शंभुनाथ

 

विश्व में जब व्यापार युद्ध चल रहा है, सूचना-टेक्नो क्षेत्र में नई क्रांतियां उपस्थित हैं। बिल गेट्स से लेकर एलेन मस्क तक के विकास ने हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अर्थात कृत्रिम मेधा तक पहुंचा दिया है। ऐसे संकेत हैं कि यह ध्वंस के लिए ड्रोन और मिसाइल से भी बड़ा युद्धास्त्र बन सकती है। यह मानव बुद्धि से बनकर मानव बुद्धि का ही ध्वंस करने का औजार बन सकती है, फिर भी एक उत्सव की तरह दिख सकती है!

राजा बदलते रहे हैं। अब डेटा ही राजा है और संपूर्ण मनुष्य जाति उसकी प्रजा। शताब्दियों से प्रयत्न चले हैं कि मनुष्य अधिक स्वतंत्र हो, वह प्रजा से नागरिक बने। इस उद्देश्य से ज्ञान का प्रसार होता रहा है, स्वतंत्रता पर बहस चलती रही है और आंदोलन हुए हैं। हालांकि प्रजा से नागरिक बनकर भी मनुष्य अब नागरिक से फिर प्रजा बनने की राह पर है।

कभी आशा की जा रही थी कि सूचना क्राति की वजह से सूचना का स्वतंत्र प्रवाह समाज में नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक उत्थान लाएगा। लोगों के हृदय एक-दूसरे के ज्यादा नजदीक आएंगे। इसके विपरीत, नई तकनीकी क्रांतियों ने नतीजे उलट दिए। इन क्रांतियों का सबसे ताजा और शक्तिशाली रूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। इसने सूचना को स्वतंत्रता के हथियार की जगह नियंत्रण के हथियार में बदल दिया। बहुत संभव है, सूचना अब तर्कशील मानव बुद्धि का औजार बनने की जगह मानव बुद्धि को नियंत्रित करने के औजार में बदलती जाए।

कृत्रिम मेधा निश्चय ही मनुष्य की बुद्धि द्वारा ही निर्मित है। मुख्य प्रश्न है कि यह किनके द्वारा किन उद्देश्यों से व्यवहार में लाई जा रही है। कृत्रिम मेधा को विकसित करने वाले नोबेल विजेता जियोफ्रे हिंटन ने लंबे समय तक गूगल में काम करने के बाद 2023 में इस्तीफा दे दिया था। वे कहते हैं, ‘कहना मुश्किल है कृत्रिम मेधा के बुरे आदमियों द्वारा बुरे उद्देश्य से उपयोग को रोकना कैसे संभव होगा।’ एक वैज्ञानिक की अंतरात्मा बची थी, वह पीछ हटा। लेकिन धनलोलुपता कमजोर अंतरात्मा वाले लोगों के विवेक का दरवाजा तोड़ देती है।

इधर युवाल नोआह हरारी ने अपनी नई किताब ‘नेक्सस’ में खोलकर लिखा है कि कृत्रिम मेधा किस तरह वैज्ञानिकों, बहुराष्ट्रीय उद्यमियों तथा राजनेताओं का एक सम्मिलित खेल है और यह हिटलर तथा स्टालिन की परंपरा में सर्वसत्तावाद के नए चेहरे दे सकती है।

कृत्रिम मेधा अपने आप में न अच्छी है और न बुरी, जैसे चाकू! लेकिन उसका दुरुपयोग दूसरे विश्वयुद्ध से भी बड़ा विनाश ला सकता है। जिस दौर में कृत्रिम मेधा को अ-हानिकारक बताकर उसके उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है, हिंटन की आशंका और हरारी की चेतावनी महत्वपूर्ण लगती है।

अब कृत्रिम मेधा बताती है कि हम कौन हैं

सौ-दो सौ साल पहले यूरोपीय उपनिवेशवादियों की पुस्तकें बताती थीं कि हम कौन हैं और हमें क्या करना है। ‘ओरियंटलिज्म’ (प्राच्यविद्या) भारत में उपनिवेशवाद का तर्क बनाते हुए इस देश को परिभाषित करता था। अब कृत्रिम मेधा को हमसे ज्यादा पता है कि हम कौन हैं और हमें क्या चाहिए। अंग्रेजों के समय हमारे पास अपने को जानने के लिए ‘ओरियंटलिज्म’ के अलावा अन्य स्रोत भी थे और हम आत्मपहचान के लिए लड़ सकते थे। 21वीं सदी में हम गूगल, सोशल मीडिया और कृत्रिम मेधा पर निर्भर होते जा रहे हैं। हमारी ‘पहचानें’ आत्मछल बन चुकी हैं। हम सूचनाओं के एक खौफनाक जाल में फंसे हैं और इसकी संभावना है कि हमें अब उपनिवेशवाद की एक नई किस्म से गुजरना पड़े।

ध्यान में रखने की जरूरत है कि टेक्नो-प्रभुओं के पास हमारे बारे में सारी सूचनाएं हैं कि हम क्या सोच रहे हैं, क्या पसंद-क्या नापसंद कर रहे हैं, हम क्या बेच और क्या खरीद रहे हैं तथा सोशल मीडिया पर क्या बोल रहे हैं, कौन से रील्स ज्यादा देख रहे हैं। हम जब इंटरनेट पर स्क्रॉल करते हैं और कहीं ठहरते हैं, कहीं मजा लेते या घृणा व्यक्त करते हैं, टेक्नो-प्रभुओं को पता हो जाता है। वे हमें धीरे-धीरे पूर्ण नियंत्रण में ले लेते हैं। हमारे जीवन का हर पत्ता उनकी मर्जी से डोलता है। हम डेटा-स्लेव होते हैं!

कृष्ण ने अर्जुन को विश्वरूप दिखाते हुए कहा था- सृष्टि का वर्तमान ही नहीं, अतीत और भविष्य भी मुझमें लय है। सभी कर्म मैं करता हूँ, तुम निमित्त मात्र हो अर्जुन! आज मनुष्य ज्यादा गहरे अर्थ में निमित्त मात्र है। वह असीम शक्तिशाली टेक्नोलॉजी के सामने अपना अंत:स्व, अपनी महत्ता खो दे रहा है। वह नई स्थितियों में वर्तमान को ही नहीं खो रहा है, अतीत और भविष्य की व्याख्या भी अब उसके हाथ के बाहर है। यह पर-अधीनता है, छद्म तौर पर स्वतंत्र होने के उल्लास में डूबी हुई!

अब टेक्नोलार्ड ज्यादा शक्तिशाली हैं

ग्रीस के यानिस वारोफकिस ने अपनी पुस्तक ‘टेक्नो फ्यूडलिज्म: व्हाट किल्ड कैपिटलिज्म’ में लिखा है कि किस तरह तकनीकी दुनिया में सामंतों का एक नया वर्ग विकसित हुआ है जो सर्वर, डेटा लाइन, ए.आई. आदि की सेवाएं देकर वैसे ही भाड़ा वसूलता है जिस तरह जमींदार वसूलता था। इस तरह टेक्नो-जमींदारों का एक नया युग आया है।

टेक्नोलॉर्ड से अभिप्राय है तथ्यों, छवियों और वस्तुओं को लेकर बने सूचना-जाल पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाली अमेजन, गूगल, ओपन एआई, एक्स, एक्सएआई जैसी संस्थाएं और इनके मालिक। ये प्राय: अमेरिकी व्यापारी हैं और दुनिया में सबसे अधिक आय वाले हैं। उन्होंने निश्चय ही हमारे जीवन को सहज बनाकर अपना आकर्षण बढ़ाया है, पर हमारे सोचने, कल्पना करने और जीने की स्वाधीनता छीन ली है। इस ओर ध्यान जाना चाहिए कि आज जिन ध्वंसावशेषों पर उत्सव के दृश्य हैं, उनमें हमारी मानवता और समाज के ऊंचे आदर्श भी पड़े हैं।

एक ग्रीक मिथकीय नायक है डायोनिसस। उसका नगर में आगमन उन्माद, उपद्रव और ध्वंस के साथ होता है। वह सुंदर दिखता है, पर सवारी बाघ की करता है! वह उनको नष्ट कर डालता है जो उसकी विचारधारा का विरोध करते हैं। वह सभी परंपराओं को तोड़-फोड़कर हर चीज को नशीली शराब और उत्सव में बदल देता है। देखा जाए तो कृत्रिम मेधा का आगमन ऐसे ही एक डायोनिसस के रूप में हुआ है।

क्या कृत्रिम मेधा मानव स्वतंत्रता पर आक्रमण है

ए.आई. में तथ्यों के भंडार हैं, पर न उसे ज्ञान का ब्रह्मांड समझना चाहिए और न ज्ञान का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत। फिर भी लोग उसका इस्तेमाल करने और उससे सूचनाएं ग्रहण करने के लिए बाध्य होते जा रहे हैं। वे अपनी इस गुलामी को स्वतंत्रता के रूप में देखते हैं। उन्हें प्रधानतः अपने हित से मतलब है। वे पुस्तकों से दूर हो चुके हैं।  मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद घटा है। उनकी सृजनात्मकता, कल्पनाशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि में ह्रास आया है। अब तक मनुष्य उससे बनता आ रहा था जो वह देखता, सुनता, पढ़ता और रचता था। अब वह हरदम एक मशीन के साथ है।

इसमें संदेह नहीं कि कृत्रिम मेधा का बढ़ता प्रमाण मनुष्य की ‘स्वाभाविक बुद्धि’ को धीरे-धीरे कमजोर कर देगा। यह एक भयावह प्राकृतिक विनाश होगा। मनुष्य की स्वाभाविक बुद्धि का विनाश प्रकृति की एक बड़ी संपदा का ही विनाश है, जिसकी ओर ध्यान जाना चाहिए। कृत्रिम मेधा मनुष्य द्वारा अपनी स्वतंत्रता के लिए सैकड़ों साल से किए जा रहे प्रयत्नों की भी घेरेबंदी है। ये चीजें चिंता में डालती हैं।

काफी पहले स्पष्ट हो चुका है कि कृत्रिम मेधा डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करने वाले नागरिकों पर अप्रत्यक्ष निगरानी का एक औजार है। डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करने वाले लोग बढ़ रहे हैं। 2025 में उनकी संख्या 5.56 अरब है, दुनिया की आबादी का 67.9 प्रतिशत। इसका अर्थ है, ए.आई. करोड़ों-करोड़ लोगों पर निरंतर निगरानी रख रहा है। उसके तथ्यों का इस्तेमाल सरकारें और बहुराष्ट्रीय कंपनियां दोनों कर रही हैं, ताकि वे अपनी विराट व्यावसायिक ताकत से लोगों के विचारों और रुचियों को नियंत्रित कर सकें।

ए.आई. से एक भय यह फैला है कि लाखों लोग बेरोजगार होंगे और नए रोजगार की मांग में कमी आएगी। इस भय पर लीपापोती की जाती है। लेकिन दुनिया ने देखा है कि अमेरिका और इंग्लैंड में, जहां विकसित ए.आई आ चुकी है, कर्मचारियों की भारी छंटनी हुई है। अकेले अमेरिका में ट्रंप-मस्क की जोड़ी ने हालिया 25,000 कर्मचारियों को छांटा है। सफेदपोश श्रमिकों के बीच हाहाकार मच गया है। अब खाते-पीते परिवारों पर भी विपत्तियों के पहाड़ टूटेंगे। यह विध्वंसक तूफान अन्य देशों से भी गुजरेगा।

21वीं सदी की अति-विकसित टेक्नोलॉजी के जमाने में स्पष्ट हो गया है कि श्रमिकों की महत्ता कितनी है। पिछले दिनों नारायणमूर्ति ने अचानक सप्ताह में 70 घंटे काम करने का प्रस्ताव रख दिया। इससे समझ में आता है कि दुनिया में तकनीक-महारथियों का वर्ग श्रमिकों से अपने संबंध पर किस दिशा में सोच सकता है।

देखा जा सकता है कि आज लोगों में सूचनाओं के प्रति खुलापन नहीं है। सभी को मनपसंद सूचनाएं चाहिए। सूचनाओं के प्रति खुलापन समाज के लोगों को परस्पर निकट लाता है, जबकि हालात भिन्न हैं। सूचना के संसार में बुद्धिपरक चीजों की जगह निर्बुद्धिपरक चीजें ज्यादा गतिशील हैं क्योंकि वे लुभावनी हैं, मायावी हैं। इनके बल पर मनुष्य को उसके सांस्कृतिक विकास और उच्च मानवीय भावनाओं से विच्छिन्न करके धर्म, नस्ल, जाति और प्रांतीय भावनाओं में उलझा देना आसान होता है।

विचित्र विरोधाभास है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जितना अधिक उन्नत होता जा रहा है, आम मानव मस्तिष्क उतना पिछड़ता और आदिम होता जा रहा है!

फिर भी यह सच्चाई है कि विश्व को विध्वंस और अशांति से मनुष्य ही बचाएगा और बहुत संभव है कि इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी सामना करना पड़े।

कृत्रिम मेधा शिक्षण संस्थानों को उजाड़ रही है

आने वाले दिनों में दुनिया के विश्वविद्यालयों को कृत्रिम मेधा से एक बड़ी चुनौती मिलने वाली है। अभी से कहा जा रहा है कि कई पाठ्यक्रम अप्रासंगिक हो गए हैं। अमेरिका ने हाल में कई विश्वविद्यालयों और अनुसंधानों को सहायता देना बंद कर दिया है। अब ऐसे पाठ्यक्रमों, अनुसंधानों और ज्ञान की जरूरत है जो किसी न किसी रूप में सत्ता-अर्जन में सहायक हो। आज सत्ता ही ज्ञान की धुरी है। प्राचीन काल में क्षमतावान और ॠषि-मुनि-ज्ञानी अलग-अलग थे। इन दिनों क्षमता की नली से सारी विद्याएं और कलाएं निकल रही हैं।

हमारे देश में दो मुश्किलें हैं। एक तो खुद शिक्षार्थियों की उच्च शिक्षा में दिलचस्पी खत्म हो रही है, क्योंकि परंपरागत रोजगार कम या समाप्त हो गए हैं। कालेज की सीटें भर नहीं पा रही हैं। दूसरे, चैटबोट की गुणवत्ता बढ़ते जाने से अब शिक्षक, क्लास, गाइड और कोचिंग सेंटर की जरूरत नहीं है। शिक्षक नाम की संस्था ही एक दिन समाप्त हो जाएगी, इसकी जगह ज्ञान के मैनेजर आ जाएंगे।

अब यह सवाल नहीं है कि आपके पास कौन-सी ऊंची डिग्री है। अब पूछा जाता है, आप क्या कर सकते हैं? फिर शिक्षण, निर्देशन, तथ्य संकलन, विश्लेषण, निष्कर्ष आदि के जो काम कृत्रिम मेधा कर देगी उसके लिए अलग आदमी की कया जरूरत है! हजारों शोधार्थी विपत्ति में पड़ेंगे। ऐसी भी आशंका है, आने वाले 20 सालों में मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा निम्न वर्ग का अंग होगा। शिक्षित कहे जाने वाले लोगों पर गाज गिरेगी, शिक्षा का महत्व घटेगा।

कई बार सूचनाओं का तूफान अंधा बनाता है

कृत्रिम मेधा नि:संदेह शिक्षार्थियों की तथ्यों, विचारों और नई खोजों तक पहुंच आसान बना देती है, पर वह भ्रांतिपूर्ण प्रचार की भी सबसे बड़ी जगह है। शिक्षार्थी उसका हिस्सा बन सकता है। इसके अलावा, अनुसंधानों की चोरी बढ़ सकती है, थीसिस लिखना आसान हो जाएगा!

कृत्रिम मेधा सबसे बढ़कर एक जासूस है। वह एक प्रबंधक भी है। वह एक सर्वनिपुण कलाकार, कवि और लेखक है। वह कहानी का प्लाट दे सकता है। वह महज मेधा नहीं एक अच्छा-खासा वर्कर है। ए.आई. से पेंटिंग बनवाई जा रही है, धुनें निकाली जा रही हैं। मनपसंद गायक के स्वर में गाना गवाया जा रहा है। यहां तक कि कलाकारों के डिजिटल क्लोन बनाकर अभिनय कराया जा रहा है। इसलिए कई तरफ से नियमन और फिल्टर की मांग भी उठ रही है।

आदमी से जब उसकी भाषा छीन ली जाती है, प्रतिभा का डुप्लीकेट या विकल्प तैयार हो जाता है और एकांत सृजन के आनंद की डकैती होती है, फिर क्या बचता है सांस्कृतिक दुनिया में!

इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिजिटल डिवाइड का एक नया रूप है। एक तरफ वे होंगे जिनकी ए.आई. तक पहुंच है और दूसरी तरफ वे होंगे जिनकी असमर्थ होने के कारण पहुंच नहीं है।

समझने की जरूरत है कि कृत्रिम मेधा का एक बड़ा हमला अंतरवैयक्तिक संबंधों, आलोचनात्मक सोच और भावनात्मक बुद्धि पर है। इन चीजों के ह्रास का अर्थ है सामाजिक अंत:क्षय। आज प्रचार हो रहा है कि ए.आई. को रोका नहीं जा सकता, यह अपरिहार्य है। क्या इसी तरह सामाजिक अंत:क्षय भी अपरिहार्य है?

धीरे-धीरे कुछ भी स्वतंत्रतापूर्वक सोचने और करने के लिए स्पेस सिकुड़ता जाएगा। कई बार सूचनाओं का बृहद प्रवाह दृष्टि का विस्तार करने की जगह अंधा बना देता है।

माया महा ठगिनी हम जानी

जब प्रिंटिंग प्रेस आया था, ज्ञान को हस्तलिखित पोथियों में बंद नहीं रखा जा सका था। ज्ञान का लोकतंत्रीकरण हुआ, वह अधिक लोगों तक पहुंचने लगा। सभी जातियों के लोग पढ़ने लगे। ज्ञान को तब केवल सत्ता के रूप में नहीं देखा जा रहा था। उसका एक काम स्वतंत्रता और संवेदना का प्रसार करना था। जब एक अत्यंत छोटे वर्ग के बाहर के लोग भी ज्ञान के निर्माता बनने लगे, सैकड़ों साल तक चुप लाखों लोगों ने स्वाधीनता का स्वाद चखा। ‘पावरलेस’ के पास ‘पावर’ आने लगा, स्वेच्छाचारिता का सिकुड़ना शुरू हुआ।

टेलीविजन आया। इसने पाठक को दर्शक बनाना शुरू कर दिया था। रामायण सीरियल (1987) ने सड़क-चौपाल कैसे खाली करा दिए थे, जरा याद कीजिए। सक्रिय पाठक धीरे-धीरे निष्क्रिय दर्शक में बदलने लगे। सिनेमा हाल बंद होने शुरू हुए, बड़े माल-मल्टीप्लेक्स बनने लगे। नेटफ्लिक्स आया। उपभोक्तावाद का तीव्र विस्फोट हुआ तो बड़े पैमाने पर बाजार लोगों की रुचियों और सोच को अधिक सघनता से नियंत्रित करने लगा। फिर मोबाइल छलांगें लगाने लगा और उसमें से अंततः जिन्न प्रकट हुआ!

अब वह दौर है जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ‘पावर’ और ‘पावरलेस’ के बीच दूरी बढ़ा दी है। जिसके पास जितनी ज्यादा सूचनाएं हैं और सूचनाओं के प्रसार की जितनी अधिक क्षमता है, वह उतना अधिक शक्तिशाली है। आज झूठ को भी क्षमता के बल पर सत्य के सिंहासन पर बैठाया जा सकता है। एक नया समय है, ए.आई. का प्रयोग युद्ध क्षेत्र में तबाही के लिए हो रहा है।

अब कदम-कदम पर चंबल है, डिजिटल डकैत हैं। मनुष्य आज से अधिक कभी इतना अधिक असुरक्षित न था। हर व्यक्ति मोबाइल पर स्पैम से डरा रहता है कि उसके बैंक उकाउंट से कोई पैसा न उड़ा ले। कोई धंधेबाज कहीं फंसा न दे। लेकिन कोई नहीं जान पाता कि एक बड़ी डकैती उसके मानसिक जगत में हो चुकी है- आत्मविवेक की डकैती। इससे डिजिटल मूर्खता बढ़ गई है।

हम वस्तुतः इससे अनजान हैं कि तरह-तरह से तृप्त किए जाते हुए भीतर से कितने रिक्त किए जा चुके होते हैं। हम कबीर का यह कथन भूल चुके होते हैं, ‘माया महा ठगिनी हम जानी’! कृत्रिम मेधा की माया बहुत शक्तिशाली है।

सूचना क्रांति एक विराट सूचना भ्रांति है

सूचना का अधिकार मिला था, तब एक नई स्वाधीनता का अनुभव हुआ था। सूचना-क्रांति के युग में सूचना का अधिकार ठंडे बस्ते में है। सूचना क्रांति अब सूचना भ्रांति है। सूचना भ्रांति के तीन रूप हैं- (1) गलत सूचना (मिसइन्फार्मेशन), (2) अज्ञानता बढ़ाने वाली झूठी या खंडित सूचना (डिसइन्फार्मेशन) तथा (3) बुरे उद्देश्य से प्रचारित सही ऐतिहासिक सूचना (मेलइन्फार्मेशन)।

गलत सूचना (मिसइन्फार्मेशन) का अर्थ है, किसी गलत या अधूरी सूचना को अनजाने में सही मान लेना और उसे ही सत्य बतलाना। कुछ इतिहासकारों ने दिल्ली के इतिहास को ही भारत के इतिहास के रूप में उपस्थित किया था। वेंडी डोनिगर ने ‘हिंदूज : एंड अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ में बताया कि प्राग्वैदिक काल में गेहूं उपलब्ध था जो तथ्य नहीं है। ऐसे कथन ‘मिसइन्फार्मेशन’ हैं और जानकारी के अभाव के नतीजे हैं। ये किसी कुटिल उद्देश्य से नहीं कहे गए होते। कई बार व्यक्ति को पूरे मामले की जानकारी नहीं होती, वह मिसइन्फार्मेशन के कारण अनजाने में कुछ गलत कह देता है।

युधिष्ठिर ने महाभारत में कहा था, ‘अश्वत्थामा मारा गया’! यह झूठी सूचना (डिसइन्फार्मेशन) का प्राचीन उदाहरण है। इसका लक्ष्य था द्रोणाचार्य के बेटे के मरने का झूठा प्रचार करना ताकि वे बेटे के शोक में हथियार दें और अर्जुन आसानी से उनका वध कर दे। यह गलती नहीं है, छल को गलती नहीं कहा जा सकता। युधिष्ठिर में अंतरात्मा बची थी। इसलिए कोई न सुन पाए इतने धीमे से कहा था, ‘नरो वा कुंजरो’, मनुष्य नहीं बल्कि हाथी!

इस समय बड़े-बड़े विज्ञापन, टीवी न्यूज चैनल और सोशल मीडिया के विभिन्न मंच ‘डिसइन्फार्मेशन’ के ऐसे औजार हैं, जिन्हें काफी आकर्षक बना दिया गया है। लोगों में सच जानने की भूख घट गई है। यही वजह है कि झूठी या अधूरी बातों का प्रचार करके जनमानस में अज्ञानता की बारूद भरना आसान हो गया है।

कई बार लोगों को गुमराह करने के लिए तथ्य के सिर्फ उन पहलुओं को उभारा जाता है जो किसी समूह विशेष का हित साध सकें। तथ्य के कई पहलुओं को दबा दिया जाता है। किसी महत्वपूर्ण खबर या तथ्य को दबा देना या मामूली जगह देना भी ‘डिसइन्फार्मेशन’ है।

डिसइन्फार्मेशन अज्ञानता निर्माण है जो अब एक बड़ा सूचना उद्योग बन चुका है। इसका प्रसार केवल मीडिया ही नहीं बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, राजनीति, व्यापार और आम नागरिक जीवन तक है। अमेरिका में एक किताब छपी है- ‘व्हाई लीडर्स लाइ’, जिसमें बताया गया है कि दूसरे विश्व युद्ध से ही झूठ बोलने की यह परंपरा है। आम लोगों के लिए ये असहायता की घड़ियां हैं जब ज्ञान के हल्ले के बीच सबसे अधिक संकट में ज्ञान है।

सूचना भ्रांति का एक तीसरा प्रकार है- कुद्देश्यपूर्ण तथ्यात्मक सूचना (मेलइन्फार्मेशन)। यह किसी को बेवजह नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से निजी या ऐतिहासिक तथ्य का दुरुपयोग है। यदि किसी के पास किसी अंतरंग यौनिक प्रसंग की पुरानी तस्वीरें हैं तो उनका बाद में ब्लैकमेल के उद्देश्य से इस्तेमाल करना कुद्देश्यपूर्ण तथ्यात्मक सूचना है। यदि कोई अतीत के किसी नस्लीय-धार्मिक दुष्कृत्य या भेदभाव को वर्तमान सामाजिक ‘भिन्नता’ के लिए औजार बनाता है तो यह ऐतिहासिक तथ्य का दुरुपयोग है। वे नि:संदेह तथ्य हैं, पर सैकड़ों साल बाद बदला लेने के लिए उनका इस्तेमाल वर्तमान से पलायन है। यह आधुनिक सामाजिक विकासों की उपेक्षा करके होता है, ताकि मेलइन्फार्मेशन के उपयोग से सामाजिक विद्वेष बढ़े।

ऐसी सूचनाएं न ज्ञान का प्रसार करती हैं और न संवेदना का, बल्कि आखिरी दो प्रोपगंडा बनकर हिंसा फैलाती हैं। कहा गया है, ‘सूचना ही शक्ति है’, जबकि आज कहा जाना चाहिए, ‘शक्ति ही सूचना है’। झूठ को सच बनाने के लिए गले के जोर की जरूरत पड़ती है।

लक्षित किया जा सकता है कि पहले सत्य इतना गायब न था। प्राचीन ॠषि-कवि माया और सत्य में फर्क करते थे, क्योंकि वे आज जैसे इंद्रियपरायण भोगी न थे। तुलसी ने लिखा था, ‘गो गोचर जहँ लगि मन जाई, सो सब माया जानहु भाई।’ ‘गो’ का अर्थ है इंद्रियां। उपर्युक्त कथन का आशय है, ऊपर-ऊपर से न देखो, अंतर्दृष्टि से देखो।

गांधी ने जिस तरह सत्य बोलकर राजनीति की थी, क्या हम दुबारा वे दिन देख सकते हैं?

सूचना अराजकता कैसे दूर होगी

यह ‘सूचना साम्राज्यवाद’ का ही नहीं, ‘सूचना अराजकता’ का युग भी है। इसे आज की विकसित टेक्नोलॉजी ने विस्तार दे दिया है। निश्चय ही सूचना में झूठ की मिलावट प्राचीन काल से है। लेकिन इन दिनों सूचना में सत्य खोजना कंकड़ में चावल ढूंढ़ने के समान है।

मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है। पिछले दो सौ सालों में शिक्षा का काफी प्रसार हुआ है। फिर भी समाज से नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक दरिद्रता नहीं जा पा रही है। मनुष्य को गुमराह करने वाली झूठी सूचनाओं को अपार सफलता मिल रही है और देश अशांत है।

आखिर इतिहास के गड़े मुर्दों को हथियारबंद करने तथा ‘डिसइन्फार्मेशन’ की जरूरत क्यों पड़ गई? यह प्रश्न अंतत: इस सवाल के करीब ले जाता है, पावर की इतनी ज्यादा भूख क्यों है? इन दिनों हर तरफ विध्वंस का उत्सव है। हर तरफ अशांति है एक जीवन विरोधी माहौल है।

संपाती को शक्ति का अभिमान हो गया था। वह सूर्य को छूने चला और झुलस गया। हनुमान से संबंधित बचपन की एक कथा है कि वे सूर्य को फल समझकर निगलने चले और धरती पर गिरे। वे एक बार शिवलिंग को पूंछ से उठा लेने की कोशिश कर रहे थे। ऐसी कई कथाएं संदेश देती हैं कि अपनी शक्ति को इतना न बढ़ा लो कि उसपर तुम्हारा नियंत्रण न रह जाए!

क्या आप बिना कल्पनाशीलता के सपने देख सकते हैं

मनुष्य के ज्ञान और संवेदनशीलता के साथ-साथ उसकी कल्पनाशीलता पर नियंत्रण मानवीय स्वाधीनता का ह्रास है। इन दिनों कृत्रिम मेधा यही कर रही है। दुनिया में चालाकियां बढ़ी हैं, विवेक विस्थापित हुआ है। जब कृत्रिम मेधा के उत्पादन, मार्गदर्शन और प्रत्युत्तर ही प्रमाण समझे जाने लगेंगे तथा मनुष्य का खुद सोचना और कल्पना करना कम होता जाएगा तो मनुष्य धीरे-धीरे महत्वहीन और नगण्य भी होता जाएगा। हमारा दूर तक गहराई से देखना प्रभावित होगा।

कृत्रिम मेधा कभी मनुष्य की तरह बड़े सपने नहीं देख सकता! यदि ए.आई. का सूचना-साम्राज्यवाद ही हमारे सपने निर्मित करेगा, दुनिया में सत्य के राज्य की जगह चालाकियों का राज्य विस्तार पाएगा।

कृत्रिम मेधा एक विराट चालाकी का नतीजा है। इसपर सावधान होना चाहिए कि विभिन्न किस्म की चालाकियां मनुष्य की संवेदना को संकुचित करती हैं। संकुचित संवेदना कल्पना को संकुचित करती है, निश्चय ही साहित्यिक कल्पना को भी।

क्या आप संकुचित कल्पना लेकर बड़े सपने देख सकते हैं?