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| मर्सी मारग्रेट बोड़ा तेलुगु की चर्चित युवा कवयित्री, कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता। कविता संग्रह ‘माटला मदुगु’। |
दुष्यंत युवा लेखक, गीतकार-पटकथा लेखक। 10 पुस्तकें प्रकाशित। नवीनतम कहानी संग्रह, ‘किस्से कॉफियाना’। पिछले कुछ वर्षों से प्रमुख दैनिक अखबारों के लिए स्तंभ लेखन। |

बीड़ी का धुआं
मेरी मां एक कहानी की तलाश में रहती थी
ताजा रची गई
हरे भरे शब्द समूहों से सुसज्जित
वह सदा हरियाली की तलाश में रहती थी
जीवन के तानेबाने और अपनी ही होने में
जब वह गांव से शहर की ओर चली
जीवन के सफर में
एक नई-नवेली दुल्हन के रूप में
वह अपने भीतर
अपना गांव अपने साथ ले गई
गांव की बीड़ी की खुशबू के साथ
प्रत्येक कश के साथ
उसे ऐसा लगता
वह अपनी सांस में भर रही है
जीवन शक्ति
अपने पुरखों के घर और बचपन के सपनो
हालांकि, उसे कम ही समझ में आया
कि उसके भीतर का गांव
उससे अजनबी हो जाएगा
पहली बारिश की खुशबू
जो वह अपने साथ ले गई
उनके लिए एक पहेली बन जाएगी
प्रत्येक रात
जब वह प्रार्थना में घुटनों के बल बैठती
उसके विचार उसे
अपने गांव की ओर वापस ले जाते
जब वह अपनी आंखें बंद करती
और प्रार्थना शुरू करती
गांव उसकी आत्मा से निकलकर
उसके चारों ओर एक कोहरे की तरह छा जाता
और उस पल
मेरी मां एक आकाशगंगा-सी प्रतीत होती
एक जीवन की कहानी
रोशन करता हुआ सूरज
उसने कभी नहीं सीखी पढ़ने की कला
फिर भी वह समझ लेती थी
आस्था की कहानियां
उसके चुंबकीय खिंचाव ने
लावारिस शब्दों को आकर्षित किया
उन्हें कहानियों में पिरोते हुए
हर सुबह, जब वह नींद से जागती
नई जन्मी कहानियां उसके ध्यान के लिए रोतीं
रेंगते और रोते हुए उसकी गोद के लिए
लेकिन अब, उसकी नजर धुंधली पड़ गई है
मधुमेह ने चुरा ली है उसकी नजर
वह अब नहीं देख सकती
अपने भीतर का गांव
न ही रोशन कर सकती है
यादों का जादुई पेड़
अनकहे अप्रत्याशित रह जाते हैं उसके नजरिए
वह चाहती है
अपनी कहानियां और अपना गांव
वह तड़पती है अपनी प्रिय बीड़ी के लिए
पर उसने नहीं चाही, अपनी नजर
अपने सफर के आखिरी दिन
उसने मेरा हाथ थामकर आग्रह किया
‘मेरे सम्मान में रचो एक कविता
एक जो जगा दे, मेरा बचपन
मेरी मां की भुलाई हुई कहानियां
ऊंची उड़ान भरने के मेरे सपने’
मैं, एक बुझा हुआ दीया
शब्द खोजने के लिए जूझती हूँ
उसके हाथों की आखिरी ठंडी छुअन
मुझे छोड़ देती है
एक सुनसान, नम जमीन की तरह
मुझे बीड़ी के धुएं के लच्छों की तरह
घेर लेते हैं उसके सपने।
खुशी खुशी खून बहाने वाली
दीवारों पर
खिड़कियों की सलाखों से परे
पेड़ों की कतारों से ज्यादा लंबे रास्तों पर
मैं देखती हूँ महिलाओं को चलते हुए
उन्होंने अपने शरीर के चारों ओर लपेट लिया है
आसमान
वे पहनती हैं खून के बादल
अपने पेट के चारों ओर
हरे भरे खेतों के पार
लाल जमीन पर
वे कतारों में चलती दिखाई देती हैं
सफेद सारसों की तरह
उनके गर्भ से बहता हुआ खून
सूखी जमीन पर इंसानियत के बीज बोता है
उनके पैरों से खून टपकता है
उनके कूल्हों पर
वे खून से सने कदमों के निशान छोड़ती हैं
जैसे ही वे दूसरे विश्व की ओर बढ़ती हैं
देखो, उस कतार में
सीता, भगवान राम की पत्नी
यीशु की माँ मैरी
पैगंबर मुहम्मद की पत्नी
झांसी बाई, रुद्रमादेवी खड़ी हैं
और उनके पीछे
महिलाओं की एक सेना चलती है
सितारों के निशान की तरह चमकती हुई
देखो, उनके सामने-
उन्हें रोकने में नाकाबिल
मंदिर की दीवारें कांपती हैं
और ढह जाती हैं
‘खुशी से खून बहाने वाली’ के नारे
खुद उन्हीं में बदल गए हैं
नारे की तनी हुई मुट्ठी बन गई हैं वे खुद ही
आग की लाल लपटों की तरह बढ़ रही हैं
पर्याप्त चमकदार आकाशगंगा को
रोशन करने के लिए।
संपर्क : dr.dushyant@gmail.com


