनाने में लगा हुआ था।

रतिराम शाह हरिया अहीर का लोक तो संवार ही रहा था पर साथ ही उसका परलोक संवारने की जुगत में भी लगा हुआ था।नेकनीयती की बात करता, धर्म-कर्म की बात करता, शास्त्रों में लिखी हुई हिदायतें दोहरा कर सुनाता और फिर ठोक बजा कर जानने की कोशिश करता कि हरिया अहीर पर उसकी बातों का कितना असर हुआ है।

रतिराम शाह की बातों का असर हुआ और खूब हुआ।रतिराम शाह की नियामतों से गदगदाया हुआ हरिया अहीर एक दिन उसके पैर पकड़ कर गिड़़गिड़ाता हुआ उसके सामने बैठ गया और बार-बार माथा जमीन पर टेकने लगा।

‘अरे क्या हुआ तुझे।कुछ ठीक-ठीक बोल, ये क्या मुंह में बुदबुदाए जा रहा है।’ रतिराम शाह ने घुड़का।

‘मैं भी ईसाई होना चाहता हूँ मालिक।’ हरिया अहीर ने नजरें झुकाए-झुकाए ही कहा।

‘ये क्या बकवास कर रहा है।ईसाई हो गया तो कौन तेरे हाथ का पानी पिएगा।’ रतिराम शाह उसकी बात से हैरान था।

‘नहीं मालिक! ईसाई बनना नहीं चाहता बस ईसाइयों की तरह आपके सामने अपना गुनाह कबूल करना चाहता हूँ।’ अपराध बोध से दबे जा रहे हरिया ने अपनी बात समझाने की कोशिश की।

अचानक रतिराम शाह का चेहरा दमक उठा।उसने अपनी पैनी नजरों से हरिया अहीर की कातर द़ृष्टि को बींध दिया।कुछ क्षण के लिए तो हरिया सहम गया।उसे लगा कि कहीं गलती तो नहीं कर बैठा, पर तभी रतिराम शाह की चाशनी में डूबी हुई मीठी आवाज आई।

‘कबूल-कबूल हरिया।मन में कोई मैल न रखियो।सब कबूल दे।’

‘मालिक एक दिन आपकी जेब से रुपये गिरे थे…।’ रतिराम शाह की आवाज ने हरिया को बल दिया

‘हां, गिरे थे।सात सौ रुपये।’ रतिराम शाह अकारण ही हँस दिया।

‘वो मुझे मिले थे मालिक।’ हरिया अहीर पानी-पानी होता हुआ बोला।

‘मुझे पता है कि वे रुपये तुझे ही मिले थे, पर तूने लौटाए क्यों नहीं।’ रतिराम शाह की आंखों ने अचानक रंग बदल लिया।साहूकार की पुश्तैनी धूर्तता बाहर झांकने लगी।

‘मन में पाप आ गया था मालिक।तंगहाली, गरीबी बस इसी से मन में पाप आ गया था।’ हरिया फिर गिड़गिड़ाया, ‘अब आपने आंखें खोल दीं मालिक।’

‘चल कोई बात नहीं।अब तेरा चित्त निर्मल हो गया है।पाप धुल गए समझ।जा अंदर जाकर मुनीम से मिल ले।’ रतिराम शाह ने हरिया अहीर की पीठ थपथपाई।हरिया पिघल गया।

‘जानते हुए भी आपने कभी पूछा नहीं मालिक।’ पानी से लसलसाई हुई गीली मिट्टी से भी ज्यादा लसलसा गई थी हरिया अहीर की आत्मा।

‘क्या फायदा होता! तुझे पाप पुण्य का ज्ञान तो था नहीं।अगर उस समय तू मुकर जाता तो फिर कभी कबूल नहीं कर पाता और जिंदगी भर पाप की गठरी तेरे सिर पर लदी रहती।बस इसी पाप से मैं तुझे बचाना चाहता था।’

रतिराम शाह की आवाज में संताई उतर आई थी।

‘आप देवता हैं मालिक- आप देवता हैं।’ हरिया अहीर ने एक बार फिर माथा टेका।

‘जा मुनीम से मिल ले।’ कहने के साथ ही रतिराम शाह ने आंखें मूंद लीं।

हरिया समझ गया कि मालिक अब और बात करना नहीं चाहते सो उठा और दालान में बैठे मुनीम के पास चला गया।दिल उछल रहा था कि जाने मालिक आज फिर क्या नियामत बरसाएंगे।पर बिच्छू के डंक से तिलमिलाया हुआ हरिया अहीर हाहाकार करता हुआ दालान से उल्टे पांव वापस लौटा आया।

‘मालिक, मुनीम जी तो गज़ब करते हैं।साढ़े सात हजार के पर्चे पर सही करने को कहते हैं।रुपया तो कुल सात सौ ही था मालिक।’ हैरान-परेशान हरिया अहीर शिकायती स्वर में बोला।

‘वाजिब बात कही तूने।गिरा हुआ रुपया तो सात सौ ही था पर तेरे छप्पर की बनवाई, नए कपड़ों की सिलवाई, ये तेरे नए जूते और इस सारे खर्च पर पिछले कई महीनों का ब्याज।मन भरमा मत रे बावले।तू अपना आदमी है।मुनीम ने दस-पांच कम ही लगाए होंगे।जा सही कर दे।’ रतिराम शाह ने स्नेह से थपथपाया।

‘पर मालिक…।’ हरिया अहीर कुछ कहना चाहता था पर रतिराम शाह ने टोक दिया।

‘तू तो समझदार है रे हरिया।सच बोल कर अपना परलोक तो तूने संवार लिया पर अब साहुकारी का उसूल तुड़वाकर मुझे विधर्मी बनाएगा क्या! जा सही कर दे।’

रतिराम शाह ने फिर कुर्सी से पीठ टिका कर आंखें मूंद लीं।ठगा-सा खड़ा रह गया हरिया अहीर।

सुना है कि हरिया अहीर अब साहूकारों की मुफ्त नियामतों से डरने लगा है, इसीलिए जिस दिन गांव में फोन का मुफ्त सिम बांटने वाले आए, हरिया सारा दिन घर में ही दुबका रहा।जिस दिन पता चला कि अब राशन मुफ्त मिलने लगा है- उसने राशन की दुकान वाला रास्ता ही बदल दिया और जिस दिन बिजली मुफ्त मिलने का वायदा हुआ, उसी दिन हरिया अहीर ने बिजली के खंबे पर डाली हुई कटिया उतार कर बल्ब बुझा दिया।हरिया अब युग सत्य समझ गया है कि साहूकार मुफ्त कुछ भी नहीं देता और अगर दमड़ी देता है तो फिर चमड़ी लेता भी है।

अलबत्ता, अपना चूल्हा, अपनी हंडिया, अपनी ढिबरी और अपना छप्पर बचाने के लिए हरिया, अब दिन-दिन भर खटता है और उसे देख-देख कर रतिराम शाह हँसता है।

 

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