(यहां मशीन पर गांधी के विचार प्रस्तुत हैं जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संदभ में भी देखे जा सकते हैं।)

 

मनुष्य सर्वोपरि है। मनुष्य के अंगों को शिथिल या दुर्बल बनाना मशीन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए।

यंग इंडिया : 13-11-1924

मेरा दृढ़ मत है कि जब मशीन युग की सारी देनें नष्ट हो जाएंगी, तब भी मनुष्य की कारीगरी बची रहेगी, जब हर प्रकार के शोषण के सारे अवसर खत्म हो जाएंगे, तब भी मनुष्य का सेवा भाव और ईमानदारी से काम करने की प्रवृत्ति बची रहेगी। मेरी यह सोच मुझे संबल देती है, तभी मैं अपना काम करता जा रहा हूँ। स्टीफेंसन और कोलंबस जैसे लोगों की यही आस्था उन्हें अडिग बनाए रख सकी। मुझे भी मेरी आस्था अडिग बनाए रखती है।

हरिजन, 29-8-1936

मेरा विश्वास मुझे काम में लगाए रखता है। इसके साथ ही मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मेरे सामने जो भी चुनौतियां आएंगी, उनकी नियति मिट जाना है। मशीन युग अगर मनुष्य को मशीन बनाने में लगा है, मेरा लक्ष्य है मशीन बन गए लोगों में पुनः उसके मानवीय स्वरूप को जाग्रत करना।

हरिजन, 29-8-1936

आदर्शत: मैं सभी मशीनों को अमान्य करता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे मैं शरीर को भी अस्वीकार करूंगा। शरीर मुक्ति में सहायक नहीं है। मैं आत्मा की पूर्ण मुक्ति की कामना करूंगा। इसी दृष्टिकोण से मैं सभी मशीनों को अस्वीकार करूंगा।

लेकिन मशीनें बनी रहेंगी। शरीर की तरह ही मशीनें अपरिहार्य हैं। स्वयं शरीर यंत्रों का सबसे शुद्ध रूप है। परंतु शरीर आत्मा को उच्चतम स्थिति में पहुंचाने में बाधक है- इसलिए अंततः शरीर को भी इंकार करना पड़ता है।

यंग इंडिया, 30-11-1924

मशीन की दुनिया सांप के एक बिल की तरह है। एक ऐसा बिल जिसमें सैकड़ों सांप रहते हैं। जहां-जहां मशीनें होती हैं, वहां-वहां बड़े शहर होते हैं। जहां-जहां बड़े शहर होते हैं वहां-वहां ट्राम, कार और रेलवे जैसे साधन होते हैं। यहां केवल बिजली की रोशनी दिखती है। ईमानदार डॉक्टर बताते हैं कि जहां-जहां कृत्रिम लोकोमोशन का चलन बढ़ा है, वहां के नागरिकों की सेहत बिगड़ी है। मुझे याद है यूरोप के शहर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। ट्राम-वे कंपनी की आमदनी कम हो गई थी। वकीलों और डाक्टरों की आमदनी गिर गई थी। नागरिकों की सेहत कमजोर हो गई थी। मशीनों के बारे में मुझे एक भी अच्छी बात याद नहीं।

हरिजन सभा, पेज 96

मशीनों के लिए पागलपन से मुझे एतराज है, एतराज मशीन से नहीं है। एतराज उस पागलपन से है जिसके दबाव में कुछ लोग श्रम बचाने और लागत कम करने की दलील देते हैं। श्रम बचाने का अर्थ है हजारों को बेरोजगार कर देना। उन्हें खुली सड़कों पर भूखे मरने के लिए छोड़ देना। मैं समय और श्रम बचाने का पक्षधर हूँ, मगर किसी छोटे समुदाय के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए। मानव श्रम को बचाना हमारा लक्ष्य हो सकता है, पर लोभ-प्रवृत्ति का विस्तार नहीं। मैं सदैव ऐसी मशीन का स्वागत करूंगा जो बिगड़े हुए तकुओं की मरम्मत कर सके, यह नहीं कि लोहार का तकुआ बनाना ही बंद हो जाए। लोहार का तकुआ बनाना पहले की तरह  जारी रहे। हां, जब कभी किसी बुनकर का तकुआ बिगड़ जाए तो तकुए की मरम्मत के लिए मशीन उपलब्ध अवश्य रहे सभी के लिए। लोभ की जगह अगर सद्भाव ले ले तो बाकी सब ठीक रहेगा।

यंग इंडिया, 13-11-1924

बहुतों के उपयोगी श्रम को बेवजह खारिज करके, बड़ी आबादी की कीमत पर मशीन केवल कुछ लोगों को समृद्ध बनाए, ऐसी मशीन के बारे में मैं कभी नहीं सोच सकता।

हरिजन, 22-6-1935

मशीनों की उपयोगिता तब है जब काम करने वाले लोग कम हों। जब काम करने वाले लोग अधिक हों तब मशीन अभिशाप है। भारत के मामले में ऐसा ही है। गांव में रहने वाले लोगों का समय कैसे बचाया जाए, हमारे लिए यह समस्या नहीं है। समस्या यह है कि उनके खाली समय का उपयोग कैसे किया जाए। ऐसा सोचना इसलि जरूरी है कि वे साल में छह महीने खाली होते हैं।

हरिजन, 16-11-1934

अक्सर यह पूछा जाता है कि लाखों लोगों की मेहनत क्यों न बचाई जाए? उन्हें मानसिक काम के लिए फुर्सत क्यों न दी जाए? फुरसत एक सीमा तक अच्छी होती है। भगवान ने आदमी को अपनी मेहनत की रोटी खाने के लिए बनाया है। मुझे डर है कि एक दिन हम अपनी जरूरत की हर चीज, यहां तक कि भोजन भी किसी जादूगर की टोपी से पाना चाहेंगे। एक फैक्ट्री सैकड़ों लोगों को नौकरी देती है और हजारों लोगों को बेरोजगार करती है। एक तेल मिल टनों तेल का उत्पादन कर सकती है और हजारों तेल मजदूरों को बेकार करती है। मैं इसे अहितकर एनर्जी कहता हूँ। इसके बनिस्बत लाखों हाथों से किया गया उत्पादन कंस्ट्रक्टिव और लोकहित में है। यहां तक कि मशीनों से बड़ी मात्रा में सरकारी उत्पादन भी उपयोगी नहीं है।

हरिजन,16-5-36

मशीनों के बारे में मेरी राय को गलत समझा गया है। मैं मशीनों के खिलाफ नहीं हूँ। मैं उन मशीनों के खिलाफ हूं जो आदमी को मेहनत करने से रोकती हैं और उसे निठल्ला बना देती हैं।

हरिजन, 15-6-1946

मैं मशीनों की सफलता की चकाचौंध का शिकार नहीं होता हूं।

मैं अहित करने वाली मशीनों के खिलाफ हूँ। उन मशीनों के खिलाफ नहीं हूँ जो घर का काम करने वाले लाखों लोगों का बोझ हल्का करती हैं। आसान औजार और साधन तथा ऐसी मशीनों का स्वागत करता हूँ जो ‘इंडिविजुअल’ की मेहनत बचाती है।

यंग इंडिया, 17-06-1926

मेरा मानना है कि मशीनों की प्रकृति अहितकारी है। ऐसे लाखों लोग जो किसी अन्य काम में नहीं लगे हुए हैं, और लाखों लोगों के हाथों से जो काम आसानी से हो सकता है, उस काम के लिए मशीन की जरूरत नहीं है। भारत के लोगों के लिए जो सात लाख गांवों में और उन्नीस सौ मील लंबे और पंद्रह सौ मील चौड़े भू-भाग पर रहते हैं, उनके लिए यही बेहतर और सुरक्षित होगा कि वे अपना कपड़ा स्वयं ही बनाएं जैसे कि अपना खाना खुद बनाते हैं। अगर ग्रामवासी अपने लिए जरूरी चीजों का उत्पादन अपने हाथ में नहीं रखेंगे तो गांवों की वह आजादी नहीं बची रहेगी जिसका आनंद वे अब तक लेते आए हैं।

यंग इंडिया, 2-7-1931

मैं यह स्पष्ट कर दूं कि दुनिया भर में जो संकट है, वह मास प्रोडक्शन के पागलपन की वजह से है। अगर मशीनों के उत्पादन आदमी की सभी जरूरतें पूरी कर दें तब भी उत्पाद को किसी स्थान विशेष पर जमा करना पड़ेगा। ऐसा होने से उसके वितरण की समस्या आएगी। उत्पाद की जरूरत जिस अंचल में हो, उत्पाद उसी अंचल में रहे तो वितरण की व्यवस्था समस्याजनक नहीं होगी, धोखाधड़ी नहीं होगी और कयास के लिए जगह नहीं होगी। मास प्रोडक्शन किया जा सकता है, मगर बाध्यतामूलक तरीके से नहीं। चरखे का संदेश ऐसा ही है। यह मास प्रोडक्शन है, लेकिन लोगों के अपने-अपने घरों में मास प्रोडक्शन। अगर आप एक-एक घर के उत्पाद को कई गुना बढ़ा लें और आपस में जोड़ लें तो क्या वह बड़ा मास प्रोडक्शन नहीं है?

आईबीआईडी, पृष्ठ 301,302

मैं यह नहीं चाहता कि संपत्तियां कुछ लोगों की मुठ्ठी में रहें। इसकी बनिस्बत ये सब लोगों के हाथों में हों। मशीनें आज लाखों लोगों की पीठ पर कुछ लोगों को सवार होने का अवसर देती हैं। इसकी वजह लालच है, मजदूरी बचाना मात्र नहीं। मैं अपनी पूरी ताकत से ऐसी व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहा हूँ।

यंग इंडिया, 13-11-192

मैं इसे पूरी तरह अनैतिक मानता हूँ कि मशीनों के साम्राज्य का विस्तार इसलिए किया जाए कि वह बड़ी आबादी के शोषण का तथा धन और शक्ति को कुछ लोगों के हाथों में पहुंचाने का रास्ता बनाती है। आज मशीनों का साम्राज्य खड़ा करने के पीछे की मंशा कुछ ऐसी ही है। चरखे के संगठित अभियान का ध्येय यह है कि मशीनों को उसके वर्चस्ववादी और शोषणमूलक स्वभाव से विरतकर उसे उचित स्थान पर स्थित किया जाए। मेरी योजना के तहत मशीनों की प्रकृति बदलने वाले लोग संपूर्ण मानवजाति के बारे में सोचेंगे, न कि वे केवल अपने बारे में या केवल अपने देश के बारे में सोचेंगे!

यंग इंडिया, 17-9-1925

भारत के सात लाख गांवों में निवास करने वाले जीवित उत्पादकों के सामने निर्जीव मशीनों का जखीरा नहीं बिछाना चाहिए। मशीनों का सही उपयोग यह है कि आदमी की कोशिशों में वह सहायक हो और उसे सुगम बनाए। आज के जमाने में मशीनों का अधिक से अधिक उपयोग इसलिए किया जा रहा है कि वे संपत्ति का केंद्रीकरण कुछ लोगों की मुठ्ठी में कर रही हैं और लाखों औरतों और मर्दों की अवहेलना करते हुए उनके मुंह से निवाला छीन रही हैं।

हरिजन,14-9-1935

जब उत्पादन और उपभोग दोनों ही स्थानीय स्तर पर होता है तो किसी भी कीमत पर बड़ी मात्रा में उत्पादन करने का लोभ जाता रहता है। हमारे समय की अर्थव्यवस्था की जो भी अंतहीन समस्याएं हैं, वे दूर होती हैं। यह नहीं होगा कि मुठ्ठी भर लोगों के हाथ में असंगत तरीके से जमाखोरी हो। यह भी नहीं होगा कि पर्याप्त होने के बावजूद लोगों के लिए अभाव हो।

हरिजन, 2-11-1934

मशीनों के माध्यम से उद्योगों का केंद्रीकरण हो, मैं व्यक्तिगत रूप से इसका प्रबल विरोधी हूं। अगर भारत ने हर तरह से खद्दर को अपना लिया, तो मैं समझता हूँ आधुनिक भारत मशीनों से उतना ही लेगा जितना कि जीवन को सुव्यवस्थित बनाने के लिए अनिवार्य हो और श्रम बचाने में सहयोगी हो।

यंग इंडिया 24-7-1924

यदि ऐसा हुआ, लंकाशायर भारत और दूसरे देशों के दोहन के लिए मशीनों का इस्तेमाल न केवल बंद कर देगा, बल्कि इसके विपरीत भारत के गांवों के अपने आपास को कपड़े में बदलने की प्रविधि का आविष्कार भी करेगा। मेरी योजना के अमल से यह नहीं होगा कि अमेरिका अपनी नई निपुणता से दुनिया की दूसरी प्रजातियों का शोषण करेगा और अपने को अमीर बनाने की कोशिश करेगा।

यंग इंडिया, 27-9-1925

दुनिया में इतनी हाय-तौबा क्यों मची हुई है? एक मात्र कारण शोषण है। मैं यह कहना नहीं पसंद करूंगा कि दुर्बल देशों का शोषण मजबूत देशों द्वारा किया जा रहा है। यह कहना सही होगा कि एक देश दूसरे देशों का शोषण करता है। मशीनों के प्रति मेरे एतराज का मुख्य कारण यह है कि वह मशीन ही है जो एक देश को दूसरे देशों के शोषण करने लायक बनाती है। मशीन अपने आप में एक निष्प्राण चीज है जिसे अच्छे या बुरे मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हम यह भी जानते हैं कि मशीनों को बुरे मकसद के लिए सहज ही इस्तेमाल किया जा सकता है।

यंग इंडिया, 22-10-1931

मशीनों की अपनी जगह है। वे आई हैं तो बनी रहेंगी, लेकिन उसे मनुष्य के श्रम की जगह नहीं लेने देना चाहिए। विकसित खेतीबाड़ी अच्छी है, मगर किसी कारणवश ऐसा हुआ कि एक आदमी मशीनों के माध्यम से पूरे भारत की जमीन जोत दे और खेती की पूरी पैदावार पर अपना नियंत्रण बना ले तो लाखों लोगों के पास कोई काम नहीं होगा। वे बेकार हो जाएंगे वे बेवकूफ बन जाएंगे और भूखों मर जाएंगे। बहुत से लोग ऐसी स्थिति के शिकार पहले ही हो चुके हैं। हर पल यह खतरा बना रहेगा कि और भी बहुत से लोग इस बुरी स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे। मैं घर में इस्तेमाल होने वाली मशीनों में और अधिक सुधार का स्वागत करता हूँ। परंतु हाथ से तकुआ चलाने की जगह बिजली से चलने वाले तकुओं को प्रचलित करना, तब तक अपराध है जब तक कि लाखों किसानों के लिए उनके घर में ही कोई दूसरा काम देने की व्यवस्था न हो।

यंग इंडिया, 5-1-1925

विज्ञान के सभी आविष्कारों को मैं अहमियत देता हूँ बशर्ते कि वे सभी के हित में हों। आविष्कार और आविष्कार में अंतर होता है। हमें दम घोंटने वाली गैसों को तवज्जो नहीं देनी चाहिए जो एक बार में ढेर सारे लोगों को मौत के घाट उतार देती है। ऐसे काम जो मानव श्रम से संभव नहीं हैं, सार्वजनिक हित के कामों के लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। मशीनों की मिल्कियत सरकार की होगी और पूरी तरह से आम जनता के हित में इस्तेमाल होगी।

हरिजन, 22-6-1935

अभी के समय को ‘मशीन युग’ कहा जा रहा है। यह इसलिए कि इस समय की अर्थव्यवस्था पर मशीनें प्रभावी हैं। ‘मशीनें क्या हैं?’ यह किसी की जिज्ञासा हो सकती है। एक दृष्टि से, आदमी दुनिया की बेमिसाल मशीन है। इसका न तो प्रतिरूप तैयार किया जा सकता है और न ही इसकी कॉपी की जा सकती है। हालांकि मैंने इस शब्द का इस्तेमाल व्यापक अर्थों में नहीं किया है। मैंने ऐसी मशीनों के संदर्भ में किया है जो मानव-श्रम या पशु-श्रम की क्षमता की वृद्धि में सहायक और पूरक होने के बजाय उसकी श्रम क्षमता को हथियाने की फिराक में होती है।

मशीनों की पहली चारित्रिक विशेषता यह है। मशीनों की दूसरी चारित्रिक विशेषता यह है कि उसके अपने विकास करने की क्षमता असीमित है। मानव-श्रम के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। एक सीमा के बाद आदमी की श्रम-क्षमता और यांत्रिक निपुणता का विकास नहीं हो सकता। मनुष्य की इस चारित्रिक विशेषता के पार जाकर मशीनें अपनी चारित्रिक विशेषता हासिल करती हैं। ऐसा लगता है कि उनमें ऐसी इच्छा और क्षमता है। यह मानव-श्रम के विरुद्ध है।

मशीनें आदमी की भूमिका खत्म करने की कोशिश ज्यादा करती हैं। एक मशीन सैंकड़ों का नहीं, हजारों लोगों का काम करती है। इससे बेरोजगारों और कम रोजगारों की फौज बढ़ती है। यह उसकी कामना नहीं है, बल्कि प्रकृति है। अमेरिका में, संभवतः, यह अपनी अंतिम स्थिति तक पहुंच गया है।

1908 में मैं दक्षिण अफ्रीका में था। चारों तरफ मशीनें ही मशीनें थीं। मैं आज नहीं, तब से इसका विरोध कर रहा हूँ। मशीनों के विस्तार ने मुझे आकर्षित नहीं किया है, बल्कि विकर्षण ही पैदा किया है। यह एहसास तभी हो गया था कि मशीनें वे शैतान हैं जो लाखों लोगों को दबाने और शोषण करने के लिए हैं। सामाजिक स्तर पर अगर मनुष्य और मनुष्य के बीच बराबरी हो तो मनुष्य की अर्थव्यवस्था में मशीनों की कोई जगह नहीं है।

मशीन-व्यवस्था ने मनुष्य का कद नहीं बढ़ाया है, ऐसा मैं मानता हूँ। अगर मशीनों को उनकी सही सीमा में नहीं रखा गया तो वह दुनिया को बेहतर नहीं बनाएगी बल्कि विकृत कर देगी।

डरबन की यात्रा के दौरान मैंने रस्किन की ‘अनटू दिस लास्ट’ पढ़ी। इस किताब ने मुझे अपनी ओर तुरंत खींच लिया। अगर इंसान को तरक्की करनी है, बराबरी और भाईचारे के आदर्श को हासिल करना है तो उसे ‘अनटू दिस लॉस्ट’ के सिद्धांत को अपनाना होगा और अमल करना होगा। अपने साथ गूंगे, लंगड़े और अपाहिजों को भी साथ लेकर चलना होगा। क्या धर्मराज युद्धिष्ठिर ने अपने वफादार कुत्ते के बिना स्वर्ग में जाने से इंकार नहीं कर दिया था?

हरिजन, 25-8-1946

भारत पर आज पश्चिमी यंत्रों का ऐसा आक्रमण है कि अगर भारत ने उसका सफलतापूर्वक सामना किया तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

हरिजन, 17-11-1946

 

 

प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।

सी–११.३, एनबीसीसी विबज्योर टावर्स, न्यू टाउन, कोलकाता–७००१५६ मो.९४३३०७६१७४