युवा कवि और लेखक। बाल साहित्य पर सात किताबें प्रकाशित। संप्रति मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग में कार्यरत।

गजल
एक
कौन जाने कौन किसको खल रहा है आजकल
आदमी ही आदमी को छल रहा है आजकल
जुगनुओं की फौज काबिज हर बड़ी दुकान पर
गांव में सूरज समोसे तल रहा है आजकल
नींद जो टूटी तो सारे स्वप्न घायल हो गए
आंख के पानी में कुछ तो जल रहा है आजकल
सुन रही दीवार देखो मूक बहरों की व्यथा
ऐसा ही दौर ए सियासत चल रहा है आजकल
एक चिंगारी पड़ी क्या चैनो अमन के गांव में
दोस्ती का हर फसाना जल रहा है आजकल
देख नागाओं के जलवे मौज मस्ती फक्कड़ी
हर कोई तन पर भभूती मल रहा है आजकल।
दो
हम यहां कैसे खड़े हैं क्या बताएं आपको
पांव में छाले पड़े हैं क्या बताएं आपको
आजकल हम भी अहिंसा, सत्य के राही हुए
दांत ये जबसे झड़े हैं क्या बताएं आपको
ये नदी की धार भी कब तक नदी रह पाएगी
राह में नाले बड़े हैं क्या बताएं आपको
डांट का दुत्कार का कोई असर होता नहीं
लोग अब चिकने घड़े हैं क्या बताएं आपको
ख्वाहिशें भी बेहया सी झांकतीं हद से परे
खुद से ही कितना लड़े हैं क्या बताएं आपको
दिख रहे हैं एक जो मौकापरस्ती के लिए
इनमें भी कितने धड़े हैं क्या बताएं आपको
मैंने तो बस ये कहा था दाल में काला है कुछ
लोग क्यों पीछे पड़े हैं क्या बताएं आपको।
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