युवा कवयित्री। वृत्ति- शिक्षण।

दुख हर शक्ल पर एक लकीर है

दुख-पसंद आदमी के हिस्से दुख नहीं आता
वह दुखों को गले लगाकर
उसके कान के नीचे जड़ देता है चुंबन
वह फाहा रखता है दुखों के नमक पर
पी जाता है दुख का खारा पानी
वह जब्त करता है दुखों के सारे चीथड़े
लगा देता है उन पर पैबंद
वह जांघों पर रात हरसिंगार का पौधा बोता है
और सुबह चुनता है फूल
दुख मकड़े का वह जाला है
जो घर के हर कोने में पसर जाता है
दुख बारिश के महीने का मेंढक है
जो रात भर टर्राता है
दुख वह शेर है
जो हर पल मुलायम खरगोश चबाना चाहता है
दुख वह ऊंट है
जो अपने कूबड़ में जमा लेता है महीनों का जल
डालता है मुंह में घूंट-घूंट
प्यास के अंतिम क्षण में
दुख वह बच्चा है
जो रात भर मां के सूखे स्तन से चूसता है दूध
दुख आंखों का वह हिस्सा है
जिसका कोर हमेशा गीला रहा है
दुख नैहर का वह मालपुआ है
जो खत्म होने के बाद पेंदी में छोड़ता है स्वाद
दुख सखी है
जीवन का अंतरंग कोई साथी
दुख पिता के हाथ का वह झोला है
जो दुगने भार के बावजूद कभी नहीं फटा
जीवन भर पिता के हाथ से चिपका रहा
दुख मां के ललाट की बिंदी है
एक के गिरते ही दूसरी लग जाती है
ललाट उदास होने से बच जाता है
दुख वह प्रेमी है
जो चाहता है आलिंगन
रात के तीसरे पहर से गोधूलि बेला तक
बिछुड़न के अंतिम पहर में
जड़ता है ललाट पर चुंबन
देता है दिलासा लौट आने का
दुख की कोई शक़्ल नहीं होती
वह हर शक्ल पर एक स्थायी लकीर है।

हम कीचड़ के कवि थे

हम राजधानी में बैठकर लिखने वाले लोग नहीं थे
हम घुटनों तक कीचड़ में धंसे लोग थे
हम धनरोपनी करते हुए लिख रहे थे कविता
गेहूं की भूरी बालियों को देख हुलस उठते थे
उसी वक्त आंखों के कोर से
ढुलक आती थी कविता
सरसों के पीले फूल देखकर
हमने पहली प्रेम कविता का स्वाद जाना
जंगली फूलों ने कविताओं को सुगंधित किया
कांटों में सावधानी से उन्हें स्थापित होना सिखाया
हम लकड़ी के चूल्हे पर पकने वाले भात थे
हम डेगची में सीझने वाली दाल थे
हम आग पर पकाए गए आलू मिर्च और
एक चुटकी नमक थे
हम महाजन द्वारा दी गई गाली थे
हमारे लिए कोई मंच नहीं था
मंच के नीचे हमारे लिए
कभी कोई कुर्सी नहीं लगाई गई थी
हम पंक्ति के आखिर में खड़े होकर
सभ्य शालीन सलीकेदार कवियों से
मजदूरों दलितों शोषितों पर कविता सुन रहे थे
हम जेठ की दुपहरी में तपने वाले लोग थे
हम आषाढ़ की बारिश में भीगने वाले लोग थे
हम दान-खैरात में आए लोग थे
हमारे हिस्से का सुख सोख लिया गया था
हम दुखों के पीछे भागते धावक थे
हमारे माथे पर पहली पंक्ति मयस्सर नहीं थी
हम पंक्तियों के आख़िर में खड़े होने वाले लोग थे
हम असभ्य और अशिष्ट लोग थे
हमें तन भर कपड़ा जी भर खाना कभी नहीं मिला
मिले चीथड़ों पर हम रोज़ कविताएं लिख रहे थे
हम दो जून की रोटी के लिए
रोज कविता लिख रहे थे
एक बैल के मारे जाने पर
उनकी जगह जुत जाने वाले लोग थे
हम लगातार खेतों में खड़े होकर
कविताऍं लिख रहे थे
अब वह कविता संसद पहुंचने के लिए तैयार है!

संपर्क : ग्रामरानीगंज (बंगाली टोला), वार्ड नं.07, बरबन्ना, पोस्टमेरीगंज, जिलाअररिया, पिन854334 बिहार मो.8252613779