वरिष्ठ कवयित्री और अनुसंधानकर्ता| गुजरात में रहते हुए गुजराती और हिंदी के बीच सेतु का कार्य|

किताबें मुझसे बातें करती हैं
कई सारे सवाल करती हैं
हां कभी रूठती भी हैं मुझसे ये किताबें
जब मैं दिनों तक
पैरों में पंख लगाए
इधर-उधर घूमती रहती हूँ
तब रूठती हैं किताबें
घर से निकलते वक्त मैं
झुकी, सरसरी निगाह से देख लेती हूँ
किताबों की बंद अलमारी को
वह भी देखती है मुझे उदास आंखों से
मैं पांव बढ़ा देती हूँ तेजी से
घर के बाहर
पर उसकी उदास आंखें
रह जाती हैं मेरे भीतर
मैं आकाश की ऊंचाइयों तक जाकर
झांकती हूँ नीचे हवाई जहाज की खिड़की से
तो लगता है
वे बांहें फैलाकर मुझे बुला रही हैं
कभी तेज गति से दौड़ती ट्रेन से
सफर करते हुए
यूं ही देख लेती हूँ खिड़की से बाहर
तो लगता है जैसे तेज हवा में
फड़फड़ा रहे हैं उनके पन्ने
घूम-घूम के थकी हारी मैं
अतिथि निवास के नरम तकिए के आगोश में
जब निढाल होकर गिरती हूँ
लगता है जैसे
तकिए के नीचे रखी किताब के अक्षर
मुझे हौले-हौले थपथपाकर
मेरी बंद आंखों में भर रहे हैं नए सपने
किताबें, ये कैसा रिश्ता है मेरा उनसे
मैं जहां भी जाती हूँ
बंद अलमारी से झांकती हैं उदास आंखें
बरबस खींचती रहती हैं मुझे अपनी ओर
सारे जहान में मुझे
किताबें ही दिखती हैं
उदास, बांहे फैलाकर मुझे पुकारती।

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