कवि, कथाकार और समीक्षक।बाल कविता संग्रह इ इत्ता है, उ उत्ता है’  नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित।संप्रति गवर्नमेंट कॉलेज ऑव एडुकेशन, वर्धमान’  पश्चिम बंगाल में एसोसिएट प्रोफेसर।

शिवानी को बिस्कुट अच्छे लगते हैं और सोन पापड़ी भी अच्छी लगती है, लेकिन हवा मिठाई सबसे अधिक अच्छी लगती है।

वह घर के कच्चे ओसारे पर अपनी सखी वीणा के साथ गुड्डा-गुड्डी का ब्याह रचा रही थी।गुड़िया को ब्याह के कपड़े पहनाए जा चुके थे।फिलहाल गुड्डे की साज-सज्जा चल रही थी।गुड्डा काफी मशक्क़त के बाद लाल पन्नी का कुर्ता पहन चुका था।अब उजली पन्नी को काट-छांटकर उसके लिए ब्याह की धोती बनाई जा रही थी।ठीक उसी समय गली में हांक सुनाई पड़ी, ‘हवा मिठाई ले लो, हवा मिठाई!’

बस, शिवानी सब छोड़कर सरपट गली की तरफ भागी।वीणा रुको! रुको..! कहती रही।गुड्डा बेचारा बगैर धोती के ओसारे पर धूल में लोटता रहा और शिवानी गली में खुलते घर के दरवाजे पर पहुंचकर सांस रोककर खड़ी हो गई।

‘हवा मिठाई ले लो, हवा मिठाई! रंग गुलाबी, मीठी-मीठी हवा मिठाईऽऽ…!’

फेरीवाला बास के एक मोटे और बड़े से डंडे के ऊपर के सिरे पर झिलमिलाती पन्नियों में बंद गोल-गोल गुलाबी हवा मिठाई लटकाए शिवानी के एकदम पास से गुजर गया।

शिवानी की आंखें पूरे समय हवा मिठाई पर अटकी हुई थी।वह गिन रही थी …एक, दो, .तीन, .चार ! और..और..चारऽऽ!! इससे आगे की गिनती वह नहीं जानती थी। ‘बाप रे!’

उसकी बड़ी-बड़ी आंखें फैलकर और बड़ी हो गईं।तब तक वीणा भी शिवानी के पास आकर, उससे सटकर खड़ी हो गई थी।दोनों सखियां चुपचाप देर तक, गली में क्रमशः दूर जाते हवा मिठाई वाले को देखती रहीं।

शिबनिया! गे शिबनिया! कहां मर गयी रे मुंहझौंसी?’

नानी की ग़ुस्से से भरी पुकार सुनकर शिवानी भारी मन से घर के अंदर चली और वीणा पड़ोस में अपने घर की तरफ़ दौड़ पड़ी।

शिवानी लगभग पांच साल की है।गांव में अपनी अकेली विधवा नानी के साथ रहती है।शिवानी के मां-बाप नासिक में रहते हैं।कुल चार संतानों में शिवानी सबसे छोटी है।शिवानी के पिता नासिक के किसी फल के बगीचे में चौकीदारी का काम करते हैं।आमदनी कम है और परिवार बड़ा।शिवानी के यहां गांव में रहने से, नानी का भी मन लगा रहता है और शिवानी के मां-बाप को भी आर्थिक दृष्टि से थोड़ी राहत मिल जाती है।

शिवानी के मामा का पुणे में अपना कोई छोटा सा कारोबार है।वे थोड़े से रुपये हर महीने अपनी मां के लिए गांव भेज देते हैं, जिससे शिवानी और उसकी नानी का गुजारा हो जाता है।शिवानी की नानी अपने छोटे से भंडार का बचा-खुचा मक्के का सत्तू निकालकर सान रही थी।शिवानी को देखकर बिगड़ीं, ‘कहां टौआने लगती है सुबह से खलिये पेट? खाने-पीने का कुछ होश नहीं रहता है! चल बैठ! सत्तू साने हैं, थोड़ा सा डाल ले पेट में… फिर टौआना जहां मन करे!’

शिवानी बेमन से नानी के बगल में बैठ तो गई, लेकिन उसे सत्तू बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।बोली, ‘हमको भूख नहीं है नानी!’

‘अच्छा? कहां से तसमय ठूंसकर आ रही है महरानी? चुपचाप खाओ नहीं तो डंगा देंगे पकड़कर!’

शिवानी ने जैसे-तैसे थोड़ा-बहुत सत्तू गटककर यह सजा काटी और फिर उठकर भागी वीणा को खोजने।वीणा का घर बिलकुल सामने ही था।साल भर पहले तक दोनों घरों का एक ही साझा आंगन हुआ करता था।लेकिन आपसी झगड़ों के कारण बीच में टाट की ऊंची दीवार पड़ गई थी।इसकी वजह से थोड़ा घूमकर जाना पड़ता था।इस बेवजह की कठिनाई से बचने के लिए शिवानी और वीणा ने मिलकर टाट में घुसकर निकलने लायक एक छोटा सा सुराख बना लिया था।दोनों एक दूसरे के घर जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे।शिवानी सुराख से बाहर निकली तो देखा वीणा ठीक उसके सामने खड़ी है।खुश होकर बोली, ‘चल बिनिया, खेलने!’

वीणा के हाथ में एक टूटी हुई बदरंग स्लेट और एक फटी हुई जिल्द की कोई पुरानी सी किताब थी।गंभीर भाव से बोली, ‘हम अभी इसकुल जा रहे हैं!’

स्कूल जाने की इच्छा शिवानी की भी होती थी।रोज सुबह घर के सामने से वह कई बच्चों को स्कूल जाते देखती थी।उसने एक दिन नानी से कहा भी था कि वह भी सबके साथ स्कूल जाएगी।नानी कुछ बोली नहीं, बस हँसने लगीं।शिवानी ने वीणा के हाथ से स्लेट लेकर उलट-पुलटकर देखा, बोली  ‘अच्छा, तो हम भी तुम्हारे साथ इसकुल जाएंगे!’

‘लेकिन तुम्हारे पास सिलेट और किताब कहां है?’

फिर कुछ सोचकर अपने हाथ की किताब शिवानी को देती हुई बोली, ‘ठीक है, तुम किरताब ले लो!’

फिर दोनों साथ-साथ स्कूल चले।वीणा के आंगन में बैठे एक काले रंग के झबरे कुत्ते ने जब दोनों को आंगन से बाहर जाते देखा तो वह भी उठकर उनके साथ चल पड़ा।शायद वह भी इन दोनों के साथ ‘इसकुल’ जाना चाहता था।

तीनों बहुत देर तक चलते रहे।कहीं कुछ मजेदार दिखाई पड़ता तो ठहरकर देखने भी लगते।एक जगह कई बच्चे कंचा खेल रहे थे, वे वहां भी रुके और देर तक यह तमाशा देखा।आखिर चलते-चलते गांव के पोखर के पास पहुँच गए।वहां कहवा का एक पुराना पेड़ था।शिवानी के पैरों में थकान होने लगी थी, वह वहीं पेड़ के नीचे धरती पर बैठ गई।वीणा भी थक चुकी थी, वह भी बैठ गई।कुत्ता थका था या नहीं, पता नहीं, लेकिन जब दोनों बैठे तो वह भी आकर उनके नजदीक बैठ गया।

शिवानी ने कुछ चिंतित होकर पूछा, ‘इसकुल और कितनी दूर है?’

वीणा पोखर में नहाते लोगों को देख रही थी, बोली, ‘पता नहीं!’

‘लेकिन इसकुल है कहां?’

इस प्रश्न का जवाब भी वीणा ने संक्षेप में ही दिया, ‘पता नहीं!’

अब शिवानी ने पास बैठे कुत्ते की तरफ़ देखकर कहा, ‘तुमको पता है, इसकुल कहां है?’

कुत्ता जीभ बाहर निकाल कर बस टुकुर-टुकुर शिवानी और वीणा का मुंह ताकता रहा, शायद कहना चाहता था, ‘भला मुझे कैसे पता होगा?’

‘…अरी ओ सिबनिया! अरी ओऽऽ बिनिया !! यहां कैसे पहुंच गई रे तुम दोनों? देखो तो, बित्ते भर की छोकरियों को, कैसे समूचे गांव में धमधमाती नाचती फिर रही है! हे, भगवान! कहीं कुछ हो हवा गया, तो इसकी मैया मेरी ही छाती का लहू पीने दौड़ेगी!’

शिवानी की नानी बभनटोली गई थी मल्हू झा की दुकान से उधार में सेर भर चावल लाने।शिवानी के गले से रोटी उतरती नहीं थी, उसे दोनों टाइम भात ही चाहिए होता था।इधर घर में चावल का एक दाना भी नहीं बचा था।लेकिन उस दाढ़ीजार कठ-कलेजवा ने उधार देने से साफ मना कर दिया।कितनी चिरौरी की, कितना भरोसा दिलाया कि दस-पांच रोज की बात है, पुणे से रुपये आते ही वह खुद आकर दे जाएगी।लेकिन वह पिशाच किसी तरह नहीं माना! बेचारी खाली हाथ वापस लौट रही थी कि घर से इतनी दूर पोखर पर शिवानी को बैठी देखकर उसका माथा ही फिर गया।

शिवानी ने भी अचानक नानी को देखा तो सकपका गई।फिर डरते-डरते बोली, ‘नानी, हम इसकुल जा रहे हैं!’

‘हां, हां, क्यों नहीं? और इसकुल क्यों? तुम तो कालिज जाओ, तुमको पढ़-लिख के कलट्टरनी जो बनना है! एक तुम्हारा बाप है न कलट्टर वहां नासिक में!’

‘नानी, कलट्टर क्या होता है?’

‘कलट्टर होता है…’

और नानी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी।शिवानी के धूप में तमतमाए मासूम सांवले चेहरे पर नजर पड़ते ही उसका सारा गुस्सा उड़न छू हो गया।उसने उसे हुमककर गोद में उठा लिया और लदबदाती हुई घर लौट चली।

‘कितनी भारी हो गई है रे तू!’ वह हांफती हुई बोली और शिवानी का मुंह चूम लिया।वीणा और झबरा कुत्ता भी नानी के पीछे-पीछे घर की ओर चले।

घर पहुंचकर शिवानी को नहलाकर नानी ने जल्दी-जल्दी दो पैला आटा निकाला और दौड़कर सितिया चाची के घर गई।बदले में एक पैला चावल ले आई और शिवानी के दोपहर के खाने के लिए भात बनाने बैठी।उधर दादी से मार खाकर, वीणा बहुत देर तक अपने ओसारे पर लोट-लोटकर रोती रही।क्योंकि सुबह जिस किताब को लेकर वह ‘इसकुल’ जा रही थी, वह दरअसल उसकी दादी की हनुमान चालीसा थी।

शाम को शिवानी और वीणा आंगन में छह महीने की एक पाठी का श्रृंगार करने में व्यस्त हो गई थी।नानी को शायद हरारत की वजह से हल्का बुखार चढ़ आया था और वह आंखें बंद किए घर की दहलीज में रस्सी की एक झूली हुई पुरानी खटिया पर लेटी हुई थी।शिवानी को कहीं से आलता की एक पुरानी शीशी हाथ लग गई थी।उसमें अभी भी दो-चार बूंद आलता का बचा हुआ था।वह उसी से पाठी के होंठों को रंगने का प्रयत्न कर रही थी।पाठी को भी शायद अपने होंठों का रंगा जाना अच्छा लग रहा था।वह चुपचाप खड़ी थी और रह-रहकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करने के लिए मिमिया उठती थी।लेकिन उसे टोपी पहनना बिलकुल ही पसंद नहीं था, क्योंकि वीणा जब भी उसके माथे पर बांस की छोटी सी टोकरी रखने का प्रयास करती, वह सिर हिलाकर उसे गिरा देती थी।

रात को शिवानी ने सपना देखा कि वह स्कूल गई हुई है।वहां बहुत सारे कमरे हैं।सभी कमरों में बच्चे उछल-कूद रहे हैं।कमरे में उसकी नन्ही सी पाठी भी है और वीणा का झबरा कुत्ता भी मौजूद है।पाठी के होंठ लाल-लाल हैं और उसने वीणा का वही फूलछाप फ्रॉक पहना हुआ है, जिसे पहनकर वह रोज उसके साथ खेलने आती है।कमरे में बहुत सी हवा मिठाई इधर-उधर उड़ रही है, बच्चे उसे पकड़ने के लिए उछल-कूद रहे हैं।

शिवानी ने आश्चर्य से देखा कि वीणा का झबरा कुत्ता उछल-उछलकर हवा मिठाई पकड़ रहा है और खा रहा है।जबकि उसकी नन्ही सी पाठी पूरे कमरे में इधर-उधर दौड़ रही है और मेंअऽऽ… मेंअऽऽ कर रही है, क्योंकि अब तक उसे एक भी हवा मिठाई नहीं मिल पाई थी।शिवानी खुद भी दौड़कर कमरे में पहुंच जाती है और हवा मिठाई को उछल-उछलकर पकड़ने की कोशिश करती है।लेकिन हवा मिठाई तक उसके हाथ पहुंच ही नहीं पा रहे हैं।तभी कमरे में उछलते-कूदते बच्चों से उसकी टक्कर हो जाती है और वह वहीं धरती पर धराम से गिर पड़ती है।

‘शिबनिया! अरी ओ शिबनिया! रो क्यों रही है? क्या हो गया तुझे? धरती पर क्यों सो रही है रे? …आ जल्दी से, खटिया पर आ के सुत!’

नानी की खनखनाती हुई ऊंची आवाज सुनकर शिवानी की समझ में आया कि सबकुछ सपने में चल रहा था।बस एक ही चीज असली थी, उसका खटिया पर से नीचे गिरना! वह बिना कुछ कहे उठकर नानी के बगल में फिर सोने चली गई।पर उसे देर तक नींद नहीं आई।

सपने का संबंध आंखों से उतना नहीं होता, जितना कि आदमी के मन से होता है।आंखें प्रायः वही देखती हैं जो मन उसे देखने के लिए कहता है।शिवानी जब तक जगी रही तब तक और फिर जब सो गई, तब भी, वह केवल एक ही सपना बार-बार देखती रही,हवामिठाईका !

दूसरे दिन सुबह शिवानी, वीणा के आने का इंतजार कर रही थी।वह कई बार उसे चिल्लाकर पुकार भी चुकी थी।पर वीणा आने का नाम ही नहीं ले रही थी।यही नहीं, उसने अब तक कोई जवाब भी नहीं दिया था।हारकर शिवानी ने फिर एक बार पुकारा, ‘बिनिया! गे बिनियाऽऽऽ..!’

इस बार भी वीणा की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।जबकि वीणा आंगन में टाट के पीछे ही खड़ी थी और चुपचाप सोन पापड़ी खा रही थी।पिछले दिन की पिटाई के लिए वतौर मुआवजा दादी ने कुछ देर पहले उसे पांच रुपये की सोन पापड़ी खरीदकर दी थी।सोच रही थी, खा लें तो शिबनिया के पास खेलने जाएं।लेकिन तभी शिवानी ने किसी मुसीबत की तरह टाट की सुराख से अपना माथा बाहर निकाला और उसे देख लिया।बोली, ‘क्या खा रही है बिनिया?’

वीणा को काटो तो खून नहीं।घबराकर बोली,  ‘कुछ नहीं, कुछ नहीं!’ और भाग खड़ी हुई।

वीणा के चले जाने के कुछ समय बाद तक शिवानी अवाक दृष्टि से जिस तरफ वह भागकर गई थी, उधर देखती रही।फिर धीरे-धीरे वापस अपने घर आ गई।वह सोच रही थी, वीणा कुछ खा रही थी, लेकिन उसे देखकर वह भागी क्यों? बहुत सोचने पर भी यह बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी और परेशान कर रही थी।फिर वह दाल बीनती नानी के पास जाकर बैठ गई।

शिवानी का व्यवहार नानी को कुछ असाधारण मालूम हुआ, ‘क्या हुआ रे शिबनिया? इतनी चुप क्यों है?’

‘कुछ नहीं नानी!’

‘अच्छा! बिनिया कहां है?’

‘बिनिया भाग गई!’

‘अच्छा! कहां?’

‘पता नहीं नानी!’

‘ठीक है, चुपचाप यहीं बैठ! मैं जाती हूँ चूल्हा जलाने, …खाना बनाना है।’ और वह कमर पर हाथ रखकर, हाय दैया! कहती हुई उठकर आंगन में मिट्टी का कच्चा चूल्हा सुलगाने चली गई।

गांव में भी प्रायः हर घर में गैस के चूल्हे का प्रचलन हो गया था।कच्चा चूल्हा तभी जलता जब गैस का सिलिंडर खत्म हो जाता था या फिर गैस भरवाने के लिए पास में रुपये नहीं होते थे।नानी के हाथ इधर बिलकुल खाली हो गए थे।इस महीने पुणे से रुपये आने में बहुत देर हो रही थी।बेचारी, दिन में कई बार आम के बगीचे जाती और जलावन के लिए थोड़ी-थोड़ी सूखी लकड़ी चुनकर लाती थी।

शिवानी कुछ देर तक वहीं ओसारे पर बैठकर नानी का चूल्हा सुलगाना देखती रही, फिर कमरे के अंदर से अपनी गुड़िया उठा लाई और खेलने लगी।जलावन की लकड़ी अच्छी तरह सूखी नहीं थी, धुआं बहुत हो रहा था।शिवानी ने देखा, खांस-खांसकर बेचारी नानी का बुरा हाल है।अचानक शिवानी के हृदय की धड़कन तेज हो गई और उसका कलेजा जैसे उसके मुंह तक आ गया।वह अपने आप से ही फुसफुसाकर बोली,‡‘हवा मिठाई!’

‘हवा मिठाई ले लो, हवा मिठाई! रंग गुलाबी, मीठी-मीठी हवा मिठाई!’

फेरीवाले की चिर-परिचित हांक अब गली में साफ-साफ गूंजने लगी थी।शिवानी हाथ की गुड़िया को वहीं ओसारे पर फेंककर गली की तरफ दौड़ी और पलक झपकते गली में खुलते दरवाजे पर पहुंच गई।गली में फेरीवाले को घेरकर कई बच्चे अपने मां-बाप के साथ खड़े थे।शिवानी ने देखा, एक के बाद एक सभी बच्चों के हाथों में हवा मिठाई आती जा रही है।आते-जाते फेरीवाला भी शिवानी को पहचानने लगा था।मुस्कराकर बोला,   ‘हवा मिठाई लोगी बिटिया?’

शिवानी से यह भी भला कोई पूछने की बात थी? उसका तो रोम-रोम बस एक ही चीज चाहता था- हवामिठाई! लेकिन उसे पता था कि नानी के पास रुपये नहीं हैं।अपने घने घुंघराले लटों से भरा माथा हिलाकर बोली, ‘हाँ ऽऽऽ! लेकिन नानी लुपया नहीं देगी!’

‘तो फिर बाल हैं? वही ले आओ और ले जाओ मिठाई!’

नए बाजार का यह एक नया उपयोगितावादी अध्याय था जो गांव में शुरू हो चुका था।भांति-भांति के फेरीवाले औरतों के टूटे और गिरे हुए बालों के बदले में अपना सामान देने लगे थे।औरतें हर दिन कंघी में गिरे हुए बालों को फेंकने के बजाय सहेज कर रख लेती थीं।महीने‡चारमहीनेमें, उसके बदले में उन्हें अपने बच्चों के लिए फेरीवालों से कभी बिस्कुट, तो कभी सोन पापड़ी, तो कभी हवा मिठाई या फिर जो भी खाने-पीने की चीजें वह बेचता होता, हासिल हो जाता था।यह और बात थी कि शिवानी बेचारी को इस नई रीति का अब तक ज्ञान नहीं हो पाया था। ‘बाल?’

उसकी समझ में नहीं आया कि हवा मिठाई वाला क्या कह रहा है!

पर तभी उसने देखा कि एक लड़का अपने हाथ में बालों का एक छोटा सा गोला लेकर आया।फेरीवाले ने उसे संभालकर अपनी झोली में रख लिया और बदले में बच्चे के हाथ में सचमुच ही एक हवा मिठाई थमा दी।इस नई घटना ने शिवानी की मरती हुई आशा को फिर से जिंदा कर दिया।बात उसकी समझ में आ गई थी।उसने कुछ सोचकर फेरीवाले से कहा, ‘रुको, लाते हैं!’

फिर वह सरपट घर के भीतर भाग कर गई।नानी ने चूल्हा सुलगा लिया था और खाना बनाने में व्यस्त थी।नानी का मुंह चूल्हे की तरफ होने के कारण वह शिवानी को देख नहीं सकती थी।उसे शिवानी के गली में जाने और वापस लौटने का कुछ भी पता नहीं चला।शिवानी की तरफ नानी की पीठ थी और कच्चे-पक्के बालों से भरा माथा था।पीठ पर भी ढेर सारे बालों के गुच्छे- कुछ काले, कुछ उजले, लटके हुए थे।शिवानी ने अपनी छोटी सी मुट्ठी में नानी के माथे के जितने बाल पकड़ सकती थी, पकड़ी और एक झटके से खींचकर वापस गली की तरफ़ भाग गयी।इधर नानी मारे दर्द के ऊ..ऊ..हू.. हू ..हू ! करती रह गयी।जब तक नानी कुछ समझ पाती, शिवानी वहां से गायब हो चुकी थी।

उसने फेरीवाले के पास पहुंचकर अपनी नन्ही सी मुट्ठी खोल दी और हांफते हुए बोली, ‘ये लो बाल!’

फेरीवाले ने चकित होकर देखा, बच्ची अपने हाथ में गिनती के आठ-दस बाल लिए खड़ी थी, जिसमें दो-तीन बाल काले थे और बाकी सन की तरह सफेद।वह आश्चर्य से कभी शिवानी को देखता तो कभी बालों को।फिर कुछ सहानुभूति के स्वर में बोला, ‘इतने थोड़े से बालों की मिठाई नहीं मिल सकती न बिटिया! और हैं, तो लाओ!’

फेरीवाले की बात सुनकर शिवानी उदास हो गई। ‘और बाल?’ अब  और  बाल वह कहां से लाएगी? नानी अब थोड़े न लेने देगी अपने बाल? लेकिन अचानक ही उसने इस कठिन समस्या का हल भी ढूंढ लिया।झटपट अपने घुंघराले बालों  से भरा माथा फेरीवाले के आगे करती हुई बोली, ‘ले लो! ले लो! जितने बाल चाहिए..!!’

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