सुपरिचित कवि। अद्यतन कविता संग्रह ‘किस्सागो रो रहा है’।

अंत से पहले

एक दिन कुछ नहीं बचता
अस्थियां अलग हो जाती हैं राख से

उसी एक दिन से पहले
हैं बहुत से दिन

उसी बहुत दिन में
बहुत से मैं, बहुत से तुम।

बुलबुले के भीतर लौटता हूँ

गांव लौटता हूँ
तो गांव नहीं लौटता
घर लौटता हूँ
घर भी नहीं
घर के एक छोटे कोने तक लौटता हूँ
इच्छा थी कि पूरे इंद्रधनुष के भीतर लौटूं
मगर लौटता हूँ छोटे-से बुलबुले के भीतर।

रोटी ही मिल जाती

आसान लगता है जन्नत मिलना
रोटी मिलने से
कई बार
मंत्र पढ़ने से रोटी नहीं मिलती
जन्नत मिल जाती है
क्या बुरा था यदि रोटी ही मिलती

कुत्ते के पीछे दौड़ता एक नीमपागल
रोटी मांगता है
लोग सोचते हैं – किससे मांग रहा
शायद ईश्वर से?

सब घर चले जाते हैं
और प्रार्थना में लग जाते हैं
बाहर नीमपागल रोटी रोटी चिल्लाता रहता है।

 

 

स्त्री की आवाज

सबके लिए आवाजें थीं उसके पास
बेटी के लिए जो आवाज थी
वह उसने अभी तक मौजूद
मांओं की आवाजों से ढूंढा था

बेटे के लिए आवाज
पिताओं की आवाज के कोलाहल से चुना था

पति के लिए
आवाजें वह बार-बार ढूंढ़ती थी
पड़ोस से लेकर यूट्यूब तक फैले
आवाजों के समंदर में उगे द्वीपों पर जाकर
वह कहां-कहां नहीं गई इन आवाजों के लिए
वह दुर्गम समुद्र तक गई अपनी कमजोर नाव में
और विशाल रेगिस्तान तक ऊंट पर सवार

फिर भी वह कांपती रही हमेशा
कि कुछ छूट गया उससे
वह क्यों नहीं सुना गया
जो वह कहती रही लगातार?

द्वंद

फिर आपको लगता है
किसी को आपसे प्रेम नहीं
अचानक बढ़ जाता है छाती पर
हवाओं का दबाव
लगता है इस भीषण ठंड में
कोई खींच ले गया कंधे का कंबल
दांत किटकिटाने लगते हैं
किसी को पुकारने की इच्छा होती है
और इच्छा खत्म हो जाती है

तभी याद आती है कि
एक दिन होगी आपकी मृत्यु
व्यर्थ न जाए जीवन
और बदहवासी में आप
पुकारते जाते हैं लगातार
ताकते चारों ओर
कि वे ही सुन लें जो नहीं करते प्रेम
कोई तो सुन ले, सुन ले कोई भी
कि लगे आप जीवित हैं
लेकिन कोई नहीं सुनता
सब व्यस्त हैं शायद
अवसन्न आप सोचते हैं व्यर्थ गया जीवन

कि तभी
सोचते-सोचते आप खुश होते हैं कि
जिस क्षण मृत्यु होगी
उसी क्षण ले लेंगे आप संसार से विदा
किसी के माथे पर नहीं स्मृति का बोझ।

संपर्क:  दीवानी तकिया,कटहलवाड़ी, दरभंगा, बिहार-846004/ मो.7654890592