साझा संकलन प्रकाशित। संप्रति शिक्षक के पद पर कार्यरत।

 

दर्द के भीतर दर्द ही मिला

सबीर हका की
कविता शहतूत पढ़कर
दर्द से भर उठा

कक्षा 10वीं में पढ़ाते हुए
सभी छात्राओं से
पूछ बैठा अचानक ही-
शहतूत देखा है कभी
जिसे हमारे गांव मे तोंत कहते हैं

बहुत-सी लड़कियों में से
लजाते हुए एक ने
हाथ ऊपर किया

मैंने उससे पूछा कैसी होती है
वह बोली छोटी-छोटी
लाल होकर गहरी नीली
हो जाती है

कैसी नीली?

ठीक वैसे ही जब पापा
मम्मी को मारते हैं तो
उसके शरीर पर कई
जगह छोटे-छोटे
गहरे नीले रंग के दाग
पड़ जाते हैं
वे स्पष्ट दिखाई देते हैं
कई दिनों तक
शहतूत की तरह।

औरत और घर

औरत के रहने की
ठीक ठीक जगह घर है
तो क्या औरत सुरक्षित और
सुचिंतित है घर में

या आटे के साथ खुद को ही
गूंथती बेलती रही है या
उबाल मारते पानी में चाय की तरह
छोड़ी जा रही है
रंग और स्वाद के लिए
चीनी दूध पानी के साथ

पीसा जा रहा है मसाला
सील मानकर उसी पर
सबसे अच्छी जायकेदार सब्जी के लिए

गर्म तेल में पंचफोरन की तरह
छन छन की आवाज के साथ
भूरी होने तक वही भुनी जा रही है
उसकी सोंधी महक
बिखर रही है हवा में
घर में साफ-सफाई करने के बाद
थामकर बैठ गई है कोई अंधेरा कोना
झाड़ू होकर
फटकी बिनी छानी कूटी जा रही है
अनाज-सी

वही पड़ी है दरवाजों खिड़कियों पर
परदा सी तनकर हवा में घुली
धूल के कणों को रोककर घर में
शुद्ध हवा लाती हुई

दीमक खाई किताबों-सी
बंद पड़ी है अलमारी में

मकड़ी या उस छोटी
गहरे नीले रंग वाली चिड़िया की तरह
घर के किसी कोने में छुप छुपाकर
बना रखा है कोई जाला या घोंसला
औरत के ठीक ठीक रहने की
जगह घर है
यह कोई एक साधारण वाक्य नहीं है
जंजीर है स्त्री के लिए।

कविता

तो क्या कविता लिखना
इसलिए ठीक नहीं है
कि कविता लिखने से
कुछ नहीं होता जाता
कविता किसी के काम
नहीं आती

कविता के मत्थे कभी
कोई बदलाव नहीं आ सकता
वह किसी को रोटी-रोजगार
बिजली पानी सड़क
सुख-सुविधा
कुछ कुछ भी नहीं
दे सकती

उससे ज्यादा पैसे, सम्मान और मंच
तो एक रसिक गीतकार
एक चुटकुले सुनाने वाले हास्यकवि को
मिल जाता है

यह भी कि वह
अन्याय हिंसा अत्याचार
सांप्रदायिक दंगे या
किसी रूस, यूक्रेन युद्ध के खिलाफ
होती है

वह खड़ी है जंतर मंतर पर जारी
महिला पहलवानों के प्रदर्शन के साथ
किसी ब्रजभूषण के विपक्ष में

वह लड़ रही होती है
हर मोर्चे पर जनतंत्र के हक में

राम रावण के बीच लड़े गए
लंका युद्ध या महाभारत के
महासंग्राम या
कलिंग युद्ध में
अशोक के हृदय परिवर्तन की
ओर खींचना चाहती है
सबका ध्यान

वह किसान की आत्महत्या
स्त्री बच्चे मेहनतकशों की दुर्दशा पर
ढारती रहती है आंसू

वह चुप नहीं बैठती
लताड़ती है उन कवियों को भी
जो जनपक्ष को ताक पर रखकर
जुगाड़ से पा रहे हैं सम्मान और पुरस्कार
तो क्या कविता लिखना
इसलिए ठीक नहीं है।

राजा छलिया है

राजा के किसी आदेश के पालन में
पेड़ नही उगते
न ही फलते-फूलते हैं

राजा का कहना मानकर
नहीं बहती है नदी
जंगल घाटी खेत नगर गांव से
पहाड़ खड़ा रहता है सीधा अचल
नहीं झुकता नहीं हटता
राजा के आने जाने से

पंछी अनसुना कर राजा को
लांघते रहे हैं सरहदें
जंगल पतझड़ में झरा नहीं देता अपनी पत्तियां
न ही बसंत में
फूलना-फलना रुकता है राजा के डर से

बादल बरसते रहे हैं अपनी मर्जी से
हवा पानी धूप सबके रहते वे आए हैं
यहां तक कि अदनी सी चींटी ने भी
नहीं भजा कभी राजा को

राजा ने छल से सब पर
कर लिया है अपना अधिकार
पहचानो उसे
राजा सदियों पुराना छलिया है।

खेत

खेत कट चुका है
फसलें कटकर आ चुकी हैं घर पर
सब खुश हैं
किंतु इस समय उदास है
केवल और केवल खेत
अब तक खेत पर बनी हुई थी मालिक
रोपनी कटनी निदाई
गोड़ाई करते बनिहार स्त्री पुरुष
उनके बच्चे की बेरोक आवाजाही
खेत का मन गुलजार बना रहा था
चौबीसों घंटे

ठिठुरती पूस की रात हो
या अमावस का अंधियारा
कोई न कोई बना ही रहा साथ
बने रहे दाना चुगते
चिड़िया-चुडुंग चूहा नेवला सांप
बिच्छू गाय बैल सियार घोपडार
और अन्य

खेत मगन था खेत की मेड़ पर
बैठे चरवाहे की बांसुरी की तान पर
घसियारिन की चूड़ियों की रुन-झुन में
नहर से क्यारियों में छल- छल बहते
पानी के संगीत में

अब जब खेत कट चुका है
धीरे-धीरे लोग लौटने लगे हैं
मंदिर मस्जिद गिरिजाघर
गुरुद्वारा कीर्तन भजन अजान
प्रार्थना अरदास बाजार शादी ब्याह भोज में
खेत को बिसरा कर

जेठ का महीना लगेगा तब
कोई नहीं आएगा खेत की तरफ
खेत दिन रात तपेगा सूरज की तपिस में
सहेगा लू के थपेड़े
तब कोई नहीं होगा उसके पास
बोलने बतियाने सुनने सुनाने को

खेत अपने अकेलेपन से
अकेले ही लड़ेगा
जेठ के तपते दिनों में।

संपर्क :बाणगंगा रोड,नया बसस्टैंड, वार्ड नं. 16, बलपुरवा, जिलाशहडोल(मध्यप्रदेश) मो. 8889857854