मराठी के वरिष्ठ कवि, अनुवादक और समीक्षक।कविता संग्रह ‘माझ इवलं हस्ताक्षर’
हिंदी अनुवाद –  सूर्यनारायण रणसुभे

शहर -एक

खत्म ही नहीं होता यह शहर
फैलता ही जा रहा है चारों दिशाओं में
महाकाय अजगर की तरह
कहते हैं कि इस शहर के एक छोर पर
कोई बच्चा अगर जन्मा हो
और निकला हो रेंगते- रेंगते
बाद में चलते-चलते
उसके बाद दौड़ते-दौड़ते
तो शहर के दूसरे छोर तक पहुंचते-पहुंचते
वह बिलकुल बूढ़ा हो जाएगा
संभवतः मर जाएगा
शहर के खत्म होते-होते
इसलिए शहर के दूसरे छोर पर
श्मशान का होना जरूरी होता होगा!

शहर-दो

हुमस-हुमस कर रोने की पद्धति ही नहीं रही अब
किसी की गोद में बिलगकर रोना-धोना
अब हो गया है आउट डेटेड
श्मशान भूमि पर किसी को पहुंचा कर
लौटते समय मिठाई लेकर घर आते हैं अब लोग
थोड़ी-सी खरोंच या जख्म भी हो तो
बड़े विश्वास से पूछा जाता था कभी
अब बाईपास सर्जरी भी हो जाती है
तो फोन पर से ले ली जाती है खबर
जख्म जब ताजे होते हैं
तब नहीं होती है भेंट अपने लोगों से
इतना अंतर तो आ रहा है दूध के रिश्तों में भी
इतिहास निर्माण करने की बातें
कभी हो चुकी है इतिहास में जमा
अब अनुशासित होकर जीने की लड़ाई
लड़नी पड़ रही है हर एक को
कोई किसी के जीने में दखल न दे
पूरी जिंदगी ही इन दिनों
प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हो गई है।

संजय चौधरी,फ्लैट नंबर – 4, राधा कस्तूरी अपार्टमेंट,
विघ्नहर्ता गार्डन के पीछे, गोविंदनगर, नाशिक – 422009, महाराष्ट्र मो.9370116665

डॉ.सूर्यनारायण रणसुभे, निकष, 19, अजिंक्य सिटी, अंबाजोगाई रोड, लातूर-413512
महाराष्ट्र मो. 8378080660