
वरिष्ठ आदिवासी लेखक। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं। कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद। कुछ फिल्मों में अभिनय। मातृभाषा कुंड़ुख की सेवा और इसमें लेखन।

पहिया
ये जो उधार के शब्द लिए हैं
एक दिन लौटाना होगा
इसी जंगल से चला था क्योंकि
पहिया आपसी सहयोग का
तुम्हारे महल में पहुंचकर रथ हो गया
विज्ञान तकनीक का पाकर सहारा
टैंक हो गया
फिर हमने देखा पहिया
मोटरगाड़ी रेल हवाईजहाज बन गया
पुरखों ने सोचा नहीं था
पहिए का उपयोग ऐसे होगा
वे तो कुछ अनाज या शिकार ढोते
कर गए थे गलती से पहिए का आविष्कार
पहिया लेकिन सभ्यता, विकास
व्यापार या मुनाफे का
सत्ता-श्रेष्ठता का बन जाएगा प्रतीक
यह पुरखों ने सोचा न था
युद्ध को ज्यादा घातक और मारक बनाएगा
पहिया मनुष्य के जीवन को
इतना वीभत्स और खतरनाक बनाएगा
निहत्थों के लिए आतंक बनेगा
पहिया- बुलेट बम मिसाइल बरसाएगा
यह पुरखों ने सोचा नहीं था
इस आधुनिक नई दुनिया में
पहिया ने शांति का प्रेम का गीत
कब गाया था
लोगों को अब यह याद नहीं!
हमारी प्रार्थना
किसी विद्वान ने कहा
ज्यादातर लोग करते नहीं प्रार्थना
परंतु मांगते हैं ईश्वर से भीख
वे कहते हैं- यही है प्रार्थना
जानकर थोड़ा अच्छा नहीं लगा
किंतु बुजुर्गों से अपने
जब सुने अनुभव उनके
थोड़ा आश्चर्य हुआ, कुछ खुशी हुई
जब जाना, वे अपने से ज्यादा मांगते हैं-
धरती के लिए, पेड़ पौधों, पशु-पक्षियों के लिए
नदी के लिए, झील झरनों के लिए
वे चाहते हैं जरूरत भर पानी
न कम, न ज्यादा
प्यास बुझती रहे सबकी
नदी
नदी बनी रहे
जंगल उपवन नहीं
जंगल जैसा घनी, ऐसा ही हरा-भरा रहे!
हर मौसम में
पत्तों, फूलों, फलों से भरपूर
उन्होंने सबके लिए मांगा
और उन सबकी जिंदगी रही सुरक्षित
बीहड़ जंगलों में, दुर्गम्य पहाड़ों में
प्रार्थऩा का अर्थ निरक्षर पुरखों ने
हमें यही समझाया।
बात न करना
तुम बात न करना
तब तक मुझसे
जब तक मैं इस धरती पर
हरियाली के बीज बो न लूं
बुजुर्गों ने यही बताया
हर उजड़ी धरती पर कुछ हरापन बोना है!
किंतु तुम्हारे विकास के बुलडोजर
बेवजह चले हैं यहां
काम यह कर लेने दो
कुछ हरियाली बो लेने दो
तब सुनूंगा बात तुम्हारी
धरती का जख्म थोड़ा कम कर लेने दो
रोने का सुख
कई बार देखी है, सुनी है
जंगल में कुछ टूटने की आवाज
जैसे कहीं एक डाली बड़ी
टूटकर पेड़ से हुई हो अलग
जैसे नई बियाही बेटी घर छोड़ने से पहले रोई हो
हम तो घर अपना छोड़ चुके दशकों पहले
अब रो रहे जीवन भर
इस रोने को न कोई जानता, न पहचानता
और न सुनने के लिए रखता तनिक दया भाव
अकेले कविता की पंक्तियों के संग
रोने के दुख का, सुख कुछ और है!
संपर्क : हरमू हाई कोर्ट के पीछे, बाई पास रोड, कार्तिक उरांव चौक के पश्चिम, डाकघरः डोरंडा, रांची, झारखंड -834002 मो. 7250212369
