बीड़ी पीती हुई बूढ़ी औरत’ (कविता संग्रह) और बारिश थमने के बाद’ (कहानी संग्रह) प्रकाशित।त्रैमासिक पत्रिका पाठका संपादन।

साल की वह आखिरी सुबह थी।दिसंबर की कड़ाके की ठंड वाली सुबह।दो दिन पहले ही शहर में जमकर बारिश हुई थी, ओले भी गिरे थे, जिसकी वजह से शहर का तापमान 4-5 डिग्री लुढ़क गया था।

आशुतोष भट्टाचार्य जी कलाई पर बंधी घड़ी पर समय देखा, सुबह के दस बज रहे थे।घर से जल्दी निकलने के बावजूद रास्ते में देर हो गई।ऑटो रिशे से उतरकर सीधे लाइफ केयर अस्पताल पहुंचे।आजकल शहर का ट्रैफिक व्यस्त हो गया है, कभी किसी चौराहे पर सिगनल न मिलने पर लोगों को बेवजह काफी समय तक खड़े रहना पड़ता है।कभी मजदूरों का जुलूस, तो कभी मंत्रियों का काफिला तो कभी किसी धार्मिक झांकी को सड़क से गुजरते देखा जा सकता है, जिसकी वजह से आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

आशुतोष जी अस्पताल के भीतर पहुंचे।वहां मरीजों की भीड़ देखकर अनायास ही उनके चेहरे पर विरति के भाव उभर आए

इन दिनों लोग कुछ ज्यादा ही बीमार पड़ने लगे हैं।अधिकतर डॉक्टरों का कहना है कि खान-पान में अनियमितताएं, खाद्य पदार्थों में मिलावट, शारीरिक श्रम का अभाव, तनाव और बढ़ते प्रदूषण के कारण लोग ज्यादा बीमार पड़ते हैं।प्राय: सभी डॉक्टरों के लीनिक में मरीजों की लंबी कतार देखी जा सकती है।ज्यादातर डॉक्टरों से तो मिलने के लिए हफ्ता दिन पहले से ही  अपाइंटमेंट लेनी पड़ती है।

आशुतोष जी ने काउंटर पर रिसेप्शनिस्ट लड़की से पूछा- ‘अभी कौन सा नंबर चल रहा है?’

रिसेप्शनिस्ट लड़की आशुतोष जी की तरफ देखकर बोली- ‘अभी डॉक्टर साहब नहीं आए हैं।या आपने अप्वाइंटमेंट ले रखी है?’

‘हां’ आशुतोष जी ने सिर हिलाकर कहा।

‘सर, आप अपना नाम, पता और मोबाइल नंबर बताएं।’

आशुतोष जी ने अपना नाम, पता और मोबाइल नंबर बताया।लड़की ने रजिस्टर देखकर कहा- ‘सर, आपका नंबर तेरह है।आप बैठ जाइए, अभी समय लगेगा।’

आशुतोष जी ने पीछे पलटकर देखा तो सारी कुर्सियां भरी हुई थीं।सिर्फ कोने में खिड़की के पास वाली कुर्सी खाली थी। ‘कितनी देर लग जाएगी?’ आशुतोष जी ने लड़की से पूछा।

‘डेढ़-दो घंटे…।’ यह सुनकर आशुतोष जी ने कुछ चिड़चिड़ाते हुए कहा- ‘बेटे ने तो दो दिन पहले ही घर से फोन पर नंबर लगा दिया था, फिर इतना पीछे कैसे हो गया!’

लड़की ने कुछ उखड़े स्वर में कहा, ‘सर, यहां तो सुबह के सात बजे से ही बाहर से आए हुए मरीजों की भीड़ लग जाती है।’

आशुतोष जी कुछ और न कहकर खिड़की के पास वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गए।वहां बैठने के थोड़ी देर बाद उनकी समझ में आया कि लोगों ने इस कुर्सी को क्यों खाली छोड़ दिया था।दरअसल उस खिड़की का कांच टूटा हुआ था जिससे बाहर की ठंडी हवा अंदर आ रही थी।

आशुतोष जी फुल स्वेटर और सिर पर टोपी तो पहने ही थे, अब उन्होंने अपने गले में लटकते मफलर को भी सिर, कान व गले में गोल लपेट लिया ताकि ठंडी हवा शरीर के भीतर न घुस सके।वे यह सोचकर चिंतित होने लगे थे कि इस उम्र में डेढ़दो घंटे तक इस स्टील की कुर्सी पर बैठना कितना कष्टदायक होगा, पर दूसरा उपाय भी तो नहीं था।

कंधे पर लटकते थैले को निकालकर उन्होंने अपनी गोद में रख लिया।थैले में डॉक्टर  की पुरानी फाइलें, रिपोर्ट, पानी की बॉटल, आज का अखबार और बिस्कुट का पैकेट था, जिसे पत्नी ने निकलते समय दिया था और कहा था कि बीच-बीच में बिस्कुट खा लेना और पानी भी पी लेना।

समय निकलने लगा।आशुतोष जी ने अपने आसपास किसी को अखबार पढ़ते हुए नहीं देखा, कुछ लोग रिसेप्शनिस्ट के पीछे दीवार पर टंगे रंगीन टीवी पर धीमी आवाज से चल रहे समाचार देख-सुन रहे थे।कुछ लोग अपने मोबाइल पर आंखें गड़ाए बैठे थे, तो कुछ लोग आंखें बंद कर बुलावे के इंतजार में थे।उन्होंने अखबार पढ़ने का इरादा बदल दिया।खिड़की से सामने बच्चों के खेलने के मैदान की तरफ देखने लगे।उस वत मैदान में एक भी बच्चा नजर नहीं आया।शायद ठंड की वजह से बच्चे खेलने नहीं आए थे।

खिड़की की तरफ देखकर आशुतोष जी अपने बारे में सोचने लगे थे।

हफ्ता-दिन पहले की बात है।आशुतोष जी ने सुबह नींद से जागने के बाद सीने में हल्का-सा दर्द  महसूस किया, तो वे घबरा गए।बिस्तर से उतरकर डाइनिंग टेबल के पास जाकर एक गिलास पानी पिया।पानी पीने से दर्द कुछ कम हुआ, दोपहर के बाद फिर से दर्द महसूस होने पर उन्होंने गैस की टैबलेट खा ली।चार-पांच दिन निकल जाने के बाद भी आशुतोष जी को पूरी तरह आराम नहीं मिला तो वे कुछ चिंतित हुए।शाम को दफ्तर से बेटे के घर आते ही, उन्होंने अपने दर्द के बारे में बताया।बेटे ने कहा- ‘आप डॉक्टर से मिलकर परामर्श कर लीजिए… आजकल किसी भी परेशानी को यूं ही नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।वैसे भी आपकी दो साल पहले ही एंजियोप्लास्टी सर्जरी हुई है।इस उम्र में कोई भी रिस्क लेना ठीक नहीं है।आपके पास डॉक्टर मेहता का फोन नंबर होगा।मुझे सुबह दे दीजिएगा मैं अप्वाइंटमेंट ले लूंगा, वैसे भी आजकल डॉक्टरों के पास मरीजों की लंबी कतार लगी रहती है।’

आशुतोष जी को बेटे की बात ठीक लगी।

सुबह नाश्ते के टेबल पर बेटे ने मोबाइल फोन से डॉक्टर से अप्वाइंटमेंट लेने के बाद आशुतोष जी की तरफ देखकर समझाने के लहजे में कहा- ‘आप खामखां घबराइए नहीं, कोई विशेष समस्या नहीं होनी चाहिए।खानपान की वजह से आपको यह परेशानी हो रही है।’

पास बैठी पत्नी आशुतोष की तरफ देखकर बोली- ‘आपके साथ मैं भी चलूंगी।’

तभी बेटे ने कहा- ‘हां पापा, आप मम्मी को भी साथ ले जा सकते हैं।वैसे भी मम्मी तो घर पर ही रहती हैं, उनका बाहर घूमना हो जाएगा।’

आशुतोष जी ने पत्नी की तरफ देखकर कहा-‘मैं अकेला ही चला जाऊंगा।खामखां तुम यों परेशान होगी।पता नहीं डॉक्टर से मिलने के लिए मुझे कितनी देर तक इंतजार करना होगा।तुम इतनी देर तक बैठ नहीं पाओगी।तुम्हारे दोनों घुटनें का दर्द और बढ़ जाएगा।’

और उन्होंने अकेले ही जाने का फैसला किया।

दो साल पहले सीने में एकाएक दर्द होने के कारण वे बेटे के साथ इस अस्पताल में डॉ.मेहताके पास आए थे।उस दिन भी अस्पताल में मरीजों की काफी भीड़ थी।डॉक्टर ने ईसीजी एवं इको करने के बाद तुरंत ही एंजियोप्लास्टी सर्जरी की सलाह दी थी।बेटे ने डॉक्टर  से करीब बीसपच्चीस मिनट चर्चा की थी।इसके बाद शाम को एंजियोप्लास्टी करने के लिए तैयार हुए थे।

सर्जरी के दूसरे दिन आशुतोष जी को आईसीयू से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था।दो दिन बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई थी।सर्जरी के एक साल तक वे डॉक्टर साहब से नियमित चेकअप कराते रहे।धीरे-धीरे सारी स्थिति सामान्य हो गई थी।फिर हफ्ते भर से यह नई समस्या यों आई? आशुतोष जी इसी बात को लेकर परेशान थे।

खुली खिड़की की तरफ देखकर आशुतोष जी अपने पुराने दिनों की बात याद करने लगे थे।बैंक की नौकरी से रिटायर हुए उन्हें पांच साल ही हुए हैं।इसी साल जून में वे बेटी की डिलीवरी में दिल्ली गए थे, साथ में पत्नी भी थी।बीस-बाईस दिन बेटी-दामाद के घर रहकर आने के बाद बेटे की शादी की तैयारी में व्यस्त हो गए थे।सितंबर में बेटे की शादी की।परिवार में खुशनुमा माहौल था।यह साल उनके और उनके परिवार वालों के लिए अच्छा ही गुजर रहा था।

बचपन से ही आशुतोष जी स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।फुटबॉल, क्रिकेट के अलावा बैडमिंटन उनका पसंदीदा खेल रहा है।कई बार उन्होंने अपने खेल का प्रदर्शन कॉलेज से बाहर दूसरे प्रदेशों में किया।दो बार वे राष्ट्रीय प्रतियोगिता में सम्मानित और पुरस्कृत भी हुए।नौकरी में आने के बाद पहले शादी और फिर बच्चे होने के बाद भी उनकी बैडमिंटन खेलने की आदत नहीं छूटी थी।हर शाम वे बैडमिंटन खेलने लब में जाया करते थे।उम्र के पचपनवें वर्ष में स्कूटर एसिडेंट से कॉलर बोन टूटने के बाद से बैडमिंटन खेलना पूरी तरह से बंद हो गया।

बैडमिंटन खेलना बंद होने के बाद वे अकसर दफ्तर से लौटने के बाद शाम को घर पर ही रहने लगे थे।चाय-नाश्ते के बाद अखबार, पत्रिकाएं, टीवी और मोबाइल से ही उनका समय निकल जाया करता था।

एकाएक वे हाई बीपी के मरीज हो गए।दो-ढाई साल के बाद उन्हें स्पॉन्डिलाइटिस भी हो गया था।इस तरह धीरे-धीरे आशुतोष जी बीमारी से घिरने लगे।सेवानिवृत्ति के बाद हार्ट की बीमारी व ऑपरेशन के बाद से आशुतोष जी ने अपने खानपान, दिनचर्या में काफी बदलाव किया।नियमित सुबह 5 बजे उठना फिर टहलने जाना, रात को जल्दी सोना, समय पर सभी दवाएं लेना आदि।

अपने बारे में सोचते-सोचते आशुतोष जी कुछ अन्यमनस्क से हो गए थे।तभी रिसेप्शनिस्ट लड़की की पुकारने की आवाज से वे चौक पड़े।पास जाकर पूछा तो लड़की बताई कि वह किसी दूसरे का नाम पुकार रही थी।यह जानकर वे आश्वस्त हुए।उन्होंने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा।एक घंटा हो गया है बैठे-बैठे।कमर दुखने लगी है।पता नहीं और कितनी देर इंतजार करना होगा।वे जेब से मोबाइल फोन निकालकर व्हाट्सएप और फेसबुक पर पुराने पोस्ट देखने लगे थे।

एकाएक आशुतोष जी की आंखें मोबाइल स्क्रीन पर विजय मोहन जी के फोटो पर स्थिर हो गई थीं।बीस-बाईस दिन पहले की बात है।आशुतोष जी ने अपने सहकर्मी विजय मोहन जी के आकस्मिक निधन का समाचार व्हाट्सएप पर देखा था जिसे उनके बेटे ने पोस्ट किया था।इस दुखद घटना से आशुतोष जी को काफी दुख पहुंचा था।विजय मोहन जी का उनके साथ लगभग बीस वर्षों का संबंध था।सेवानिवृत्ति के बाद विजय मोहन जी बेटे के पास दिल्ली में शिफ्ट हो गए थे।उनकी पत्नी का निधन सेवानिवृत्ति के दो साल पहले ही हो गया था।पत्नी के निधन के बाद वे एकदम अकेले हो गए थे।जैसे-तैसे उन्होंने समय काटा।उन दिनों आशुतोष जी ने उनका बहुत साथ दिया था।अकसर शाम को मोबाइल पर वे दोनों काफी देर तक बातें कर समय काट लेते थे।दिल्ली जाने के बाद भी आशुतोष जी से विजय मोहन जी की मोबाइल पर बातचीत बराबर होती रहती थी।विजय मोहन जी वैसे तो स्वस्थ थे, पर हाई बीपी के मरीज थे।विजय मोहन के बेटे ने आशुतोष जी को बताया था कि उस दिन विजय मोहन जी रात में समय पर डिनर लेकर अपने कमरे में सोने चले गए थे।सुबह जब देर तक वे कमरे से बाहर नहीं निकले तब बेटे ने जाकर देखा तो विजय मोहन जी को बिस्तर पर मृत पाया।

विजय मोहन जी के निधन के बाद आशुतोष जी काफी टूट चुके थे।उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।वे गुमशुम ही रहने लगे थे।शायद वे कुछ ज्यादा ही शॉड हो गए थे।रात में ठीक से सो नहीं पाते थे।पत्नी और बेटे ने उन्हें समझाया था कि वे विजय मोहन जी के बारे में ज्यादा न सोचें, वरना उनकी तबीयत खराब हो जाएगी।

आज अचानक पुरानी बातें याद कर आशुतोष जी के मन में आशंका होने लगी कि कहीं चुपके से कोई नई बीमारी उनके शरीर में पसर तो नहीं रही है।इस उम्र में आशुतोष जी को कुछ हो गया तो पत्नी का गुजारा उनकी पेंशन के पैसे से चल जाएगा।रहा सवाल परिवार की जिम्मेदारी का, तो उसे आशुतोष जी ने पूरा कर लिया है।बेटे की शादी, रहने के लिए मकान व अन्य सभी आवश्यक जरूरतों को उन्होंने पूरा कर लिया है।कुल मिलाकर देखा जाए तो आशुतोष जी के न रहने से परिवार वालों को बहुत ज्यादा परेशानी या तकलीफ नहीं होगी।थैले से पानी की बॉटल निकालकर दो घूंट पानी पीकर वे फिर रिसेप्शनिस्ट लड़की की तरफ देखने लगे, अभी उनका नंबर आने में देर है।

नया साल आने में अभी कुछ घंटे शेष रह गए हैं।सामने टीवी पर नए साल के धमाकेदार विज्ञापन आ रहे थे।शाम से ही आशुतोष जी के मोबाइल पर पुराने सहकर्मियों, मोहल्ले व परिवार-परिजनों के नए साल की बधाई व शुभकामना से भरे संदेश आने लगेंगे।रात में टीवी पर मनोरंजन कार्यक्रमों की झड़ी लग जाएगी।शहर-गली, मोहल्लों में नए साल के आगमन पर पार्टी, नाच-गाना का आयोजन किया जाएगा।चारों ओर पटाखों की गूंज सुनाई देगी।आशुतोष जी की आंखें खिड़की से पार झांक रही थीं।आसमान साफ दिखाई पड़ रहा था।कहीं कोई बादल नजर नहीं आ रहा था।कुछ ही देर में डॉक्टर  साहब का बुलावा आ जाएगा, फिर वह जांच कर क्या कहेंगे, यही सोचकर उनका मन कुछ अस्थिर व असहज होने लगा था, सीने का हल्का दर्द वे तब भी महसूस कर रहे थे।