वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी।अद्यतन कविता संग्रह उम्मीद चिनगारी की तरह।साहित्यिक पत्रिका रेवान्तके प्रधान संपादक।

सुख-चरम सुख

सुख!
क्या होता है यह?

चरम सुख!
क्या है यह बला?

मैं कहां जान पाई
सुख, चरम सुख

और पता नहीं क्या क्या सुख…
बचपन से मां-बापू से सुनती आई हूँ
कि पार लगाना है
पार लग जाए तो जिनगी सकारथ

उन्हें पार लगाना था
मुझे पार करना था
उनका सुख पार लगाने में था
मेरा सुख पार करने में था

इस पार को पार करने में
मैंने बहुत हाथ पांव मारे
किनारा कहीं नहीं था
जल ही जल था

मैं जल-जंतुओं से दूर
भागती रही, भागती रही और भागती रही…
पर भाग कर जाती कहां
जल क्रीड़ा में शामिल होना
मेरी नियति थी

यही था मेरा सुख
और यही था उनका चरम सुख!

सिर्फ शून्य

नदी हो या पहाड़
जंगल हो या झरने

जिन्होंने नहीं बनाया
इन्हें रचने और गढ़ने में
जिनका नहीं कोई हाथ
वे डकार जा रहे पूरी नदी को

उन्होंने पहाड़ों के पेट में
भर दिया है इतना बारूद व विस्फोटक
कि उनके जिस्म का
कोई भी हिस्सा नहीं बचा है साबुत

वे हरे-भरे जंगल से नहीं
कंक्रीट के जंगल से प्यार करते हैं
और इसे ही
वे उगा रहे हैं धरती पर

यह जो हो रहा है
और वे जो कर रहे हैं
आखिरकार किस अधिकार से
जबकि कर्तव्य के खाते में
उनके हिस्से शून्य है
सिर्फ शून्य!

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