वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

“अरे ओ ओझनऽऽऽ! ओझनऽऽऽ!

“ओ कुसुम, यू आर इम्पासिबल! वाई आर यू शाउटिंग एट सच हाइ पिच, एट दिस ऑवर”-हँसी और झुँझलाहट से भरे स्वर में यह बोलती हुई मेरी मद्रासन मित्र चित्रा ने बाहर आकर मेरे कंधे पर ज़ोर से थपकी मारी।

“अरे भई! चार दिन हो गए तुझसे कहते कि मुझे गाँव लुभाते हैं और शहरों से बहुत चिढ़ है; और तुम हमेशा मुस्कुराकर कह देती हो- नहीं! एक शहर ऐसा है, जो तुम्हारा मन जीत लेगा। जरा मैं भी तो सुनूँ, इस दुनिया में ऐसा कौन सा शहर है, जो गांवों-सा ख़ूबसूरत और भला है?”

लगभग चार दशकों से चित्रा एक बड़ी विदेशी आयात-निर्यात कंपनी की ऊँची अफसर है, और ज्यों ही मैंने उसका परिचय अपने पास खड़ी दूसरी मित्र को यों दिया- “यह है चित्रा ओझा, जिसने पूरी पृथ्वी के अक्षांश-देशांतर को कई बार नाप लिया है, कह सकते हैं अपनी बेढब चाल के कारण रौंद लिया है- मन की भली और दिमाग से प्रखर- यह कुर्गी लड़की ओझा इसलिए होगी कि इसके पुरखे बिहार के ब्राह्मण होंगे?”

बड़ी-बड़ी आंखों से घिरे इस परिचय से चित्रा के श्यामल चेहरे पर उसके सफेद चमचमाते दांत और भी जगमगाने लगे, उसने अपनी प्रेमल मुद्रा में फिर कहा, “ओ कुसुम! प्लीज़ स्टॉप इट। आय एम नॉट दैट गुड।”

मैंने कहा, “बस चुप्प! अब और सारी बातें पीछे होंगी। पहले उस मनचीते शहर की गाथा सुनाओ।”

मैं ठहरी घुमक्कड़-लोभी और मेरे सारे परिचित मेरे इस लोभ से परिचित हैं। मैं मन ही मन जुगत बिठाने लगी कि यह बताए तो सही, फिर कोई न कोई बहाना ढूँढ़ कर वहाँ चल ही दूँगी।

“हाँ, तो चित्रा! क्या नाम है?”

चित्रा के मुँह से बेसाख्ता निकला- “वैन्कूवर। कैनेडा का शहर वैन्कूवर।”

मैंने पलट कर कहा, “भई! टोरंटो की गाथा तो सुनते आए हैं, अब यह वैन्कूवर क्या बला है?”

चित्रा का उत्तर था, “सिवा इसके कि ऑन्टारियो से निकला न्याग्रा जल-प्रपात टोरेंटो में है। टोरेंटो तो बस एक औद्योगिक शहर है। पर यदि तुम गाँव की सारी अच्छाइयाँ समेटे एक उन्नत शहर को जानना चाहती हो, तो बस- वह ‘वैन्कूवर’ ही है।”

चित्रा की बात खत्म हो गई, पर मेरा सिर चक्करघिन्नी-सा घूमने लगा। कैसे पहुँचा जाए वहाँ? क्या वहाँ कोई हिंदी सम्मेलन या सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहा है, जिसमें (बतौर बहाने के) भाग लेने जाया जा सकता हो! कोलकाता फ़िल्म पैनल से पता चला कि वहाँ भी एक बड़ा इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल होगा- लेकिन उसमें भागीदारी मात्र गंभीर सिनेमा प्रेमी होने से तो मिलेगी नहीं! फिर क्या किया जाए? अचानक मुझे एक निमंत्रण अमेरिका जाने का मिला। वैसे मुझे अमेरिका से ज़रा भी लगाव नहीं है, पर मन में पाप छिपा था वैन्कूवर जाने का, इसलिए ठाँय से हाँ कह दी।…

अरे! ये लैम्प पोस्ट पर अब झब्बा-झब्बा लटकते फूल; और यह फुटपाथ फूलों से भरा… ज़रूर इसके ईर्द-गिर्द कोई बड़ी फूलों की दुकान होगी, जिसने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फूलों को इस तरह सजा रखा है, पर… यह क्या! दाएँ-बाएँ, उत्तर-दक्षिण फूल ही फूल! आख़िर ये सारी दुकानें फूलों की तो नहीं ही हैं (!) फिर इतने फूल… चारों ओर- फूल ही फूल!

मेरी विस्फारित आँखों को देख पास बैठी वहीं की विजया ने पूछ लिया, “क्या बात है, आप यों भौंचक्क-सी क्या देख रही हैं?”

“भई! ये सड़क पर इतने फूल क्यों सजे हैं? आज तुम्हारा देश का कोई ख़ास दिन है क्या?”

“जीजी! अगस्त-सितम्बर के महीने फूलों के ही तो हैं, और आपको शायद मालूम है कि प्रख्यात बुचार्ड पार्क (फूलों के लिए विश्व प्रसिद्ध) यही है। यह ब्यूटीफूल ब्रिटिश कोलम्बिया प्रदेश का शहर ठहरा- इसीलिए ये राशि-राशि फूल दिख रहे हैं।”

“भली मानस! यह ठीक – पर क्या रास्ते के फुटपाथों को फूलों से सजाकर रखना इन दुकानदारों के जिम्मे है?”

पता चला यहाँ तीन-चार हज़ार नर्सरी टेन्डर से चुनी जाती हैं और सरकार उनका भुगतान करती है। दुकानदारों का काम मात्र उन नर्सरियों के काम में नुक्स निकालना ही है।

“इतना पैसा- यों फूलों पर?” सोचते हुए मैंने चारों ओर नज़र घुमाई। पेड़ों से आच्छादित रास्ते पर कहीं एक पत्ती पड़ी न दिखे… लगे कि किसी समृद्ध व्यक्ति का ड्राइंग रूम विराट होकर सड़कों के रूप में पसरा पड़ा है। भिखमंगा वहाँ की डिक्शनरी से ही नदारद है। इसकी तह में जाना होगा- आखिर इस समृद्धि और सौंदर्य का राज़ क्या है?

यहाँ की औसत आय हज़ारों रुपए प्रति व्यक्ति है। यहाँ का नागरिक पूरा टैक्स देता है और बदले में सरकार उसे अत्यधिक सस्ती बिजली, फर्स्ट क्लास मुफ्त कॉलेज, स्कूल, अस्पताल आदि-आदि मुहैय्या करवाती है। संसार का एक-तिहाई ‘पानीय जल’ कैनेडा के पास है। इसके तीन ओर समुद्र और पहाड़ घिरे हैं, जिनमें ‘क्रूज’ भेजकर ‘स्कींग’ करवाकर सरकार पर्यटकों से भारी कमाई कर लेती है। 190 पार्कों का मालिक वैन्कूवर एक ऐसा अनोखा पार्क अपने हृदयस्थल में समेटे बैठा है, जहाँ भारत की संस्कृति जीवित है!…

28 किलोमीटर के दायरे में फैला एक आदिम जंगल (रेन फॉरेस्ट) इस शहर के बीचोंबीच है। स्वाभाविक था कि सरकार इसे बेचकर ढेरों पैसा कमा लेना चाहती है, लेकिन भारत के चिपको आंदोलन की प्रेरणाओं ने यहां के नगरवासियों को इसके पेड़ों पर चिपका दिया और सरकार को झक मारकर इसे सुरक्षित संपत्ति घोषित करना पड़ा।

इसे चारों ओर से लोहे की जाली से घेर कर चौड़ी सड़क बना दी गई है और उस पर जगह-जगह एक से एक रेस्त्रां खोल दिए गए हैं। दर्शकों को जानवर दिख जाने पर उन्हें कुछ भी खिलाने की मनाही है। हमने भी वहाँ रकून्स देखे। चमकती हरी आँखों वाले ये प्यारे नन्हें नर्म रोयों-से रकून्स हमें आशा भरी नज़रों से देख रहे थे। हमारा मन भी उन्हें कुछ खिलाने का हुआ, पर हमारे मेजबान ने विनम्रता से हमें बरज दिया। कहा- “इनका लालच सैलानियों के लिए आक्रामक हो जाएगा।”

स्टेनले की तरह ही शहर के बीचोंबीच खड़ी है ग्राउस पहाड़ी (गौरैया चिड़िया के आकार के कारण उसका यह नाम है)। फर्राटे से गाड़ी से आप ऊपर जाकर रेस्त्राँ में चाय पीजिए और टिकट खरीदकर दूसरी ओर से उतर कर नौका की सैर कर आइए। चाहें तो किसी दूसरे द्वीप पर फेरी में चले जाइए।

मैं भारत के लिए सर्वदा गर्व से गर्दन तान कर कहती रहती हूँ- इतना सा देश हमारा। यह छोटा-सा सुन्दर देश कितने भौगोलिक और ऐतिहासिक अजूबों से भरा है।… चरणों में तीन सागर.., वर्षा का सिरमौर चेरापूँजी.. जहाँ सर्वदा बारिश होती रहती है.., एक ओर थार (विश्व का नम्बर दो) मरुस्थल, तो एक ओर कश्मीर, लद्दाख और केदार की बर्फ़ घिरी पहाड़ियाँ.. भला कौन सा देश है ऐसा?

पर जब जाना कि इस छोटके से शहर ‘वैन्कूवर’ में आप सुबह ‘स्की’ (बर्फ़ का खेल) कर सकते हैं, फिर गोल्फ़ खेलने- समुद्र में पाल खोलकर बड़ी नौका में समुद्री सैर कर सकते हैं और विक्टोरिया द्वीप जाकर बुचार्ड पार्क में दिन बिता सकते हैं, तो लगा यह भी हमसे कम नहीं।

साल के 365 दिन आप खुशनुमा मौसम में आसपास जैस्पर, केलग्री, चिलवाक, टॉर्सशू बे से गेटवे टू सनशाइन कोस्ट, व्हीस्लर और भी न जाने कितनी ही अभिराम जगहों में घूम सकते हैं। म्यूज़ियम, थियेटर, सिनेमा आदि का हवाला बेकार हैं, क्योंकि वह तो और शहरों में भी होते हैं…।

वैन्कूवर एक प्यारा शहर इसलिए भी है कि यहाँ इंग्लैंड और अमेरिका की तरह लोग घमंडी नहीं हैं। अनजान आदमी भी एक-दूसरे से आगे बढ़कर यों मिलते हैं- ‘हैलो! हाऊ आर यू?’, ‘मे गॉड ब्लेस यू’, ‘कीप वेल’ या ‘हाइ! नाइस टू मीट यू’, ‘यू आर सच्च ए फाइन पर्सन’।

अमेरिका के ठंडेपन और सिकुड़ी भावों के बाद यह ऊष्मा भरा स्वागत पर्यटक के अंतस्तल में स्निग्धता की धारा बहा देता है। न केवल शहर का ग्रामीण तत्व (जंगल, नदी आदि) और समृद्धि; बल्कि वहाँ के लोगों का प्रेम, आपसी सद्भाव आपको स्पंदित कर देता है- और लगता है चित्रा ठीक ही कह रही थी…!