दोनों घनिष्ठ दोस्त थे – शंकर और शाहरुख। शंकर की बाईं टांग घुटने से नदारद तो  शाहरुख की बाईं बांह कुहनी से गायब। शंकर हनुमान मंदिर के पास बैठता और शाहरुख झंडा चौक वाली जामा मस्जिद के करीब। शाहरुख हँस कर कहता- ‘यार,  मंगतई अपुन का सांझा दुख है। सांझा दुख लोगों को जोड़ने का काम करता है।’

एक दिन शाहरुख किसी काम से दूसरे मोहल्ले गया। शाम को लौटा तो देखा कि मस्जिद के आगे शंकर जमीन पर बेहोश पड़ा है। पास ही बैसाखी। शंकर यहां..! जरूर उसे खोजते हुए चला आया होगा पागल। झोले से पानी की बोतल निकाल कर मुंह पर छींटे मारे। गाल थपथपाया, पर होश नहीं आया। अब!

चोट गंभीर है। तुरंत अस्पताल ले जाना होग। मगरीब की नमाज खत्म हुई ही थी। नमाजी एक-एक करके मस्जिद से निकल रहे थे। शाहरुख सहायता की गुहार लगाने लगा- ‘खुदा के वास्ते..  मेरे दोस्त को अस्पताल ले जाने में मदद करो।’ लोग गुहार पर शंकर की ओर नजर डालते फिर मुंह बिचका कर आगे बढ़ जाते।

शाहरुख की नजर शंकर के चंदन टीके, रामनामी और कलावे पर अटक गई। होंठों पर विद्रूप मुस्कान उभर आई। थरथराते हाथों से मोली तोड़ी, टीका पोंछा, रामनामी की जगह चारखाने वाला गमछा रख दिया और झोले से जालीदार टोपी निकालकर सर पर फंसा दी। गले में सात सौ छियासी गुदी अपनी ताबीज भी पहना दी।

इस बार गुहार का असर हुआ। मस्जिद से निकलते नमाजी शंकर को देखकर ठिठकते। छोटी सी भीड़ दोनों के पास जमा हो गई और लोग ‘या अल्लाह’… बड़बड़ाते उसको अस्पताल ले जाने का उपाय करने लगे!

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