वरिष्ठ लेखिका।‘सच कहती कहानियाँ’, ‘एक अचम्भा प्रेम’ (कहानी संग्रह)। ‘एक शख्स कहानी–सा’ (जीवनी) ‘लावण्यदेवी’, ‘जड़ियाबाई’, ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएं’,  ‘मारवाड़ी राजबाड़ी’ (उपन्यास) आदि चर्चित रचनाएँ।

हलकी ठंड की नर्म और अलसाई-सी उस रविवारी सुबह को जब बरामदे में बैठी मैं गर्म चाय की चुस्कियों के साथ अख़बारों को उलट-पुलट रही थी, तभी उस बेवक़्ती के आलम में, ऐन मेरी नाक के सामने, एक टैक्सी आकर रुकी और, उसमें से ख़ानदानी छाप लिए एक उम्रदराज़, पर चुस्त-दुरुस्त जोड़ा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मैं ‘ऊक चूक’-सी अपने चेहरे पर कई प्रश्नचिह्न चिपकाए उन्हें घूर रही थी: कि एक पढ़ा-लिखा और विनम्र स्वर मेरे कानों में पड़ा : “हमें खेद है कि हम बिना किसी सूचना और ‘अप्वायंटमेंट’ के आपके दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए। पर पता नहीं क्यों, चित्रा जी, इस शहर को छोड़कर जाने से पहले हम अपनी प्रिय लेखिका के दर्शन का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। हमने आपके प्रकाशकों से भी आपके फ़ोन नंबर के लिए प्रार्थना की थी! पर उन्होंने बताया कि आपसे केवल पत्र या ई-मेल से ही संपर्क हो सकता है। समयाभाव के कारण हम ऐसा करने में असमर्थ थे, इसलिए आपसे बिना पूछे ही हम यहाँ आ गए। पर हमने अपनी टैक्सी रोक रखी है कि यदि आपको ज़रा-सी भी असुविधा होगी, तो हम आपसे क्षमा याचना कर उलटे पाँव लौट जाएँगे।”

मैं उनकी भद्रता, संस्कारशीलता और शालीन विनम्रता से काफ़ी प्रभावित थी, पर लेखकों की अन्तर्जात हेकड़ी की वजह से उसे दिखा नहीं पा रही थी, इसलिए कुछ क्षण चुप रही। मेरे इस मौन को उस दम्पति ने मेरी विमुखता समझा और उन्होंने खड़े-खड़े ही मुझे नमस्कार कर, अपने पाँव वापस मोड़ लिए। अतिरेक तक पहुँचे उनके इस आभिजात्य से मैं कुछ विचलित ज़रूर हुई, पर मारे अपनी फुटानी के सिर्फ इतना ही कह पाई : “वैसे क्या आप लोग किसी ख़ास वजह से यहाँ आए थे?”

मेरे प्रश्न के प्रत्युत्तर में मुझे एक ऐसा जवाब मिला, जिसकी मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी! जवाब था : “हम आपको एक कहानी का प्लॉट देने आए थे। एक ऐसा प्लॉट, जो आपकी सारी कहानियों से फ़र्क है। फ़र्क क्या, समझ लीजिए उस सारी भाव-धारणा के ही विपरीत है, जो आपकी कहानियों का मूल मंत्र है। आप जीवन मूल्यों और सकारात्मक विचारों में इतनी उलझ जाती हैं कि जीवन में भौतिकता और व्यावहारिकता की भूमिका को अनदेखा कर देती हैं। आपके पात्र पहले आत्मीय-स्वजनों की मार, फिर समाज की मार, संस्कारों की मार और जीवन मूल्यों की मार से अधमरे हो जाते हैं। तब कहीं जाकर उनकी आँखें यथार्थ की दुनिया में खुलती हैं और जागने के बाद वे अपने चारित्रिक चरमोत्कर्ष से अपने चारों ओर बुन दिए गए षड्यंत्रों के मकड़जालों को काटते हैं।

“चित्रा जी! आप मेरी इस बखिया-उधेड़ मीमांसा से संतप्त होकर सोच रही होंगी कि यदि मुझे आपकी कहानियों में इतनी अधिक ख़ामियाँ नज़र आती हैं, तो मैं यहाँ आकर आपका समय नष्ट क्यों कर रहा हूँ? आपने तो मुझे बुलाया नहीं था!”

यह कहना झूठ होगा कि मैं उनके स्व-उत्तरित प्रश्नों से चकित नहीं थी। मेरे पात्रों की मानसिक हलचल पर की गई उनकी टिप्पणियाँ एकदम सटीक थीं और हक़ीक़त तो यह थी कि मैं उस व्यक्ति के घनघोर आकर्षक व्यक्तित्व से उसकी ओर खिंचती जा रही थी। ऐसे स्पष्ट वक्ता समीक्षक से आज तक मेरा वास्ता नहीं पड़ा था, और शायद यह नयापन ही मेरे आकर्षण का कारण था।

“लगता है मैंने आपको रुष्ट कर दिया है, क्योंकि मेरी भूमिका का आकार काफ़ी बड़ा हो गया है। अब यदि आप अनुमति दें, तो मैं कहानी सुनाऊँ? अन्यथा…”

उनके अधूरे वाक्य के बीच में ही आतुरता से भरी मेरी सहमति का स्वर सुनाई पड़ा, जिसमें बेरुखी की जगह ‘मनुहार’ ने ले ली थी। मेरी व्यग्रता को उस सज्जन, शिष्ट व्यक्ति ने भाँप कर भी अनदेखा कर दिया और मेरे बड़प्पन को पूरी तवज्ज़ुह देते हुए अपनी आपबीती कहना शुरू कर दिया :

“एक था राजा, एक थी रानी की तरह ही हमारा एक सुन्दर-सा संसार था, जिसमें एक कमाऊ पति, एक प्रिंसिपल पत्नी, एक राजकुमार और एक राजकुमारी रहते थे। लेकिन समृद्ध राजाओं की तरह, इस राजा को सुरा-सुन्दरी का कोई शौक़ नहीं था। सुबह नौ से शाम सात बजे तक दफ़्तर, और फिर घर। बस यही उसका शगल था। चूँकि प्रिंसिपल रानी शिक्षिका के सारे गुणों को घिस-घिस कर ही इस पायदान पर पहुँची थीं, इसलिए सिवा अनुशासन, समर्पण, प्रेम और सेवा के उन्हें भी कोई व्यसन नहीं था।

“अब ऐसे धुरंधर माँ-पिता के बच्चे भला बिगड़ते कैसे? हमारी निगहदारी के कारण तन्मय और स्वस्ति कक्षा में कभी दूसरे नंबर पर नहीं आए। हम पति-पत्नी हर वक़्त दुनिया की नब्ज़ कस कर पकड़े रहते कि कहीं हमारे बच्चे पिछड़ न जाएँ। स्वीकार करना होगा कि उन दोनों ने भी हमारी मेहनत सार्थक की और केवल छात्रवृत्ति के बल पर विदेशों के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों से उँची-ऊँची डिग्रियाँ हासिल कर लीं।

“बेटी स्वस्ति ने एम.डी. करने के बाद ही, अमेरिका में ही बसे एक भारतीय डॉक्टर से विवाह कर लिया। बेटे तन्मय ने सॉफ्टवेयर की दुनिया में अपने डंके बजा दिए। उसकी प्रवीणता और पारदर्शी दृष्टि के कारण वहाँ की अनेक बड़ी कंपनियों ने उसके लिए अपने दरवाज़े खोल दिए थे, पर उन्हें छोड़ कर वह यहाँ आ गया।

“मेरे यह कहने पर कि ‘इतनी बड़ी तनख़्वाह को ठुकरा देना कोई अक्लमंदी नहीं है?’ तन्मय का सीधा-सट्ट जवाब था : ‘पापा! यदि आप पूरा हिसाब लगाकर देखेंगे, तो पाएँगे कि हम यहाँ रह कर वहाँ से ज़्यादा धन जमा कर लेंगे। और फिर बच्चों की जैसी देखभाल आप लोग करेंगे, वैसी वहाँ की अफ़रा-तफ़री भरी ज़िन्दगी में हम कहाँ कर पाते?’

“रात को भारती ने मुझसे अकेले में कहा भी : ‘जी… आपने ध्यान दिया, बहू तो बहू, बेटा भी केवल स्वार्थ भरी भाषा बोल रहा था। जब से सोच रही हूँ, ज़्यादा धन जमा लेना, बच्चों का भार हम पर डाल देना आदि ओछी बातें इसने सीखीं कहाँ से? कहाँ मैं आस कर रही थी कि बेटा कहेगा : ‘माँ-पापा! आप लोग बहुत खट चुके, अब निश्चिंत होकर आराम से घूमिए-फिरिए!’

“भारती की कही बातों को मैंने उसका वहम मान कर पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। पर उस वक़्त मैं मूर्ख बेटे-बहू के आने की ख़ुशी में यह भूल गया था कि स्त्रियों की अन्त:प्रज्ञा पुरुषों से अधिक तीव्र होती है।

“तन्मय और स्मृति की चहल-पहल से हमारे घर में बेमौसम वसन्त जैसी रौनक हो गई! तन्मय के दोस्तों की आवाजाही की गहमागहमी में वह पूरा सप्ताह ही पंख लगाकर उड़ गया।

“एक दिन हम सब यों ही आपस में हँस-बोल रहे थे कि तन्मय उठा और अपने ब्रीफ़केस से एक ‘स्क्रोल’ निकालकर कहने लगा : ‘पापा! अपना मकान है तो बहुत बढ़िया, पर इसमें जल्दी ही जगह की क़िल्लत होने वाली है। वजह : अमेरिका से आया हमारा ढेरों सामान और फिर हमारे बच्चे।’ मेरी आश्चर्यसूचक दृष्टि को समझ कर उसने बात यों पूरी की: ‘पापा! हम अपने परिवार को यथाशीघ्र पूरा कर निश्चिन्त होना चाहते हैं।’

“इतना कहते हुए तन्मय ने वह ‘स्क्रोल’ मुझे थमा दिया और बोला : ‘पापा! बहुत ही सुन्दर नक्शा है, प्लीज़! आप इसे हुबहू बनवा दीजिए!”

“बेटे के मोह में मैंने अपनी बचत और प्रोविडेंट फंड के अधिकतर रुपए निकाल कर, वह भव्य तल्ला बनवा दिया। तल्ला बनते न बनते स्मृति ने शहर के सबसे बड़े इंटीरियर डिज़ायनर को उसे सुसज्जित करने का आदेश दे दिया। अचरज की बात यह थी कि वह छोटे-से छोटा बिल भी हमारे पास भेज देती और हम संकोचवश ख़ुद को छिजाते हुए उनकी फ़रमाइशों को पूरा करते रहते। ऊपर से उनकी मेहमाननवाज़ी, चौबीसों घंटों की एयरकंडीशनिंग और रेस्तराँओं के बिलों ने भी हमारी नाक में दम कर दिया था। सोचने की बात यह थी कि वैसे तो वे दोनों पूरे हिसाब-क़िताबी थे और उन्हें हमारी सीमित आय की जानकारी भी थी, पर वे कभी भी अपने पाँच-सितारा ख़र्चों के एवज़ में एक फूटी कौड़ी तक नहीं देते थे। इसी हैरानी-परेशानी के आलम में हमारी वंश-बेलि बढ़ी और उसमें दो ख़ूबसूरत फूल तन्या और पराग खिल गए।

“अपने पोता-पोती से अत्यधिक प्यार होने के बावजूद हम उन पर कोई लम्बा-चौड़ा ख़र्च नहीं कर पाते थे। वैसे भारती अपने बहुप्रशंसित पकवान ख़ूब परिश्रम कर उनके लिए बनाती रहती। पर उनके माँ-बाप की तरह हम उनके लिए हज़ारों के ख़िलौने मिनटों में नहीं ख़रीद पाते हैं। यह देख कर दोनों बच्चे हर वक़्त कुड़मुड़-कुड़मुड़ करते रहते।

“भारती ने स्कूल से कुछ दिनों पहले ही रिटायरमेंट ले लिया था और मैं भी दो-एक वर्षों में रिटायर होने वाला था। हमारे पास कोई ख़ास जमा-पूँजी भी नहीं थी, इसलिए एक दिन जब मैंने ख़र्च कम करने की चर्चा की, तो तन्मय ने तुरंत कहा : ‘पापा! गाड़ी बेच दीजिए।’ अभी हमारी फटी आँखें सहज भी नहीं हुई थीं कि स्मृति की आवाज़ आई : ‘मम्मी! आप ख़ानसामे पर ख़ामख़्वाह ख़र्च करती हैं। अरे, आप उससे दस हज़ार गुना बढ़िया खाना पका सकती हैं। फिर क्यों नाहक उसका ख़र्च पालती हैं?’

“उनके जाने के बाद भारती ने दुखी स्वर में कहा कि आज ही सुबह बहू ने मेरे ज़ेवरों को देखकर कहा : “अम्मा जी! ये गहने तो आप पराग और तन्या के लिए मुझे दे दीजिए।’ मेरे यह कहने पर कि ये गहने स्वस्ति के हिस्से के हैं, उसका मुँह गुस्से से लाल हो गया और वह देर तक बड़बड़ करती रही। मेरा जी तो पहले ही इस बात से खट्टा हो गया था। ऊपर से यह गाड़ी और ख़ानसामे वाली बात। सच पूछें, तो मुझे यह सब बहुत ही बेस्वाद और अकबकाया-सा लग रहा है।”

“इन बातों से हमें हाल की ही में घटी दो घटनाएँ याद आ गईं :

“पहली : भारती जिस कॉलेज की प्रिंसिपल थी, उसी में पैंसठ साल से जगदंबा नाम का दरबान काम करता था। उसकी कर्मठता, सच्चाई और ईमानदारी के कारण वह प्रबंधन का प्रेम-भाजन था। रिटायर जगदंबा की जमा रक़म चक्रवृद्धि ब्याज के कारण लाखों-लाख में हो गई है, सुनते ही उसके बच्चों ने आकर उसे बहका लिया और सबके समझाने के बावजूद, वह उनके साथ सारा रुपया लेकर देस चला गया। महीने भर में ही हृष्ट-पुष्ट जगदंबा के मरने की ख़बर आई। गाँव-जवार के लोगों का मानना था कि वह मरा नहीं है, मारा गया है।

“दूसरी : हमारे यहाँ का रामू पैंतालीस साल से घर के आदमी की तरह हमारे पास काम करता था। उसने इस घटना से सीख लेकर अपने रिटायरमेंट के रुपयों की एफ.डी. करवा ली, और जो चारों बेटे उसके दर्शनों के नदीद होने का नाटक कर रहे थे, उन्हें कह दिया कि मैं रिटायर नहीं हुआ हूँ, बस थोड़े दिन की छुट्टी ली है। यह सुनते ही उन लड़कों के उतरे मुँह खिल गए और वे उसके लिए पलक पाँवड़े बिछाने लगे। अब वह सुखी है, बारी-बारी से सबके यहाँ आता-जाता रहता है।

“इन घटनाओं को दृष्टिगत रखते हुए मैंने अपने भविष्य के लिए एक ऐसा निर्णय लिया जिसे सुनकर भारती भी अवाक रह गयी। पर मेरे विचारों से उसका इत्तफ़ाक था।

“मेरा वही निर्णय आपकी सारी कहानियों से एकदम विपरीत। परम्परागत रास्तों को छोड़ कर एक नया मोड़ ले लेता है।”

मैं उतावलेपन के कारण बीच में ही बोल पड़ी : “आपने ऐसा क्या ख़ास कर लिया जो आप मेरे आज तक के लेखन को चुनौती दे रहे हैं? अधिक से अधिक आपने अपने बेटे-बहू को घर से निकाल दिया होगा, और क्या?”

मेरी बात सुनकर हुए उन श्रीमान ने खिंची मुस्कुराहट से उत्तर दिया : “एकदम ग़लत! मैंने न तो उन्हें घर से निकाला, न ही वे मुझे निकाल पाए।”

“अच्छाऽऽ! जरा मैं भी तो सुनूँ, फिर आपने कौन-सी अनोखी राह रच डाली।” मैंने रोष भरे स्वर में पूछा।

और उन महाशय ने आगे जो कुछ कहा, वह सचमुच चौंकाने वाला था। उन्होंने अपनी कहानी यों शुरू की :

“सबसे पहले हमने स्वस्ति और भारती के नाम से बैंक लॉकर लिया और उसमें स्वस्ति के गहने रख दिए और उसकी चाबी स्वस्ति को ‘कूरियर’ कर दी। स्मृति के ज़ेवरात तो उसके पास थे ही, इसलिए हमारे मन में कोई ग्लानिबोध भी नहीं था। उसके बाद मैंने अपने ऑफिस में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति (वी.आर.एस.) की दरख़्वास्त दे दी। मेरी कर्मठता और ईमानदारी की वजह से ऑफिस में मेरी थोड़ी प्रतिष्ठा थी। उन लोगों ने मेरा निवेदन स्वीकार तो किया ही, साथ ही मुझे स्पेशल बोनस के नाम से एक मोटी रक़म भी थमा दी।

“चूँकि हमारा सारा जीवन स्व-अर्जित कमाई पर चला था, इसलिए  हम लोगों में बजट बनाने की क़ाफ़ी तमीज़ थी। हमारे पास जो धनराशि इकट्ठी हुई थी, उससे हमने अंदाज़ा लगा लिया कि इतने रुपयों से हमारा पूरा जीवन नहीं कटेगा। अत: हमने मकान के पेटे बैंक में ॠण के लिए अर्ज़ी दे दी। बैंक का मैनेजर मेरा घनिष्ठ मित्र था! इसलिए हमारे हालात के मद्देनज़र उसने सलाह दी कि हमें ॠण माँगने के स्थान पर उस बँगले को ही आज के दामों में बैंक के पास गिरवी रख देना चाहिए। हमने इसे तुरंत कार्यान्वित कर उसके सारे काग़ज़ात पारिवारिक वक़ील को सम्हला दिए। और उन्हें हिदायत दे दी कि जैसे ही हमारे बेटे-बहू अपने दीर्घ विदेश प्रवास से लौटें, वे उन्हें बँगले की चाबी के साथ ये काग़ज़ात भी दे दें।

“इसके बाद हमने अपने काम का सामान रामू के साथ धर्मशाला भिजवा दिया, जहाँ के बढ़िया मौसम, सिफ़र प्रदूषण, शांत वातावरण और वायु सेवा की उपलब्धता देखकर हमने वहाँ एक छोटा-सा बँगला लीज़ पर ले लिया था।

“चित्रा जी! हम वहाँ घर बसा कर आराम से रहने जा रहे हैं, संन्यास लेने नहीं। हम पहले तो आराम से पूरा विश्व भ्रमण करेंगे! और लगभग दो महीने बाद सीधे धर्मशाला चले जाएँगे जहाँ ‘रामू’ द्वारा बसाया हुआ हमारा नया घर, मय उसके भतीजे-भृत्य के, हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा।

“चित्रा जी, हो सकता है बच्चों को हमारा यह व्यवहार स्वार्थपूर्ण, आत्मकेंद्रित और क्रूर लगे। पर वे सारी बातों पर संपूर्णता से विचार करेंगे, तो शायद उन्हें हमारा यह निर्णय बहुत बुरा नहीं लगेगा। मेरा पक्का विश्वास है कि तन्मय वह घर इन दामों में छोड़ेगा नहीं और एक लंबे-चौड़े घर में अपना स्वच्छंद जीवन उसे बहुत भाएगा। फिर उसे यह भी तो पता है कि हमारी वसीयत किसी और की नहीं, हमारे पोता-पोती की ही होगी।”

इतना कहते न कहते वे दोनों खट् से उठ खड़े हुए और उनकी कहन शैली में डूबी मैं जब किसी और दुनिया से वापस आई तो उन भद्रपुरुष का अत्यंत विनयी स्वर मेरे कानों में पड़ा : “अशेष धन्यवाद! कि आपने अपना क़ीमती वक़्त देकर मेरी कहानी सुनी। आप इसे लिखें न लिखें, आपकी मर्ज़ी। पर मैं परम संतुष्ट हूँ कि इतनी बड़ी लेखिका के रू-ब-रू बैठ कर मैं अपनी बात कह पाया।”

मैं ‘हें-हें’ करती उठ ही रही थी कि वे दोनों टैक्सी में बैठ कर ओझल हो गए।

क्या कोई बताएगा मुझे कि मैं यह कहानी लिखूँ या नहीं?