वरिष्ठ कवि। कविता संग्रह ‘तुम अब स्वप्न नहीं देखतीं’, ‘जिंदगी जब हिसाब मांगती है’।

मैं मरुस्थल में एक वृक्ष

मैं मरुस्थल में एक वृक्ष होना चाहता हूँ
छायादार और फलदार
जैसे मां का आंचल
भूख में और धूप में असरदार।

जब मां कहा पृथ्वी हो गई

जब मां कहा पृथ्वी हो गया
पिता कहा तो आकाश हुआ
हवा कहा तो बहन हुआ
खालीपन में भटकता इंसान
अपनों को तरसता
जैसे मरु में सरसता।

थके कदम

थके कदम झुके कंधे
मैंने पूछा, बेकार हो?
उसने कहा, हां! और तुम?
मैंने कहा, मैं भी!
जेब खाली है?
कैसे जाना?
जेब भारी हो तो
कमर सीधी रहती है।

प्रेम

जो लिखा नहीं गया
जो कहा नहीं गया
जो गाया नहीं गया
जो सिर्फ गुनगुनाया गया
बस वही प्रेम है।

द्वारा : 56, धीर पुर, निरंकारी कॉलोनी, अम्बेडकर चोपड़ के पास, दिल्ली-110009 मो.9350147760