एक काव्यसंग्रह जहाँ कवि होगा’, तीन उपन्यास किधर जाऊँ’, ‘चींटियों की वापसीऔर मेघा के बरसे अउ महतारी के परोसे

 

उन दिनों मेरी नियुक्ति बतौर शिक्षक कांकेर के एक अंदरूनी गांव में हुई थी। तब कांकेर जिला मुख्यालय न होकर विशाल बस्तर जिले की मात्र एक तहसील और एक छोटा-सा कस्बा हुआ करता था।

नई-नई नौकरी का नया-नया उत्साह जरूर था, लेकिन रहने की समस्या खड़ी हो गई थी। कांकेर में रहने के लिए मैंने किराए के मकान की तलाश की लेकिन फिलहाल नहीं मिला। सो मैंने घर से ही रोज आने-जाने का निर्णय कर लिया। हालांकि यह मेरे लिए बहुत ही थका देने वाला निर्णय था। सुबह रोज करीब पैंसठ किलोमीटर जाना और फिर उतने ही किलोमीटर घर लौटना मेरे लिए बड़ी मुश्किल भरा काम था। यदि कांकेर में ही पदस्थ होता तो कोई खास समस्या नहीं थी, क्योंकि रायपुर से जगदलपुर, सुकमा, कोंटा, दंतेवाड़ा, बैलाडीला, बीजापुर, भोपालपटनम, जैपुर, मलकानगिरि आदि शहरों के बीच अनेक बसें हर घंटे चलती थीं जो धमतरी और कांकेर से होते हुए ही जाती थीं। लेकिन मुझे तो कांकेर से करीब सात किलोमीटर दूर एक अंदरुनी गांव में जाना था। यदि मैं धमतरी से कांकेर बस के जरिए चला भी जाता तो वहां से स्कूल जाने में परेशानी होती, क्योंकि उधर एक भी बस नहीं चलती थी। सड़क भी कच्ची थी। अत: मैंने आने-जाने के लिए एक नई मोटरसाइकिल खरीद ली।

मैं बाइक ठीक-ठाक चला लेता था। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजमार्ग पर गाड़ी चलाने में थोड़ी परेशानी होती थी, क्योंकि इस मार्ग पर दिन-रात लगातार मोटर-गाड़ियों की आवाजाही लगी रहती थी। राष्ट्रीय राजमार्ग होने के बाद भी चौड़ाई अपेक्षाकृत कम थी। दो गाड़ियों के क्रास करने के दौरान साइकिल या बाइक सवारों को अपनी गाड़ी सड़क के नीचे पाई में उतारनी ही पड़ती थी।

दिन के उजाले में मुझे गाड़ी चलाने में उतनी परेशानी नहीं होती थी, लेकिन कई बार स्कूली काम के चलते देर हो जाती थी और मुझे घर आने में रात हो जाती थी तब बड़ी गाड़ियों का डर मेरे मन में बैठ जाता था।

मेरी इस परेशानी को देखते हुए कुछ मित्रों ने सलाह दी कि मैं धमतरी से कांकेर एक दूसरे रास्ते से भी जा सकता हूँ।

धमतरी से कुकरेल और माड़मसिल्ली बांध होते हुए नरहरपुर से कांकेर के लिए एक रास्ता था। हालांकि यह सिंगल रोड था लेकिन ट्रैफिक का दबाव जरा भी नहीं था। दिनभर में कोई एकाध बड़ी गाड़ी या फिर दो-चार मोटरसाइकिल गुजर जाए तो बड़ी बात थी।

मुझे यह रास्ता ठीक लगा, क्योंकि इससे मेरा वह डर दूर हो गया जो बड़ी गाड़ियों के कारण मेरे मन में समाया हुआ था। इस रास्ते से गुजरते हुए भी उतने ही समय में कांकेर पहुंच जाता था, जितना मेन रोड से होकर जाने में लगता था। यानी दो घंटे का सफर था।

मुझे घने जंगलों के बीच से होकर गाड़ी चलाने में बड़ा मजा आता था। धमतरी शहर से बाहर निकलते ही अछोटा-भोयना के बाद जंगल की शुरुआत हो जाती थी जो कांकेर जाते तक खत्म ही नहीं होती थी। जगह-जगह सर्पाकार मोड़ मिलते थे। उन मोड़ों से गुजरते हुए मुझे लगता था कि मैं किसी सर्प की पीठ पर सवारी कर रहा हूँ। सड़क के दोनों ओर साल-सागौन और करही-खम्हार सहित विभिन्न प्रजाति के वृक्षों से आबाद घने जंगलों के बीच नानाविध पक्षियों के कलरव और ठंडी-ठंडी हवाओं में समाहित जंगली फूलों की खुशबुओं से पूरा क्षेत्र महकता रहता था।

कुकरेल के आगे बनरौद के बाद दो रास्ते निकले हुए थे। सीधा रास्ता नगरी-सिहावा की ओर जाता था। कांकेर जाने के लिए दाईं ओर की सड़क पकड़नी पड़ती थी। थोड़ा आगे जाने पर स्वचालित साइफन वाले अद्वितीय माड़मसिल्ली बांध के दर्शन होते थे। आमतौर पर जितने भी बांध हैं चाहे वह सोंढूर बांध हो या दुधावा बांध या फिर गंगरेल बांध, पानी की निकासी के लिए उनमें लगे फाटक को खोलना पड़ता है, लेकिन माड़मसिल्ली बांध में एक अंग्रेज इंजीनियर का कमाल देखिए कि बांध में भरपूर पानी भरने के बाद यहां लगे गेट अपने आप खुल जाते हैं और पानी कम होने पर अपने आप बंद भी हो जाते हैं। मैं सुबह-शाम जब भी इस बांध से होकर गुजरता था तो अपनी प्रिय पत्नी मैडम सिली की याद में इस बांध को बनाने वाले उस महान और युवा अंग्रेज इंजीनियर को मन ही मन सलाम जरूर करता था। मैडम सिली का नाम ही बाद में विकृत होकर मादाम सिल्ली और फिर माड़मसिल्ली हो गया।

खैर, बांध पहुंचने से पहले तीन-चार मोड़ वाली एक गहरी घाटी भी पड़ती थी जहां से उतरना और चढ़ना मन में एक रोमांच भर देता था। माड़मसिल्ली के बाद सुरही-बादल होते हए नरहरपुर पहुंचता था। यहां एक चौराहा पड़ता था। बाईं ओर यानी पूर्व की ओर गट्टासिल्ली होते हुए सिहावा-नगरी जाने का मार्ग था, दाएं पश्चिम की ओर चारामा के लिए रास्ता था। सीधे दक्षिण की तरफ कांकेर के लिए सड़क निकली हुई थी और उत्तर की ओर का मार्ग धमतरी के लिए था, जिधर से मैं आता था।

चौराहे से आगे कांकेर जाने के लिए एक गली मुड़ती थी।

 इसी गली में पहला मकान उसका था जहां से मैं मुड़ता था। मुड़ने के दौरान सावधानी के लिए अपनी बाइक का हार्न जरूर बजा देता था ताकि गली में कोई बच्चा खेल रहा हो तो वह सतर्क हो जाए। सामने से आ रहे साइकिल और बाइक सवारों के लिए भी यह संकेतसूचक होता था।

मैं दुविधा में पड़ गया, क्योंकि यहीं से एक और गली के लिए रास्ता था। तब मुझे अहसास हुआ कि मुझे सिर्फ सड़क ही नहीं, बल्कि गलियों की भी पहचान रखनी चाहिए, वरना राह भटकते देर नहीं लगती।

अब किसी से रास्ता पूछना जरूरी हो गया था, लेकिन किससे पूछूं, क्योंकि आसपास कोई नजर नहीं आ रहा था। तभी मेरी नजर उस घर पर पड़ी। आंगन में एक युवती खड़ी थी। मैंने कुछ संकोच के साथ कांकेर जाने का रास्ता पूछा। साथ में यह भी बता दिया कि मैं एक शिक्षक हूँ और पहली बार इस रास्ते से गुजर रहा हूँ। अपने बारे में बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना ही था कि वह कहीं यह न समझ ले कि मैं उससे बात करने के लिए या फिर मजा लेने की नीयत से रास्ता पूछ रहा हूँ।

उसने बताया कि सीधे चले जाइए। आगे एक और दोराहा मिलेगा, आप दाहिने मुड़ जाइएगा।

मैं आभार जताते हुए आगे बढ़ गया।

उस दिन से यही रास्ता मेरे रोज का आने-जाने का माध्यम बन गया। घर से सुबह निकलता था और करीब साढ़े नौ बजे नरहरपुर पहुंचता था। वहां से अपने स्कूल जाने में करीब पौन घंटे का समय और लगता था। वापसी में शाम लगभग साढ़े पांच बजे यहां पहुंचता था और फिर बड़े आराम से गाड़ी चलाते हुए सात बजने के पहले घर लौट आता था।

अगले दिन फिर वहीं से होकर गुजरा। उस दिन भी वह लड़की आंगन में खड़ी थी। मैंने गली होने के कारण हार्न बजाया। हार्न की आवाज से वह तनिक चौंक गई। मैं मुस्कराया और आगे बढ़ गया। अपनी मुस्कान की प्रतिक्रिया देखने के लिए मैं मुड़कर देखना चाहता था, लेकिन साहस नहीं जुटा पाया। अलबत्ता बाइक के बैकव्यू मिरर से उसे देखने का प्रयास किया। वह मेरी ओर ही देख रही थी। मैं फिर मुस्कराया और गाड़ी की स्पीड तेज कर दी। मुझे लगा कि उसकी आंखें चिड़िया की तरह मेरी पीठ पर बैठ गई हैं।

अब यह रोज का सिलसिला बन गया। मैं वहां से गुजरता, हार्न बजाता,  मुस्कराता, बदले में वह भी मुस्कराती, फिर मैं आगे बढ़ जाता और उसकी आंखें चिड़िया की तरह मेरी पीठ पर बैठ जातीं।

अब वह शाम को भी मेरे लौटने का इंतजार करने लगी। मुझे देखती और मुस्कराकर घर के भीतर चली जाती।

हम दोनों मुस्कराहट की भाषा में ही एक-दूसरे से बातें करते थे और हमारी आंखें खिलखिलाकर हँस पड़ती थीं।

तब मुझे लगा कि इस भाषा में संसार के किसी भी व्यक्ति या प्राणी से बहुत ही आसानी से बातें की जा सकती हैं। इसके लिए ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए, बस आपका मन निर्मल हो, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने के बजाय उनके लिए दया-करुणा और प्रेम का भाव हो।

सोमवार से लेकर शनिवार तक मन खुशी से भरा रहता था। कक्षा में बच्चों को बड़े ही उत्साह के साथ पढ़ाता था। पहले कभी-कभी किसी बात को लेकर बच्चों को जो डांट-फटकार लगा देता था, अब वह भी बंद हो गया था। किसी बच्चे के गृहकार्य न करने पर उसे हँसते हुए माफ कर देता था। मेरे इस आश्चर्यजनक परिवर्तन से न केवल बच्चे, बल्कि मेरे सहकर्मी शिक्षक भी हैरान थे। शुरू से मैं मितभाषी था, लेकिन अब तो मेरी वाणी में अतिरिक्त मिठास भी घुल गई थी।

रविवार छुट्टी का दिन जरूर होता था, लेकिन अब वह बोझ लगने लगा था। आराम बेचैनी में बदल जाता था। किसी काम में मन ही नहीं लगता था। बस उस लड़की के बारे में ही सोचता रहता था। मेरा उसके बारे में सोचना महज शारीरिक आकर्षण नहीं था, बल्कि मैं उससे आगे उसे अपना जीवनसाथी बनाने के बारे में गंभीरता से सोच रहा था, इस बात की चिंता किए बगैर कि वह मेरे बारे में क्या सोचती है।

अब उसका नाम और उसके घर-परिवार के बारे में जानने की इच्छा प्रबल हो उठी। सोचने लगा कि किस तरह पूछूं? मन में यह डर भी था कि कहीं वह मुझे छिछोरा न समझने लगे। सोचा कि क्यों न वही तरीका अपनाया जाए जो अब तक प्रेमी-जोड़ा अपनाते रहे हैं, यानी खत लिखना।

मैंने एक रंगीन कागज निकाला और खत लिखना शुरू कर दिया। पूरे दो पेज में अपने मन की लगभग सारी बातें लिख दीं और उसे एक लिफाफे में बंद कर बाहर से अच्छी तरह चिपका दिया। सोचा कि कल ही जब स्कूल जाऊंगा तो उसके आंगन में फेंक दूंगा।

लेकिन इसमें भी एक खतरा था। मेरे पत्र फेंकते ही उसी समय कहीं उसके मां-बाप, भाई या घर का कोई सदस्य आंगन में न निकल आए और पत्र उसके कब्जे में चला जाए? यह भी हो सकता है कि वह लड़की पढ़ी-लिखी न हो और वह पत्र किसी को पढ़ने के लिए दे दे। दोनों ही स्थिति में उस लड़की पर मुसीबत आ सकती थी जो मैं कदापि नहीं चाहता था। मेरा क्या है, पकड़े जाने पर मैं रास्ता बदल सकता था।

इसी उधेड़बुन में मैंने खत को फाड़कर फेंक दिया और आने वाले दिनों तथा स्थितियों-परिस्थितियों को भविष्य के गर्भ में यह कहते हुए डाल दिया कि जैसा चल रहा है,  वैसा चलने दिया जाए।

दूसरे दिन कार्यालयीन काम अधिक होने के कारण स्कूल से लौटते हुए मुझे देर हो गई। नरहरपुर पहुंचा तो शाम के लगभग सात बज चुके थे।

उसके अगले दिन मैं जैसे ही उसके घर के पास पहुंचा और बाइक की गति धीमी करते हुए हार्न बजाया, वह लड़की बिजली की गति से भी तेज कदमों से आंगन की दीवार तक पहुंचकर मेरे सामने एक रुमाल फेंक दी और उतनी ही गति से घर के भीतर चली गई।

मैंने रुमाल उठाया और फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी। मैं इतना जान गया था कि उस रुमाल के भीतर एक पत्र है।

मैं हैरान था। मैं खुद उसे पत्र लिखने जा रहा था, लेकिन उसने पहले ही बाजी मार ली। अब मेरे मन के भीतर जिज्ञासाओं के बवंडर उमड़ने-घुमड़ने लगे कि उसने खत में आखिर क्या लिखा होगा?  क्या उसने प्रेम निवेदन किया होगा? क्या वह किसी तकलीफ में होगी? क्या उसकी शादी कहीं और तय हो गई होगी? क्या उसने किसी सहेली या रिश्ते की भाभी से मुझे चाहने की बात बताई होगी और वह बात उसके घर पहुंच गई होगी और फिर उसके मां-बाप ने उसे बहुत डांटा-फटकारा होगा?

मैं अपने आप को रोक नहीं सका और गांव के बाहर ही गाड़ी खड़ी कर कांपते हुए हाथ से पत्र निकाल लिया। पत्र मात्र तीन वाक्यों में लिखा हुआ था। लिखा था- दिन डूबने के बाद इस रास्ते से मत गुजरना। यह भालुओं और जंगली सुकरों का रहवास क्षेत्र है। अंधेरा होने के बाद तेंदुए भी सक्रिय हो जाते हैं।

मुझे इस बात की तसल्ली हुई कि मेरी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं, लेकिन मन में हताशा भी हुई कि उसने प्रेम का एक शब्द भी नहीं लिखा था।

बाइक चलाते हुए मैं उसी के ध्यान में मग्न था। कुछ दूर आगे जाने के बाद अचानक मैंने ब्रेक लगा दिया और गाड़ी रोक दी। अपने आपसे कहाअरे यार, भले ही उसने प्रेम का एक शब्द नहीं लिखा, लेकिन उसे मेरी परवाह तो है। उसने भावी खतरे से बचने के लिए आगाह तो किया है न! यही तो उसका प्रेम है। यदि वह प्रेम नहीं करती तो मेरी इस तरह चिंता क्यों करती? और फिर प्रेम करने के लिए प्रेम लिखना कहां तक जरूरी है?’

मन एकदम से उत्साहित हो गया।

वह बला की खूबसूरत थी। इतनी सुंदर कि सुंदर शब्द उसकी सुंदरता के सामने अर्थहीन लगता था। सुंदर दिखने और उसे दिखाने के लिए मैं भी रोज अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर जाता था। जब मैं उसकी सुंदरता के बारे में सोचता था तो कभी-कभी यह सोचकर उदास भी हो जाता था कि मुझ जैसे साधारण शक्ल-सूरत वाला लड़का उसके मन को कहां भाएगा।

मेरे दिन बहुत अच्छे से कट रहे थे। चार-पांच महीने यूं ही गुजर गए।

एक दिन और ज्यादा समय तक मुझे स्कूल में रुकना पड़ गया। वहीं शाम हो गई थी। मैंने उस लड़की की सलाह को मानते हुए मुख्य रास्ते से घर लौटने का निश्चय किया।

घर लौटते समय चारामा के आगे मरकाटोला घाटी के पास सामने से तेज रफ्तार से आ रही एक लग्जरी बस की हेडलाइट की तेज रोशनी से मेरी आंखें चुंधिया गईं और मेरी बाइक सड़क किनारे मुरुम में फिसल गई। मुझे ज्यादा चोट तो नहीं आई, लेकिन गाड़ी के नीचे पैर दब जाने के कारण गर्म साइलेंसर पाइप से मेरा एक घुटना थोड़ा जल गया और फफोले पड़ गए। वापसी में ही धमतरी मसीही अस्पताल में मरहम-पट्टी कराई और घर आ गया। दूसरे दिन घुटने में सूजन आ गया। डॉक्टर ने दो-चार दिन घर में रहकर आराम करने की सलाह दी। मैंने उनकी सलाह मान ली और मेडिकल लीव ले लिया।दस दिन बाद जब मैं मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने के लिए अस्पताल गया तो हैरत में पड़ गया। वह लड़की भी वहां डॉक्टर के केबिन के बाहर अन्य मरीजों के साथ स्टूल पर बैठी हुई थी।

मैं किसी अनहोनी की आशंका से भर गया। लड़की काला चश्मा पहने हुई थी। क्या उसकी आंखों में चोट लग गई है या फिर किसी तरह का संक्रमण फैल गया है? उसके साथ एक अधेड़ वय की महिला और अठारहउन्नीस साल का एक लड़का भी था। मैंने अंदाजा लगाया कि वह महिला मां और लड़का उसका भाई होगा।

इससे पहले कि मैं लपककर उसके पास जाता और कुछ पूछता, वह अपनी मां के साथ डॉक्टर के केबिन में चली गई।

मैं अपने आपको रोक नहीं सका। उसके भाई से आखिरकार पूछ लिया कि उसे क्या हुआ है?

उसके भाई ने बताया कि वह पिछले दस दिन से सोई नहीं है। पलकें भी नहीं झपकातीं। सुबह से ही आंगन में कभी बैठकर तो कभी खड़े-खड़े टकटकी लगाए किसी की राह देखती रहती है। उसकी आंखों का पानी सूख चुका है। हम लोगों ने उसे कई बार रुलाने की भी कोशिश की ताकि आंखों से आंसू निकल सके। पूछने पर भी कुछ नहीं बताती। कई बैगा-ओझा से भी इलाज कराके देख लिया कि किसी भूत-प्रेत का साया न पड़ गया हो। इससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ। थक-हारकर यहां इलाज के लिए लाए हैं।

मैं अब वहां पलभर के लिए भी रुक नहीं पाया। बार-बार मेरी रुलाई फूट रही थी। बार-बार अपने आप को कोस रहा था कि यह सब मेरे कारण ही हुआ है। जिस दिन से उसने मुझे नहीं देखा, उसी दिन से उसकी यह हालत हुई थी।

उस रात को मैंने हजार सदियों की तरह गुजारा। रातभर मैं भी नहीं सो सका और सुबह होने का इंतजार करने लगा।

दस दिन बाद स्कूल जा रहा था और घर से एक निश्चय करके निकला था। ठीक साढ़े नौ बजे उसके घर के सामने पहुंचा। हार्न बजाया और अन्य दिनों की तरह आगे बढ़ने के बजाय गाड़ी वहीं रोककर खड़ा हो गया।

वह रोज की तरह आंगन में ही खड़ी थी। हार्न की आवाज सुनते ही लपककर मेरी ओर बढ़ी। मेरे हाथों को अपने हाथों से थामकर मुस्कराते हुए बोली- आ गए…बहुत देर लगा दी…

इसके बाद उसकी आंखों से हजारों नदियां बहने लगीं। मुझे लगा कि दुधावा बांध जो उसकी आंखों में बसा हुआ था, आज ढह गया है।

बीच सड़क पर इस हालत में हम दोनों का इस तरह खड़ा रहना मुझे मुनासिब नहीं लगा। मैं उसके कंधों को थामते हुए आंगन तक आ गया।

इस बीच उसके मां-बाप, भाई और पड़ोस की तीन-चार महिलाएं भी अपने घरों से बाहर निकल आई थीं और हम दोनों को देखे जा रही थीं।

उसके भाई ने मुझे पहचान लिया। कहा- आप तो कल धमतरी में अस्पताल में मिले थे न,  कौन हैं आप और इधर से कहां जा रहे हैं? क्या मेरी बहन आपको जानती-पहचानती है?

मैंने लड़की की ओर देखते हुए और मुस्कराते हुए बस इतना ही कहा- धमतरी से कांकेर वाया नरहरपुर…