स्ट्रीमलेट ड्खार

(1960) खासी भाषा की प्रतिष्ठित कवयित्री, कथा लेखिका, नाट्यकार, आलोचक और विदुषी।नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग में खासी की प्रोफेसर।अनेक पुरस्कारसम्मान प्राप्त।तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं।

हिंदी अनुवाद : जीन एस. ड्खार

(1979) बहुभाषी लेखिका तथा खासी, हिंदी और अंग्रेजी की परस्पर अनुवादिका।लेडी कीन कॉलेज, शिलांग में हिंदी विभागाध्यक्ष।खासी में एक आलोचना पुस्तक के अलावा कई शब्दकोशों के निर्माण में शामिल।

प्रकृति मां

समीर के झोंके मन मोहित करते हैं
रंग-बिरंगे फूल सुगंधित करते हैं
कहां लुप्त हो गए वे गुजरे पल की छवि में?
बीतते समय में कुछ भी ज्ञात नहीं मुझे
आशा के वे पत्ते अब झड़ने लगे हैं
शीत की उषा की भाँति
तुम ठंड में सिकुड़ना शुरू कर देती हो
अपने इन नेत्रों से मैंने देखा है
कि तुम्हारा सौंदर्य मुरझाने लगा है
और तुम्हारे कंधे दुर्बल हो गए हैं
मैंने उठाने और बल देने का प्रयास किया है
क्या मैं पुनर्जीवित कर सकती हूँ
संतुष्टि के वृक्ष को?
क्या मैं झड़े हुए पत्तों को समेट सकूँगी?
कमजोर जड़ों को अंदर तक घुसा पाऊँगी?
क्या वह पुनः दृढ़तापूर्वक खड़ा हो पाएगा
इन सभी परिवर्तनों में?
मुझे दुख होता है प्रकृति मां
तुझे उजाड़ा गया
तेरे रक्त को चूसा गया और तू हाड़ मात्र रह गई
आगामी पीढ़ी पर क्या बीतेगी?
घोर अंधकार में सारे मौसम भटक गए
चोटियाँ समतल हुईं, मैदान उठ गए
चिड़ियों की चहचहाहट बंद हुई
जानवरों को डर लगने लगा
मनुष्य जाति का भविष्य कहां है
जबकि तेरा नाश मानव के ही हाथों हुआ है।

पड़ोसन की बेटी

जिस दिन से तुम्हें गढ़ा गया है,
तुम्हारे साथ गलत होने लगा है
तुम्हारे खून ने ही यह सब किया है
वे कहते हैं, ‘यह एक सांस्कृतिक परंपरा है।’
तुम अपनी मां के चेहरे द्वारा देखी गई हो
जिसका चेहरा पके केले-सा पीला है
जिसका शरीर दुबला-पतला है बांस-सा
एक जीवित हाड़, कुछ मांस और रक्त से युक्त
कल्पना से परे अत्याचार सहा उसने
बदतर कुपोषण का सामना किया है
तब तुम इस संसार में आई
अति दुर्भाग्य
तुमने अपनी माँ को खोया है
जिसने तुम्हें जीवन दिया और अपना खो दिया
तुम खाली बर्तन से भी हल्की थी
और मदमस्त फल-जैसी सिकुड़ी हुई
परिवार में तुम्हारा स्वागत नहीं था
क्योंकि तुम अपशकुन ठहराई गई थी
तथापि, तुम जी रही हो
पर एक अ-बाल्यावस्था का जीवन
न तुम्हें खेलने को गुड़िया मिलती है
न ही गाने को कोई शिशुगीत
अपने भाई-जैसी तुम विशेष नहीं हो
बल्कि पिता के लिए एक बोझ हो
बढ़ते-बढ़ते तुम्हें श्रम करना है
दिन ताप का आघात सहना है
रात घरेलू हिंसा की आग है
तुम्हें भोर होने पर जगा दिया जाता है।

स्ट्रीमलेट ड्खार:‘कासा पीटैटिस’, गोल्फलिंक्स, खलीहशनोंग, शिलांग, पूर्वी खासी हिल्स, मेघालय-793001, मो. 9436117479

जीन एस. ड्खार: हिंदी विभागाध्यक्ष, लेडी कीन कॉलेज, सेक्रेटेरिएट हिल्स, शिलांग, पूर्वी खासी हिल्स, मेघालय-793001, मो. 9612325039