मुंबई विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक। ताजा किताब ‘भय आक्रांत’(कथेतर गद्य)।

 

इस समय पूरा विश्व एक बड़ी त्रासदी से गुजर रहा है। देशों की उन्नत सभ्यताओं को एक अदृश्य वायरस ने बौना कर दिया है। मध्यम वर्गीय परिवार का व्यक्ति आज फिर से संघर्ष के उसी बिंदु पर आ कर खड़ा हो गया, जहां से कभी उसने शुरुआत की थी।

यह भूमंडलीकरण का प्रभाव है कि पड़ोसी देश के एक शहर से निकली बीमारी ने उसके अपने देश के अन्य हिस्सों को अछूता छोड़ कुछ ही महीनों में विश्व के 218 देशों को अपनी चपेट में ले लिया। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही महीनों में धीरे-धीरे कोरोना महामारी एक महावृत्तांत में बदल गई। इसने ऐसी असंख्य अनपेक्षित कहानियों को जन्म दिया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

हिंदी में महामारी की त्रासदी पर अब तक जितना भी देखने और सुनने को मिला, गद्य में मिला। यह पहली बार है कि महामारी की त्रासदी की अभिव्यक्ति गद्य के अलावा अन्य विधाओं और खासकर कविता में भी देखने को मिली। इस दौर में संजय कुंदन के संपादन में एक संकलन भी आया है। ‘कोरोना के कवि’। कोरोना काल में कई तरह से कविताएं प्रकाश में आई हैं। उन्हीं दिनों सजग एवं संवेदनशील कवि विजय कुमार की वॉल पर एक कविता पढ़ी थी ‘शब्दों के बाहर था यह सब’। यदि उनकी कविता से एक पंक्ति उधार ले कर कहूँ तो उस समय देश में जो परिदृश्य बना, वह शब्दों से बाहर की चीज थी। शब्द भी लाचार हो गए और भाषा निरीह लगने लगी, ‘यातनाओं के वे पल/केवल दृश्य थे/केवल दृश्य/सुबह से शाम तक/देर रात तक केवल दृश्य/तपती धूप/कंकरीली सड़क/टूटी-सी चप्पलें/असहनीय भूख सूनी-सूनी आंखें/पांवों के छाले/औरतें उनके टूटे हुए शरीर/और वे कितना सह सकती हैं/औरत होने के मायने भी खत्म हुए वहां।’

भारत की सड़कों पर सुबह से शाम तक दृश्य ही दृश्य चले जा रहे थे। पसीने, आंसू और रक्त से सने हुए दृश्य। सड़कों और गालों पर धूप से सूख चुके दृश्य। त्रासदी के दृश्य जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। हमने कहां सोचा था कि इक्कीसवीं सदी में शहरों से गांवों की ओर कभी ऐसा पलायन होगा। लंबे समय तक शहर में अपना खूनपसीना बहाने वाला वर्ग इस तरह एक हुजूम का हिस्सा बन कर एक दिन भूखेप्यासे, असुरक्षित और असहाय अपने गांवों की ओर पैदल चलते चले जाने पर विवश हो जाएगा।

सिर पर गृहस्थी की गठरी लादे अपने स्वाभिमान को होठों के कोनों में दबाए चुपचाप चलते पुरुष और उनके पीछे-पीछे गोद में बच्चा थामे किसी शून्य में डूबी चलती चली जातीं स्त्रियां। कभी गठरी, कभी गर्भ और कभी नन्हीं उंगलियों को थामे कठोर पथ पर चलती हुई करुणा को इस प्रकार प्रकट रूप में शायद ही इससे पहले कभी देखा गया होगा। इन्हीं दृश्यों पर संजय कुंदन लिखते हैं, ‘जैसे आए थे वैसे ही जा रहे हम/यही दो-चार पोटलियां साथ थीं तब भी/आज भी हैं/और यह देह/लेकिन अब आत्मा पर खरोचें कितनी बढ़ गई हैं/कौन देखता है/हम जा रहे/यह सोचकर कि हमारा भी एक घर था कभी/अब वह न भी हो/तब भी उसी दिशा में जा रहे हम।’

यह वह समय था जब घर के होने का महत्व अचानक बढ़ गया था। जिनके पास घर थे, वे अपने घरों में सुरक्षित हो गए। जिनके शहर भर की इमारतों की ईंटों और छतों पर उंगलियों के निशान थे, वे लॉकडाउन के दूसरे ही दिन दिल्ली की बस्तियों से बेघर कर दिए गए। बस्तियों से हजारों की संख्या में निकले दिहाड़ी मजदूर पैदल चलते हुए दिल्ली की सड़कें नाप रहे थे। उन्हें भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। अपने उस गांव पहुंचना था जहां बंदी खत्म होने तक बिना किराए वाली छत नसीब हो सकती थी। यह राइज होते इंडिया में अस्त हो रहे भारत के त्रासद दृश्य थे। इसने कई रचनाकारों को उद्वेलित किया। संध्या कुलकर्णी अपनी कविता में बताती हैं, ‘अश्लील है/आंखें बंद कर लेना/कमजोर मजदूरों की ओर से/जब जीवन लगा हो दांव पर/अश्लील है/मजदूरों की सड़क पे बेहिसाब मौत के दृश्य के बाद/बज जाना/धांसू सा कोई विज्ञापन/अश्लील है जन याचिकाओं को अवैध ठहराना/मनुष्य की जींस को नकार देना/मनुष्यता का बूंद भर पानी में/डूबो दिया जाना।’

जिस टीवी स्क्रीन पर दर्द और आंसू के कारुणिक दृश्य दिखाए जा रहे थे वहीं इनके लिए चैनल वालों को प्रायोजित विज्ञापनों का सहारा लेना पड़ा। विज्ञापनों के फ्लैश होते ही पल भर पहले के वे कारुणिक दृश्य पल भर बाद उपभोग के किसी बेपरवाह दृश्यों में खो जाते। एक धांसू धुन में उतर जाने के बाद अचानक वह पूरा अमानवीय माहौल हमारे मानस पटल से विस्मृत हो जाता। कुछ देर उस शून्य में खोए रहने के बाद जब हम फिर से उन कारुणिक दृश्यों में लौटते तो करुणा और मन के बीच के नाजुक तार टूट चुके होते थे।

अश्लीलता का एक दूसरा उदाहरण ज्योति चावला अपनी कविता उनके पैरों की आवाज से कांप रही है पृथ्वीमें प्रस्तुत करती हैं, ‘जिस समय तुम जिक्र कर रहे हो/दुनिया के सबसे स्वादिष्ट व्यंजन का/वे लोग रोटी की तलाश में चल दिए हैं तपती सड़कों पर/अपने अदृश्य घरों की ओर/जिस समय तुम तैयार कर रहे हो अपनी देह को/किसी अदृश्य ताकत से लड़ने के लिए/वे सड़क पर नोच कर खा रहे हैं मरे हुए जानवरों का मांस।

क्या नई सदी का नया समाज बिलकुल संवेदनहीन है? इंसान से इंसान में संक्रमित होने वाली बीमारी के दौर में जब पूरा शहर लॉकडाउन था तब उन सैकड़ों मजदूरों का बिना मास्क और सैनिटाइजर के आंख मलते, भूखे-प्यासे सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते चले जाना किसके हित में था?

आखिरकार ये एक करोड़ लोग शहर छोड़ कर गांवों की ओर क्यों गए? इसका उत्तर देते हुए कवि देवी प्रसाद मिश्र अपनी कविता में कहते हैं, ‘अगर हमने तय किया होता कि हम गांव नहीं जाएंगे तो हम बताते कि/मेज पर किताब रख कर पढ़ने से कम बड़ा काम नहीं है मेज बनाना/तब हम पूछते कि सिर पर ईंट ढोना/एक अच्छे घर में रहने की हकदारी और दावेदारी को किस तरह कम कर देता है/हम बताते कि शहर की रोशनी को ठीक करके लौटने के बाद/अपने घर के अंधेरे में लौटते हुए हमारा दिल कितना फटता है।’

‘अगर हमने तय किया होता कि हम नहीं जाएंगे तो हम पूछते कि क्यों/अखबार बांटने वाले के घर का चूल्हा जल जाए तो गनीमत/जबकि खबर का धंधा करने वाला अरबों के धंधे में लिथड़ा रहता है/और रोज थोड़ा-थोड़ा धीमा-धीमा देश जलाने का काम करता है।’

इन पंक्तियों को पढ़ लेने के बाद जैसे भीतर ही भीतर धीरे-धीरे कुछ सुलगने लगता है। यहां यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह पलायन नहीं था। रेलें अचानक बंद कर दी गई थीं। राज्यों के बीच परिवहन रोक दिए गए थे। रोजगार शून्य पर पहुंच गया था, लेकिन पेट का खोड़र लॉकडाउन की सुबह भी रोटी मांग रहा था।

इतने बड़े जन समुदाय के अचानक गांव पहुंचने पर अवश्य ही ग्रामीण जीवन में एक उथलपुथल मची होगी जिसकी ओर संकेत करते हुए विष्णु नागर लिखते हैं, ‘एक नर्क चला जाएगा/एक नर्क आ जाएगा/अपना होकर भी/जो कभी अपना नहीं रहा/वह आसमान आ जाएगा/गांव आ जाएगा/एक दिन फिर लौटने के लिए/आंधी बन लौटने के लिए/गांव आएगा/मौत आ जाएगी/शहर की आड़ होगी/गांव छिप जाएगा।

इसमें अपनों के अपना न होने का गहरा दर्द है। हर बार के घर जाने और इस बार के घर जाने के बीच का जो फर्क है वहीं इस कविता में ‘नर्क’ है।  मनुष्य की ईमानदारी, उसके कौशल और स्वाभिमान पर चोट नारकीय यातना के समान नहीं तो और क्या मानी जाएगी।

कोरोना महामारी के चलते जो स्थितियां देश में बनीं, उससे देश का कोई वर्ग अछूता नहीं रहा। संक्रमण के डर से लगी तालाबंदी ने लगभग हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर आयु के व्यक्ति को प्रभावित किया। बेरोजगारी के चलते युवा और महामारी के चलते वृद्ध अधिक पीड़ित हुए, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों तक से उनके खेलने-कूदने के अधिकार छिन गए। बच्चे महीनों तक घर में कैद रहने पर विवश हो गए। कुछ बच्चे ऐसे भी थे जो अपनी मां की उंगली थामे अपने छोटे से जीवन की सबसे लंबी यात्रा कर रहे थे। धूप और धूल की मार सहते कंधों पर लदे शिशु, जाने किसके लिए बोझ थे। निरंजन श्रोत्रिय लिखते हैं, ‘गहरी नींद में भी वह लेता है सिसकियां देर तक/ये सिसकियां पीड़ा का निस्पंद हैं/अधिक विचलित करतीं उसके रोने से भी/जब उस बच्चे की नींद में अटकी ये सिसकियां थमेंगी/कोरोना तभी जाएगा।’

मानस पटल पर अंकित कई चित्र भविष्य को ही नहीं वर्तमान को बेचैन किए हुए हैं। इस बेचैनी को उन दिनों हममें से कइयों ने महसूस किया है। उन्हीं अनुभूतियों को शब्द देते हुए हरि मृदुल अपनी कविता ‘फिर भी’ में लिखते हैं, ‘पंखा सरसरा रहा है/पांच नंबर पर/अपनी अधिकतम सामर्थ्य के साथ/फिर भी हवा गायब लगती है/फिर भी पी जाता है कोई न कोई मच्छर/नमक सी निरंतर गल रही देह से खून/बच्चे गहरी नींद में हैं फिर भी/फिर भी बीवी कई बार करवट बदल चुकी है/मैं सोया नहीं हूँ फिर भी/आंख मूंद कर पड़ा हुआ हूँ/बिस्तर पर चुपचाप।’ जिनके पास घर है उनकी आंखों में भी नींद नहीं है।

ऐसी पीड़ाएं निम्न वर्ग ने बड़े पैमाने पर झेलीं, लेकिन मध्य वर्ग भी लगातार छटपटाता रहा। न जाने कितनी ही स्त्रियों और पुरुषों ने सड़कों पर मासूम भूख को देख कर उन दिनों अपनी थाली में रखी रोटी को चुपचाप उठाकर थाली से बाहर कर दिया। कितनों ने ही हाथ में लिए हुए निवाले को गटक लेने में अपराध का अनुभवबोध किया। ऐसा भी हुआ कि पटरी पर बिछी गोल रोटियां रेल के पहियों की तरह दौड़ कर नींद में घुस जाती रहीं और बिस्तर पर पड़ा कवि जाने कितनी ही रातें छटपटाता रहा, ठीक जैसे उस रात पटरी पर सोए लोग छटपटाए होंगे।

एक दूसरी मनोदशा देखिए जहाँ संक्रमण के डर से घर में कैद व्यक्ति खिड़की से बाहर की हलचलों को देखता-सुनता है। वह समझने का प्रयास करता है। एक खिड़की ही है जो उसे बाहर की दुनिया से जोड़ती है। बाहर से रह-रह कर एम्बुलेंस की आवाजें आती हैं और एक-एक कर बीमार को उठा ले जाती हैं। एक समय बाद बाहर की हलचलें थम जाती हैं, लेकिन वे फिर घर में कैद व्यक्ति के भीतर सुनाई देने लगती हैं। बोधिसत्व की ये पंक्तियां जो कोरोना काल में आम जन के भीतर की व्याकुलता को शब्द देती हैं, ‘किसे ले गए लोग?/ क्यों ले गए?/कौन लोग हैं जो रोना नहीं भूल पाए/अब तक इस भौतिक संसार में/खिड़की खोल कर देखता हूँ/बेमियादी कैद से/बाहर झांकने की यही सीमा है/दुख और यातना का कारण जान भी लूं/तो भी क्या कर लूंगा/फिर भी/किसे और क्यों ले गए लोग/यह ठीक-ठीक जानने को आतुर/झांकता हूँ बार-बार बाहर।’

उन्हीं दिनों ‘मुक्तिपथ पेज’ के कार्यक्रम में बात करते हुए वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी कह रहे थे कि कविता लिखने के लिए कवि में संवेदना के साथ साहस का होना जरूरी है। उनके कहे अनुसार अपने समय में कविता के जरिए हस्तक्षेप करते हुए कवि साहस के साथ अपने को ही नहीं बचाता बल्कि अपनी भाषा और सभ्यता को भी बचाता, है। जहां मनुष्य की सत्ता समाप्त हो जाती है वहीं एक छोटी सी चिड़िया अपने हस्तक्षेप से मौन को चीरती है। इस साहस को एक छोटी-सी कविता में अभिव्यक्त करते हुए वे लिखते हैं,

इस निर्जन को भंग करती है/एक चिड़िया की चहचहाहट/भाषा के निर्जन में/कविता एक मौन मार्ग है।यह उन दिनों की विवशता है जिसके हम सब भुक्तभोगी थे। एक डरावनी शांति, संदेह और अकेलेपन के दिनों में चिड़िया की मासूम चहचहाहट बचे रहने का आश्वासन देती थी।

इस निर्जन समय में सबके होते हुए भी आदमी बिलकुल अकेला हो गया। ऐसे समय में उसके भीतर के डरावने मौन को सुनने का प्रयास जरूरी है। उन स्थितियों का अध्ययन जरूरी है जिनमें मनुष्य निराशा से भर गया था। इन स्थितियों में देश ने अपने को विश्व से, राज्यों ने अपने को देश से, गांव ने अपने को शहर से और इंसान ने अपने को समुदाय से काट कर अलग कर लिया था। उसी अकेलेपन में कुछ ऐसे भी थे जिन्हें अवसाद के धुंध ने घेर लिया। उन स्थितियों में कुछ संवेदनशील हृदयों ने निराशा से बचने के लिए खुदकुशी का रास्ता चुना। इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को ‘खुदकुशी’ कविता में उठाते हुए कवि विनोद दास लिखते हैं, ‘एक अरब से ज्यादा की आबादी में/दरअसल उनके लिए न कोई कंधा था/न ही आगे बढ़ा कोई हाथ/आशा भी छोड़ चुकी थी साथ/वे अपने दुख में इतने अकेले, पराजित और कातर थे/कि जिंदगी की अंतिम गली में/सिर्फ उनके पास बचने के लिए मृत्यु ही थी।’

यह लज्जा की बात है कि हमारा समाज ऐसा निर्मम और स्वकेंद्रित बन गया है कि अपने आगे दूसरा दिखाई ही नहीं देता। कोरोना कोई पहली महामारी नहीं है। इससे पहले भी लोगों ने महामारियों को झेला है। बेरोजगारी, अकेलापन, उदासी और निराशा जीवन के अंधेरे पक्ष हो सकते हैं। लेकिन जीने की आस्था और जीने का साहस किसी भी उदासीनता से ऊपर की चीज है। हमें जीवन का सम्मान करते हुए जीवन को जीना है। डर और अकेला कर देने वाली आशंकाओं से बाहर निकलना है। पूरे आत्मविश्वास और पूरी जिजीविषा के साथ इस जीवन को इसी जीवन में जीना है।

कोरोना काल का संकट वास्तव में सभ्यता का संकट है। यह सिर्फ संक्रमण फैलने का मामला नहीं है। इस संकट ने हमें एक दूसरे के प्रति सशंकित कर दिया है। सामाजिक दूरी के नाम पर समुदाय से काट कर हमें अकेला कर दिया है। हम एक अदृश्य भय से डरे हुए है। इतना कि एक सामान्य से फल बेचने वाले से फल खरीदते समय उसके ठेले पर रखे लाल रंग के सेब को हाथ में लेने से डर रहे हैं, जैसे वह सेब न होकर परमाणु का गोला हो।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीने वाला व्यक्ति भी आज भौतिक वस्तुओं में अदृश्य की कल्पना से डरने लगा है। जबकि वास्तव में हम वस्तुओं और व्यक्तियों से नहीं, अपनी शंका और आशंकाओं से डरे हुए हैं, जो हमारे दिलों और दिमाग में उपजाई जा रही हैं। संक्रमण के डर से एक भरा-पूरा परिवार अपने संक्रमित बूढ़े मां-बाप को अकेला छोड़ कर भाग रहा है। लोग बीमार की सहायता करने से डर रहे हैं। पड़ोसियों को देख कर पड़ोसी मुंह फेर रहा है। एक दूसरे के ठीक सामने होते हुए भी लोग एक दूसरे को अकेला छोड़ रहे हैं। हमने सोशल मीडिया को अपनी दुनिया बना ली और जो दुनिया हमारे आस-पास थी उसके प्रति हमने अपने कानों में रुई ठूंस ली।

संक्रमण के भय ने समाज की मानसिकता को बदल दिया है। इस समय ने हमें लूटना सिखाया है। किसी और को सामान मिले न मिले, लेकिन मेरे परिवार के लिए चार महीनों का राशन घर में सुरक्षित हो जाना चाहिए जैसे भावों से हम भर गए। हमने सुना था कि अगला युद्ध यदि हुआ तो पानी के लिए होगा, लेकिन इस महामारी में हमने अमेरिका-यूरोप जैसे समृद्ध देशों में लोगों को टॉयलेट पेपर के लिए लड़ते देखा। टीवी न्यूज चैनलों के एंकर्स के चेहरे उनके भावों के साथ आज भी याद हैं। उन्होंने चीख-चीख कर दूसरों पर शक करना सिखाया।

कोरोना संक्रमण का रोग तो फैल रहा है, लेकिन झूठ और भ्रम का एक घातक रोग भी समाज को घेरे हुए है। संक्रमितों और मृतकों के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन परिदृश्य में न रोग दिख रहा है और न रोगी!

एक समय था जब लेखक की लेखनी जनता की आवाज होती थी। मीडिया तटस्थ होता था, वह जनता का विश्वास होता था। इस दौरान टीवी हर दस-बीस मिनट पर उलूल-जुलूल मुद्दे उठा कर चिल्लाता रहा और एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों को अपने साथ खड़ा बताता रहा, जबकि सचाई यह है कि इस बीच बेरोजगार हो चुके दो करोड़ युवा सड़क पर, सिग्नल पर, कतारों में जरूरत भर की सैलरी वाले जॉब का पता पूछते फिर रहे हैं। एक करोड़ लोग जो शहर से गांव की ओर गए थे वे गांवों में अपमानित होकर शहर लौट रहे हैं। लाखों विद्यार्थी ऑनलाइन पर, लाखों लोग अपनी जान की परवाह किए बिना रात की रोटी के लिए कोरोना संक्रमितों के बीच काम कर रहे हैं। कई करोड़ व्यापारी अपनी उजड़ी हुई दुकानों और उखड़ी हुई कमाई की जड़ें जमाने मे जुटे हैं। जिस समय आधे से ज्यादा भारत अपने-अपने संघर्षों, अपनी चुनौतियों से जूझने में लगा हुआ है तो फिर वह कौन-सी जनता है जो मनगढ़ंत कहानियों पर मीडिया के साथ खड़ी है?

हम अपने आस-पास ऐसे तमाम लोगों को देख रहे हैं जो हर घर से कूड़ा इकठ्ठा कर रहे हैं। उस स्त्री को भी जो अपने छोटे-छोटे बच्चों को घर पर छोड़ कर हर सुबह सड़क पर झाडू लगा रही है। फेरीवाला गली मोहल्लों में घूम कर फल और सब्जी बेच रहा है। दूधवाला हर घर में सुबह दूध पहुंचा रहा है। ऐसा नहीं कि उन्हें संक्रमण का डर नहीं है। उनके लिए भूख की समस्या रंगीन पर्दे पर परोसी जा रही समस्या से कई गुना बड़ी है।

इस बीच कविता में बहुत लिखा गया और बेहद संवेदनशील लिखा गया। कई रचनाकारों ने अपने-अपने शब्दों में अपने भावों को अभिव्यक्त किया है। यहां सबका जिक्र संभव नहीं है। इन सबके बीच कुछ खाए-पिए अघाए हृदयरहित व्यक्तियों द्वारा गिराए गए झूठे आंसुओं की सूखी बूंदे भी हैं।

अनामिका अनु अपनी कविता मैं क्वारंटीन में हूँमें लिखती हैं, ‘न्यूज में बता रहे हैं/तुम्हें स्टेशन पर से मार डंडे भगा देते हैं/भोर से कुछ नहीं खाया डंडों के सिवा/पांच सौ रुपये थे/सोते में कोई जेब से निकाल ले गया/इतनी गंदगी और मच्छर में तुम सो कैसे गए? भैंस हो? बस आई थी, बैठ जाते/छत का पाँच सौ, भीतर बैठने का हजार!

लेकिन इन सारे शब्दों से परे का एक जरूरी शब्द ‘प्यार’ है, जिसका इस समय अकाल पड़ा हुआ है। ‘प्यार’ जैसे इस दौर का सबसे बदनसीब शब्द बन गया है जबकि मानवता को बचाने वाले इस शब्द की इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है। उसके होने की एक खूबसूरत कल्पना करते हुए स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी कविता में लिखते हैं, ‘कितना अच्छा हो कि प्रेम का कोई वायरस हो/और उससे सारी दुनिया संक्रमित हो जाए/तानाशाह मनुष्य बन जाए और मनुष्य पहले से श्रेष्ठ/कितना अच्छा हो दुनिया की सारी/भाषाएं खत्म हो जाएं/और प्रेम हमारे संवाद की भाषा बन जाए।’

साहित्य मानव समाज की श्रेष्ठतम निधि जरूर है, लेकिन मनुष्य का जीवन साहित्य से कहीं बड़ा है। कविता में जीवन की व्याख्या है, लेकिन जहां दर्द है, पीड़ा है, संघर्ष है, लेकिन कहने का साहस नहीं, जिनके पास शब्द नहीं, जिनमें अभिव्यक्ति की कला नहीं, जीवन वहां भी है। हो सकता है कि कोरोना काल में जो देखा गया, लिखा गया वह बहुत सीमित हो। हो सकता है कि पीड़ाओं की दुनिया कवियों की पहुंच से दूर कुछ और भी हो, शायद जिन तक वे अब भी पहुंच न पाए हों!

संपर्क: बी 601, श्री एयर इंडिया सीएचएस, प्लॉट नं. – 24, सावरकर नगर, ठाणे पश्चिम, मुंबई- 400601 मो. 9757277735/ ईमेल : jayshreesingh13@gmail.com