
हिंदी और राजस्थानी भाषा की विविध विधाओं में लेखन। राजस्थानी में एक निबंध संग्रह प्रकाशित। संप्रति व्याख्याता।
जानवरों की भाषा और मां
बहुत बार मेरी मां
करती है बातचीत
जानवरों से भी
हिनहिनाती हुई बछड़ी
गाय के थनों को हूम-हूमकर
बिना कहे मां के
कब पैठती है गहरे तक
क्षीरसागर के
संझा वक्त
रंभाती गायों की बोली में
मां कितनी मिठास घोलती है
उछल कूद कर रहे मेमने
मेरी मां से लेकर छूट
बहुत बार
अपनी मां से बतियाते हैं
भैंस की मोटी-कर्कश आवाजें
मां के कानों में
भाषा की मलैवण लेकर उतरती है
बहुत बार
पालतू बिल्लियां तो
करती है पावांधोक अक्सर
मां के
जब वह बचाकर
गुटका भर दूध जरूरतों से
बाटकी भर देती है
घरेलू बिल्लियों की
नीले कंठों वाले अनेकों मोर तो
झूमते रहते हैं प्रायः
मां के लटक रहे पल्लू के आस-पास
जब वह दानें डालकर
उन्हें टोकती रहती है बार-बार स्नेह के साथ
चिड़िया
गौरेया
गिलहरी
सब के सब
खूब करते हैं हथाई
मन की बातें
मां से झूम-झूमकर
लेकिन
मैं आज तक नहीं कर पाया डिकोड
मां और जानवरों की भाषा।
संपर्क : राजकीय चिकित्सालय के पास, वार्ड नं. 7, पोस्ट – कालू, तहसील – लूणकरणसर, जिला – बीकानेर, राजस्थान मो.9460923603


अतीव सुंदर रचना। सच कविता का भाव बहुत कमाल का। जहां ममता हो, वहां शब्द, लिपि और भाषा गौण हो जाते हैं।