वरिष्ठ कवि।पांच कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित।

धूल और तानाशाह

जो हवाएं धूल उड़ाती हैं
वह उन हवाओं से घबरा जाता है

जो धूल रोकने में असमर्थ हैं
उसे उन खिड़कियों पर भरोसा नहीं

जिस धूल को
पेड़ अपने पत्तों पर जगह देते हैं
उसे वे पेड़ सुंदर नहीं लगते

पता नहीं धूल से क्या वैर है उसका
जो आईने पर जरा-सी दिख जाए
तो सहन नहीं होता

एकांत में
जब कभी वह सोचने लगता है
धूल और हवाएं उसके वश में क्यों नहीं हैं
तब वह उदास हो जाता है
उसे लगता है कि वह ताकतवर नहीं
एक छिपा डरपोक है।

ठूंठ

समय ने जिन्हें उखाड़ा
हम उन पेड़ों के ठूंठ हैं

हम रात को सपनों में
परिंदों को चिट्ठियां लिखते हैं
और दिन में
उनके आने का इंतजार करते हैं।

समय असमय कुछ पंक्तियां

1
मिट्टी के देवता
कितने भी पूजे जाएं
पर वे डरते है बारिश से।

2
यह कैसा समय है
फूलों का कोई उल्लेख नहीं
और पत्थर चर्चा में है।

3
मेरा दुर्भाग्य यह नहीं
कि मुझे वह सबकुछ नहीं मिला
जो मुझे चाहिए था
मेरा दुर्भाग्य यह है
मैंने हमेशा अपना लोहा
आग से बचाए रखा।

4
रोटी
प्यार
तथा आक्सीजन
नहीं चाहिए कुछ और
ईश्वर भी नहीं।

5
दुख है कि उम्र भर
पढ़ता रहा प्रेम कविताएं
पर कभी प्रेम अनुभव नहीं किया
प्रेम के लिए
मैंने सिर्फ इंतजार किया
कभी पहल नहीं की।

6
आवाजों के शोर में
कोई मुझे बुलाए मेरी मातृभाषा में
तो मेरी खुशी को जैसे लग जाए पंख।
ओ मेरी मातृभाषा!
जिसे हो तुम्हें बोलने में शर्म
वह भूल जाए घर का रास्ता।

7
पहले हम तय करते थे
चीजों की जगह
अब चीजें तय करती हैं
हमारी जगह।

8
संत भी सरकारी
पूजा भी सरकारी
खुशहाली भी सरकारी
चर्चा भी सरकारी
क्या इसे ही
इतिहास में कहा जाएगा
अमृत काल।

एक उदास कविता

बिखर गया जुलूस
मशालें बुझ गईं दिलों के ही भीतर

हर किसी के माथे पर
दिख रही है पराजित सपनों की राख
आदर्शों की किताब फड़फड़ा रही है अंधेरे में

किसी के पास
अब न बचा है हौसला न उम्मीद
नए चांद का उगना भी
अब नहीं सोच पा रहे हैं लोग
हरियाली सहम गई है
और फूलों पर कुदृष्टि है धूल की

प्यार में
एक-दूसरे के लिए बचा है छद्म
भाषा में छल है विचारों में कुटिलता
चारों ओर मौन चीत्कार है
हवाओं में लेकिन बज रही है चापलूसी की धुन
मंचात्माएं तड़प रही हैं
उन्हें सुनाई नहीं दे रही तालियां
घरों में दुबके लोग मांग रहे हैं खुद से
सांसों का हिसाब

आईनों में चेहरे साफ नहीं दिखते
मलिनता उजले कपड़ों के नीचे
ले रही है सांसें
एक-दूसरे के लिए
न बचा है समय न सरोकार
मैत्री
टूटे कांच के टुकड़े जैसे चुभते हैं
कुशलता पूछना
सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है

जमीर लापता है
हर कहीं बैठे हुए हैं
ठग और चोर
जो कभी धूप बेचते हैं कभी छाया

बिखर गया जुलूस
और बुझी हुई मशालों का धुआं
समय की हथेली पर
कर गया काला हस्ताक्षर

यह देख
माचिस की छोटी-छोटी तीलियां
सब एकसाथ चिल्लाए
क्या हमारी लौ इतनी कमजोर है

तिनकों ने भी सुना
और वे पूछने लगे
अरे! यह क्या हुआ
क्या ऐसे ही होता है अंत सपनों का!

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