‘इस बार तुम्हारे शहर में’, ‘अक्टूबर उस साल’ (कविता संग्रह) ‘होश पर मलाल है’ (गजल संग्रह)। ताशकंद स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज, उज्बेकिस्तान में विजिटिंग प्रोफेसर।

समरकंद

सदियों की धूप, बर्फ और
युद्धों के रक्तरंजित
इतिहास में
समरकंद का बयान व बखान
महत्वपूर्ण है
यहां मस्जिदों, मकबरों, महलों
और इमारतों के मेहराब
मानों कोई खुली हुई आंखें हैं
जो देखती रही हैं
कारवां की लंबी परछाइयां
रेशम के सपनों के धागे
और तलवारों की खूनी प्यास

समरकंद
केवल एक शहर नहीं
बल्कि सभ्यता का नक्शा है
मदरसों के गुंबद
जहां ज्ञान
धर्म और तर्क से संवाद करते रहे हैं
यहां की गलियां
हर दरवाजा किसी यात्री के सपने-सा है

‘रेगिस्तान’ की धूल में
आज भी यादें ऐसे चमकती हैं
जैसे सूखी आंखों में बची
आखिरी नमी
यह एक प्रतीक है
उस सांस्कृतिक मिलन का
जहां तुर्क तैमूरों की तलवार
फारसी के गीत
भारतीय ज्ञान और व्यापार के रंग
अरबी की पुकार के साथ
एक ही आकाश में गुंथ जाते हैं

और आज भी
तेरी रातों में जलते चिराग
सभ्यता की उस लौ के प्रतीक हैं
जो कभी बुझती नहीं
बल्कि हर सदी में
नई व्याख्या
नया रूप
नया जीवन पाती है।

बुखारा

बुखारा
जहां के मस्जिदें, मकबरे, मदरसे
अब भी खड़े हैं
समय की दीवारों पर जड़ी
किसी खामोशी की तरह

बुखारा
मानो सदियों की तस्बीह हो
हर कण में छुपा एक रहस्य
हर आहट में गूंजते
इतिहास के अभिलेख

गुंबदों के ऊपर लटकता चांद
जैसे कि कोई रहस्य बताने को आतुर
और यहां की ऊंची मीनारें
मानो आकाश की उंगलियां छूना चाहती हैं
मानो ये प्रार्थना की जमी लकीरें हों

यहां की कालीनों के धागों में
उज्बेक आत्मा की परतें बुनी हैं
बुखारा एक आईना है जिसमें
रेशमी कारवां की छवियां
अब भी झिलमिलाती हैं
किसी सूफी संत की आंखों की गहराई लिए

बुखारा
व्यापार, विद्वता, संस्कृति और धर्म का केंद्र
वह एक रहस्यमयी किताब है
जिसे जितना पढ़ो
उतना ही गहरा हो जाता है उसका अर्थ।

खिवा

खिवा
खानते की राजधानी रहा
रेशम मार्ग की व्यापारिक चौकी भी
‘इचन कला’ को अपनी खोह में समेटे
यह रेगिस्तान रेशम और मसालों के कारवां के
अब भी दिलचस्प किस्से सुनाता है
रेगिस्तान की तपती सांसों के बीच
खिवा की दीवारें
गोया मिट्टी से नहीं
सदियों की स्मृतियों से बनी हैं
ये रेत पर उकेरे किसी स्वप्न की तरह हैं
जहां इतिहास खुद
अपने पदचिह्नों को खोज रहा है

यह शहर याद दिलाता है
कि समय रेत की तरह फिसल जाता है

रेशम मार्ग

यहां से गुजरते, ठहरते
कारवां लाते ले जाते अपने साथ
चीन के रेशमी धागे
फारस की खुशबू
भारत के मसाले
यूनान की कथाएं
और अरब की सूफियाना रोशनी

इस मार्ग पर सिर्फ वस्तुएं नहीं थीं
इनपर चलती थी स्मृतियां
चलते थे मिथक और किवदंतियां
और हां
चलते थे बुद्ध के संदेश भी
मनुष्यों की आंखों में

सौदागरों की थकान ने
व्यापार के साथ संस्कृतियों को भी जोड़ा
इस तरह सभ्यताएं
संवादों से समृद्ध होती रही हैं।

संपर्क :विजिटिंग प्रोफेसर, ताशकंद स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज, ताशकंद, उज्बेकिस्तान