वरिष्ठ लेखिका।सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)एक शख्स कहानीसा’ (जीवनी) लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

अमृतमय-कुंभ से पहले दिन बैसाखी-पर्व पर सूर्य को प्रणाम करते हुए असंख्य हाथ ऊपर उठे हुए हैं और हवा में गूँजने लगता है- ‘ॐ भूर्भुव:स्व:तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो नः प्रचोदयात्’ का तारसप्तक स्वर। मेरा सिर भी अनजाने ही झुक जाता है और दोनों खाली हाथ अंजलि मुद्रा में ऊपर उठ जाते हैं। क्या यह इन अनगिनत तीर्थयात्रियों द्वारा रचे गए इस वातावरण का प्रभाव है? या कि ये मेरे अन्तर्मन में छिपे हुए संस्कार हैं? मुझमें यह परिवर्तन कैसे? क्या इसे भी ये तीर्थयात्री ही रच रहे हैं?

तभी उगते सूर्य की बाईं ओर दिखे- लम्बे-लम्बे दण्ड कंधे पर रखे, भगवा ध्वज उड़ाते साधु और दाईं ओर जैसलमेर की सतरंगी चूनड़ी की पगड़ी सिर पर बाँधे बूढ़े बाबा। इन बाबा की पहरेदारवाली मुद्रा देखते ही बनती थी। पोपला मुँह, पर चेहरे पर तेज ऐसा मानों अपने साथ आई हुईं सारी ‘पद्मिणियों’ के एक मात्र रक्षक वे ही हैं। पन्द्रह साल की बहन की रक्षा हेतु माँ द्वारा नियुक्त किया गया पाँच साल का भाई जिस ठसक से चलता है; उसी तरह बाबा भी कभी आगे चलती युवती को फटकार कर, तो कभी पीछे रह जाती प्रौढ़ा को ‘दक्काल’ (कड़ी डाँट) उस ठसक का इज़हार कर रहे थे…

ठिठके पैर, रेले के धक्के से अनायास आगे बढ़ रहे हैं। यह शायद  गंगा माई का प्रताप है कि वह मुझे भय से मुक्त होने की दिशा में ठेल रही है। क्या मैं इस परीक्षा मेें पास हो पाऊँगी? …मुझे अमृत मिलेगा या नहीं इसका पक्का पता तो मुझे नहीं है, पर इन धक्कों से मेरा झूठा अहंकार अवश्य ही थोड़ा-बहुत विर्दीण हो रहा है। यह रेला मेरी क्षुद्रता, मेरी कीट-पतंग-जैसी स्थिति से मेरा साक्षात्कार करा रहा है। बता रहा है- महासागरों से घिरी इस पृथ्वी पर मेरी वक़त एक बूँद के सहस्र पद्मांश से भी कम है, फिर तो असंख्य सौर-मंडलों, नीहारिका और आकाशगंगा के ग्रह-नक्षत्रों में मेरी क्या स्थिति होगी सोचकर ही सिर घूमने लगता है। मन में प्रार्थना के स्वर उभरने लगते हैं, “हे प्रभु! हे विराट! कृपा कर मुझे अपनी क्षुद्रता की सम्पूर्णता मेें जीने दो। मैं जो भी कुछ हूँ यदि वह भी भूमिसात हो गया, तो मेरा क्या होगा? क्या मैं कोई वायवीय वस्तु नहीं बन जाऊँगी? ..हवा-सी हल्की और पानी-सी तरलहोकर यदि मैं त्रिशंकु की तरह बीच अधर में ही लटक गयी तो? सब कहते हैं, ‘मैं’, मेरा छोड़ दे, पर भगवान! यदि मैं फिर से ऐसा कर पाती, तो तुझे ढूँढ़ने यहाँ क्यों आती? ..अपने अंदर ही न ढूँढ़ लेती?” उलझन भरे शब्दों के दाँव-पेंच और तार्किक प्रश्नों के संजाल में फँसती मैं ‘हर की पौड़ी’ पर जा बैठी।

आज बैसाखी के दिन कुंभ से पहली संध्या होने के कारण हर की पौड़ी पर भव्य संध्या-आरती आरम्भ हो गई है। इक्कीस जगहों से एक साथ उठतीं पाँच तल्लों की आरतियाँ, फूल भरे पत्तों की नौकाओं में जगमगाते प्रेम, आस्था, श्रद्धा, विश्वास और करुणा के अनगिनत दीये! इधर बैसाखी-स्नान के बीच मुड़ कर आरती को हाथ जोड़े खड़ीं भीगे वस्त्रों में महिलाएँ!.. डूबते सूर्य की लालिमा और उगते चाँद की शुभ्रता! क्या यह दृश्य रवि वर्मा के किसी चित्र की प्रतिकृति है?.. या कोई जीवंत दृश्य?

शायद रवि वर्मा इसे शीर्षक देते ‘जनरल डायर द्वारा मारे गए शहीदों को श्रद्धांजलि’। हाँ! वह खूनी दिन ‘बैसाखी’ का ही तो था, जब गंगा मैया अपने दूध भरे आँचल से अपने निहत्थे बच्चों के घावों को धोकर उन्हें साफ़-सुथरा बनाकर स्वर्ग भेज रही थी।…

मुझे एक अद्भुत-सा रोमांच हो रहा है!.. मेरे हाथों की रोमावलि इसकी साक्षी है। यह क्या? मेरे गालों पर आँसू? कैसे? क्यों? दुविधा में हूँ कि अपनी दरिद्र अहम्मन्यता का किला तोड़ इन्हें बहने दूँ या रोक लूँ? अचानक मैं एक बड़ा निर्णय लेती हूँ!!.. और मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगती है। पहली बार मुझे इन पर शर्म नहीं आती, गर्व होता है। सचमुच गर्व होता है कि मैं भी सबके बीच सबकी तरह ही अपने आनंद को व्यक्त कर सकती हूँ, रो सकती हूँ, नाच सकती हूँ, अपना अतीत-वर्तमान सब भूल सकती हूँ।..

भाव की रौ में गंगा के वक्ष पर अपनी नौका के दीए के लिए माँ को पुकारती हूँ- “माँ! स्वीकार लो इसे। समेट लो अपने आँचल में। ..हे हिमालय-पुत्री गिरिजा! हे शाश्वत सत्य की प्रवहमान मूर्तिमंत अभिव्यक्ति! ..इसका तुझमें समाहित होना ही इसका निरंतर प्रज्ज्वलित रहना है। माँ! भेजो तीक्ष्ण धारा और समेट लो इसे अपने अंक में।” शायद इस सच्ची पुकार ने माँ गंगा के हृदय को आलोड़ित कर दिया होगा, तभी ‘दीये’ की नौका एक क्षण के लिए थमकी और फिर तीव्रता से गोल-गोल घूमकर किसी अज्ञात गहराई में खो गई। उसके साथ ही मेरे हृदय का स्पंदन, आँख, कान, नाक, श्वॉस-प्रश्वॉस सब कुछ प्रणाम-मुद्रा में नि:शब्द हो गए।

शायद यही प्रेम-भक्ति है, जिसमें भक्त मिटकर भी अपने आराध्य का होना चाहता है।

आरती अपने पूरे ‘जोम’ (यौवन) में है। सामने की सीढ़ियों पर बैठी एक उत्साही महिला तेज लय में तालियाँ बजाती उठ खड़ी होती है। खुशबू के झोंके की तरह यह गंध देखते-देखते ही कई जोड़ी तालियों में बदल जाती है और जगह-जगह महिलाएँ मोर्चे संभाल लेती हैं। ‘जय मैया की, जय मैया की’ जयकारे आकाश में, पाताल में, धरती में और पास खड़े पहाड़ों में गूँजने लगती हैं। सहस्त्रों हाथ और सिर श्रद्धावनत लय में ऐसे झूमने लगते हैं जैसे यह क्षण उनके जीवन का चिर-प्रतीक्षित क्षण हो।

अनगिनत प्रार्थनाएँ, अनगिनत स्वर!.. कोई भी शब्द साफ नहीं, सिवा भाव के। शब्दहीन अर्थ हवा में तैरते रहते हैं। वे देह को तो छूते ही हैं, पर मन को छूते हैं बार-बार। अनहद नाद की तरह ही वहाँ एक दिव्य गुंजन विद्यमान रह जाती है। क्या है यह? ..जड़ या चेतन? ..चैतन्य अवस्था की जड़ता या जड़ता का चैतन्य?..

तेज हवा बहती है और आरती की लपटें, ज्योतिपुंज की तरह चारों ओर प्रकाश फैलाने लगती हैं। पहाड़ की पगडंडी, चौबारों के छज्जे, पुलों की रेलिंग आदि पर मुंड ही मुंंड दिखने लगते हैंं। ये सिर एक विराट कमल की पंखुड़ियों-से; शंख-ध्वनि के घोष के साथ गद्गद् भाव से हिलते नजर आते हैं। उनकी आँखें इस अनुपम द़ृश्य से परम तृप्त लगती हैं।

भारत के दो धुर सीमान्तों हिमालय और ठेठ बाड़मेर के बाशिंदे यहाँ एकमएक हैं। और इधर? तीन फुट लम्बे और दस इंच मोटे बाँस में फूँक मार कर ‘सा’ का दण्ड-स्वर भरता यह अमेरिकी जवान! ..यह क्या चाहता है? ..देखते ही देखते एक-एक कर उसके साथी भी अपने-अपने चोगों से खड़ताल, मंजीरे, ढोल आदि निकाल लेते हैं और ‘बाँस’ के ‘सा’ स्वर के साथ, ‘शिवोऽहं-शिवोऽहं’ की ध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण को भिगोने लगते हैं। शुद्ध उच्चारण के साथ कायिक, मानसिक और वाचिक तीनों का समर्पण व्यक्त करती इनकी लयात्मक काया!.. एक चमत्कारिक दृश्य की सृष्टि कर रही थी। क्या कोई इन्हें भटकी हुईं आत्माएँ कह कर पाप का भागी बनना चाहेगा?

आरती के स्वर आकाश, धरती, पहाड़, पेड़ और जल चारों दिशाओं को गुंजरित करते हुए मद्धम लय से समापन की ओर चले जाते हैं। उनकी गूँज अनहद नाद की तरह चतुर्दिक छा जाती है। अनायास ही हमारी चाल की लय और गति भी उन शब्दहीन स्वरों पर सम गति से संचालित होने लगती हैं।..

रात घिर रही है। आकाश का रंग स्लेटी से क्रमश: श्यामल और काला हो गया है.. सुबह के ब्रह्म मुहूर्त्तकी प्रतीक्षा में बैठी यह काया कल जब पावन कुंभ के जल से आचमन कर अपनी बुराइयों का तर्पण करेगी, तो उसकी एकमात्र कामना होगी कि उस शुभ घड़ी का पावनजल उसे सचमुच ही शुद्ध कर दे, पूर्णत: कल्मष रहित। हो सकता है, उस घड़ी का वह जल, उसे द्विधाओं के संजाल से मुक्त कर एक उन्मुक्त आत्मा बना दे। हे प्रभु! यदि ऐसा हो सके, तो मैं अपने चारों हाथपैर जोड़े, झोली पसारे तुम्हारी करुणा की याचना करती हूँ।

प्रभास वेला में पूर्व दिशा से चारों तरफ़ फूटतीं किरणों के बीच हिरण्यगर्भा सूर्य, सोने के घड़े-सा शीतल वायु में उदीयमान हो रहा है। सबके हाथ अंजलि मुद्रा में गंगाजल भरे उसकी ओर उठे हुए हैं। सारे हृदय निष्पंद हैं, प्रतीक्षारत हैं- विष्णु वाहन गरुड़ के आगमन हेतु। बारह वर्षों में केवल इसी क्षण, सागर-शय्याशायी पद्मनाभ! अपने पृथ्वी-पुत्रों को यह महाप्रसाद देते हैं। देवता और असुरों के श्रम से अर्जित, पर केवल देवताओं को प्राप्य यह प्रसाद हर कोई पा लेना चाहता है। इसलिए ठठ्ठ के ठठ्ठ लोग हरिद्वार के गंगा तटों पर भरते जा रहे हैं, भरते जा रहे हैं.. एक असीम-अनन्त सिलसिले की तरह…!

कहते हैं, कुंभ के शुभ मुहूर्त में सूर्य, चन्द्र, ग्रह, दिशाएँ, राशियाँ और सारे नक्षत्र पृथ्वी के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति में होते हैं! ..ज़रा कल्पना कीजिए उस दृश्य की, जिसमें सम्पूर्ण नीहारिका अपनी पुत्री पृथ्वी को ‘असीसने’ उठ खड़ी हुई है। क्या यह दृश्य स्वयं में ही अमृत-स्वरूप नहीं है?

‘मैं’! जो मात्र कौतुक के लिए यहाँ आई है- वह मैं? यह सब क्यों सोच रही है? सदी का अंतिम कुंभ? …गरुड़ की पंखों-सी किरणें? ..वाइब्रेशन? ..मेला? ..आस्थाओं के पुंज! ये ढेरों-ढेर लोग? शायद इन सारी चीज़ों को एक साथ सस्ते में पा जाने का मोह ही मुझे यहाँ खींच ले आया होगा? नहीं तो भला मेरा इस संक्रांति पर्व में, इन अमृत की बूँदों से क्या लेना-देना?

जीवन में अधिकतर चीज़ों को नकारना स्वभाव हो जिसका, जो हर विश्वास में, हर संस्कार में विज्ञान घुसा देता हो, वह आदमी निश्चित ही यहाँ कुछ तोड़ने-फोड़ने आया होगा? तर्क-कुतर्क से, प्रमाणों से, पुस्तकों के अल्प-ज्ञान से वह शायद यहाँ यह उद्घोष करने आया होगा कि “ऐ राशि-राशि मनुष्यों! रुक जाओ! तुम क्या करने यहाँ आए हो? यह सही है कि अभी सूर्य और अन्यान्य ग्रहों से पृथ्वी का कुछ अच्छा हो रहा है, लेकिन पंचांग के हिसाब से ऐसे दिन तो और भी होंगे? फिर क्या ज़रूरत हैयों ख़ानाबदोशों की तरह यहाँ से वहाँ चलते रहने की?” ..पंडितों ने बहका दिया और हो गए ज़रा से हरिद्वार में 50 लाख तीर्थयात्री जमा।.. जैसे एक भेड़ के पीछे आँखें मूँदें सारी भेड़ें पहाड़ से गिरती चली जाती हैं; उसी ‘भेड़वा-धसान’ की तरह, तुम सब भी साधुओं के कहे-कहे यहाँ कष्ट झेलने आ गए?

आँखों की परिधि से परे तक तम्बू ही तम्बू लगे हैं। इनमें कन्याकुमारी, अमरनाथ, बद्रीनाथ और जगन्नाथ तो समाए ही हैं; न जाने कौन-कौन से प्रदेश से, धरती के किस-किस कोने से यहाँ यात्री अपनी-अपनी झोली भरने आए हैं।

अंजलि के जल में सूर्य की शीतल किरणें दिख रही हैं। आदित्य को अर्घ्य देने को उठता हाथ, उसमें घिरने वाले इन्द्रजाल से अनुरक्त हो जहाँ का तहाँ रुक गया है। ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ मस्तिष्क की आज्ञा को परे हटाकर मनमाना खेल खेल रही हैं।.. उस अंजुरी में एक के बाद एक बनते आवृत्त देश-काल और समय की सीमा को तोड़ निर्बन्ध और उन्मुक्त हो, जो इच्छा होती है, वही दृश्य मेरी दृष्टि की परिधि में ला रहे हैं; अवश-सी मैं उनके रू-बरू हूँ।.. समर्पित-सी है यह अहंकारी ‘मैं’ की स्वामिनी!!..

“बाइसा थे क्यों आया?” जैसलमेरी महिला का यह वाक्य थमक कर मेरे कानों और आँखों के सामने आ रहा है। यह आवाज़ बाहर से आ रही है या अन्दर से?? ..इस जल में छोटे-छोटे गोल-सुनहरे आवृत्त बनते जा रहे हैं- घटनाओं के!!.. क्या यह किरणों का कोई खेल है या कोई अमृत-वर्षा? ..इनमें से ये चेहरे (?) ये घटनाएँ क्यों उभर रही हैं?.. क्या सम्बन्ध है इनका कुंभ से? ..मेरी तार्किक दुनिया से?..

आवृत्त- एक छह साला बच्ची का, जो रोज़ सुबह चार बजे पड़ोसिन ताई के पीछे-पीछे गंगा नहाने जा धमकती है। उसके प्रमुख आकर्षण हैं; छल-छल करता पानी और घाटिये (पंडा) के लगाए हुए तिलक छापे, जिन्हें वह अपने दोनों गालों, माथे, गले और यहाँ तक कि नाक पर भी; श्री, खड़ाऊँ, तिलक आदि आकारों में छपवा लेती है। पड़ोसिन ताई दो पैसे के लिए झल्लाए नहीं, इसलिए अपने स्कूली पैसों से घाटिये का भुगतान कर देती है। घर वाले उसे देख कर खूब हँसते। माँ कहतीं, “जब इसे लेने विमान आएगा, तो हम भी उससे लटक जाएँगे।” पर ख़ैरियत यह थी कि किसी ने रोका नहीं। इस तरह वह लड़की उन सन्तानहीना पड़ोसिन ताई का खूब लाभ उठाती रही। गुनगुन करती पड़ोसिन ताई का स्नान-ध्यान पन्द्रह मिनट में हो जाता, फिर मन्दिरों को ‘ध्याने’ में ज़्यादा से ज़्यादा आधा घंटा और लगता; इस बीच वह इस सीढ़ी से उस सीढ़ी पर फुदकती रहती; कभी इस पंडे की चों चों में चोंच घुसाती- तो कभी किसी दूसरे की..

..एक दिन जैसे हीं रामफल घाटिया (पंडा) हाथ हिला-हिला कर एक जवान से लड़ता हुआ दिखाई दिया; वह हवा की तरह वहाँ जा पहुँची। चालीस-पैंतालीस साल पहले उन शब्दों को अर्थ देती वह घटना, जो उस समय समझ में नहीं आई थी.. आज भी एकदम साफ़ दिख रही है।..

युवक कह रहा था कि ‘उसे अपने पिता के बारहवें का श्राद्ध चार आने में करना है।’ ..वह अपनी चवन्नी हथेली पर रखे खड़ा था ..दुबला-पतला, साँवले रंग का वह जवान (जो अपनी गंभीर आँखों के कारण कुछ ज़्यादा ही बड़ा लग रहा था) ऊपर खाली बदन और नीचे साफ़ धोती पहने, गंगा की मिट्टी में दोनों पैर जमाए खड़ा था। ..बहस जारी थी.. घाटिये ने कहा, “बाप के श्राद्ध के लिए हम किसी भी हालत में ग्यारह रुपए से कम नहीं लेते हैं!! ..तुम्हारी श्रद्धा और स्थिति देख कर हम सवा रुपये में तर्पण कराने के लिए राज़ी हो गए हैं; और तुम हो कि अपनी  अंटी ढीली ही नहीं करते!! और कितना झुकें हम?” ..घाटिया इसी तरह लम्बे-चौड़े संवाद बोलता जाता और उन सबके अंत में वह युवक गर्दन हिला कर अपनी धीर-गंभीर आवाज़ में एक ही जवाब देता, “आमार काछे आर पोयशा नेई, आमि एई चार आना तेई आमार बाबार तर्पण कोरबो” (मेरे पास और पैसे नहीं हैं, मैं इन चार आनों से ही अपने पिता का तर्पण करूँगा).. और ..फिर घाटिये का वही धाराप्रवाह भाषण शुरू हो जाता..। मेरी आँखें एकटक घाटिये को देख रही थीं और उसकी वाक्पटुता पर मुग्ध थीं।

इतने में ही एक संभ्रांत सज्जन ने आगे बढ़कर कहा- “पंडाजी, यह तो घोर अन्याय है। एक बच्चा अपने पिता का श्राद्ध कर रहा है और आप एक रुपए के लिए अड़े हुए हैं! यह लीजिए- रुपया।” घाटिया उनको पहचानता था। उसने पीछे हटकर थोड़ी शर्म के साथ नमस्कार करते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, “बोटेई, बोटेई! एखुनी कोराछी” (ठीक है, ठीक है; तुरन्त कराता हूँ)। लेकिन यह क्या? ..अति विनम्रता से उस युवक ने वह सिक्का उन सज्जन को लौटाते हुए कहा- “धन्यवाद, लेकिन अपने पिता का श्राद्ध मैं अपने पैसे से ही करूँगा।” घाटिया और वहाँ उपस्थित कई स्नानार्थी उसे ‘दुर्मति’ और ‘घमंडी’ कहने लगे, लेकिन मुझे साफ़ आईने के अक्स-सा वह दृश्य याद है कि न तो उस युवक के चेहरे पर कोई अहं था, न ही कोई अभिमान। हाँ, वहाँ सौम्यता और शांति थी, जो पिता के प्रति उसकी असीम आस्था और गहन श्रद्धा से उपजी थी। ..छह वर्षीया मैं उसे मन ही मन ‘गधा’ कह ही रही थी कि पड़ोसिन ताई ने बाँह पकड़ कर घसीटते हुए मुझे भीड़ से बाहर खींच लिया और सिर पर धौल जमाते हुए कहा, “चौबीस घण्टा बदमाशी!!..इत्ती भीड़ मैं घुसणै रो कांई काम थो?”

आज इस मुहूर्त में… इस कुंभ के जलावृत्त में… उस युवक का चेहरा क्यों उभर रहा है? युगों की इस कालावधि को पार कर आया यह चेहरा यहाँ क्यों बुलाया गया है? ..क्या अमृत-बूँदों का पान कराने? ..क्या उसकी सच्चाई का डंका बैकुंठ में भी बजा था? नहीं तो मैं जिन भावों को उस समय समझ नहीं सकी थी, भाषा नहीं दे सकी थी, वह ‘मैं’ इस क्षण!! उस स्मृति मात्र सेक्यों इतनी अभिभूत हो रही हूँ?..

जलांजलि में घूमता नया आवृत्त..  “माँजी! माँजीऽऽऽ”- “अरे के होया नन्दकिशोर? क्यूँ हेला मारन मंड (आवाज़ देने) रह्या सै?” “माँ जी, यह लीजिए आपकी कंठी, जल में गिर गई थी।” लम्बी साँस लेते हुए नन्दकिशोर ने कहा..“कठै (कहाँ)?” “‘वहीं, जहाँ आपने डुबकियाँ लगाई थीं। यह तो अच्छा हुआ, जो यह हमारे हाथ लग गई, वरना हमारी मालकिन हमें उलाहना दे देतीं कि मुनीमजी भला स्नान कराया माँ को!” नन्दकिशोर ने शहीदी मुद्रा में कहा।.. “ओहो! ठाई (उठाई) क्यूँ भाई? ..यमद्वितीया का दिन!!..माई कै चढ़गी थी, तो चढ़ी रहती; यो तो तैं ठीक नहीं कर्या?” …कहती हुई माई संकल्प और चंदन-तिलक हेतु घाटिये के आगे जा खड़ी हुई। ..अरे! यह क्या? माई ने वह दस भरी (तोले) की कंठी उठाई और घाटिये को दे दी। चुपचाप, बिना किसी एहसान के। घाटिया कभी कंठी को देखे, कभी माई को!!.. बिना बोले भी बात बिजली की तरह फैल गई और बड़बड़ करती पड़ोसिन ताई ने अम्माँ को यह क़िस्सा यों सुनाया, “चलो, मान भी लेवाँ कि आगली बड़ै घर री बेटी है या ठीक है, लेकिन ईको मतलब यो तो नईं है कि आपको समय नईं बिचारै? ..हो सकै है या कंठी बीरी (उसकी) ‘लास्ट’ कंठी हुवै, ..पर दे दीनी घाटिए नै(?) जिद्दी कठै री!! माथो खराब है ई लुगाई रो!!” अम्मा शायद उन्हें जानती थीं, इसलिए आहिस्ता से बोलीं, “वे उसूलों की पक्की हैं, वर्ना आज के युग में कौन ऐसा करता है? ..लोग तो मनौती मान कर भी मुकर जाते हैं, पर अगली खड़ी है सत् पर। ..आप चाहें कुछ भी कहें, पर आज तक किसी ने उन्हें झूठ बोलते या बात से फिरते देखा है?” …कहते हैं- नन्दकिशोर वर्षों यह कहता हुआ रोता फिरा कि “अरे! हमें पता होता, तो हम ही न रख लेते वह कंठी।”

…उस युवक और इस माई में क्या कोई सामंजस्य है?.. जो एक के समकक्ष दूसरे की आकृति उभरी? ..क्या इनका सत् इतना बड़ा है? कि इन स्मृतियों को समय की धूल धुँधला करने में असमर्थ है?..

आवृत्त-… ‘रेनबो ़फैमिली’ की सुन्दर युवती ‘चोजा’ का, जो ‘वेल्स’ में वकील है पर ‘ॐ’ का झंडा उड़ाती रेनबो ़फैमिली के साथ कुंभ स्नान को आई है। ये लोग सारे विश्व में घटने वाले इन आस्था और संस्कृति के पर्वों की खोज में रहते हैं। मैंने चोजा को जब अपने साथ आरामदायक होटल में रात बिताने को कहा, तो उसके ठीक उलट उसने अपनी चमकती हुई आँखों से मुझसे पूछा, “आश्रम के तंबू में रहने का मन है? ..अनुमति लूँ तुम्हारे लिए?..” …‘वकील चोजा’ यहाँ क्यों आई है? सात समंदर पार से यह सुन्दर युवती यहाँ क्या पाने आई है? ..क्या यह भी मेरी ही तरह ‘वाईब्रेशन्स’ ढूँढ़ती फिर रही है? ..या किसी अवसाद से मुक्त होना चाहती है? ..पर इसके चेहरे पर तो ‘आनन्द ही आनन्द’ है।

आनन्द की यह स्थिति चाहे क्षणिक ही हो, पर इसका यह क्षण पूर्ण है.. परम सत्य है.. जब बूँद में सत्य प्रतिबिम्बित होता है, तब वह उस अथाह महासागर की, उस विराट की प्रतीक बन जाती हैऔर अंत में यह प्रतीक स्वयं में ही विराट बन जाता है। तो क्या इनका सुख, आनन्द या परमानन्द मान लिया जाए? …ऐश्वर्य, वैभव और ऐषणा से परे कुछ ढूँढ़ निकालने का सतत् प्रयत्न करता यह युवा दल कब अपने लक्ष्य का संधान कर पाएगा यह तो पता नहीं?..पर इनकी यह यात्रा ही इन्हें आनन्द की अमृतबूँदों से भर रही है, पूर्ण कर रही है!!

आवृत्त-.. नैमिषारण्य में मिले बूढ़े किसान बाबा का; जिनका चेहरा दर्पण है उनकी साधुता का। ..हाथ में लाठी लिए हरिद्वार की ओर जाते, ये बाबा ‘निर्द्वन्द्व नि:शंक’ बढ़े जा रहे हैं। ..रास्ते में जब वे चाय पीने के लिए रुकते हैं, तो मैं अपने दोनों हाथों से सहमती हुई-सी उनसे एक छोटी सी मठरी लेने का अनुरोध करती हूँ। ..अपने भतीजे के वर्जना के हाथ को पीछे हटा कर वे कहते हैं, “ई बेटी बड़ा मन से कही है; ना कैसे करें।” ..अरे! ये क्षणमात्र में मेरा मन कैसे जान गए?? ..तीर्थों में किसी और का न खाने का व्रत इन्होंने मेरे लिए क्यों तोड़ा?.. यह प्रश्न अपनी जगह था, पर मेरे यह पूछने पर कि ‘इतनी भीड़ में वे रहेंगे कहाँ’ ..के जवाब में उनका उत्तर मेरे सारे अन्तर और बाह्य प्रश्नों का उत्तर था.. “बेटवा! ई धरती पर सबै का रैन-बसेरा है। तुम हमरी चिंता ना करो। ..हम आराम से स्नान-ध्यान करके ई दू पायन की बस से अपनै ठौर पहुँच गई हैं।”

अभी मन किसान बाबा की उन्मुक्त हँसी से गमक ही रहा था कि किनारे पर सिर पर चौका-चूल्हा धरे टूरिज्म की बड़ी-बड़ी बसों से उतरते, हँसते-खिलखिलाते, रास्ता पूछते यात्री बाबा को सही साबित करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ठिठके हैं स़िर्फहम सरीख़ों के पाँव, जो सारे प्रबंधों के बावजूद मरने के डर से मरे पड़े हैं। झुंझलाहट होती है कि अमृत-संधानी हम; दुःख से, मृत्यु से, डर क्यों रहे हैं? अपनी मूर्खतापूर्ण पढ़ाई-लिखाई को पीछे छोड़ यदि हम इन अपढ़ विद्वानों से थोड़ी सी आस्था उधार ले लेते, तो शायद हमारा भी कल्याण हो जाता!!

सुबह के साढ़े तीन बज रहे हैं; भीड़ के दबाव की चिन्ता सिर पर सवार हो गई है। स्वयं को आवृत्तों के भँवरों से मुक्त कर अपना ध्यान वर्तमान पर केन्द्रित कर हम भी झट से ब्रह्मकुंड में डूब कर अपने झूठ-सच की माफ़ी माँगते हुए ताँबे की लुटिया जल में चढ़ाते हैं और स्नानमग्न हो जाते हैं। भय बना हुआ है कि कहीं सोए हुए लोग जाग गए, तो तर्पण-स्नान रह जाएगा!!.. हमें जल्दी-जल्दी डुबकियाँ लगानी हैं… ‘फलां के नाम की, ढिमका की बीमारी की, अमुक ने बेटा माँगा, उसकी’; यह करते-करते सर्वमंगल कामना के मंत्र अपने आप मानस में तैरने लगते हैं।.. जल का बर्फ़ीलापन शीतलता में परिवर्तित हो जाता है.. और रोम-रोम उस पवित्र जल में घुलने लगता है। ..सिर झटक कर स्वयं से कहती हूँ, “बकवास मत करो, भला तुम कब से भक्तिन (भक्त) हो गई?” पर मन का कोई कोना कहता है, ‘कभी तो भक्त बन कर भी देख!! कि कैसा लगता है?’ ..अच्छा हुआ यह बात जँच गई और क्षण भर में ही मेरी पूरी देह अव्यक्त आनंद से रोमांचित हो उठी!!.. कल आरती के समय के बहते आँसुओं से फिर घिरने लगती हूँ।..

स्नानार्थी रो रहे हैं, गा रहे हैं, पुकार रहे हैं- ‘हे गंगा मैया! बुला माँ!’ ..सबकी अपनी-अपनी बोली है, पर ध्वनि एक ही है। इनके लिए यात्रा ही गंतव्य है, ..स्नान ही कुंभ है। इनका  अमृत-बूँदों से कोई लेना-देना नहीं है। ..इनकी यह भावना कि यह कुंभ, शती का अंतिम कुंभ है और हमें इसके स्नान का पुण्य मिलेगा ही इतनी प्रबल है कि इसके समकक्ष मेरी स्वार्थपरता रो-रो पड़ती है। जो नहा चुके हैं उनके चेहरों पर ऐसी शांति है मानों स्वर्ग के सातों सुख उन्हें मिल गए हों और माई ने उन्हें धन्य कर दिया हो। गंगा माँ से पूछा- “हे माँ! तुमने उन्हें धन्य किया या उन्होंने तुम्हें?” ..सुनकर माँ मुस्कुराती है…।

लगता है गंगा का यह बड़ा चबूतरा अब भरेगा नहीं.. पर इतने में ही ‘लाल रंग के घाघरे-ओढ़नी पहने गंगाजल में भीगीं महिलाएँ और सतरंगे पग्गड़ा बाँधे भीगे पुरुष, दाढ़ियों से जल चुआते सरदारों का झुंड, त्रिपुण्डी वैष्णवों का मंडल, फिरंगी साधु-मंडली’ …अर्थात् पूरा हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, इंग्लिस्तान, सबके सब वहीं आकर जम जाते हैं; वे वह सारी जगह छेक लेते हैं। उनके रंग-ढंग से ऐसा लग रहा है कि अब ये भीगे वस्त्र उनके शरीर पर ही सूखेंगे और वे आसपास ही कुछ खा-पीकर आगे बढ़ जाएँगे।

आख़िर यह कौन सा सम्मोहन है(?) जो समृद्ध किसानों को, ़फैक्ट्रियों के मालिकों को, ढेरों लक्ष्मी-पुत्रों को.. यहाँ खींच लाया है? ..क्या यह सस्ते में पुण्य कमाने की कामना है.. या आजकल के बढ़ते प्रवचनों का असर है?.. आख़िर.. यह गति, यह रेला!.. यह शांति, यह सिलसिला!.. यह जन-प्रवाह है क्या.. जो थम ही नहीं रहा?..

क्या यह रेला कभी थमता नहीं..? क्या यह एक सदी से दूसरी सदी को,.. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को, यों ही लगातार सौंप दिया जाता है? ..क्या ये ही हैं वे मूल्य, जो ‘महाभारत के युद्ध में परीक्षित को’ और ‘लंका युद्ध में विभीषण को’ बचा लेते हैं? ..उनका रूप बदल सकता है, पर उनका बीज इतना गहरा है कि असंख्य अत्याचारों के बाद भी मनु रूप में अंकुरित हो कर श्रद्धा से पोषित होता है। ..क्या यही है सृष्टि का क्रम? ..असंख्य-असंख्य कलावृत्तों के बाद भी पुनर्नवा??..

कमर तक जल में डूबी काया और अंजलि का अर्घ्य रोक कर, बड़े आकार की नथ पहने एक युवती से यहाँ आने का कारण पूछा, तो उसने सीधा-सा जवाब दिया- “हम तो माई से मिलकर यही कहने आए हैं कि ‘उसी के कारण हम हैं’।” ..नथ के लिए पूछने पर कहा- “और बहिनी! यह नथ तो उसी के नाम की है, जिसने सिर पर छत डाल रखी है। यह नहाएगी, तो उसे भी पुन्न मिल जाएगा!!..” परम विश्वास से उस सरला रूपवती पहाड़न का यह कहना इस शहरी काया को ‘अत-थत’ कर देता है… वह अविश्वास से उसे एकटक देखती रह जाती है कि एक सामूहिक स्वर उसे अपनी ओर खींच लेता है… यह स्वर ‘गंगा की जै-जै, जमुना की जै-जै’ गाते इतालवी समूह का है!..

पास जाकर देखा कि हिप्पियों के बचकानेपन से परे उम्रदराज़ बीस-पच्चीस युवक-युवतियाँ, झूम-झूम कर साफ़ उच्चारण से इस लय को उठा-गिरा रहे थे। उस लय ने वहाँ एक ऐसा सम्मोहक समाँ बाँध रखा था कि वहाँ से हिलने का मन नहीं करे।.. अवसर देखकर हम भी वहीं एक ओर बालू में धँस कर बैठ गए। ..कीर्तन थमने पर पता चला इनमें से कोई डॉक्टर है, कोई वकील और कोई व्यवसायी। यह पूछने पर कि आप यहाँ क्यों आए हैं(?) ..उन्होंने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठा दिए- ‘वह जाने’ की भंगिमा में! (ईश्वर की ओर इंगित करने का यह भारतीय तरीक़ा क्या सारे विश्व में एक-सा है?)..

कुछ क्षणों के मौन के बाद उनमें से एक ने कहा, “हमारी सभ्यता में आस्था, प्रेम, श्रद्धा आदि बातें कहीं दूर खो गई हैं, हम उनके तंतुओं को ढूँढ़ने यहाँ आए हैं। यहाँ के पहाड़ों की शाश्वत अटलता हमें विश्वास प्रदान करती है और गंगा का चिरंतन प्रवाह हमें गतिमान बनाता है।…”

यहाँ की सारी घटित-अघटित घटनाओं के मंथन से एक ही सत्य उभर कर स्थापित होता है कि… “ये विश्वास सही हैं या नहीं यह तो पता नहीं, पर धूप में तप कर भी मुस्कुराते हुए इन भक्तों की श्रद्धा सच है!! ..अमृत की बूँदें जल में हैं या नहीं पता नहीं!! पर जन-मानस में तो अवश्य हैं, तभी तो वह अमृत-पुत्र कहलाता है, मृत-मिट्टी का… अमृत-पुत्र!!.. शाश्वत, चिरंतन, अनश्वर!!…

स्मृतियों के सागर में डूबा मन अतिशय भावुक हो रहा है। यह जादू मुझ में क्योंकर घटा मैं नहीं बता पाऊँगी!!.. नहीं बता पाऊँगी उन सारे प्रश्नों के जवाब, जो लगातार मुझे अब भी घेरे रहे और घेर रहे हैं!!..

हाँ! स़िर्फ बता पाऊँगी तो यह कि गीता पर हाथ रख कर, ‘मैं फलाँ, वल्द फलाँ, स्वीकार करती हूँ कि मैं निहायत घमंडी, अल्पज्ञानी और आस्थाहीन प्राणी हूँ’, लेकिन अस्वीकार करना चाह कर भी, मुझे स्वीकार करना पड़ रहा है कि सचमुच मैंने देखे हैं- ‘कुंभ-स्नान में तैरते आस्थाओं के फूल’, ‘अमृत की बूँदें’!!.. और जिन्होंने झंकृत किया है मुझे भी!!.. ‘वाइब्रेशन्स’, किसी पुलक या किसी अतीन्द्रिय अनुभव को तलाशती ‘मैं’, आज ऐसी जड़ हो गई हूँ मानों मुझे आकाशी बिजली का करंट मार गया हो!! ..वितृष्णा, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष से भरा, मेरा यह कठोर मन कुंभ-तर्पण के समय ‘अमित्रों’ की भी मंगलकामना करने लगा था और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया’ अनायास ही बार-बार उच्चारित होने लगा था, बिल्कुल अनचाहे और अनजाने।..

अमृत की बूँदें क्या इससे अधिक कोई और अजूबा भी घटा सकती हैं?.. कि क्षणमात्र को ही सही इस मिट्टी (धरती) की पुत्री को अमरत्व (सर्व:) का बोध करा दें.. उसका ‘स्व’ मिट कर सर्व हो जाए.. और वह नश्वर मूल्यों की जगह शाश्वत मूल्यों की पुजारी बन जाए।

हाँ! अनश्वर हैं हम; चिरंतन हैं, शाश्वत हैं;.. क्योंकि हर युग में, हर सदी में, हर कुंभ पर्व में, हर कुंभी में, हम कहीं अपने पिताओं के, तो कहीं अपने पुत्रों के रूप में वर्तमान में उपस्थित हैं। यह अयन है, ..एक सभ्यता का दूसरी सभ्यता में; ..‘अपने पूरे मूल्यों के साथ’, ..‘पूरे विश्वासों के साथ’!!.. धरती की मृत्तिका से बना है यह अमृत-पुत्र!!.. और काल के आवर्त्त से परे; सत्ता है इसकी!!

 

 

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