हर कोई जब छाती में बहुत से सपने और माथे में बहुत से ख़याल डाल कर घर से ज़िंदगी ख़रीदने निकलता है, और ज़िंदगी के बाज़ार में ज़िंदगी की क़ीमत सुनता है, तो उसकी छाती में खनकते सब सिक्के बेकार हो जाते हैं।
एक ग़ुस्सा था रुके हुए पानी की तरह जिसके निकलने की कोई राह नहीं थी, इसलिए जहाँ वह रुका हुआ था, उन दीवारों को ही चाट रहा था।
जीवन बड़ा अजीब होता है। कई बार उसकी परतों में से हम जिस रंग को खोजते हैं, वह नहीं निकलता। पर कोई ऐसा रंग निकल आता है जो उससे भी अधिक ख़ूबसूरत होता है।
ऐसी कई कहानियां हैं जो कागजों में नहीं हैं, बल्कि औरतों के अंदर लिखी हुई हैं।
जिंदगी तुम्हारे उसी गुण का इम्तिहान लेती है, जो तुम्हारे भीतर मौजूद है…. मेरे अंदर इश्क़ था।
कहानी लिखने वाला बड़ा नहीं होता, बड़ा वह है जिसने कहानी अपने जिस्म पर झेली है।
रात ऊँघ रही है…
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक है
यह सपनों की चोरी ।
तेरा मिलना ऐसे होता है
जैसे कोई हथेली पर
एक वक़्त की रोजी रख दे
जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है
अब सूरज रोज वक़्त पर डूब जाता है
और अँधेरा रोज़ मेरी छाती में उतर आता है
मैं उस वक़्त का फल हूँ
जब आज़ादी के पेड़ पर
बौर पड़ रहा था
वाचन : आरती प्रज्ञा (विविध भारती मुंबई )
ध्वनि संयोजन : अनुपमा ऋतु (लेखिका एवं अनुवादक)
दृश्य संयोजन-सम्पादन : उपमा ऋचा (मल्टीमीडिया एडीटर वागर्थ)
प्रस्तुति : वागर्थ, भारतीय भाषा पारिषद कोलकाता
