
वरिष्ठ लेखक और कथाकार।चार कथा संग्रह प्रकाशित।

आज रविवार है।
रविवार को दस के पहले बिछावन नहीं छोड़ते प्रभाकर जी। आधे-आधे घंटे पर दो बार चाय! फिर नाश्ता! सब बेड पर! रविवार का नाश्ता जरा स्पेशल होता है। बाकी दिन कॉलेज जाने की हड़बड़ी रहती है। जो मिला गले के नीचे उतार लिया। आज के दिन इत्मीनान रहता है। आराम से टीवी देखते हुए अखबार पढ़ते हुए और ह्वाट्सऐप-फेसबुक ब्राउज करते हुए धीरे-धीरे चटखारे लेते हुए सारा काम करते हैं।
मोबाइल में समय देखा.. पौने नौ! दो चाय हो चुकी थी। तीसरी का नाश्ते के साथ इंतजार था। अब तक तो आ जानी थी। राधिका भी न…! आजकल लापरवाह होने लगी है। समय का ध्यान नहीं रखती! आवाज देना चाहते थे कि झूमा हड़बड़ाती-सी रूम में आई। हाथ में चाय-नाश्ते की ट्रे लिए।
‘मेमसाब का तबीयत ठीक नेई सर। जॉर (बुखार) हुआ, माथा में दरद!’
उन्होंने तुनक कर झूमा को निहारा, जैसे कोई बेतुकी बात कह दी हो। फिर ठठा कर हंस पड़े- ‘तबीयत खराब है.. हंह! स्त्रियों की तबियत भी कभी खराब होती है!! तू भी स्त्री है न? बता, तो तेरी तबीयत कभी खराब हुई? कभी बुखार आया?’
झूमा इतने सारे औचक सवालों से किंचित घबरा गई। पहले तो उसे समझ में ही नहीं आया कि ऐसे सवाल पूछने के पीछे मकसद क्या है सर का। महिला होने से ही तबीयत खराब नहीं हो, ऐसा तो कोई बात नेईं। खूब सावधानी रखने के बाद भी उसको अक्सर जॉर, खांसी, सर्दी होते रहता है। इस सवाल का क्या उत्तर दे भला!
एक पल को सोचती हुई फिक्क से हँसी- ‘हमलोग मजदूर मानुष सर। मजदूर मानुष चाहे पुरुष हो या महिला.. उसको कभी बुखार नेई आता। आता भी है तो जॉर को हम धक्का देके दूर भगा देता।’ हालांकि झुमकी ने यह व्यंग्य में कहा, पर होंठों पर उसका स्वयं का निर्मम सच विद्यमान था।
‘वो बात नहीं रे! सच ये है कि स्त्रियां कभी बीमार नहीं पड़तीं। सब दिखावा और चोंचले होते हैं…!’
प्रभाकर जी हिंदी के विभागाध्यक्ष के साथ वरिष्ठ लेखक भी थे। वे अपनी रचनाओं में नारी सम्मान तथा स्वनिर्भरता के मुद्दों पर प्रखरता के साथ लिखते। कॉलेज में उनके समर्थकों का एक गुट था। गुट के स्वघोषित नायक थे वे। रविवार के दिन मित्रों को लंच पर बुला लिया करते। खासा मजमा जमता। नारी विमर्श की रचनाओं पर बहसें होतीं। राधिका मेहमानों की आवाभगत में किचेन की उमस और धांस के बीच फंसी नई-नई रेसिपी बनाने की कवायद में एक पांव पर नाचती रहती। सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती।
ट्रे मेज पर रखकर झूमा लौटने को हुई तो प्रभाकर जी फनफनाए- ‘सुन, मेमसाब से बोलना आज कोई मेहमान नहीं आ रहा। हम भी बाहर जा रहे, छह बजे लौटेंगे। देखना… सुनकर सारा बुखार उतर जाएगा!’
झूमा ने सिर हिलाया और रूम से बाहर आ गई। सर इतना बड़ा ‘मास्टर मोशाय’ (शिक्षक)! समझ नहीं रहा कि घर का काम काज से कोई भी स्त्री नहीं घबराता। ये भी कोई बात है! मेहमान नहीं आने की बात सुनकर बुखार उतर जाएगा! किचन में आई तो देखा मेमसाब का चेहरा बुखार से लाल भभूका था। थोड़ी देर में चाय लेकर तेज कदमों से शिशिर के रूम की ओर बढ़ी।
‘दादा बाबू, मेमसाब को बुखार आया। एक बार किचन में जाके देखो, पूरा गा (देह) ठो भट्ठी का माफिक तप रहा..!’ उसकी आवाज लरज रही थी। शिशिर लैपटॉप पर गेम खेल रहा था। झूमा की किंकियाहट से ध्यान फिसला तो गलत बटन पर अंगुली फिसल गई। सारा मजा ध्वस्त हो गया। विफरी नजरों से झूमा की आंखों में झांका- ‘बुखार हुआ? मम्मी को? तू भी न… क्या-क्या तो बोलते रहती है।’
‘सच बोल रहा दादा बाबू…!’
‘हाहाहा, मम्मी लोग भी कभी बीमार पड़ती हैं क्या!’ झूमा की बात को फाख्ता की तरह उड़ाता शिशिर हँस पड़ा – ‘मम्मी के झांसे में आ गई न!’ अक्सर छुट्टी के दिन शिशिर शाम को दोस्तों को घर बुला लेता। मम्मी चाव से बेटे के दोस्तों की खातिर तरह-तरह के आइटम बनाती। क्या मजाल कि चेहरे पर जरा भी शिकन आ जाए। वापस जा रही झूमा को रोककर शिशिर हिनहिनाया- ‘मेरे दोस्तों से चिढ़ है उन्हें। बोल दे आज कोई नहीं आएगा। मैं भी बाहर जा रहा, छह बजे लौटूंगा!’
झूमा का मन उदास हो गया। कोई भी उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा। वह किचन में आकर अपने बर्तन–पोछा आदि के काम में लग गई। प्रभाकरजी और शिशिर थोड़ी देर में तैयार होकर बाहर चले गए।
राधिका की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी। रुक–रुककर तीन उल्टियां हुईं! तेज ज्वर के दबाब से आंखें मुंदी जा रही थीं! सर और बदन में भयानक दर्द फुफकार रहा था। नीम बेहोशी की तंद्रा!
‘मेमसाब, तबीयत जास्ती खराब हो रहा। सर को फोन करके बुला लो। डॉक्टर के पास जाना होगा।’ झूमा का स्वर कातर था। राधिका के होंठों पर सूखी हँसी उभरी। हँसी में किंचित भय घुला था। उसने मना कर दिया- ‘उन्हें बुलाने की जरूरत नहीं है री। जरूरी प्रोग्राम में गए होंगे। पेरामेट ले लिया है न, ठीक हो जाऊंगी।’
लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होती गई। राधिका निढाल-सी बेड पर पड़ गई। पलकें बेहोशी में पूरी तरह बंद। झूमा समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। मन बेचैन हो रहा था। इस घर का काम खत्म हो चुका था और उसे दो अन्य घरों में काम के लिए जाना था। यहां कोई पुरुष नहीं है। मेमसाब अकेली हैं। इस हालत में उन्हें छोड़कर कैसे जाए! मेमसाब ने सुबह से कुछ खाया भी नेईं। सुबह चाय-बिस्किट दी थी, पर बोमी (उल्टी) में सब बाहर आ गया!
झूमा बेड के पास आई। ज्वर के ताप से चेहरा मुरझाए गुलाब-सा बेनूर था! झूमा ने हथेली से राधिका का माथा सहलाया। मुंह पर पानी के छीटें मारे। शीतल छीटों के स्पर्श से पलकें आधी खुलीं। तली मछली की सी निस्पंद आंखें झूमा पर टिक गईं।
‘अरे, तू गई नहीं अभी तक?’ धीमी बड़बड़ाहट मानो गहरे कुंए से आ रही हो आवाज!
‘ऐसे कैसे चली जाऊं? बैंक मोड़ के पास एक डॉक्टर बाबू बैठते हैं…’ झूमा ने मन ही मन निर्णय लेते हुए कहा- ‘आपको वहां ले चलती हूँ।’
राधिका को कुछ भी सुनने का होश कहां था! झूमा उन्हें कंधे का सहारा देते हुए बाहर लाई। दरवाजे पर ताला लगाया और धीरे-धीरे चल कर ऑटो में बैठ गई। बैंक मोड़ के पास डॉक्टर चक्रवर्ती का चैंबर था। ‘अरे ज्जा.. फीस-दवा आदि का खर्चा लगेगा। पैसे?’ एक पल को झूमा का बदन भय से कांप उठा।
तभी जेहन में चिलका कि आज ही सुबह शर्मिला मेमसाब से महीना (तनख्वा) मिला था। पंद्रह सौ टाका! रुपए आंचल के छोर में बंधे थे और छोर की गांठ कंधे से दूसरी ओर उतरकर बंगाली स्टाइल में कमर में गहरे खुंसी थी। खजाने को सुरक्षित रखने का यही तरीका था झूमा का। मन आश्वस्त हो गया।
डॉक्टर को दिखाते दवा खरीदते बारह बज गए। घर लौट कर मेमसाब को चाय बिस्कुट दिया। फिर आधे घंटे के अंतराल पर दो तरह की दवा। दवा के घोल से राधिका गहरी नींद में उतर गई।
कुछ देर बाद झूमा बुझे कदमों से किचेन में आई, अपने लिए दो रोटी सेंकी और चाय के साथ निगलकर वापस राधिका के पास आ बैठी। मन में द्वंद्व चल रहा था। दो घरों में काम का नागा हो गया आज। तिलोत्तमा आंटी भालो मानुष (अच्छी महिला) है। वह तो कुछ नेई बोलेगा पर लोलिता बौदी (भाभी) बहुत लड़ाकू है। दस ठो बात तो सुनाएगा ही, एक दिन का हाजिरी भी काट लेगा। हाजिरी यानी सौ टाका का लॉस! अनायास ही उसकी हँसी फूट गई।
दो बजे झूमा डॉक्टर के कहे अनुसार राधिका के लिए दलिया बना कर लाई। तंद्रा अभी भी तारी थी। पोर-पोर में कमजोरी ठुंस गई थी। अपने हाथों से उसने दलिया खिलाई। फिर दवा दी। दवा के असर से राधिका फिर से गहरी नींद में चली गई।
चार बजे राधिका की नींद खुली। मानो कई युगों की कुंभकर्णी निद्रा से जगी हो! मन हल्का लग रहा था। बुखार भी उतर गया था, पर चेहरे पर कमजोरी छाई थी। झूमा को पास बैठे देखकर चौंकी- ‘अरे… तू अभी भी यहीं है?’
‘आपको ऐसा हाल में छोड़ के कैसे जाता मेमसाब?’ झूमा फिक्क से हँस पड़ी।
‘ऐसी हालत माने…?’
यानी कि मेमसाब को कुछ भी याद नईं! झूमा ने उन्हें सारे घटना क्रम की सिलसिलेवार जानकारी दी। बेहोशी की अर्धतंद्रा… बैंक मोड़ तक की यात्रा… डॉक्टरी चेकअप… दवा…दलिया का पथ्य..आदि! राधिका भौचक थी… इतना भारी धर्मयुद्ध हो गया और उसे कुछ भी पता नहीं चला!
दवा कब-कब लेनी है बता कर झूमा अपने घर के लिए विदा हुई। दवा फीस ऑटो आदि के खर्च के बारे में राधिका को पूछने का होश नहीं आया। झूमा ने बताया भी नहीं। राधिका को लगा कि जाते हुए झूमा उसके पास एक अनाम-सी प्यारी खुशबू छोड़ गई है।
शाम के छह बजे! ड्राइंग रूम में घुसते ही प्रभाकरजी ने ऊंची आवाज में हुंकारा दिया-‘अरे कहां हो? सारे दिन नींद से ही फुरसत नहीं मिलती मैडम को! बहुत थक गया। जल्दी से चाय लाओ.. साथ में बेसन के चिल्ले भी!’
‘अभी लाई…!’ दस मिनट ही बीते होंगे। राधिका चाय-चिल्ले लेकर बोतल वाले जिन्न की तरह प्रभाकर जी के सामने हाजिर! कक्ष में आने के पहले पीले मुरझाए चेहरे पर लोशन का हल्का लेप लगा लिया। कमजोरी से लड़खड़ाते कदमों में दांत पर दांत जमा कर मजबूती भरी! पूरी देहयष्टि पर छद्म मुस्कान का गुलाबी नकाब डाला। प्रभाकर जी की तितली-सी बिंदास नजरों ने एक पल को राधिका के बदन का मुआयना किया। बदन पर पड़े गुलाबी नकाब ने तितली को रोमांच से भर दिया। मन ही मन बड़बड़ाये – ‘स्त्रियां भी कहीं बीमार पड़ती हैं? ये झूमा भी न..! बेसिरपैर का इधर का उधर करती रहती है कमबख्त!’
संपर्क सूत्र : प्रिंस रेडीमेड, केडिया मार्किट, जी टी रोड, मोहन फेमिली स्टोर के पास, आसनसोल – 713301 (पश्चिम बंगाल) मो.9832194614

