युवा कवि।कई पत्रिकाओं में प्रकाशित।

स्वर्ग

स्वर्ग में सुना है
सब मुफ्त है
जितनी चाहो
खा सकते हो रोटियां

स्वर्ग में रोटियां कौन बेलता है?

वे चुप हैं

विरह में डूबे इस पानी पर
एक मूरख बत्तख खुश है

विरह में खिली इस घास पर
एक कौवा सुस्ता रहा है

वसंत आया है
किसे धीरज बंधाने?

पेड़ों ने सब देखा है

फूलों को डालियों से झटक कर
वे चुप हैं।

ईश्वर

ईश्वर
मैंने बेतहाशा शराब पी
मैंने अपना कोलेस्टरॉल बढ़ने दिया
मुझे क्षमा करो

ईश्वर
मैंने घंटों टीवी देखा
मैंने बेतरह शॉपिंग की
मुझे अपनी शरण में ले लो

ईश्वर
मैं कैफे-रेस्तरां में भटकता हूँ
मैं फोन में डूबता जाता हूँ
मुझे मुक्ति दो।

पेड़

मैं और तुम जब बातों में थे
पेड़ हमें सुन रहे थे

घूमती हुई धरती पर वे स्थिर थे

एक पत्ती उनपर फूट रही थी
एक पत्ती उनसे गिर जाने वाली थी

मैं और तुम जब बातों में थे
पेड़ हमें छू रहे थे

वे बहुत पास थे
और हमें सहला रहे थे।

थोड़ी सी रेत

हरा एक उदास रंग है
जो पृथ्वी पर चढ़ गया है
हमें बर्फ चाहिए
या पतझड़ का मटमैला रंग
पर कोई समझता नहीं
सब हरे के पीछे पागल हैं

बरसात में
यह और चटक जाता है

हमें बरसात नहीं चाहिए
हमें थोड़ी रेत चाहिए
कोई समझता नहीं।

मेरा असल इतिहास

चमड़ी में
मेरी नग्नता रहती है
नग्न सूर्य और चंद्र की ओर
एक द्वार खोलती
मन की सब
निषिद्ध मछलियां
तैर आती हैं
गंध और पसीने के
इस समुद्र में

बारीक परतों में
समय की क्रूरता
यह सोख लेती है

पुराने दाग
चोट के निशान
मेरा असल इतिहास है-
भुलक्कड़ आत्मा के लिए
चमड़े के दस्तावेज़

डरती है आत्मा
चमड़ी के भीतर
सिकुड़ कर रहती है।

संपर्क : द्वारा जयचंद गोला, रूम नं. 201, मंगलम, पाल डेयरी के करीब, मुनिरका विलेज, नई दिल्ली-110067