युवा कवयित्री। केरल में कार्यरत। काव्य संग्रह : इंजीकरी

अय्यप्पा पणिक्कर

साहित्य अकादमी और सरस्वती सम्मान से सम्मानित अय्यप्पा पणिक्कर केरल के एक महत्वपूर्ण कवि हैं।उन्हें मलयालम कविता में आधुनिकता का अग्रदूत माना जाता है।उनकी कृति कुरुक्षेत्रमने मलयालम कविता में क्रांतिकारी परिवर्तन किया 

1-समाचार

मौत की ख़बरों से भरी अखबारें
भाषणों की संख्या
और लंबाई बढ़ती जा रही है
कान बेकार हो गए हैं
और आंखें अंधी
अनंत कठिनाइयां हैं
मुझे अपने कान, आंख
और दिमाग कब वापस मिलेंगे
बताओ मेरे दोस्त
क्या तुम सर्वज्ञ नहीं हो?

2-लेखन

क्या तुम जानते हो
तुमने कैसे लिखी मेरी कविता?
क्या तुम जानते हो
तुमने क्यों लिखा?
क्या तुम जानते हो
हर अच्छी कृति
दूसरे के द्वारा लिखी जाती है?
हम स्वयं को नहीं जानते
दूसरे संभवतः हमें जान सकते हैं
कविता जानने का माध्यम है
यह जाने हुए की अभिव्यक्ति नहीं है
वह जो सोचता है कि वह जानता है
कुछ नहीं लिखता
अगर कुछ जानना है
तो कुछ लिखा जाएगा
इसलिए हर पंक्ति लिखते समय
याद रखो
यह कविता स्वयं से अन्य है
दूसरा स्वयं है- वह लिख रहा है
हमारे भीतर का लेखक अन्य है
इसलिए तुम मेरी कविता लिखते हो
और मैं तुम्हारी!

3-उत्सव

एक जंगल है
दूर, बहुत दूर
क्या हम वहां चलें?
हम एक झोपड़ी बना सकते हैं
वहां रह कर
खुद को समेट कर
ठंड और धूप एकसाथ साझा करेंगे
जंगल का हरा अपने शरीर पर रेंगते हुए देखो
टहनियों से नीचे रिसते पक्षियों के गीत सुनो
रेत में धँसे पांव में
बहती धारा धीरे-से गुदगुदाती है
हम वहां मस्ती के साथ जा सकते हैं
है न दोस्तो?
प्रगतिशील लोग इसका मजाक उड़ा सकते हैं
पलायनवाद का प्राचीन सिद्धांत समझकर
चिंता मत करो
हम उन्हें भी अपने साथ ले जा सकते हैं
वहां, घर पर हुड़दंग मचाने
ठीक है न?

4-कावालम

सड़क, पुल और कार के आने से पहले
नदी के दूसरे किनारे से
नाविक को जोर से पुकारना होता था
नाव… नाव!
थोड़ा बायां
दिन में वह आसानी से दिख जाती थी
रात में उसे जोर से पुकारना होता था
जैसे छोटे से दीये की वह अकेली हो बाती
नदी की लहरों पर लहराती लंबी लकीर की तरह
नाव उभर आती थी
अपनी ऊंघती आंखों को मलता
नाव को खेता हुआ
आ सकता था उरमी अप्पण
नाव खेने की वह आवाज आनंदित करती थी
‘क्या इसी तरह तुम मुझे उस पार ले जाओगे?’
तुम कह सकते हो-
वे दिन निकल गये दोस्त!
मैं कावालम जाना चाहता हूँ
उन सभी जगहों को देखना चाहता हूँ
लकड़ी के कुंदे से बना वह दरवाजा
वह आंगन, वह उतरती नदी, वह तुलसी चौरा
स्कूल का प्रांगण और वह नदी का किनारा
क्या मुझे (अब भी) वहां
यह सब देखने को मिल सकता है?
क्या मेरे अंतिम विश्राम स्थल को देखना भर
तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं होगा?
दोस्तो क्या मैं उस समय वहां रहूंगा?
तुम होगी और जरूर होगी
मेरा दृढ़ आग्रह और विश्वास है
पर
मैं नहीं आ सकूंगा, मैं आस-पास भी नहीं रहूंगा
और अगर हुआ भी तो भी नहीं आऊंगा
मैं तुम्हें नहीं देख सकूंगा
इसलिए आज मैं
तुम्हें जी भर कर देख लेना चाहता हूँ
तुम्हारी तस्वीर में
पार्श्व फलक में
तुम्हारा चेहरा कितना खूबसूरत है।

6-बाल छंद

देखो, मैंने नई कविता लिखी
इसे तुम्हारे सामने लेकर आया
बहुत पहले जब वह बच्चे को देखने आया था
वह बगल में शिशु शैया पर लेटा हुआ था
उसने लंबे समय तक अपनी मुस्कान दबाए रखी
फिर उसने मुस्कान को धीरे से खिलने दिया
मानो वह मेरी कविता हो
जैसे, मेरी यह कविता
मंद ही मुस्कराएगी तुम्हारे सामने आने पर
थोड़ी-सी लज्जा
थोड़ी-सी झिझक
बहुत-सी खुशी
फिर सब कुछ अचानक हुआ
कविता तेजी से बढ़ी
गाकर और नाच कर
स्वयं का आनंद उठाती
पृथ्वी और प्रकृति को गले से लगाती
दोस्तो, यह मेरे दिमाग में लंबे समय से थी
यह अभी पूरी हुई
इसकी उम्र हो गई
मैं?
मैं भी उसके नजदीक आया
ऐसा लग रहा था
मुझे किसी और की
या कुछ और की जरूरत नहीं है
जैसे हमारी कविता
हमें करीब लाएगी
अभिनंदन करेगी, आशीर्वाद देगी
जीवन की तरह ही
लो, यह अब आपकी कविता है
यह आपका भी बच्चा है।

संपर्क:​ अनामिका विला, एसएनआरए हाउस नं 31, कावू लेन, श्रीनगर, वल्लाकडावू, त्रिवेंद्रम-695008 केरल, मो.8075845170