मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के साथसाथ लेखन से जुड़े हुए।अंग्रेज़ी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित।मिथिला रिव्यू’, ‘जैगरी लिट’, ‘उसावा लिटरेरी रिव्यूके संपादक मंडल के सदस्य।

बसंत के अनाम नीले फूलों से ढकी क्यारी
लगती है आसमान का कोई उजला टुकड़ा
लोग तस्वीर खिंचवाते हैं, थोड़ी देर ठहर कर
बढ़ जाते हैं अपने रास्तों की ओर
देर तक गूंजता रहता है उनकी हँसी का आलाप

आज युद्ध का तीसरा दिन है
सुबह ही देखा रूसी मिसाइल को
ध्वस्त करते हुए मीनार का गुंबद
ढहती इमारतों के चित्र इस तरह दिखाए जा रहे हैं
जैसे टूटते हैं दूध के दांत
हर रोज एक नए शहर की आत्मा
को चोटिल कर रहा है
यूरेनियम का परचम
पिछले साल जब हम मिले थे
सूरज डूबने को था
लाल रोशनी खिड़की से छिटककर
तुम्हारे शरीर पर चकत्ते बना रही थी
तुम्हें चूमना था ढेर सारे फालसों का
एक साथ मुंह में घुल जाना

तुम्हारा फोन बंद है
हेल्पलाइन के सभी नंबर व्यस्त हैं
मैं टीवी में दिखते लोगों में
तुम्हारा चेहरा ढूंढता हूँ
अचानक तुम्हारा अस्तित्व भ्रम लगने लगा है
तुम्हारा होना मेरी कल्पना का एकमुश्त सच

लाल बल्बों की टिमटिमाती रोशनी से लैस
एक और हवाई जहाज घनघनाता हुआ
मेरे ऊपर से निकल जाता है
मैं कितनी और बार उम्मीद करूं
कि उसमें तुम भी सवार हो।

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