दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली की छात्रा।

 चारकोल

मैं रोज देखती हूँ तुम्हें
सिर्फ तुम्हें नहीं
तुम्हारे चेहरे पर छाई
झुर्रियों के सिलवटों में
दबे अतीत को भी
मुझे दिखता है
कि उस अतीत में जब-जब
तुमने सजाना चाहा कोई ख्वाब
तब-तब खिली दोपहरी के बीच
तुम्हारी आंखों के आगे
फैला दिया गया चारकोल
रात तो खैर रात ही थी।

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