युवा लेखिका।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में पीएच.डी. की शोध छात्रा।कोलकाता के खुदीराम बोस कॉलेज में शिक्षण।

कविता और मनुष्य का पुराना सृजनात्मक नाता है।कविता मानव मन की कई उलझनों को स्पष्ट करने और कई बार चेतना को जगाने का काम करती है।यह गहरे अवसाद से निकालती है, तो कई बार सवाल उठाती है।

‘न रोको उन्हें
लिखने दो शुभा
दीवारों पर नारे ही सही
अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास।’

पहाड़ की पीड़ा और श्रमिकों के जीवन-संघर्ष को अपनी कहानियों और कविताओं में सुंदरता से बयान करने वाले शेखर जोशी का हाल में निधन हो गया।उनका जाना हिंदी साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। ‘कोसी का घटवार’, ‘दाज्यू’ और ‘बदबू’ जैसी प्रख्यात कहानियों के लेखक के तौर पर उन्होंने पाठकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई थी।उनकी नई बेचैनियों का आख्यान है उनका नवीनतम कविता संग्रह ‘पार्वती’।इस संग्रह में उनकी प्रतिबद्धता मेहनतकश लोगों के प्रति है।६९ कविताओं के इस कविता संग्रह को उन्होंने ६ उपशीषर्कों ‘पार्वती’, ‘अयांत्रिक’, ‘आंदोलित जन’, ‘अस्पताल डायरी’, ‘विविधा’ और ‘दिल्ली प्रवास-प्रारंभिक रचनाएं’ में  बांटा है।इसे पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि हम कई स्मृतियों, कहानियों और मानवीय रिश्तों की घटनाओं को अपनी आंखों के सामने घटते देख रहे हैं।

इस संग्रह के पहले भाग ‘पार्वती’ में कवि पहाड़ पर रहने वाले लोगों का संघर्ष, उनकी व्यथा, वहां की लोकपरंपराओं, कथाओं, अपनी जमीन से प्रेम के भाव को व्यक्त किया है।इसमें विस्थापन की पीड़ा का भी जिक्र है।कविता संग्रह में पहाड़ के लोगों की पीड़ा के बीच उत्तराखंड का प्राकृतिक सौंदर्य एक सुखद स्वप्न की तरह पाठकों के मन को उम्मीद से भर देता है।

शेखर जोशी खुद को पहाड़ के कठिन जीवन की गहरी बेचैनी से अलग नहीं कर पाते।वे ‘देवी का वन’ कविता में कहते हैं, ‘भारी बोझ सिर पर ले संभल कर उतरना ओ पार्वती/तेरी राह तकते खैरा औ बसंती/तुझे आशीष देंगे जी भर’।कवि को मालूम है कि पहाड़ों पर गुजर बसर करना कितना मुश्किल है।यहां बार-बार पहाड़ से नीचे उतर कर अपनी जरूरत की चीजों को लाना कठिन होता है, इसे कवि ने महसूस किया है।

शेखर जोशी पहाड़ी जीवन की तुलना में शहर को देखकर महसूस करते हैं कि पहाड़ों पर अब भी सामूहिकता और संवाद बचा है।कवि कई चित्र रखता है- ‘वह किसी ब्याह की तैयारियां/लाल मिट्टी से लीपी सारी देहरियां….बेटी की विदाई पर/अगले मोड़ तक महिलाओं का जाना/वह घूंघटों के भीतर बहते आंसू/पूरी बाखई में उदासी का आलम’।यहां मौन भी बोलता है।

उत्तराखंड के प्रसिद्ध ओखल नृत्य का जिक्र कवि ने अपनी कविता ‘ओखल नृत्य’ में किया है।शेखर जोशी ‘मितवा’ कविता में भेटौई (उत्तराखंड में चैत माह में बेटी को दिया जाने वाला पकवानों का उपहार) की परंपरा की बात करते हैं।वे कहते हैं- ‘मेरे सपनों में आता रहेगा/ मेरा यह बाखई वाला गांव।’ नि:संदेह यह कविता संग्रह लोकजीवन के वैशिष्ट्य के साथ हमें जड़ों की ओर ले जाता है और एक कथाकार की सृजनात्मकता का नया आयाम दिखाता है।

शेखर जोशी सही अर्थों में मजदूरों के, आम जीवन के कवि हैं।वे जितना पहाड़ के लिए चिंतित हैं, उतना ही शहरों के वंचित और मेहनतकश मजदूरों के लिए व्यथित हैं।वे क्षेत्रीयता का अतिक्रमण करते हैं। ‘कारखाना-१’ और ‘कारखाना-२’ कविता में श्रमिकों पर नए समय के भारी दबाव की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- ‘मन में नफरत हो पर मुंह से राम कहो/तीन कौड़ी के आदमी को ‘माई-बाप सलाम’ कहो’।

इस युग में अपनी डायरियों में कविता लिखने वाला कवि अचानक कविता की जगह अपने जीवन का अर्थशास्त्र लिखने लगता है।हालांकि शेखर जोशी नई पीढ़ी के प्रति आश्वस्त हैं।वे नई पीढ़ी में उम्मीद रोपना चाहते हैं- ‘न रोको उन्हें/लिखने दो शुभा/दीवारों पर नारे ही सही/अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास।’

वे कोरोना काल में बड़ी संख्या में मरने वाले नागरिकों, मजदूरों की खबर से मर्माहत होते हैं।  ‘अखबार की सुर्खियों में’ कविता में कहते हैं- ‘नहीं, कोई नाम नहीं/कोई ईनाम नहीं/महज एक अनाम गिनती बनकर/कल के दिन का स्कोर होकर रह गया वह/रेडियो की खबरों में/टेलीप्रिंटर के तारों में’!

शेखर जोशी जब अस्पताल में थे, तब उनके आस-पास जितनी गतिविधियां थीं, वे बड़ी बारीकी से महसूस करते थे।वे मृत्यु के आतंक में जीने की बात सोचते थे।अपने पास वाले मरीज से संवाद के संबंध में वे कहते हैं- ‘हम दोनों बतिया रहे थे/अपनी हारी-बीमारी भूल कर/अपने दुख और अपनी चिंताएं बिसराकर/आभार, हमारी अन्नप्रसवा धरती/माध्यम बनी तुम/हमारे बीच पसरा मनहूस सन्नाटा टूटा।’

उनकी कविता में शब्दों की सरलता है, उन्हीं शब्दों में छिपी जीवन की जटिलता भी है।जैसे कोई छोटा शिशु अपने एक शब्द से अपनी छोटी दुनिया व्यक्त कर जाता है, वहीं जब लोग बड़े हो जाते हैं, तब चालाकी से शब्दों के बाण चलाते हैं।कविता के लिए निश्छलता बेहद जरूरी है। ‘ख्वाहिश एक सपने की’ कविता को पढ़ते हुए मुझे अज्ञेय की कविता ‘हरी घास पर क्षण भर’ की याद आ जाती है।दरअसल कवि अपने भीतर एक अन्वेषक, एक जिज्ञासु और एक सहृदय मानुष को सदैव बचाकर रखना चाहता है।

शेखर जोशी ‘नन्ही परी के लिए एक स्वागत गीत’ कविता में छली गई कुंवारी स्त्रियों के बारे में बताते हैं, जो अपने बच्चे को सड़कों पर, मंदिर में या कूड़े पर फेंक देती हैं।हाल में उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश दिया है कि अब अविवाहिता स्त्री भी गर्भपात करवा सकती है।पहले यह अधिकार सिर्फ शादीशुदा कपल के पास था।कवि कहता है- ‘वह दिन दूर नहीं जब छली गई कोई कुंआरी मां/पूरे दम-खम के साथ कह सकेगी/यह मेरी सर्जना है यह मेरी संतान है/और कुछ पूछकर क्या करेंगे आप।’ यहां बदलते युग की स्त्री का साहस है।

शेखर जोशी ‘जुनून : एक काव्य पाठ की रोमांचक स्मृति’ में एक घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वे खुद को कवि रूप में प्रस्तुत करने को कितने व्याकुल थे।जब उन्हें अपनी एक ट्रेनिंग के दौरान कविता सुनाने का मौका मिला तो उन्होंने अपने ट्रेनिंग सुपरवाइजर कवात्रा साहब के रोकने के बावजूद अपने सहपाठियों की बात मानकर अपनी कविता का पाठ जारी रखा।यह बेचैनी ही हमें विस्तार देती है।वे प्रसिद्ध कहानीकार होने के साथ ही एक अच्छे कवि के रूप में भी अपने को उपस्थित कर पाए हैं, यह संग्रह इसका प्रमाण है।

जिज्ञासा-‘पार्वतीकी भूमिका में नॉस्टाल्जिया का जिक्र है।यह रचनात्मकता के लिए कितना जरूरी है?

शेखर जोशी– नॉस्टाल्जिया के लिए हमारी आंचलिक कुमाऊंनी भाषा में एक प्यारा सा शब्द है : नराई।हिंदी में संभवतः इसे स्मृत्याभास कहा जाता है।अंग्रेजी अथवा हिंदी में वह अपनत्व नहीं प्रतीत होता जो नराई शब्द में है।मैं नराई शब्द का ही प्रयोग करूंगा।

नराई रचना का प्राण होती है।इसके दो आधार तत्व हैं- आसक्ति और बिछोह।नराई जीवन भर आपका साथ नहीं छोड़ती।विश्वास मानिए, ‘पार्वती’ संग्रह की दूसरी कविता ‘मातृहीन’ मेरे अस्सी वर्ष पुराने एक अनुभव पर आधारित है।

देश विभाजन की पृष्ठभूमि पर अंग्रेजी, बांग्ला, हिंदी, पंजाबी और उर्दू में लिखे गए उपन्यासों के मूल में प्रायः इसी नराई की भूमिका रही है।

जिज्ञासा अपनी लोकधर्मिता की प्रेरणा के बारे में कुछ बतलाइए।

शेखर जोशी– मेरा जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में, किसान परिवार में हुआ था।अब वह गांव विस्थापन के कारण प्रायः उजड़ गया है।लेकिन मेरी स्मृति में जो गांव है वह भरा पूरा-सा, लोकराग और लोक संस्कृति से भरपूर एक जीवन इकाई है।मेरी कविताओं में गांव का वही लोक जीवन आप देखते हैं।

जिज्ञासाआपकी कविताओं के बारे में यह कहा जाता है कि ये निरालाकेदारनागार्जुन की काव्य परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।इस बारे में आपकी क्या राय है?

शेखर जोशी– यदि लोग ऐसा मानते हैं तो यह मेरा सौभाग्य है।तीनों ही कवि मेरे आदर्श रहे हैं।व्यक्तिगत जीवन में नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल का अपार स्नेह मुझे मिलता रहा है और मेरा प्रयास रहा है कि जनजीवन को देखने-परखने में उनका अनुसरण कर सकूं।

जिज्ञासाआपकी कविताओं में एक ओर प्रकृति को लेकर सौंदर्यबोध है, वहीं दूसरी ओर कविताओं में प्रतिवादी स्वर है।दोनों में कैसा संबंध है?

शेखर जोशी– मेरी आधारभूमि प्राकृतिक सौंदर्य से भरी-पूरी थी, इस कारण मेरी गद्य और पद्य रचनाओं में प्राकृतिक सौंदर्य का समावेश स्वाभाविक है।जहां तक प्रतिरोधी स्वर का प्रश्न है, वह व्यापक जनभावना से मेरे जुड़ाव के कारण है।

जिज्ञासाआपने इस संग्रह में लिखा है मोची, लोहार, बढ़ई, वेल्डर, मोल्डर, ठठेरा, खरादिए, मिस्त्री, रंगसाज मेरे गुरु थे।आपके बनने में इन गुरुओं की क्या भूमिका रही है?

शेखर जोशी– इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए मुझे थोड़ा विस्तार में जाना पड़ेगा।

सैनिक जीवन में अधिकारियों का समय-समय पर स्थानांतरण होना स्वाभाविक प्रक्रिया है।वर्कशाप के कार्य व्यापार की निरंतरता बनाए रखने के लिए एक मिडिल मैनेजमेंट कैडर जरूरी होता है।दूसरे विश्वयुद्ध से पहले सेना की ई.एम.ई. कोर में ब्रिटिश प्रधानमंत्री के नाम पर ‘बेविन बॉयेज’ की स्थापना की गई थी।इसके अंतर्गत कुछ युवा सिविलियन प्रशिक्षुओं की ट्रेनिंग के लिए उन्हें ब्रिटेन भेजा जाता था।विश्वयुद्ध के कारण यह क्रम टूट गया।इसे पुनर्जीवित करने के लिए १९५१ में सिविलियन बॉय अ‍ॅप्रेंटिस की चार वर्षीय ट्रेनिंग शुरू की गई।इसके माध्यम से प्रशिक्षुओं को प्रत्येक ट्रेड की ट्रेनिंग देने के अलावा एक विशेष ट्रेड की दक्षता का प्रशिक्षण दिया जाता था।

यह एक संयोग ही है कि सामंती परिवेश की जीवन-शैली में पले मुझ जैसे व्यक्ति का चयन इस ट्रेनिंग के पहले बैच में हो गया था।

हमारी पारिवारिक परंपरा में शिल्पकारों को अछूत माना जाता था।उनका स्पर्श हो जाने पर उनके सामने ही घर के किसी सदस्य को पानी के छींटे देकर शुद्धि कर पवित्र करने का चलन था।अपने नए अवतार में मुझे ऐसे शिल्पकारों, कारीगरों का शिष्य बनने का अवसर मिला और उनसे एक आत्मीय रिश्ता बन गया।मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में यह एक परिवर्तनकारी घटना थी।मेरे इन गुरुजनों ने मेरी मानसिकता में परिवर्तन किया।मैंने अनुभव किया कि  खून के रिश्ते से बढ़कर पसीने का रिश्ता होता है।

‘दुख उठाने के लिए स्त्रियां ही बची रह जाती हैं
मानो उनका यही जीवनचक्र है:
सुख देना, दुख सहना
और नए दुखों की राह तकना।’

कुमार अंबुज (१९५७) का नवीनतम काव्य संग्रह ‘उपशीर्षक’ है।इसमें उनकी एक लंबी कविता ‘शोकसभा’ सहित कुल ८२ कविताएं संकलित हैं।वे समकालीन कविता के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, इस अर्थ में कि वे अपने समय के बदलाव, आवेग और अनुभव का संतुलन बनाए रखते हैं।यह सच है कि कविता का उत्कर्ष शिल्प से ज्यादा अनुभव का मामला है।इस संग्रह के आरंभ में वे जोसेफ कोनराड के हवाले से कहते हैं- ‘मेरा काम है कि मैं आपको सुनने, कुछ महसूस करने और सबसे ज्यादा कुछ देखने के लिए तैयार कर सकूं।बस यही, और यही सब कुछ है।’

आज हम सिर्फ कहने और सुनने में व्यस्त हैं।आज कहने और सुनने की भीड़ में ठहरकर देखने का अर्थ है कविता की आत्मा को बचाना।

इस संग्रह की कविताएं जीवन की घटनाओं पर आधारित सच की बानगी हैं, जहां कवि की संवेदना का तार जनपक्षधरता से जुड़ा है।यह जनपक्षधरता सिर्फ मनुष्यों से नहीं है, बल्कि इसकी व्याप्ति विस्तृत पर्यावरण एवं परिवेश तक है।कवि वर्तमान में होते हुए भी अतीत और भविष्य की ओर देखना नहीं छोड़ता।कुमार अंबुज पोस्टर को महज एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि असहमति, विवेकपूर्ण साहस और प्रतिरोध मानते हैं-—‘सभ्यता की राह में आगे दिखती हैं वे दीवारें/जिन पर लगाए पोस्टर फाड़ दिए गए हैं/चलते-चलते हम आ गए हैं उस जगह/जहां एक पोस्टर तक का जीवन खतरे में है/और सबको अंदाजा हो जाता है कि अब/मनुष्यों का जीवन और ज्यादा खतरे में पड़ चुका है।’ इन दिनों अभिव्यक्ति पर बढ़ रहे खतरे से कवि का चिंतित होना स्वाभाविक है।

कुमार अंबुज की कविताएं अपने समय के साथ एक संवाद है। ‘धरती का विलाप’ कविता पूरी दुनिया की विस्थापित औरतों की पीड़ा है।एक पुरुष कवि का हृदय स्त्री की पीड़ा को सिर्फ समझता ही नहीं है, बल्कि उसकी संभावित विपत्तियों की आशंका से भयाक्रांत भी हो जाता है- ‘दुख उठाने के लिए स्त्रियां ही बची रह जाती हैं/मानो उनका यही जीवनचक्र है: सुख देना, दुख सहना/और नए दुखों की राह तकना।’ यह कविता भौगोलिक सीमाओं से मुक्त दुनिया भर की स्त्रियों की पीड़ा का आख्यान है।

कवि मानव-विरोधी घटनाओं से चिंतित है।आज समाज में नृंशसता, संवादहीनता और वर्चस्ववादी शक्तियां बढ़ती जा रही हैं।ऐसे में  पर्यावरणविद, इतिहासकार, बुद्धिजीवी, पुस्तकालय सब हाशिए पर हैं।इसलिए- ‘हम रोज काट रहे हैं हजारों वृक्ष/बुद्धिजीवियों को डाल दिया है स्टोन-क्रशर में/तोड़ी जा चुकी हैं तमाम मूर्तियां/दुरुस्त हो गए हैं पाठ्यक्रम/बंद कर दी हैं लाइब्रेरियां/उधर देखो, जिंदा ही जलाए जा रहे हैं तुम्हारे जिंदा लोग।’

कुछ समुच्चयमें छोटीछोटी क्षणिकाओं में गंभीर बातें हैं।कवि लोकतंत्रको परिभाषित करते हुए लिखता है, ‘आखिर एक आदमी/जनता को कर ही लेता है नियंत्रण में।वह युगीन विडंबनाके बारे में कहता है, ‘गरीब को अभिशाप फलीभूत होते हैं/अमीर को वरदान।

कवि ‘विकास’ की ओर इशारा करता है, ‘जो एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में भी/एक सरीखा नहीं है’।कुमार अम्बुज ‘भूमिका’ में आज के बुद्धिजीवियों पर सवाल करते हैं, ‘बुद्धिजीवियों की एक भूमिका यह भी है/कि वे फैला सकें सच्ची निराशा’। ‘इकाई’ के बारे  में, ‘क्रूरता ही है संपत्ति की इकाई’।ऐसी कई क्षणिकाओं में कवि ने अपने समय की विडंबनाओं को चित्रित किया है।

यह संग्रह घोर निराशा के बीच एक उम्मीद की तरह है, ‘अनुभव का आसरा यह है/कि धूल और लू भी आखिर धुल जाती हैं बारिश में/और बारिश शरद की तारों-भरी रात में।’

कवि अंधकारमय परिवेश में भी आशा की किरणें खोजता है, ‘इस जीवन का नहीं कोई अर्थ/पर अर्थ बनाना पड़ता है/भावों को मनाना पड़ता है/संसार के इस पुल पर आकर/उस पार तो जाना पड़ता है’ – ये पंक्तियां विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद जगाने का काम करती हैं।

जिज्ञासाआपने अपने कविता संग्रह उपशीर्षकमें उपको महत्व दिया है।इसका क्या तात्पर्य है? आपका केंद्र से इतर देखना कितना चुनौतीपूर्ण है?

कुमार अम्बुज– हमारे समय में मुख्य चुनौतियों, विचारों, घटनाओं, वास्तविकताओं को चमकदार शीर्षकों की ओट में रखा जा रहा है।यानी जो उपेक्षणीय या कम महत्वपूर्ण है उसे शीर्षक बनाया जा रहा है।इसलिए अब उपशीर्षक ही हमारे समय और सचाई के संबंध में कहीं बेहतर सूचनाएं और मूल्यवान जानकारी दे सकते हैं।वे रोशनी के नेपथ्य में छिपे अंधेरे के बारे में भी हमें कुछ अधिक सजग कर सकते हैं।यह शीर्षक इसी ओझल होते जा रहे पक्ष की तरफ़ एक जरूरी ध्यानाकर्षण है।

जिज्ञासाक्या आपकी कविताएं व्यवस्थाविरोधी वृत्तांत हैं?

कुमार अम्बुज– कविताएं व्यवस्था विरोधी नहीं हैं, वे अव्यवस्था-विरोधी हैं।यदि ‘व्यवस्था’ से आपका आशय ‘सत्ता’ से है तो निश्चित ही संग्रह की कुछ कविताएं, दरअसल सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी शक्ति संरचनाओं के खतरों और उनके जनविरोधी चरित्र को संबोधित हैं।

जिज्ञासा-‘शीर्षक उपशीर्षककविता में जिस नव राष्ट्रवाद का जिक्र है, वह कितना जनकल्याण और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा है और कितना प्रहसन है?

कुमार अम्बुज – नव-राष्ट्रवाद कहीं अधिक उग्रता, बहुलतावाद विरोध, अलोकतांत्रिकता, एवं संकीर्णतावाद में फँसता है और फँसाता है।इस हेतु वह नए तरीके, नए तर्क, नए व्यवहार खोजता है।वह नागरिक अधिकारों से ज्यादा धार्मिक अस्मिताओं को महत्व देने लगता है।वह आपसी नफरत, झूठे गौरव और असहिष्णुता के उपक्रमों को परिचालित करता है।अंतत: वह किसी प्रहसन में नहीं, त्रासदी में बदलता है।

जिज्ञासाआज का विस्थापन १९४७ के दौर के विस्थापन से कितना अलग है?

कुमार अम्बुज– विस्थापन का प्रश्न महज किसी देश विभाजन की मुश्किलों तक सीमित नहीं।वह तमाम प्राकृतिक विभीषिकाओं और राजनीतिक संकटजन्य स्थितियों तक अपनी परिधि, अपना व्यास फैलाता है।वह अपने घर, गांव, शहर के क्षेत्रीय स्तरों पर भी देखा जा सकता है और इन दायरों से निकलकर पूरी सभ्यता के रकबों तक जाता है।रोजगार, वर्चस्ववाद, नस्लीय या जातीय घृणा भी इसका एक असमाप्य कारण बना हुआ है।यह एक अनवरत, असीमित समस्या है।सारे विस्थापन मनुष्य को, सभ्यता को अनदेखी यातनाओं में धकेलते हैं।अकेलेपन, अलगाव, अवसाद और समाज से विश्रृंखल होने की समस्याओं को प्रचुर, असाध्य और नया करते हैं।अकारण नहीं कि संसार का प्रमुख, श्रेष्ठ साहित्य विस्थापन की मुश्किलों और उसके प्रभावों से भरा हुआ है।

जिज्ञासाइस संग्रह में आपने लिखा है जो आदमी बच जाता है प्राकृतिक आपदाओं से, मर जाता है राजनीतिक आपदाओं से।ऐसा आपने क्यों लिखा है?

कुमार अम्बुज– तमाम कवियों, लेखकों, विचारकों, वैज्ञानिकों और समाज-अर्थशास्त्रियों ने हमेशा रेखांकित किया है कि आदमी प्राकृतिक आपदाओं में, राजनीतिक और प्रबंधन-अक्षमताओं के कारण ही अधिक मुश्किल में आता है।यानी सारी प्राकृतिक आपदाएं यदि बड़ी विभीषिका बनती हैं तो उसका कारण राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव है, कुप्रबंधन है।याद कर सकते हैं कि अकाल, बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं पर इसी दृष्टि से काम करने के लिए अमर्त्य सेन को नोबेल सम्मान दिया गया।

जिज्ञासा लंबी कविता शोक सभामें आवेग, विचार और विवेक का द्वंद्व देखा जा सकता है।आप कविता लेखन के लिए इन तीनों को कितना जरूरी मानते हैं?

कुमार अम्बुज– कविता अनेक तत्वों और अदेखे-जाने-अनजाने रसायनों से मिलकर बनती है।ये सभी आवश्यक हैं।जाहिर है कि आवेग, विचार, भाषा और दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण अवयवों में से हैं।

‘युद्ध का कारण मुझे जो
मानते हैं वो गुणी
पहले परख लें भावना
जो वासना से थी सनी’।

मृत्युंजय कुमार सिंह अपने नवीनतम खंड काव्य ‘द्रौपदी’ में उम्मीद ही नहीं जगाते, कुछ सवाल भी उठाते हैं।

पुरुष सत्तात्मक समाज ने अकसर द्रौपदी को कटघरे में खड़ा किया है, लेकिन कवि मृत्युंजय कुमार सिंह ने नैतिक साहस दिखाते हुए द्रौपदी के चरित्र को पुनर्विस्तार देने का साहस दिखाया है।आज किसी स्त्री का नाम द्रौपदी नहीं रखा जाता।किताब की भूमिका में कवि इस बात का जिक्र करते हुए बताता है कि आज भी घरों में महाभारत नहीं रखा जाता।

पितृसत्ता ने हमेशा द्रौपदी को लेकर एक गलत नरैटिव तैयार किया है।कथाकार-कवि मृत्युंजय कुमार सिंह कहते हैं- ‘नारी सुलभ शिक्षाओं में/दिखता न था उसे कोई हल/उसके हृदय के स्वप्न का/विस्तार था थोड़ा विरल।’ इस पुस्तक में दुनिया की आधी आबादी की व्यथा का वर्णन करती  द्रौपदी कहती है, ‘कौन हूँ मैं, कौन मेरा/वो जो मुझको छल गए हैं/छोड़कर मुझको अकेले/स्वर्ग को जो चलते गए हैं?’ मृत्युंजय कुमार सिंह समाज से सवाल करते हैं कि क्या पुरुष स्त्री की नियति का आधार है? स्त्री की अपनी भी पहचान है? क्या स्त्री पत्नी, मां, बहन, बेटी बनकर परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति में अपने दायित्वों का निर्वहन किसी पुरुष से कम करती है? वह अपने दायित्वों का पालन करने के बावजूद हाशिए पर क्यों है? उसे हर घटना के लिए दोषी क्यों माना जाता है? ऐसे कई प्रश्नों के साथ कवि की द्रौपदी अपना पक्ष रखते हुए कहती है- ‘युद्ध का कारण मुझे जो/मानते हैं वो गुणी/पहले परख लें भावना/जो वासना से थी सनी’।

द्रौपदी का ऐसा कहना आज के समाज पर करारा व्यंग्य है जो स्त्रियों  के साथ हो रहे शोषण, दुष्कर्म, यौन हिंसा आदि के लिए स्त्रियों को ही जिम्मेदार मानता है।युधिष्ठिर ने भरी सभा में द्रौपदी को एक वस्तु की तरह दांव पर लगा दिया था।

आज भी समाज में ऐसे कई लोग हैं जो बलात्कारी को दोषी न मानकर जिसके साथ बलात्कार की घटना घटी है उसके कपड़ों को दोषी मानते हैं।यह काव्य सामंती मानसिकता वाले ऐसे लोगों की सोच पर जोरदार प्रहार है।मृत्युंजय कुमार सिंह ने द्रौपदी के मिथक को अपनी पूरी कलात्मक और बौद्धिक क्षमता से व्यक्त किया है।

कवि मृत्युंजय कुमार सिंह ने खांडव वन-प्रसंग के जरिए पर्यावरण संरक्षण की बात की है।वे धर्म के नाम पर बढ़ रही सांप्रदायिकता, नृशंसता और क्रूरता का विरोध करते हैं।धर्मगुरुओं की पोल खोलते हुए वे कहते हैं, ‘धर्म के नाम पर जो धर्म का रूप है देखा मैंने/सच कहती हूँ, नहीं सुना/होता पहले इस जग में’ यह खंडकाव्य सैकड़ों वर्षों से निंदित द्रौपदी के मन की कथा का आख्यान है।इसमें द्रौपदी विवेकपरक और लोकतांत्रिक ढंग से प्रतिरोध की आवाज उठाती है।

जिज्ञासाआपने एक मिथकीय चरित्र को केंद्र में रखकर खंडकाव्य लिखा है।आज के युग में मिथकीय चरित्र कितना प्रासंगिक है?

मृत्युंजय कुमार सिंह– मिथक अपने आप में एक ऐसी संभावना है जो कालावतरण कर जाती है।हमें समझना होगा कि मिथक में अनंत संभावनाएं छुपी होती हैं और युग के अनुरूप मिथकों के अर्थ बदलते रहते हैं।मिथक कोई काल्पनिक, अतिवायवीय तथ्य नहीं है, बल्कि धूसर अतीत में घटित की छाया है, जिसमें हमारे वर्तमान की संभावनाएं भी झांकती हैं।

वैदिक वांङ्मय से लेकर सभ्यताओं के सभी काल में और सभी कालों के साहित्य में मिथक अतीत और वर्तमान के बीच सेतु सिद्ध हुए हैं।होमर, शेली, वर्ड्सवर्थ, या फिर जयशंकर प्रसाद, निराला, दिनकर, धर्मवीर भारती, सुब्रह्मण्य भारती, नरेश मेहता, दुष्यंत कुमार इत्यादि को देखें।मिथकों के बिना साहित्य अपनी सामाजिक विरासत से ही बिछड़ जाएगा।हम कह सकते हैं कि महाभारत जैसी कृति कभी कालातीत नहीं होगी।वैसे भी महाभारत को ‘चरित्रों का महाकाव्य’ कहा गया है।इसके चरित्र कभी चुकेंगे नहीं।

जिज्ञासाहमारे समाज में द्रौपदी को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता।आपकी द्रौपदी किन अर्थों में महाभारतकालीन द्रौपदी से भिन्न है?

मृत्युंजय कुमार सिंह– यह मानसिकता समाज में बहुत बाद में पनपी, जिसमें द्रौपदी को सामाजिक दृष्टि से हेय श्रेणी में रखने की कोशिश की गई।हमारे प्राचीन शास्त्रों एवं विद्वत परंपरा में द्रौपदी को पंचकन्या में से एक माना गया है।यानी सीता, अनुसूया आदि के समकक्ष रखा गया है।द्रौपदी का चरित्र महाभारत में स्त्री संघर्ष और उसके सशक्तिकरण को प्रतिष्ठित करने वाला सबसे सशक्त चरित्र है –  यह तो निःसंदेह है।मैंने प्रयास किया है कि स्त्री के मन की पीड़ा, उसके दंश को, उसके मन में उठने वाले विविध भावों की परतों को इस तरह व्यक्त करूं कि उनका संबंध एक मिथक से आगे बढ़कर खुद आज की स्त्री के व्यक्तित्व को स्थापित कर सके ।

असल में द्रौपदी जैसे चरित्र को हमें विभिन्न अभिवृत्तिओं वाले चरित्र के रूप में ग्रहण करना चाहिए, तभी हम उसकी सर्वकालिकता का आधुनिक संदर्भ में उपयोग कर सकते हैं।मैंने ऐसा करने की चेष्टा की है।

जिज्ञासाक्या आपको नहीं लगता कि पुरुषसत्तात्मक समाज में द्रौपदी का पांच पांडवों से विवाह करना सामंती व्यवस्था में स्त्री की दीन अवस्था को दर्शाता है? क्या आपकी द्रौपदीउससे मुक्त हो पाई है?

मृत्युंजय कुमार सिंह– यह निर्णय पाठक को लेने दीजिए कि मेरी द्रौपदी पुरुष सत्ता के बंधनों से मुक्त हो पाई है कि नहीं।आप मान कर चलिए कि जिस दिन मैंने स्वयं इस रचना की संभावना और अर्थवत्ता निर्धारित करनी शुरू कर दी, उसी दिन से इसके अनंत पाठ की संभावना भंग हो जाएगी और एक बंधे बंधाए सांचे में स्टीरियोटाइप व्याख्याएं सामने आने लगेंगी।

जिज्ञासाआधुनिक विमर्शों के दौर में यह खंड काव्य स्त्री विमर्श की किन परतों को खोलता है?

मृत्युंजय कुमार सिंह– जहां तक आधुनिक विमर्शों की बात है, स्पष्ट कह देना पड़ता है कि द्रौपदी लिखते वक्त मेरी नजर सिर्फ राजकन्या द्रौपदी पर नहीं थी, बल्कि मेरी नजर उसके ब्याज से नारियों के उस समूह पर थी, जिसे कुलीन समाज में यथोचित सम्मान नहीं मिला।हिडिंबा और निषादिन का जिक्र इन्हीं संदर्भों में आया है।उनकी संततियों की पांडवों के रक्षार्थ बलि ली गई।आप समझ सकेंगे कि यहां सिर्फ कुलीन कुलवधू द्रौपदी की पीड़ा का अंकन नहीं है, उसका विस्तार उपेक्षितों में भी उपेक्षित जनजातीय स्त्रियों की पीड़ा तक है।

जिज्ञासाक्या आज एक स्त्री इतनी सक्षम हो पाई है कि पुरुषों को आईना दिखा सके?

मृत्युंजय कुमार सिंह– जाहिर है कि द्रौपदी के चरित्र का मूल आधार ही पितृसत्ता के प्रतिरोध का  है।द्रौपदी के चरित्र की धुरी यही है।लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि भारतीय समाज की धर्म के प्रति आस्था और पितृसत्तात्मकता के मिश्रण से तैयार जो एक सामान्य स्टीरियोटाइप है, वह द्रौपदी जैसे चरित्र को अलौकिकताओं में उलझाकर उसकी वैचारिक अंतर्धाराओं की क्षति करता है।ऐसे में मैंने द्रौपदी का वह पक्ष सामने रखने की कोशिश की है जो निहायत तार्किकता से अपने आप को व्यक्त करता है और स्त्री अस्मिता से जुड़े ऐसे व्यावहारिक प्रश्न सामने लाता है, जिनसे अकसर पुरुष-सत्ता पलायन करती रही है।

‘अब मैं इंसानों की श्रेणी से इतर
इंसानों को ही आशीषें बांटता त्रिशंकु हूँ
…और अब भी मैं
समाज की बजाई हुई ताली में
एक चीख मात्र हूँ’।

अन्तस की खुरचनयुवा कवि यतीश कुमार का पहला काव्य संग्रह है।इस संग्रह में अलग-अलग मिजाज की ९६ कविताएं हैं, जो दो खंडों- ‘देशराग और आसपास’ और ‘साझा-धागा’ शीषर्क में विभक्त हैं।कवि का मन जीवन की विभिन्न जटिल दशाओं से होकर गुजरता है।उसकी कविता में एक लाइफ लाइन है जो जीवन की असंख्य छवियों के साथ एक निरंतर यात्रा पर है। ‘अन्तस की खुरचन’ को पढ़कर एक बार भी नहीं लगा कि यह कवि का पहला संग्रह है।कविता की बुनावट में समाज, स्थानीयता, देश, राजनीति, किन्नर, वेश्या, नदी, सड़क, स्त्री, प्रेम, मां-पिता, बेटी आदि का रेशा-रेशा मौजूद है।

आज शहरीकरण, औद्योगिक और तकनीकी विकास आदि जिस तेजी के साथ मनुष्य की पहचान मिटा रहे हैं, वह अकल्पनीय है।कवि को कविता पर भरोसा है, जहां वह अपनी कविताओं के भीतर मनुष्यता को बचा लेना चाहता है।

यतीश कुमार की कविताओं में खासकर नदी को लेकर गहरी चिंता है।एक पर्यावरणविद की तरह वे नदी को जीवन और भविष्य की थाती मानते हैं।विकास और शहरीकरण के नाम पर नदियों का सूखना एक घटना मात्र नहीं है, बल्कि शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी है।नदियों का सिकुड़ना मनुष्यता का विलोप है।अवैध बालू निकालने और खनन के साथ नदियां विलुप्त होती जा रही हैं। ‘शहर का नदी होना’ कविता में कवि की पीड़ा देखी जा सकती है- ‘सारी नदियां गुम होती जा रही हैं/मंदिर और मस्जिद में/और बढ़ रहे हैं कंक्रीट के इबादतगाह’।कवि के लिए नदी जीवन है, स्मृति है, थकान के बीच ऊर्जा है। ‘किऊल : मेरी कविताओं की धौंकनी’ में कवि बड़ी साफगोई से यह स्वीकार करता है कि उसके बनने में नदी की शीतलता और आर्द्रता ही है।वह कहता है-

मेरी लेखनी में प्रवाह जब भी थोड़ासा धूमिल होता है, मैं चुपके से चला जाता हूँ उसी अपनी बचपन की किऊल नदी के पास।कई बार वह मेरी कविता में अनजाने बिना दस्तक दिए चली आती है दबे पांव।मेरी धौंकनी बनती है और फिर उसकी सांसें अन्तस में बही चली जाती हैं।

फिर भी कवि स्वयं को न भौगोलिक सीमाओं में बांधता है और न वर्ग-वर्ण में।उसकी कविताओं में समाज के वंचित-उपेक्षित समुदाय के लोगों के लिए पर्याप्त संवेदनात्मक लगाव है।वह किन्नरों को पूर्ण मनुष्य की श्रेणी में रखने का हिमायती है।वह एक चीख की तरह उनके साथ खड़ा है- ‘अब मैं इंसानों की श्रेणी से इतर/इंसानों को ही आशीषें बांटता त्रिशंकु हूँ/…और अब भी मैं/समाज की बजाई हुई ताली में/एक चीख मात्र हूँ’।

कवि यतीश कुमार का मन संपन्नता से ज्यादा  वंचित-अभावग्रस्त लोगों के जीवन की ओर जाता है।इसलिए वे गरीबी, वस्त्रहीन, कुपोषित समाज की पीड़ा को दर्ज करने से नहीं चूकते।अपनी कविता ‘शहर के पुल’ में वे कहते हैं- ‘इधर-उधर से झांकते हैं/डरे-डरे से कुछ लोग/धूसर ढूह की ओट से/लेटे हैं कुछ थके शरीर/फटे आंचल से झांकता है/सूखे स्तन में मुंह मारता बच्चा’।

स्त्री जीवन का सच यतीश कुमार की कविता के केंद्र में है।हालांकि आधी आबादी का एक दर्द यह है कि वह अपने फैसले खुद नहीं ले पाती।वह अपने गर्भ में पल रही शिशु कन्या तक को जन्म नहीं दे सकती।कवि ‘भूल’ शीर्षक कविता में दिखाता है, ‘दो के बाद मेरा आना/छाया का परछाई बन जाना/लड़के की चाह में, प्रेम की डाह में/समय से पहले आने की आहट में/न जाने और कितने बहाने…./और अब कचरे के डब्बे में/ठहर-ठहर कर सांस ले रही हूँ।’ जीवन के यथार्थ का ऐसा मार्मिक अवलोकन बहुत कम देखने को मिलता है।

कवि को गांव और अपनी जड़ों का ख्याल है,  ‘इन दृश्यों के बीच/खोजता फिरता हूँ/मकई के भुये-सा मुलायम समय/और हाथ में सिर्फ पुआल रह जाता है।’ इतनी भीगी हुई करुणा और संवेदना उस कवि की ही हो सकती है जिसका मन गांव से जुड़ा हो, जिसकी कविता में पुआल, किसान, खेत, अनाज, गमछे आदि का वृत्तांत हो।कवि शहर और गांव के बीच एक पुल की तरह है।

कवि प्रेम को सिर्फ महसूस ही नहीं करता, बल्कि जीता भी है।यह प्रेम कई रूपों में पाठकों के समक्ष आता है।वह पिता के प्रेम के रूप में भी आता है, ‘और जब तुम हँसती हो तो/पिता का सीना समंदर हो जाता है/बनती हुई तस्वीर/मुक्कमल हो जाती है’।खुद पिता होकर कवि अपने पिता को हर वक्त महसूस करता है।

यतीश कुमार अपनी कविता में कृत्रिमता की जगह कोमलता, संकीर्णता की जगह विस्तार और संवेदनहीनता की जगह सहृदयता का संस्कार रोपने की कोशिश करते हैं।

जिज्ञासाआप नदियों को लेकर इतने मुखर क्यों हैं?

यतीश कुमार : हमारी सभ्यता और संस्कृति की कल्पना नदियों के बिना नहीं की जा सकती।मेरे लिए नदी शक्ति का प्रतीक, जिजीविषा का स्मारक है।नदी मेरी स्मृति में बहता एक तीर्थ धाम है।वह कभी अवरुद्ध हो जाती है, कभी राह भटक जाती है, कभी अपवर्ज्यों से इतना भर जाती है कि बोझिल हो जाती है, लेकिन सतत प्रवाहित होती रहती है।स्वयं को खोजते हुए बार-बार नदी की ओर लौटता हूँ, और जितनी बार लौटता हूँ थोड़ी-सी नदी अपने लिए बचाकर ले आता हूँ।नदी मेरी सर्जना की लौ है।यही वजह है कि किऊल नदी को मैंने अपनी कविताओं की धौंकनी कहा है।

मुझे लगता है व्यक्ति को अपने यथार्थ, अपनी स्मृति, और स्वयं से मिलने के लिए नदी के पास जाना चाहिए।आज का सच यही है- ‘लोग उसे पागल नदी कहते हैं/जबकि सचाई यह है/कि नदी पागलों से त्रस्त है।’

जिज्ञासा आज के रचनाकारों को अपने सृजन पर व्यवस्था का कितना दबाव झेलना पड़ता है?

यतीश कुमार : सृजन एक शाश्वत सच है- मेघ का बनना, बीज का प्रस्फुटित होना और शिशु का जीवन पटल पर आना।दबाव का स्त्रोत चाहे व्यवस्था हो या कुछ और, एक सर्जक के लिए यह एक संश्लिष्ट मामला है।व्यवस्था से लड़कर उसे पार करके ही अर्थवत्ता का रस चखा जा सकता है।हालांकि रचनाकारों की कई दुविधाओं में एक यह है कि इन दोनों के बीच संतुलन कहां से लाए।कविता मुख्यतः संवेदनाओं की उपज है।हमें ध्वंस को दबाकर सृजन करना है और मनुष्यता को बचाए रखते हुए एक श्रेष्ठतर दुनिया की तरफ बढ़ना है।मैं ध्वंस और सृजन के बीच संतुलन की बात करता हूँ, जहां सबसे ज्यादा दबाव अपनी संवेदना को बचाए रखने का है।

जिज्ञासाक्या आपको नहीं लगता कि इन दिनों रंगों की परिभाषा बदल गई है।रंगों के क्या मायने हैं?

 यतीश कुमार : प्रकृति ने जो रंग दिए, बेहद खूबसूरत दिए।हमने रंगों को परिभाषित करने के चक्कर में उनके मायने बदल दिए। ‘रंग-वार्ता’ कविता दरअसल इसी को उजागर करने का प्रयास है।रंग प्रतीकवाद इस समय कला, धर्म, संस्कृति, राजनीति हर जगह प्रवेश करने लगा है।हिंदुत्व का रंग भगवा, इस्लाम का रंग हरा,  दलितों के संघर्ष का रंग नीला है तो वामपंथ और समाजवाद का रंग लाल।हम वही देखते हैं जो हमारे अर्ध-चैतन्य में रोपित होता है।समाज में रंगों के मायने सिर्फ उन आंखों के लिए बचे हैं जो इनके नैसर्गिक रूप को देखने में सक्षम हैं।रचनाकार और कलाकार रंगों के सही मायने समझने की पात्रता रखते हैं।

जिज्ञासाक्या आपको लगता है कि शहरों के बसने से गांव उजड़ रहे हैं?

यतीश कुमार : सिर्फ शहर बसने से नहीं, बल्कि अनुपयुक्त विकास से भी गांव की प्राकृतिकता नष्ट हो रही है।गांव विलय और वजूद के दोहरे संघर्ष में हैं।गांव एक तहज़ीब है गंगा-जमुना की मित्रता की, सामंजस्य की, संतुलन की।गांव प्रकृति का स्पर्श कर सब कुछ को प्रेम में बदल देता है।

जिज्ञासाआज कल कविता को विभाजित करके देखा जा रहा है।बतौर कवि आपको यह कहां तक सही लगता है?

यतीश कुमार : मेरा मत साफ है कि साहित्य में विभाजन की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।मैं इस शब्द के ही खिलाफ़ हूँ जिसे आदिवासी या दलित साहित्य और आजकल थर्ड जेंडर साहित्य कहा जाता है।साहित्य की एक ही कसौटी है, वह है पाठक।किसी भी तरह का विभाजन साहित्य की शक्ति को क्षीण करेगा।

जिज्ञासाआपके लिए प्रेम के क्या मायने हैं?

यतीश कुमार : इसे उस आभास की तरह समझता हूँ जो एक मोमबत्ती के बुझ जाने के बाद रह गए प्रकाश-सा होता है।यह अहसास आपको मनुष्य बनाए रखने में जड़ी-बूटी सा काम करता है।यह प्रेम सीमाओं से परे है।

समीक्षित कविता संग्रह :

(१) पार्वती, शेखर जोशी, नवारुण प्रकाशन, नोएडा, संस्करण-२०२२
(२) उपशीर्षक, कुमार अंबुज, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण-२०२२
(३) द्रौपदी, मृत्युंजय कुमार सिंह,  वाणी प्रकाशन, संस्करण-२०२२
(४) अन्तस की खुरचन, यतीश कुमार, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण-२०२१