मदन गोपाल लढ़ा
वरिष्ठ कवि, कहानीकार और आलोचक। राजस्थानी और हिंदी में कई किताबें प्रकाशित। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित।

स्वाति
राजस्थानी और हिंदी में परस्पर अनुवाद। कुछ रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। आकाशवाणी से जुड़ाव।

‘यहीं था हमारे पूर्वजों का गांव मणेरा।’ गाड़ी से नीचे उतरते ही बीरबल ने अपनी आठ साल की पोती सुरभि से कहा। चारों तरफ रेत ही रेत। आंधी से बनते बिगड़ते धोरे। सुनसान इलाका। सामने रेत में धराशायी घरों के भग्नावशेष दिख रहे हैं।

इस धरती पर पांव धरते ही बीरबल के मुरझाए चेहरे पर रौनक आ गई। चौतीस वर्षों से मातृभूमि उसे बुला रही थी। आज मन की मुराद पूरी हुई। बीरबल के कदम अपने आप चल पड़े। बेटा अरविंद टवेरा गाड़ी के पास खड़ा था और सुरभि अपनी मम्मी के साथ गाड़ी में ही बैठी थी।

मणेरा हमेशा वैसा नहीं था, जैसा आज दिख रहा है। बीरबल की आंखों में अतीत की स्मृति फिल्म की तरह चलने लगी। कभी यहां मंगल ही मंगल था। एक जीता जागता गांव। घर जैसे घर। लोग जैसे लोग। ठाकुर जी के मंदिर के नगाड़ों से दिन उगता और गवाड़ में गुरबत के बीच छिपता। सेना के तोपाभ्यास के लिए सन् उन्नीस सौ चौरासी में जब महाजन फील्ड फायरिंग रेंज की स्थापना हुई तो मणेरा का सूरज सदैव के लिए अस्त हो गया। सरकारी हुकम से मरुधरा के चौंतीस गांवों की जमीन सेना को सौंप दी गई। इस सूची में एक नाम मणेरा भी था।

जो गांव उजड़े, सरकार ने वहां के बाशिंदों को मुआवजा दिया। खेत की जमीन हो चाहे घर की जगह, सबका मोल आंका गया। जमीनों की कीमत तो तय की जा सकती है पर गवाड़ की गुरबत का मुआवजा कौन दे सकता है? युगों पुरानी परंपराओं का मोल कौन आंक सकता है? बीरबल के मन की पीड़ा जग गई। अंतस के भाव चेहरे पर झलकने लगे।

जहां मणेरा गांव बसता था, वहां अब खंडहर ही खंडहर थे। रास्ते से गुजरते हुए बीरबल की निगाहें एक खेजड़े पर पड़ीं। उसके कदम थम गए। इसी खेजड़े के नीचे कोडमदेसर भैरूंनाथ जी का थान हुआ करता था। उसकी मां को भैरूंबाबा का ईष्ट था। बाबा की आठम को घर में मीठी घूघरी बनती और थान पर चढ़ाने के बाद सब बच्चे चाव से प्रसाद जीमते।

थान के बाईं तरफ भादुओं का कुआं था। रेत से कुआं तो भर गया मगर उसकी खेलियों के पत्थर अपने समृद्ध अतीत की साख भर रहे थे। कितना मीठा पानी था इस कुएं का। मुखराम भादु ने जनहित में इसका निर्माण करवाया था। इसका नाम भले ही भादुओं का कुआं रहा हो, पर समूचा गांव इसके अमृत सरीखे पानी से प्यास बुझाता था। महानगर मुंबई में भी ऐसा पानी नहीं पिया बीरबल ने। कुएं की याद मात्र से उसे प्यास लग गई। उसने होठों पर जीभ फेरी। लेकिन अब वैसा पानी बचा ही कहां है? बीते चौतीस बरसों से प्यासा ही तो है बीरबल। आरओ वाला महंगा पानी पीते हुए भी कभी तृप्ति नहीं मिली उसे। कुएं से पूर्व में दुलमेरी पत्थरों से बने घर के खंडहर नजर आ रहे हैं। कभी यह घर गांव की शान हुआ करता था। उसके जिगरी यार भंवरसिंह का घर महल से कहीं कम नहीं था। घर की बाखल में एक मोटे तने वाला नीम था। उस नीम पर सैंकड़ों पक्षी बसते तो नीचे लोगों का मेला लगा रहता। गर्मी में तो आधी रात तक इस नीम के नीचे हथाई घुटती। सावण में नीम की डाली पर झूला टंगता तो झूलने का ठाठ निराला ही लगता। पर अब वह बाखल सुनसान थी। इस उजाड़ में नीम जैसे दरख्त को भला कौन छोड़ता? बीरबल ने आह भरी। उसके मन में सवालों के भंवर उमड़ रहे थे मगर जवाब देने वाला कोई नहीं था।

जब फायरिंग रेंज के लिए सेना को जमीन सौंपी गई तब लोगों ने अपने साधन-सुविधा के अनुसार नया ठिकाना तलाश लिया। मुखराम भादु के बेटों ने खाजूवाला में जमीन खरीद ली। रामेश्वर लखोटिया ने लूणकरनसर में आटा चक्की लगा ली। बेगाराम पंडित रावतसर पहुंच गया। किसी ने धंधे की सुविधा देखी तो कोई रिश्तेदारी की ओर झुका। उस घड़ी को याद करके तो बीरबल की आंखे नम हो गईं। कैसा मंजर था वह! घर छोड़ना किसी त्रासदी से कम नहीं था। कई दिनों तक नींद नहीं आई उसे। ऐसा लगता था कि घर नहीं कोई बडेरा पीछे छूट गया हो। रो-रोकर बुरे हाल हो गए। गांव छोड़ते हुए गोमती के आंसू तो थमे ही नहीं। अपनी घरवाली की याद में अनमना हो गया बीरबल।

 घर में गोमती का जीव बसता था। गांव छोड़ने के बाद एक दिवाली मुश्किल से देखी होगी उसने। डॉक्टर भले ही उसकी मृत्यु का कारण हृदयघात बताते हों मगर बीरबल असली कारण को भली-भांति जानता है। इस घर में तो कभी उसके सर में दर्द तक नहीं हुआ। गोमती ही क्यों कई बुजुर्गों की जीवन-डोर बीच में ही टूट गई। जो जीवित हैं उनका कलेजा भी गांव उजड़ने की पीड़ा से सदैव जलता रहता है। दूसरों की बात छोड़िए, खुद बीरबल इतने लंबे अरसे बाद भी गांव की मौत के सदमे से कहां उबर पाया है। यूं तो अरविंद एमबीए करके मुंबई की एक कंपनी में अफसर हो गया। उसी कंपनी में बराबर की ओहदेदार मालती के साथ उसका विवाह हो गया। महानगर के बहुत मंहगे इलाके पानवाड़ी में चौथे तल्ले पर उन्होंने एक खूबसूरत फ्लैट खरीद लिया। अरविंद की बेटी सुरभि भी आठ साल की हो गई। घर में कोई कमी नहीं मगर बीरबल आज भी महानगर की जिंदगी के लिए अजनबी था। गोमती के जाने के बाद तो उसका अकेलापन और बढ़ गया। मुंबई में रहते हुए भी मणेरा को जी रहा था वह।

लेकिन आज बीरबल मणेरा की धरती पर खड़ा था। अरविंद के विवाह की नाथूदादा की जात बाकी थी। इस इलाके में लोक देवता नाथूदादा के प्रति बहुत आस्था है। तोपाभ्यास क्षेत्र में नाथूदादा के मंदिर की ध्वजा लहराती है। सेना की इजाजत लेकर दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। अरविंद और बहू की व्यस्तता के कारण अब तक यहां आना संभव नहीं हुआ मगर इस बार बीरबल ने रट ही लगा दी। नाथूदादा के धोक लग जाए और मातृभूमि के दर्शन भी हो जाए। अरविंद ने भी बाबा का मन रखा।

‘धड़ाम।’ अचानक कहीं दूर तोप से गोला छूटा तो जमीन दहल गई। आस-पास के दरख्तों से पंखेरू कलरव करते हुए उड़ने लगे। इस धमाके से बीरबल का मन भी पक्षियों की तरह फड़फड़ाने लगा। अब इन धमाकों से उठने वाली गर्द ही तो शेष बची है मणेरा में। रह-रह कर एक सवाल उसके मन को मथने लगा। सदियों से उनके पुरखे यहां रह रहे थे फिर अचानक यह खतरा कहां से उतर आया? विचारों की उधेड़बुन में खोया बीरबल घूमता हुआ अपने पुराने घर की जगह पहुंच गया। सामने घर की जगह को देखकर बीरबल की आंखें भर आईं। खंडहर बन चुके कच्चे टापरे के लिए अब ‘घर’ की संज्ञा असंगत लग रही थी। लकड़ियों के लिए लोगों ने छत पटक दी। बिना सार-संभाल के पुरानी दीवारों के घुटने टूट गए। समूचा गांव उजड़ गया था, परंतु यह घर बीरबल की यादों की धरती पर अटल खड़ा था। जब उसने बाखल में पांव रखा तो उसे अपने पूर्वजों से मिलने का अहसास हुआ। उसने नीचे झुककर मिट्टी को स्पर्श किया। आंखों से निकलकर दो मोती चुपके-से मिट्टी में मिल गए। बीरबल ने मन ही मन में घर का नक्शा खींचा। पूर्वमुखी दो आसरों के ठीक बीच में पूजा का थान। पलिंडे से सटी हुई रसोई। बाखल में खुलती बैठक जिसमें बापू का हुक्का गुड़गुड़ाता रहता। पिछवाड़े पशुओं के चरने के लिए ठाण और पानी का कुंड हुआ करता था। इधर बीरबल अपनी पुरानी यादों की गठरी को संभालने में मगन था उधर गाड़ी में तपती से हाल बेहाल था। लू से एक ही दिन में मालती का रंग पीला पड़ गया। सुनसान जंगल में सुरभि भी उकता गई। बाबा आए तो गाड़ी रवाना हो। अरविंद बाबा को बुलाने के लिए गया। बीरबल अपने पुराने घर की बाखल में औंधा लेटा था। अरविंद ने भागकर बाबा को संभाला। परंतु बाबा अब कहां थे? उन्होंने तो अपने पुरखों के घर के बांथ भर ली थी। अब कोई सरकार बीरबल को अपने गांव-घर से जुदा नहीं कर सकती। अरविंद गला फाड़कर रोया। मगर बाबा अपने वापस नहीं लौटने के फैसले पर अटल थे।

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