दीपक दले

(1968) मिसिंग भाषा के महत्वपूर्ण लेखक हैं।असमिया में भी लिखते हैं।कविता, कहानी, जीवनी एवं शोधआलोचना की एक दर्जन पुस्तकें।

अनुवाद : कुल प्रसाद उपाध्याय

कवि, कथाकार और अनुवादक।तुलनात्मक साहित्य में विशेष रुचि।असमिया, नेपाली, बांग्ला आदि भाषाओं से अनुवाद कार्य।

मां, इस बार लिगाङ में

मां, इस बार लिगाङ में
नहीं हो सकेगा जा पाना
अपने प्यारे गांव के घर में
तुम न करना पूरे गांव को उदास
सेमल के पेड़ तले मेरे लिग्गद की याद में
आंसू तुम न गिराना मां
लिगाङ जितना आ रहा है पास
आ रही है उतनी तुम्हारी भी याद
घूमते हुए चारों ओर अपने खेत में
हाफलु के ऊंचे टङीघर में बैठकर गुमसुम
फागुन की हवा में दिल दुखाती
तलाशना मत मुझको
हर दिन याद करता हूँ मैं
तुम्हारा वह बासी भात
मां, इस बार लिगाङ में दिल मेरा रोता है
तुमसे दूर होकर
बढ़ती झुर्रियों वाले तुम्हारे वे गाल
कमजोर होती वे निराश उदासीन आंखें
वह गांव की पगडंडी
इन सबसे दूर होकर दिल मेरा रोता है
तुमसे दूर रहकर दिल मेरा रोता है
मां, मुझे न पाकर पास दिल न दुखाना
पुराङ आपिन और आपङ तुम खाना
स्वर्गीय पिता को दे लेना पिंड वाम-हस्त से
संतुष्ट हो उनकी भी आत्मा समस्त से
जानती हो न मां
असंतुष्ट आत्मा बनेगा कारण
फिर तुम्हारे ही कष्ट का
मां, आएंगे मेरे बाल-मित्र लिगाङ के अवसर पर
देखकर उन्हें फिर तुम आंसू न बहाना
कहना उनसे
तुम्हारे बचपन का दोस्त
मेरा चरवाहा बेटा
आज हो गया है शहरवासी
गांव से दूर होकर भी वह भूल नहीं सकता हमें
देखना गुमराग समान होते ही
वह दौड़ आएगा लिगाङ में
मां, मैं तो हमेशा ही तुम्हारे ही पास हूँ
और तुम्हारे साथ से मेरा हर दिन लिगाङ है…!

गांव छोड़ आने के बाद

लगता है जैसे
छूट गया है सबकुछ
गांव को छोड़कर
आने के बाद
नहीं करती है उदास
पेड़ों की यादें
पर वह नदी
बहुत याद आती है
नदी किनारे की हवा
मदमस्त होकर
आमंत्रण का अइ-निःतम
मेरे लिए गाती है-
किया था वादा लौट आने का मुझसे
फिर कहां तुम खो गए?
किसके मोहपाश में बताओ
इस कदर बंदी तुम हो गए।

दीपक दले : कारपुमपुली, गारमुर, एनसीसी एकेडमी के निकट, जोरहाट, असम 785007, मो. 9435490221

कुल प्रसाद उपाध्याय : सहायक निदेशक (राजभाषा), तेजपुर विश्वविद्यालय, नपाम, तेजपुर, असम-784028  मो. 9435490221