सुपरिचित कहानीकार। आठ कहानी संग्रह और दो उपन्यास सहित सिनेमा पर भी एक पुस्तक ‘सिनेमा भीतर सिनेमा’ प्रकाशित। संप्रति अध्यापन।

 

ऑफिस से शाम में घर पहुंचा ही था कि विवेक, मेरे बेट का फोन आ गया, ‘हां पापा, हमलोग थोड़ी देर हुए कोलकाता पहुंच गए हैं और अपने होटल में चेक-इन कर लिया है।’

एक आंतरिक तसल्ली मैंने महसूस की। विवेक और उसके तीन सहपाठी रेलवे-भर्ती का एक एग्जाम देने के लिए कल शाम ट्रेन से कोलकाता निकले थे। आज शाम वहां पहुंचते ही उसने मुझे फोन किया। जैसा कि वह बाहर कहीं भी जाने पर हमेशा करता है।

मैंने पूछा, ‘एग्जाम सेंटर वहां से कितनी दूर है, ये पता कर लो। कल कितने बजे हैं एग्जाम है?’

‘हां-हां… वो हमलोगों ने गूगल मैप पर देख लिया है। यहां से चार किलोमीटर दूर है। एग्जाम कल सुबह दस बजे से है।’

‘जाओगे कैसे?’

‘अरे पापा, आप टेंशन मत लो, हमलोग कैब बुक करवा लेंगे। एक घंटा पहले सेंटर के लिए निकल जाएंगे।’

नई पीढ़ी इन सब मामलों में ज्यादा स्मार्ट है। उन्हें ज्यादा टोकना ठीक नहीं। यह हमारी पीढ़ी नहीं है जो किसी नई जगह में ‘क्या होगा, कैसे होगा’ की चिंता में घुलती रहती है। इतना ही कहा, ‘ठीक है, तुमलोग अपनी तैयारी अच्छे से करो।’

‘ओ.के. पापा। कल एग्जाम के बाद फोन करता हूँ।’

मैं थोड़ी चैन की सांस लेता हूँ। विवेक पिछले तीन साल से कई परीक्षाएं दे रहा है। मुझे याद है, फॉर्म भरने के चार महीने बाद कहीं एग्जाम का शेड्यूल तय हुआ था। इसकी तैयारी के लिए उसने बिलासपुर की एक कोचिंग भी ज्वाइन किया हुआ है, जहां वह पिछले छह महीने से इसकी तैयारी कर रहा है। वहीं के उसके तीन दोस्त भी साथ गए हैं। दिल ही दिल में मनाता हूँ, भगवान! इस बार वह सफल हो जाए! कितनी तो मेहनत करते हैं ये बच्चे… दिन और रात एक किए हुए कि बेस्ट रिजल्ट ला सकें! पर अक्सर कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता है। किसी परीक्षा के पेपर लीक हो जाते हैं तो कभी पता चलता है, परीक्षा ही कैंसिल कर दी गई है।

मैं बहुत शुक्र मनाता हूँ कि इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ है। और इस बात पर मैं मन ही मन काफी प्रसन्न भी हूँ। बेटे के फोन से मुझे आंतरिक खुशी हुई है, और पत्नी को विवेक के पहुंचने की बात बताते हुए उससे चाय बनाने के कह देता हूँ। यह चाय मैं अपनी इसी खुशी के साथ पीना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ, विवेक मेधावी है और लगनशील। बस, उसे सही मौका मिल जाए, अच्छा रिजल्ट ले आएगा। स्कूल से लेकर कॉलेज, एम.एस-सी. तक टॉपर रहा है। मुझे पूरी उम्मीद है, इस बार कुछ न कुछ अच्छा होगा। और मैं अपनी इस खुशफहमी को न जाने क्यों, इधर की परीक्षाओं का हाल जानने के बावजूद, भंग होने देना नहीं चाहता। इसमें ही बना रहना चाहता हूँ और किसी भी अप्रिय और नकारात्मक बात को दिल-दिमाग में नहीं आने देना चाहता। और देखो कि मैं इस समय तमाम सत्ता-निष्ठ करोड़पति सुखियारे बाबाओं की तरह खुद को प्रवचन दे  रहा हूँ…कि हम सभी चाहते हैं हमारा जीवन मंद-मंद बहती नदी में बड़े सहूलियत और आराम से तैरती किसी नाव के समान हो। सुमित्रानंदन पंत की बहुत प्रसिद्ध कविता ‘नौका-विहार’ के समान। ‘न कोई कष्ट/न कोई बाधा! और बहुत सुविधाजनक ढंग से हम अपने गंतव्य तक पहुंच जाएं! हालांकि सामने जैसी विकट स्थितियां हैं, उसमें यह एक दिवा-स्वप्न ही है, इसके  बावजूद चाह उठती है कि अपनी राह निष्कंटक हो। नहीं चाहते कोई अप्रिय घटना घटे।

लेकिन आपके चाहने भर से क्या होता है। कोई न कोई बात आपके आराम और सुविधा में खलल डालने आ खड़ी होती है।

हां, मैं इसे खलल ही कहूंगा।

जब मैं चाय की चुस्कियों के साथ बेटे के सुखद भविष्य के खुश-खयालों में खोया हुआ था कि बिलकुल अचानक जयराज घर आ पहुंचा था। वह भी बिना किसी पूर्व-सूचना के। जयराज का शायद चार बरस बाद यों अचानक मेरे घर आना मेरे लिए जितना अप्रत्याशित था, उससे कहीं ज्यादा अप्रियकर। ऐसी अच्छी घड़ी में कुछ अशुभ-सा। उसे देखते ही, नहीं चाहते हुए भी जो बात सबसे पहले दिमाग में बिजली-सी दौड़ी, वो यह कि यह साला फिर मुझसे कुछ आर्थिक मदद मांगने आया है, जबकि कोई चार बरस पहले मुझसे उधार लिए मेरे 2000/रुपए इसने आज तक नहीं दिए हैं। अरे, देना तो छोड़ो, कभी उनके लौटाने की भी कोई चर्चा तक नहीं की है। इसका साफ मतलब उसका मुझे धोखा देना है। उधार के नाम पर रुपए मांगना और नहीं लौटाना। जबकि इसके बाद वह पांच-सात बार तो मुझसे मिला ही होगा, दुनिया-जहान की बातें की होंगी, लेकिन भूलकर भी उन रुपयों का जिक्र उसने नहीं किया। बिलकुल नहीं! कुछ ऐसे जैसे उसने मुझसे रुपए लिए ही न हों! उसकी रोजी-रोटी की अस्थिरता और खस्ता माली हालत का अंदाजा लगाकर मैंने मांगे भी नहीं। स्वाभाविक है, जिनके प्रति आपके मन में ऐसा गहरा संदेह और अविश्वास पनप जाए, उसके साथ आप भला कैसे और कितनी देर तक सहज रह सकते हैं? हँस-बोल सकते हैं?

‘आओ जयराज, बैठो।’ मैंने उसके आने पर कोई खुशी या उत्सुकता जाहिर नहीं की कि उसको खुद-ब-खुद कुछ अंदाजा हो जाए मेरी नाखुशी का, नापसंदगी का।

‘और भाई साहब, कैसे हैं?’ उसने पूरे उत्साह से मुझसे पूछा है, सामने सोफे पर आराम से बैठते हुए।

वह उम्र में मुझसे कोई तेरह-चौदह साल छोटा होगा। संभवतः अभी पैंतीस के आसपास का। मुझे उसकी खुली, तेज और किंचित लापरवाह आवाज का आत्मविश्वास खल जाता है। गो कि उसके बोलने-बताने की शैली हमेशा से यही रही है। सोचा, क्या इस आदमी को जरा भी उस बात का अहसास नहीं, कि मुझे इनके रुपए लौटाने हैं? 2000/रुपए। ये कोई पचीस-पचास जैसी कोई मामूली रकम भी तो नहीं है जिसे ये सिरे से भूला हुआ है। और इसी वजह से मेरे दिमाग की सुई अब तक जैसे यहीं, इसी बात पर अटकी हुई है। सिर को शनैः शनै भारी करते।

‘सब ठीक ही है। तुम बताओ?’ मैं उसे किंचित अनमना-सा, बुझा-बुझा-सा जवाब देता हूँ। साथ ही उसे ध्यान से देख रहा हूँ। छह फिट की ऊंचाई को छूता उसका लंबा शरीर बढ़ती उम्र के साथ इधर भर आया है, बल्कि पेट भी निकल आया है जो उसके फेडेड नीली जींस पर लापरवाही से पहने सफेद कुरते के बावजूद झलक जा रहा है। हां, लेकिन उसके सांवले चेहरे पर जरूर लंबी बेरोजगारी और आर्थिक तंगी के अनुभव से जन्मी गहरी रेखाएं हैं। हां, आंखों पर सस्ते काले फ्रेम का चश्मा है जो शायद इधर ही चढ़ा है।

जयराज बहुत इत्मीनान से और आत्मविश्वास से मेरे सामने बैठा हुआ बोल रहा है। कुछ पुराने साथियों को याद कर रहा है कि आजकल उनसे भी मुलाकात नहीं हो पाती। मैं अनमना-सा सुन रहा हूँ। ठीक-ठीक कहूं तो मुझे उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि मेरे हिसाब से उसने मुझसे चीटिंग की है, धोखा दिया है, कि जिसने उसकी किसी समय में मदद की हो, उसे वह बिलकुल भूल गया है। मेरा कायदा यह है कि आदमी को कम-से-कम अपने रिश्तों में, आपसी संबंधों में एक न्यूनतम ईमानदारी तो रखनी ही चाहिए। जयराज कभी उन रुपयों की बात ही नहीं करता, जो उसे देखते ही मुझे कील-सा गड़ना शुरू हो गया है।

क्या उसने मुझे निरा बेवकूफ समझा है या कोई भुलक्कड़, जो दिए गए रुपए आसानी से भूल गया हो; कि उसकी भलमनसाहत का फायदा लेने उस पर फिर कोई नया चारा डाला जा सकता हो?

बहरहाल, मैं फिर भी उसे ध्यान से सुनने की कोशिश कर रहा हूँ। अरे, मैंने उसके बारे में तो कुछ बताया ही नहीं।

मेरी उसकी पहचान कोई बारह-चौदह साल पुरानी है। उन दिनों हमारा नाट्यग्रुप ‘रंगरेज’ यहां बहुत सक्रिय था। हम दस-पंद्रह लोगों का ग्रुप। इसमें दो-तीन लड़कियां भी थीं। ग्रुप दो-चार महीने में कोई नाटक तैयार करता। उसे थियेटर से लेकर नगर के सड़कों-चौराहों पर हम खेला करते थे। कई बार गांवों के चौपालों में भी। वे दिन ही अलग थे। सब रचनात्मक ऊर्जा और जोश से भरे हुए रहते, इन नाटकों से कुछ बदलावों की गहरी मंशा के साथ। मैं इसमें अभिनेता और संवाद लेखक था, जब जैसी भूमिका काम आ जाए। तब का दुबला-पतला, लंबा जयराज हमारे ग्रुप का केंद्रीय या महत्वपूर्ण अभिनेता नहीं था। उसे बस छोटे-मोटे किरदार ही दिए जाते। कभी नेता के सहायक का, कभी पुलिस का, तो कभी आंदोलनकारी युवा का। दरअसल ग्रुप में उसकी भूमिका हमेशा मंच से कहीं ज्यादा ‘बाहर’ की रहती थी। नाटक-प्रदर्शन के वाल-राइटिंग, पोस्टर चिपकाने के अलावा ग्रुप के लिए आर्थिक मदद जुटाना। नाटक के लिए लोगों से, दुकानदारों से और कभी-कभी सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं से आर्थिक सहयोग जुगाड़ना। इसमें वह सदैव आगे और तत्पर रहता। अलग-अलग फील्ड के लोगों से बात करने, उन्हें सहयोग करने के लिए कन्विंस करने में उसकी चतुराई, मिठास भरी वाचालता बहुत काम आती। उन दिनों वह आई.टी.आई. से दो बरस का ‘इलेक्ट्रिशियन’ डिप्लोमा कर लेने के बाद रोजगार दफ्तर में रजिस्ट्रेशन करा चुका था। और आगे उसे नगर के विशाल स्टील प्लांट से अपने बुलावे का इंतजार था। इंतजार इसलिए क्योंकि इस ट्रेड की डिमांड प्लांट में शुरू से रहती आई थी। इस ट्रेड की पढ़ाई कर लेने के बाद माना जाता था, अगले की प्लांट में नौकरी पक्की! दसियों सालों से यही होता आया था। लेकिन इस बीच, नई आर्थिक नीतियां पूरे देश में जोर-शोर से लागू की जा चुकी थीं। भूमंडलीकृत आर्थिक नीतियों के चलते हर पब्लिक सेक्टर पर निजीकरण लागू किया जा रहा था। इस प्लांट में भी ‘मेंस-पॉवर’ कम से कम करने का काम शुरू हो चुका था। मैनेजमेंट का ज्यादा जोर अब ‘मिनिमम मेंस-पॉवर’ और ‘मैक्सिमम प्रोडक्शन एंड प्रॉफिट’ पर आ गया था।

इन सबके चलते उन दिनों प्लांट भी अपने भर्ती-नियमों में निरंतर बदलाव किए जा रहा  था और नई भर्तियों पर लगभग रोक तब भी लग चुकी थी। लेकिन जयराज का बैच इस मामले में खुशकिस्मत रहा कि प्लांट ने पहले तो उन्हें बाकायदा इंटरव्यू के बाद छह महीने के अपने निर्धारित इंटर्नशिप के लिए सलेक्ट कर लिया, जिसके अंतर्गत फिर उन्होंने प्लांट में छह महीने का अनिवार्य इंटर्नशिप भी कंप्लीट कर लिया। इसके बाद उन सबको पूर्व-निर्धारित नियमों के हिसाब से यहां नियमित कर्मचारी के रूप में ज्वाइनिंग मिल जानी थी।

और उन सबको पूरा विश्वास था कि आज नहीं तो कल, हमको परमानेंट ज्वाइनिंग मिल जाएगी।

लेकिन तभी इनकी नियुक्ति पर मैनेजमेंट की नई नीतियों की तलवार लटक गई।

वे 200 ट्रेनीज इंतजार करते रहे। लेकिन उन्हें नहीं लिया गया।

इसके बाद जयराज के लिए अपनी नौकरी पा सकने का संघर्ष ही सर्वोपरि हो गया। उसके जीने का मकसद। अब वह उस भर्ती-आंदोलन का हिस्सा बन गया, बल्कि इसका नेतृत्वकर्ता जिसमें उसकी तरह के दो सौ स्टूडेंट नौकरी लगने की राह देख रहे थे। ये कोर्ट गए। इसके लिए हड़ताल किए। धरना-प्रदर्शन किए।

लेकिन प्लांट की नीतियां इस दौर में बेहद सख्त कर दी गई थीं। नियमित भर्तियां बिलकुल बंद। मैनेजमेंट जहां अपने नियमित पुराने वर्करों के लिए ‘मल्टी-स्किल्ड प्रोग्राम’ ले आया था, जिसमें उन्हें दूसरे फील्ड के कामों को कुशलतापूर्वक करना सीखना था, वहीं अब काम के लिए ठेका सिस्टम आ चुका था, जिसमें मैनेजमेंट द्वारा बड़ी-बड़ी कंपनियों और ठेकेदारों को काम का ठेका दिया जाता और वे अपनी मर्जी के मुताबिक ‘स्किल्ड’ या ‘अनस्किल्ड’ लेबर भरकर काम चला रहे थे। जबकि जयराज का ग्रुप अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर संघर्षरत था।

जयराज का अब सारा ध्यान और समय अपनी नियुक्ति आदेश करवाने के संघर्ष में ही लग रहा था। उसका ग्रुप से अब वैसा संपर्क नहीं रहा। वहीं, इधर धीरे-धीरे हमारे ग्रुप ‘रंगरेज’ का भी बिखराव शुरू हो चुका था। लड़के-लड़कियां अब नाटक छोड़कर अपने लिए काम-धंधे की तलाश में जुट गए थे। और होते-होते दो-तीन साल बाद वह ग्रुप केवल हमारी यादों का मात्र हिस्सा बनकर रह गया। और अब तो ‘रंगरेज’ महज ‘ह्वाट्स्एप ग्रुप’ बनकर ही सांस ले रहा है जिसमें हर ग्रुप की तरह यहां भी सत्ता-समर्थक अंध-भक्ति और उथले राष्ट्रवाद की लहरें हिलोरें मारती हैं। यह हाल देखकर कुछ समय बाद मैं ग्रुप से एग्जिट हो गया।

जयराज और उसके साथियों के भर्ती का मामला कोर्ट में लटक गया था। ये स्थानीय मैनेजमेंट पर दबाव बनाते, तो अधिकारी हां-हूँ कहकर पीछा छुड़ा लेते। मामला जस का तस। इधर इनकी भर्ती की उम्र-सीमा भी पार हो गई थी। लेकिन इनका संघर्ष जारी था।

अखबार में इनके आंदोलन और मांगों की छोटी-मोटी खबर यदा-कदा छपती रहती थी। लेकिन एक दिन अपेक्षाकृत बड़ी खबर छपी थी-लोकल न्यूज पेज पर पांच कॉलम की, बड़े फोटो के साथ॥ खबर यह थी कि इनके ग्रुप के कई सदस्य अपनी मांगें मनवाने टाउनशिप की सबसे बड़ी पानी टंकी पर चढ़ गए थे। जयराज की भी फोटो छपी थी। वही एक तरह से अगुआई कर रहा था। हुआ कुछ नहीं। पुलिस ने इन्हें उतारा और केस दर्ज कर लिया। बाद में सबको मुचलके पर छोड़ दिया गया।

इसी दौरान उसकी शादी हुई थी जिसमें लंबे समय के बाद ग्रुप के अधिकांश लोग मिले थे। उसकी बारात में गए थे।

इसके कई महीने बाद अचानक आज की ही तरह एक दिन जयराज मुझसे मिलने घर आया था। तब उसने आने से पहले फोन किया था। मिलने पर अपनी व्यथा-कथा के साथ बताया, ‘भाई साब, परसों बड़े भैया का एक्सीडेंट हो गया। एक गड्ढे में उनकी बाइक स्लिप हो गई थी। हॉस्पिटलाइज्ड हैं। दाहिने पैर की हड्डी घुटने के नीचे से फ्रेक्चर हो गई है। डॉक्टर कह रहे हैं रॉड लगेगा। उसी के खर्च की जुगाड़ में घूम रहा हूँ। आप से कुछ मदद मिल जाती तो अच्छा होता। मैं जल्दी ही लौटा दूंगा।’

मैंने पूछा था- ‘कितना?’ उसने कहा, ‘दो हजार दे दीजिए आप। बाकी मैं और दोस्तों से जुटा रहा हूँ।’

मैंने रुपए दे दिए थे। रुपए उसने नहीं लौटाए।

कई महीने बीत गए। शायद साल भर से अधिक ही। मैंने एक दिन उसके ज्यादा करीबी दोस्त फिरोज से इसकी चर्चा की, तो उसने कहा था, ‘वह सचमुच बहुत परेशानी में है, भाई साहब। प्लांट इन्हें ले नहीं रहा और इसके काम-धंधे का कोई ठिकाना नहीं। घर-परिवार वाले आदमी की सौ-सौ परेशानी। किसी तरह घर-परिवार चला ले रहा है, उसके लिए यही बहुत है। भाई साहब, अच्छा होगा, उससे आप मत ही मांगो।’

फिरोज के कहने पर मैं सचमुच इस बात को भूल गया। मेरी पूरी सहानुभूति उसके साथ थी। हाथ आई सरकारी नौकरी मिलने से रह गई, जिसे पा जाने की हर कोशिश में वह लगा हुआ है। मैं तो सरकारी नौकर हूँ। बंधी-बंधाई पेमेंट मिल जाती है। अक्सर मैं जयराज की स्थितियों के बारे में सोचना चाहता हूँ कि कैसे और कहां-कहां भटकते उसके दिन गुजरते होंगे…? कुछ छोटा-मोटा काम उसने पकड़ लिया होगा, लेकिन सचाई यह है कि उसके बारे में सोचना शुरू करते ही मेरी सारी बुद्धि, सारी कल्पना जैसे कुछ दूर जाकर ‘ब्लॉक’ हो जाती है। सब कुछ अदृश्य, अकल्पनीय और अनिश्चित। मैं आगे कुछ भी नहीं सोच पाता।

इस बीच समय अपनी गति से गुजरता रहा। सबकी अपनी-अपनी व्यस्तता तो रहती ही है।

उससे मेरी अगली मुलाकात हुई कोई तीन बरस के बाद। अचानक। और वहां, जहां उसके होने की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी! उस साल विधानसभा के चुनाव थे, और एक कॉलेज के विशाल परिसर में हो रहे ‘काउंटिंग’ में मेरी ड्यूटी लगी थी। काउंटिंग स्थल के कैंटीन में वह सहसा मुझे मिल गया था। मैं बहुत चौंका था- ‘अरे, तुम यहां कैसे?’ उसने बताया था, कि वर्तमान विधायक का वह काउंटिंग एजेंट है कि पिछले कुछ सालों से वह ‘भाई साहब’ के साथ लगा हुआ है और आज की तारीख में उसका ‘खास आदमी’ है। कि यहां उसके जितने भी काउंटिंग एजेंट हैं, सबके लिए चाय-नाश्ते, खाने-पीने का इंतजाम करना उसी के जिम्मे है। वह ‘भाई साहब’ के साथ कुछेक बार वह दिल्ली भी जा चुका है और वहां अपनी नियुक्ति आदेश को लेकर मैनेजमेंट के आला अधिकारियों तक अपने ‘भाई साहब’ और पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के मार्फत अपनी मांग पहुंचा चुका है।

मुझे यह जानकर भी अच्छा लगा था कि राजनीति में घुसकर भी वह अपनि नियुक्ति के  एजेंडे को ध्यान में रखे  हुए है।

नेताओं के साथ रहने से, इसके गुमान से बातों को कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बोलने की आदत लोगों में सहज आ ही जाती है। जयराज भी इसका अपवाद नहीं निकला। बमुश्किल दस-बारह मिनट की उस मुलाकत में अपनी शेखी बघारते हुए उसने एक दिलचस्प बात बताई कि पिछली बार जब वह दिल्ली गया था, पार्टी मुख्यालय में उसने पार्टी-अध्यक्ष के साथ अपने मोबाइल से विधायक महोदय की उसने जो तस्वीर खींची, वह विधायक महोदय को इतना ज्यादा पसंद आया कि अपने मिलने-जुलने वाले विशाल ड्राईंग रूम की दीवाल पर उसने इसे इनलार्ज कराके बहुत बड़े साइज के पोस्टर के रूप में लगवा लिया है। उसने कहा था, ‘आप कभी विधायक जी के घर जाओ तो देखना वह फोटो जिसमें पार्टी मुख्यालय के लॉन में पार्टी-अध्यक्ष के पीछे-पीछे तेजी से चलते हुए हमारे विधायक जी खुद भीग रहे हैं, लेकिन अध्यक्ष जी को बारिश की बूंदों से बचाने उनके ऊपर अपना छाता ताने हुए हैं।’

…यह फोटो जयराज ने खींची है, इसका पक्का प्रमाण मेरे पास नहीं है, लेकिन हां, यह फोटो सचमुच विधायक जी के ड्रॉइंगरूम में आज भी शोभायमान है। उनकी पार्टी-अध्यक्ष के प्रति  निष्ठा और समर्पण प्रदर्शित करते हुए।

जानकार मुझे अच्छा लगा था कि जयराज ने अपनी आय के लिए राजनीति की राह पकड़ ली है। मुझे लगा था, अपनी होशियारी और सक्रियता से वह अपनी नियमित आय के लिए कुछ न कुछ जुगाड़ निकाल लेगा। देश की राजनीति हजारों, बल्कि लाखों युवाओं को ऐसे ही अस्थायी वैकल्पिक रोजगार मुहैय्या कराए हुए है।

उस दिन भी जयराज ने कहा था, ‘भाई साहब, पूरी उम्मीद है, हमारा ऑर्डर जल्दी ही हो जाएगा।’

लेकिन यह अभी तक नहीं हो सका है। इसी कारण तो आज वह मेरे सामने बैठा हुआ है। नौकरी लग चुकी होती तो उसे यहां आने की जरूरत ही क्या थी?

नौकरी? वह भी सरकारी! और परमानेंट! यह जैसे धरती से अंतरिक्ष में जाने सरीखा असंभव हो चला है, खास तौर पर साधारण घरों के बेरोजगारों के लिए। भर्तियां बहुत कम हो चुकी हैं। कभी-कभार 100-200 पोस्ट निकले भी तो आवेदकों की संख्या लाखों के पार चली जाती है। लाखों युवा इसका सपना संजोए इसमें सफल होने के लिए कोचिंग सेंटर ज्वाइन करते हैं, बरसों-बरस इसकी तैयारी करते हैं। खुद मेरा बेटा विवेक पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद तरह-तरह की परीक्षाओं की तैयारी में जुटा रहता है। जो भी सरकारी-गैर-सरकारी वेकेंसी निकले, फॉर्म भरते जाओ। असफलताओं के बाद भी उम्मीद का दामन मत छोड़ो, आजमाते रहो खुद को बार-बार।

‘पापा, आपलोगों का ही टाइम अच्छा था’, बेटा अक्सर मुझसे कहता है, ‘कम से कम जो वेकेंसी निकलती थी, वह फुलफिल तो होती थी! यहां तो ढेर सारे प्रॉब्लम्स हैं। बल्कि पूरी सीरिज है प्रॉब्लम्स की! परीक्षा से ऐन पहले ही पेपर लीक हो जाता है। मेरे दो इम्पॉर्टेंट एग्जाम के पेपर लीक हो गए थे और एग्जाम कैंसिल! अगर एग्जाम किसी तरह हो भी गए तो रिजल्ट अटका दिया जाता है। खुदा-न खास्ता किसी तरह रिजल्ट निकल गया तो गड़बड़ी होने की शिकायत हो जाती है, मामला कोर्ट में फंस जाता है। जांच आयोग बिठा दिया जाता है। अगर किस्मत से सही-शॉट रिजल्ट निकल भी गया तो नियुक्ति आदेश का इंतजार करते रहो। एक साल… दो साल… कई बार तो ऐसा हुआ है कि ज्वाइनिंग के बाद ट्रेनिंग लेते बैच का ऑर्डर कैंसिल कर दिया गया है। यह बोलकर कि ये पिछली सरकार की नियुक्तियां हैं जिनमें जमकर धांधली हुई है। मेरे एक दोस्त के साथ ‘लैब-अटेंडेंट’ पोस्ट में यही हुआ था। कितने मुश्किल से, ले-देकर उसे ये नौकरी मिली थी, वह भी गई! अब वह फिर एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहा है। समझ नहीं आता, बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है? कई बार तो लगता है, ये लोग जानबूझकर हमारे फ्यूचर से  खिलवाड़ कर रहे हैं! जैसे ये सिस्टम ही एनी हाऊ चाहता है कि रगड़ा खाते-खाते एक दिन नौकरी के खयाल से ही हमारा मोह भंग हो जाए! और चुपचाप किसी भी दूसरे छोटे-मोटे कामों में लग जाओ कि पिज्जा डिलेवरी ब्वॉय बन जाओ। पकोड़ा तलने लगो और कुछ नहीं तो ई-रिक्शा ही चलाने लग जाओ!’

और इन्हीं वजहों से, सचाई यह है कि अपने बेटे से कहीं ज्यादा फ्रस्ट्रेट मैं रहने लगा हूँ। नौकरी के विभिन्न वेबसाइट्स में उसके योग्य वेकेंसी सर्च करता हूँ। पोस्ट ग्रेजुएशन किए उसे दो साल से अधिक हो गए हैं। उसके भविष्य को लेकर घबराया-घबराया सा रहने लगा हूँ, किसी से कह भी नहीं सकता।

इस बीच काबिज सत्ता द्वारा नई आर्थिक नीतियों से भी चार कदम आगे बढ़कर गोया सब कुछ चंद उद्योगपतियों को सौंप देने की जो बड़ी मुहिम चल रही है, उसमें इधर के नौजवानों के लिए रोजगार की जगह बहुत ही सीमित हो गई है। रिपोर्ट्स बताते हैं कि इधर देश के टॉप आई.आई.टी. से निकले इंजीनियरों का ही प्लेसमेंट नहीं हो पा रहा है, बाकी का तो छोड़ दो।

तो फिर जयराज? ये किस गिनती में आते हैं? लेकिन वह बाजिद, हताशा और नाउम्मीदी के आलम में पैंतीस की उम्र हो जाने के बावजूद, अपनी बारह बरस पुरानी रद्द हुई नौकरी पा जाने की लड़ाई लड़ रहा है। यह लड़ाई लड़ने उसने कुछेक मर्तबा हम जैसे समर्थ मित्रों से थोड़ा-मोड़ा आर्थिक सहयोग मांगा था, सभी ने सहर्ष उसका साथ दिया था।

मुझे अभी तक इसका बहुत आश्चर्य रहा है कि नौकरी पा जाने की मृगतृष्णा से जयराज का मोहभंग भला क्योंकर नहीं होता?

बातचीत में मैंने अपनी जानकारी के लिए उससे पूछा, ‘तुम्हारे बच्चे कितने हैं?’

‘दो हैं। बेटा सात साल का है और बेटी चार साल की। पत्नी भी सिलाई-कढ़ाई या कुछ और काम करके कुछ कमा लेती है। अपना तो भाई साब, अब तक ढंग का कोई ठिकाना नहीं जम सका।’ उसके स्वर में अब एक उदासी और हताशा उतर आई है, सच में कभी-कभी बहुत दुख होता है, भाई साब। किस्मत ने ऐसा दगा दिया कि हाथ आई पक्की नौकरी चली गई। वह मिल गई होती तो इतने पापड़ थोड़े बेलने पड़ते जिंदगी में! मेरे साथ वाले कहां से कहां निकल गए और हम यहीं के यहीं। पॉलिटिक्स में भी घुसने की कोशिश की, पर भाई साब, उसमें भी सफलता सबको नहीं मिलती। चार साल तक लगा रहा विधायक महोदय की सेवा में कि कुछ न कुछ अपना भी इनकम का जुगाड़ जम जाएगा। लेकिन मुझे उन्होंने आज तक न एक टेंडर दिलाया, न ही कोई एन.जी.ओ. वाला ग्रांट। वह सब भी ये अपने रिश्तेदारों को बांटते हैं। भाई साब, हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को तो खाली लॉलीपॉप पकड़ाते रहते हैं। बोल के कि अरे,मैं लगा हुआ हूँ, तुम्हारे लिए कुछ न कुछ करूंगा। क्या करोगे भाई साब, सब जगह ऐसा ही है। अपने-अपने को देखो…।’

मुझे उसको नौकरी की लड़ाई का ध्यान आया, जो जैसे जयराज की मुख्य पहचान ही बन चुका है, पूछा, ‘तुम्हारे प्लांट वाले जॉब का कुछ जमा? कोई प्रोग्रेस?’

‘अरे, क्या बताएं भाई साब, पिछली बार तो बिलकुल होते-होते रह गया। कोई साल भर  पहले हम तब के नए सी. ई. ओ. दत्ता से मिले थे। उन्होंने हमको बहुत भरोसा दिया था। बोले थे कि मुझे लगता है, मैनेजमेंट कुछ शर्तों के साथ ही तुम्हें नौकरी दे सकता है- पहली तो यह कि तुमलोगों को कोई ग्रेड नहीं मिलेगा। न ही तुमलोग इसकी मांग करोगे। दूसरे, तुमलोग अभी तक के खाली समय का कोई क्लेम नहीं करोगे इसका कोई भुगतान नहीं होगा और आपलोगों को प्लांट के अलग-अलग ब्रांच में भेजा जाएगा। मैं पूरी कोशिश करूंगा! इतना कुछ बोला था सी. ई. ओ. दत्ता ने तो हम सबको पूरी उम्मीद बंध गई थी कि हमारे भाग खुलने वाले हैं! पर जाने क्या हुआ, पता चला, उन्हीं का ट्रांसफर दूसरी जगह कर दिया गया है! हमसे मिलने के महीने भर के अंदर! मैनेजमेंट का खेल है भाई साब, अंदरखाने क्या चल रहा है, किसी को पता नहीं चलता। अब कहानी साफ है- आगे हमारा कुछ नहीं हो सकता! हम किस-किस से नहीं मिले? अपने सी.एम. से, इस्पात मंत्री से, यहां तक कि दो बार दिल्ली जाकर चेयरमेन से भी मिल लिए। कुछ नहीं हुआ। नेता-मंत्री तो खाली-खाली आश्वासन ही देते रहे हैं। अब कोई उम्मीद नहीं है हमारे लिए। क्या करें, देख रहे हैं सब अपने लिए छोटा-मोटा काम। जिसको जहां मिल जाए। फिलहाल मैं एक लोकल ‘राइस ब्रान ऑइल मिल’ में काम कर रहा हूँ। चार महीने हो गए।’

इसकी कहानी जैसे हमारे समय के हर दूसरे नौजवान की कहानी है। उनके हाथों में बरसों मेहनत से पढ़कर हासिल की हुई डिग्रियां हैं, लेकिन रोजगार नहीं। इस सचाई को मैं बाहर क्या, अपने ही घर में घटता देख रहा हूँ। विवेक इसी संघर्ष में लगा है। उसके लिए कम से कम मैं तो हूँ- नौकरीपेशा पिता, जो वक्त-जरूरत उसकी आर्थिक मदद करता रहता है। और नैतिक सपोर्ट भी। लाखों के पास तो यह भी नहीं। अपनी कल्पना में मैं देख सकता हूँ उन हजारों युवक-युवतियों को जो नौकरी की खातिर दिल्ली, इलाहाबाद, पटना, भोपाल या लखनऊ में किसी तरह एक-एक कमरे में चार-चार लोग रहकर एग्जाम क्रैश करने के लिए कोचिंग ले रहे हैं, दिन-रात एककर तैयारी में लगे हैं। सपना है सबका कि एग्जाम निकाल लें। मगर उस मुताबिक वेकेंसियां नहीं निकल रही है। निकल भी रही हैं तो कम पेमेंट वाली अस्थायी और संविदा भर्तियां हैं। यहां तक कि अब बैंक भी साल भर की संविदा  नियुक्तियां दे रहा है। अब तो जैसे सबकुछ संविदा या प्राइवेट हो चला है।

मुझे उसके काम पर जाने की बात से खुशी हुई। कहा, ‘ठीक कर रहे हो। घर चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा।’

‘हां, भाई साब।’ इसके बाद कुछ देर के लिए वह चुप हो गया, जैसे असल बात करने की भूमिका बना रहा हो। और मैं भी उसकी इस भूमिका के समाप्त होने का इंतजार कर रहा था।

‘अब भाई साब, आपसे क्या छिपाना। शायद आपको मालूम नहीं हो, पत्नी की तबीयत पिछले कुछ महीने से बहुत खराब चल रही है। पहले भी थी ये समस्या, लेकिन इतना नहीं बढ़ा था। अभी उसका चार कदम चलना तो दूर, उठना-बैठना मुहाल है! बीच में प्राइवेट हॉस्पिटल में न्यूरो-सर्जन को दिखाया था। एम. आर. आई. से पता चला, रीढ़ की कोई नस दब गई है, क्या बोलते हैं- लुंबर-4, लुंबर-5। वह तो ऑपरेशन कराने बोल रहा था। दो-चार दिन रखकर उसका वहां इलाज कराया। अब प्राइवेट हॉस्पिटल का खर्च तो जानते ही हो, भाई साब। दो दिन का बिल पंद्रह हजार! फिर दूसरे कई जगह दिखाया, मगर उसको आराम नहीं मिल पाया। सीधे बैठ नहीं पाती। दो कदम चल नहीं पाती। मैं जैसे-तैसे सब मैनेज कर रहा हूँ। घर के काम-काज सहित उसकी देखभाल। एक परिचित मिले तो बोले, यहां-वहां के चक्कर में मत पड़ो। नागपुर में एक अस्सी साल का डॉक्टर है, वह ठीक कर देगा, वहां ले जाओ। उनने बताया कि उनके एक रिलेटिव को यही प्रॉब्लम थी, उसने ठीक कर दिया। तो डॉक्टर का अपॉइंटमेंट ले चुका हूँ कल का। आज रात की ट्रेन से रिजर्वेशन है। अभी मुझे पैसों की जरूरत है, भाई साब। मेरे पास आठ हजार ही हैं अभी। पता नहीं वहां कितना लग जाए? सो आपसे जो हो सकता है, मदद चाहिए। भाई साब, आप पहले भी मेरी मदद करते रहे हैं। अभी आप चार हजार कर दीजिए। कुछ और जगह से मांग रहा हूँ। मैं रुपयों का जुगाड़ होते ही लौटा दूंगा।’

रुपए की बात सुनते ही जैसे मेरी छठी इंद्रीय सक्रिय हो गई। ये पहले भी मुझसे उधार ले चुका है और तब भी इसने कहा था-लौटा दूंगा। किंतु आज तक देने का नाम नहीं। अब ये नई मांग? फिर मस्तिष्क में मेरे कुछ और मित्रों की तस्वीर तैर गई। उन्होंने भी ऐसे ही कुछ बहाने बनाकर छह-आठ महीने पहले मुझसे रुपए मांगे थे। एक ने घर बनाने के नाम पर, एक ने बहन की शादी के नाम पर। कई परिचितों-रिश्तेदारों ने जो हजार-दो हजार लिए हैं, उनका तो कोई हिसाब नहीं। इन सब में करीब चालीस हजार फंसा हुआ है मेरा। हद ये है कि वे मांगने पर, तगादा करने पर भी लौटाने का नाम नहीं ले रहे हैं। अजब ढिठाई और बेशर्मी है! उनसे मिलने की उम्मीद नहीं। वहीं अब ये? मुझे समझ नहीं आ रहा था।

कोई पांच मिनट पहले जब मैं किसी काम से भीतर गया था तो पत्नी ने दबे स्वर में एकदम मना कर दिया था। ‘पैसा-वैसा मांगे तो नहीं देना। पहले का लिया है उसको तो देने का नाम नहीं लिया! रहने दो!’

और मैं पाता हूँ, बहुत सतर्क होकर अपनी सफाई दे रहा हूँ… अभी तो यार, पैसे नहीं हैं। मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ। घर-परिवार में भी बहुत खर्चे हैं। बेटे-बेटी की पढ़ाई-लिखाई।  जयराज भाई, सॉरी। मैं टुकड़े-टुकड़े में बोल रहा हूँ। बुझे स्वर में…।

वहीं भीतर से मैं मुतमईन हूँ, कारण भले ही इसका जेनुइन हो, रुपया देने पर यह इस बार भी वापस नहीं दे पाएगा, उसका डूबना तय ही है।

‘ठीक है भाई साब, वह उठते हुए थोड़े उदास स्वर में कहता है, कोई बात नहीं। ट्रेन का टाइम भी हो रहा है। मुझे निकलना है।’

मैं बाहर गेट तक उसे छोड़ने आया हूँ। गेट के बाहर उसकी मोटर-साइकिल खड़ी है। उसकी वही बहुत पुरानी मोटर-साइकिल। बदरंग और खटारा, जिसके सीट कवर तक जहां-तहां से उधड़े हुए। सामने स्ट्रीट लाइट पोल है जिसके तेज सफेद उजाले में मोटर-साइकिल और बेपर्द होकर बहुत दयनीय नजर आ रही है।

मोटर-साइकिल स्टार्ट करके जाते हुए उसने  कहा- ‘नमस्कार भाई साब।’

घर का गेट बंद करके लौट रहा हूँ तो मैं एक अजीब और गहरे उथल-पुथल की मनोदशा में हूँ। स्तंभित-सा। अपने झूठ कहने की बेहद ग्लानि और पछतावा! और कचोट कि मुझे उसे रुपए दे देने चाहिए थे। उसे जरूरत है तभी तो पांच-छह किलोमीटर दूर से वह आया था। रुपए हद से हद नहीं मिलते, इससे ज्यादा क्या हो जाता? जहां इतने डूबे हैं वहां यह और सही! लेकिन फिर सोच रहा हूँ, अक्सर अपनी भलमनसाहत में ऐसे दोस्तों की मदद करके न जाने कितनी बार छला गया हूँ कि वापस मांगने पर भी नहीं लौटाते। और फिर उनकी दगाबाजी के लिए, अपनी सहायता के बदले यों ठगे जाने को लेकर नहीं चाहते हुए भी गहरे विचलन, पछतावे और क्रोध से भर जाता हूँ। इसलिए, अच्छा है, इससे दूर ही रहो। वह कहावत है न, ‘न बढ़ई के पास जाओ, न बसुला की मार खाओ!’

लेकिन इतने तर्कों के बावजूद मैं आश्वस्त नहीं हूँ। जहां एक ओर वे सारे चेहरे दिल-दिमाग में चक्कर काट रहे हैं जिन्होंने धोखा दिया है। वहीं खयाल उठता है कि एक पल के लिए खुद को जयराज की जगह रखकर देखो। उसकी जगह पर तुम होते तो क्या करते? और यह भी कि अगर वह प्लांट में नियमित नौकरी कर रहा होता, एक हैसियतदार आदमी होता, तो भी क्या तुम्हारा यही बर्ताव होता?

मैं कुछ भी तय नहीं कर पा रहा। यह सही हुआ या गलत?

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