कहानी संग्रह इस पथ का अंत कहाँ।संप्रतिभारतीय रेल में अधिकारी।

वातावरण में इतनी वीरानी छाई हुई थी कि सांस की आवाज स्पष्ट सुनी जा सकती थी।कीट पतंगों और अन्य जंगली जानवरों की आवाज इस वीरान वातावरण को और भयावह बना रही थी।अभी तीन चार दिन पहले ही दस पुलिस जवानों से भरी गाड़ी को उड़ा दिया गया था।बड़ा गड्ढा हो गया था बीच सड़क में।सारे अखबार इस खबर से भर गए थे।टीवी चैनलों में इसी खबर को प्रमुखता से दिखाया जा रहा था।बुद्धिजीवी और नेता लोग अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।सारे देश ने एक स्वर से विरोध किया था।सब कह रहे थे कि इस समस्या के हल के लिए जल्द ही कुछ कदम उठाया जाना चाहिए।आखिर कब तक यह खूनी संघर्ष हमारे जवानों और नवयुवकों की इस तरह जान लेता रहेगा? इस साल की यह तीसरी बड़ी घटना थी।पुलिस वाले जमकर खिसियाए हुए थे।और खिसियाते भी क्यों नहीं? उनके प्राणों की कोई कीमत नहीं है क्या? उनके परिवार में उन्हें चाहने वाले कोई नहीं हैं क्या? उनके परिवार वालों के आंसुओं की कोई कीमत नहीं है क्या? कई सालों से यह खूनी खेल चालू है।बहुत धैर्य रख लिया।अब ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।एक का बदला दस-दस को मारकर लेंगे।गांव वालों को भी सबक सिखाना ही पड़ेगा।उन्हें साफ-साफ बताना पड़ेगा कि वे किधर हैं? किसका साथ देना चाहते हैं?

हवलदार विरंजन यादव के दिमाग में यही सब चल रहा था।वह बस्तर के घोर नक्सल इलाके के किसी गांव में सफल चुनाव संपन्न कराने के लिए गई टुकड़ी का एक सदस्य था।नक्सलियों ने इस बार भी चुनाव का बहिष्कार किया था।गांव वाले बुरी तरह से डरे हुए थे।पिछले चुनाव में भी एक भी वोट नहीं पड़ा था।तीन-चार दिन पहले ही घटी घटना से इस बार भी वही संभावना नजर आ रही थी।इसी को ध्यान में रखकर सरकार ने बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती की थी।

यद्यपि हर चुनाव में ऐसा नहीं होता है।गांव वाले बताते हैं कि कभी-कभी नक्सली खुद किसी एक पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए कहते हैं।गांव के मंगू पटेल ने इस दर्शन को समझने का प्रयास किया तो उनका दिमाग खिसक गया।दूसरों को देखकर वह बत्तीसी निकाल लेते थे और भयावह तरीके से हँसते थे।डाक्टरों ने बताया कि दिमाग पर ज्यादा जोर पड़ने से नसें इधर-उधर हो गईं हैं।रजबा कोल ने इस विषय पर दिमाग खर्च करना चाहा तो वर्दीधारियों ने उसे पेड़ से लपेटकर मार डाला।विनायक पांड़े हलके के नामी पटवारी थे।उनके बनाए नक्शे ऐसे थे कि तीन पीढ़ियों से अदालत में मुकदमे चल रहे हैं लेकिन हल नहीं निकल पा रहा है।कभी जमीन का कुछ हिस्सा एक पक्ष में जाता है तो कभी दूसरे पक्ष में।उन्होंने भी इस चुनावी दर्शन को समझना चाहा पर नाकाम रहे।अंत में यही निष्कर्ष निकाला गया कि यह विषय नेताओं के कार्यक्षेत्र में आता है और आम नागरिकों को इसे समझ पाना असंभव है।

गांव के हर घर में घूमकर लोगों को चुनाव में वोट डालने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।जो नहीं आएगा उसे जबरदस्ती उठाकर ले जाएंगे।प्रजातंत्र में वोट का बड़ा महत्व है।गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित, अधिकारी-कर्मचारी, पति-पत्नी सभी के वोटों की कीमत बराबर होती है।वोट नहीं डालेंगे तो सरकार कैसे चुनी जाएगी और सरकार नहीं बनेगी तो फिर नक्सली जैसे लोगों का राज हो जाएगा।

प्रजातंत्र के लिए ही तो हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया था।अपने प्राणों का बलिदान किया था।कोई तमाशा नहीं था आजादी का संघर्ष।पूरे दो सौ साल लगे थे।देश के अंदर अलग-अलग विचारधारा हो सकती है, होनी भी चाहिए, लेकिन कोई भी विचारधारा देश समाज से बड़ी नहीं होती है।ऐसे में तो कोई भी स्वार्थी तत्व अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए कभी भी लोगों को भड़काना चालू कर देगा।

गांव वालों की स्थिति बहुत दयनीय थी।वे बेहद डरे हुए थे।एक तरफ पुलिस थी तो दूसरी तरफ नक्सली।वे दोनों से दूर रहना चाहते थे।उन्हें दोनों सताते थे।पुलिस को किसी पर शक हुआ तो उसको मार-मारकर अधमरा कर देते थे और नक्सलियों को यदि किसी पर मुखबिरी का शक हुआ तो वह उसकी नृशंस तरीके से हत्या करते थे।सबके सामने।लाश को कुचल डालते थे और उसके ऊपर हग मूत भी देते थे।

कभी-कभी डराने के लिए झूठ-मूठ ही किसी को पकड़कर पीट दिया जाता था।

दुर्भाग्य की बात है कि फिल्मों के हीरो, हिरोइनों के खांसने और पेट खराब होने की खबर मीडिया  दिखाता है पर इन गरीबों की सुध खबर लेने वाला कोई नहीं है।आज के इस आधुनिक समय में भी इस तरह का जीवन जीने के लिए लोग मजबूर हैं।

न जाने कितने परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके थे, लेकिन डर के मारे जी भर के रो भी नहीं पाते थे।आंसुओं को पी जाते थे।खुद को मार भी नहीं सकते थे वरना बहुत पहले ही इस दुनिया को विदा कर दिए होते।

विरंजन को चाय की तलब लगी तो गांव के एक घर में पहुंच गए।दरअसल कैंप में चाय का बंदोबस्त सुबह आठ बजे के बाद होता था।आज उनकी नींद जल्दी खुल गई थी।नित्यक्रिया से निवृत्त होकर वह चाय के जुगाड़ में इधर-उधर बहुत भटके, लेकिन कोई चायवाला नहीं दिखा।घर के बाहर रानी बर्तन धो रही थी।घर में एक गाय भी बंधी थी।उसी को देखकर विरंजन घर के सामने बने चबूतरे पर बैठ गए।

पुलिसवाले को देखकर रानी कांप गई।उसके हाथ से बर्तन छूट गए।विभिन्न प्रकार के डरावने विचार मन में तैरने उतराने लगे।कुछ गलती तो नहीं हो गई है? किसी ने पुलिस वालों के कान तो नहीं भर दिए हैं?

विरंजन, रानी के डर को भांप गए और बोले, ‘डर मत।तेरा मरद कहां है?’
‘सो रहा है।’ सर को पूरी तरह से घूंघट से ढककर रानी ने धीरे से कहा।
‘उठा उसे।बड़ा आलसी है।इतना दिन चढ़ आया और वह सो रहा है।’
‘रात को जूड़ी आ गई थी।पूरा बदन तप रहा था।’
‘फिर आराम कर लेने दे।’

रानी भीतर चली गई।वह सोच रही थी कि पुलिस वाला उठकर चला जाएगा पर विरंजन तो चाय पीने के लिए आए थे।

रानी ने देखा कि चंगू अभी गहरी नींद में थे।उसने उठाना उचित नहीं समझा।रात के तीसरे पहर तो किसी तरह नींद आई थी।दो पहर तो कराहते-कराहते ही निकल गए थे।कोई जड़ी बूटी और दवा भी नहीं थी कि पिला देती।फिर सोचा कि कहीं हाकिम साहब नाराज न हो जाएं।

‘उठो मुनिया के बाबू।हाकिम साहब बैठे हैं।’ उसने धीरे से आवाज दी।
‘हाकिम !… कौन हाकिम?’ चंगू डर के मारे हड़बड़ाते हुए उठ बैठे।
‘वर्दी वाले हाकिम!’
‘सरकारी वर्दी कि जंगल वाली वर्दी?’
‘सरकारी !
‘कब से बैठे हैं?’
‘बीस मिनट हो गए।’
‘हमको उठा क्यों नहीं दिया?’ चंगू गुस्से से बोले।
‘हम सोचे कि तबीयत ठीक नहीं है, इसीलिए नहीं उठाया।’
‘अरे, हम मर थोड़ी रहे थे।साहब लोग कहीं नाराज हो गए तो लेने के देने पड़ जाएंगे।’
चंगू जल्दी से तैयार हुआ और बाहर आकर विरंजन के कदमों में लेट गया।
‘अरे, उठो… उठो… यह क्या कर रहे हो।’  हवलदार साहब ने कहा।
‘क्षमा हजूर… घरवाली ने बताया नहीं था।औरत जाति के सहूर ही कितना होता है, आप तो जानते ही हैं।’
‘कोई बात नहीं।’
‘कौनो काम रहा हजूर?’ चंगू ने हाथ जोड़कर पूछा।
‘वोट दे रहे हो कि नहीं?’
चंगू चुप रहा।
‘डरो मत… हम लोग साथ में रहेंगे।सरकार साथ में है तो फिर काहे की और किसकी फिकर।’
चंगू ने बात को बदलने के लिए रानी को आवाज लगाई।
‘साहब के लिए कुछ चाय साय बनाएगी कि नहीं, मुनिया की महतारी?’
विरंजन खुश हो गए।इसी के इंतजार में तो वह इतनी देर से बैठे हुए थे।

इधर रानी सोच में पड़ गई।गाय को दुहा जरूर था पर बछड़े ने बर्तन को लात मार दिया था और इस वजह से पूरा दूध जमीन पर लुढ़क गया था।जहां दूध गिरा था वहीं पर घर के लोग दातून मुखारी करते थे अतः उसे जमीन से उठाया भी नहीं जा सकता था कि छानकर कुछ काम आ जाता।कुछ समझ में नहीं आ रहा था।साहब को चाय नहीं पिलाएगी तो वह बुरा मान जाएंगे।सोचेंगे कि हम लोग उधर मिले हुए हैं।शक के आधार पर चंगू को पकड़कर जेल में बंद कर सकते हैं।उसकी जमकर कुटाई करेंगे।दो हड्डी पसली का तो आदमी है।कहीं कुछ हो गया तो? कैसे पलेगी उसकी मुनिया? कहां से लाऊं दूध? कैसे बनाऊं चाय? पड़ोसियों के यहां के गाय-भैंस भी छूटे हुए हैं कि उनसे मांग लाती।
‘जल्दी करो… साहब को कैंप जाना है।’ चंगू ने आवाज लगाई।

रानी सुनकर परेशान हो गई।कोई जुगत समझ में नहीं आ रही थी।वह अरबा में रखे सारे बर्तनों की तरफ देख रही थी।दूध पावडर का डिब्बा पूरी तरह खाली था। अचानक उसके दिमाग में एक उपाय कौंधा और उसने मुनिया को गोंद से उतारकर नीचे बैठा दिया।
उपाय काम आ गया।उसने एक कप चाय बनाई और साहब को ले जाकर दी।
‘तुम नहीं पिओगे चंगू?’ विरंजन ने पूछा।
‘हजूर!… हम बाद में पी लेंगे।रानी ने एक कप ही चाय बनाई है।शायद अभी दूध नहीं दुहा है।’
‘इसी को आधा-आधा कर लो।’
‘नहीं हजूर! हमारी इतनी औकात कहां कि आपसे कुछ बांटने का सोच सकें।आप पीजिए।हमारा सौभाग्य है कि साहब जी की छोटी-सी खातिरदारी करने का मौका मिला है।’
हवलदार साहब को बड़ी तेज तलब लगी थी।वह सुडुक-सुडुक कर चाय की चुसकियां लेने लगे।
स्वाद कुछ अलग सा था पर तलब ऐसी थी कि चाय को छोड़ नहीं सकते थे।

जब कप में बिलकुल थोड़ी-सी चाय बची तब अचानक दिमाग में घंटी बजी।वह इन इलाकों के तरह-तरह के किस्से सुन चुके थे।यहां पता ही नहीं चलता है कि कौन आम नागरिक है और कौन नक्सली।साधारण वेश-भूसा में वह आम नागरिकों के बीच बैठे रहते हैं और खबरें इकट्ठा करते हैं।गांव के कई लोग खुद इन संगठनों से जुड़े होते हैं।

‘इसका स्वाद कसैला क्यों है?’ विरंजन ने चौंकते हुए पूछा।
‘कसैला! साहब हमारे यहां तो गाय के दूध की शुद्ध चाय बनती है।हमारे घर के चाय की प्रशंसा तो सब लोग करते हैं।जो भी एक बार पी लेता है वह बार-बार पीना चाहता है।’
‘हमें बेवकूफ बना रहे हो।इसमें जहर मिलाकर मुझे मार डालना चाहते हो।’
‘बच्ची की कसम हजूर! मुनिया की महतारी ऐसा कभी नहीं कर सकती।हम लोग तो घर आए मेहमान को भगवान के बराबर दर्जा देते हैं।हम आपको क्यों मारेंगे?’
‘मुझे शुरू में ही कुछ शंका हुई थी।जब तुमने वोट डालने के प्रश्न पर कोई रुचि नहीं दिखाई थी।चाय भी तुमने सिर्फ मेरे लिए ही बनवाई थी।’
‘हजूर! उन लोगों ने धमकी दी है कि यदि किसी ने वोट डाला तो उसे बड़ी खतरनाक सजा देंगे।अब आप ही बताइए मालिक कि हम क्या करें? आप लोग तो कुछ दिन के बाद यहां से चले जाएंगे, तब हमारी रक्षा कौन करेगा? वे लोग तो यहीं बने रहते हैं।’
‘नौटंकी बंद कर बेवकूफ।बुला अपनी पत्नी को और पूछ कि उसने चाय में क्या मिलाया है?’

यह कहकर विरंजन ने चंगू के पैर में दो बेंत मारी।विरंजन मान लिए कि अब ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह पाएंगे, अतः उठकर कैंप की तरफ जाने लगे।साथ में चंगू और रानी को भी कैंप चलने के लिए कहा।
मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।कौन देखभाल करेगा उनकी? घर यहाँ से बहुत दूर है।पत्नी को सब कुछ बता भी नहीं पाया।उसे तो बैंक का कोई काम नहीं आता है।पता नहीं पासबुक वगैरह कहां रख दिया है।हे भगवान! इतनी भी क्या जल्दी थी।इसीलिए कहते हैं कि किसी चीज की तलब बेकार होती है।एक-दो घंटे सब्र कर लेता तो यह नौबत ही क्यों आती।

विरंजन बड़बड़ाते जा रहे थे और तेजी से चल रहे थे।चंगू की तबीयत ठीक नहीं थी।उसे तेज चलने में बड़ी तकलीफ हो रही थी।हांफते हुए वह भाग रहा था।रानी मुनिया को गोद में बैठाए चंगू के पीछे-पीछे चल रही थी।

कैंप में पहुंचते ही विरंजन ने साथियों से कहा कि उसके पास समय बहुत कम है।हो सके तो उसे घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए।साथियों को उसने पूरी बात विस्तार से बताई।

पुलिस कैंप में हड़कंप मच गया।विरंजन इतना जल्दी उनको छोड़कर कैसे जा सकता है ? सब लोग लात घूंसों से चंगू और रानी की पिटाई करने लगे।चंगू की बात सुनने को कोई तैयार ही नहीं हो रहा था।हाथ जोड़े दया की भीख मांगते हुए वह मार खाए जा रहा था।

रानी को जब समझ आ गया कि अब बिना सच बोले जान बचाना मुश्किल है तो वह जोर से चिल्लाई।
‘आप लोग सच जानना चाहते हैं न मालिक, तो सुनिए! जो दूध मुनिया को पिलाती हूँ, उसी को कप भर निकालकर चाय बनाई है।’

इस एक वाक्य के कारण चारों तरफ सन्नाटा छा गया।सब लोग सन्न रह गए।सबका गला सूख गया।
सन्नाटा तोड़ते हुए रानी ने आगे कहा, ‘साहब घर आए थे।मुनिया के बाबू ने जब चाय बनाने के लिए कहा, तो मैं परेशान हो गई।दूध घर में था नहीं।साहब लोगों के गुस्से के बारे में हम लोग सब कुछ जानते हैं।चाय नहीं बनाती तो साहब विरोधी पक्ष का समझ लेते।मारते-पीटते।अचानक मेरे दिमाग में चाय बनाने का यह तरीका आया।मुझे नहीं मालूम था कि इसका स्वाद कुछ अलग होगा।हम लोग गरीब इनसान हैं लेकिन इतने अमानवीय नहीं हैं कि घर आए मेहमान को जहर खिला दें।’

विरंजन सन्न रह गया।डर और क्रोध पिघलकर पश्चाताप में परिणत हो गए।वह पश्चाताप की अग्नि में झुलसने लगा।खुद को धिक्कारने लगा।आत्मग्लानि की वेदना उसके हृदय को चीरने लगी।एक झटके में ही रानी ने उसे तुच्छ साबित कर दिया।उसे लगने लगा कि रानी का व्यक्तित्व कितना विराट है और उसका कितना छोटा।

विरंजन के संस्कार जाग गए।पुरुखों और बड़े बुजुर्गों की समझाइस मानो मन मस्तिष्क की गहरी परतों से निकलकर ऊपरी सतह पर आ गई।वह रानी के चरणों में लोट गया।रो-रोकर माफी मांगने लगा।भूल गया कि वह हवलदार है और उसके साथी कर्मी वहीं खड़े हैं।

हाथ जोड़कर बोलता जा रहा था, ‘तुमने मुझे सदा-सदा के लिए कर्जदार बना दिया है।मैं इस ऋण को कैसे चुका पाऊंगा? मुझे माफ कर दो।माफ नहीं करोगी तो मैं इस बोझ को सह नहीं पाऊंगा।’

सत्य की अनुभूति इनसान का परिचय उसके वास्तविक स्वरूप से करा देती है।वास्तविक स्वरूप जो प्रेम से भरा हुआ पूर्णतः अभिमान रहित होता है। चंगू भागकर आया और विरंजन को पकड़कर रानी के चरणों से उठाया और बोला, ‘आप यह क्या कर रहे हैं हजूर? हर कोई हम लोगों के ऊपर ऐसे ही शक करता है।समय ही खराब है।किसी का दोष नहीं है।अविश्वास ने हमारी मानवीयता पर ग्रहण लगा दिया है।भाई-भाई एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं।एक दूसरे को मार रहे हैं।आप पश्चाताप न करे साहब!’
‘मैं तुम लोगों के सामने बहुत बौना हो गया हूँ चंगू।हो सके तो माफ करें देना।’ विरंजन ने चंगू को छाती से चिपकाते हुए कहा।

चंगू का बदन तप रहा था लेकिन प्रेमरूपी नदी में बहते पानी से उसका तापमान घटने लगा।विरंजन को जैसे ही चंगू की बीमारी याद आई, उसने कैंप में उपस्थित डाक्टर से चंगू को देखने के लिए कहा।अब तक गांव के अन्य लोग भी इकट्ठा हो चुके थे।सबकी आंखें आंसुओं से भीग गई थीं।प्रेम ने अविश्वास और घृणा को क्षण भर में भस्म कर दिया था।

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